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कहानी

जिद्दी रेडियो
पंकज मित्र


दूसरे लोगों के लिए जो आवाज सिर्फ एक 'खट' की थी, स्वप्नमय बाबू के लिए इसी आवाज भर से यह बता देना आसान था कि यहाँ पर कैपिटल 'एच' की जगह स्मॉल 'एच' टाइप हो गया है और ऑनरेबल कोर्ट ऑफ फलाँ बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेंगे कि ऑनरेबल का एच स्मॉल से लिखा जाए, हो तो यहाँ तक सकता है कि इसी गलती पर भन्ना कर बेचारे मुवक्किल की जमानत की अर्जी ही नामंजूर कर दें। इन स्थितियों से बचने के लिए विशेषज्ञता की जरूरत थी और यह विशेषज्ञता वैसे ही नहीं आ गई थी, बरसों की मेहनत कहिए या तपस्या का फल थी कि कचहरी परिसर में नकलखाना के सामने लंबे बरामदे पर बैठे सैकड़ों खट् खटा खट् खट् की आवाजों के बीच भी अपनी एक गलत खट् की आवाज को वैसे ही पहचान लेते थे जैसे शास्त्रीय संगीत का कोई पारखी सैकड़ों सुरों की भीड़ में एक गलत सुर को। सैकड़ों हजारों खटाखट की आवाजें जिसे वे ताल कचहरी कहते थे किसी बड़े आर्केस्ट्रा के सम्मिलित संगीत से भी ज्यादा मधुर लगती थीं उन्हें क्योंकि इसी पर टिका था उनके पूरे महीने का संगीत - आटा, चावल, दूध, चीनी, चाय, बच्चों की किचकिची फरमाइशें, फीस...

खटाक्‌! विवादी स्वर से उनके सोचने की लय टूटी थी, जरूर चाय छलक कर गिरी होगी टेबल पर जिससे हाथ को बचाते हुए चाय का गिलास अंदाज से उठाना था उन्हें, नहीं तो कुर्ते की आस्तीन चाय में लिसड़ जाने का खतरा था और उन्हें बड़ा लिजलिजा लगता था यह अहसास। हल्की-सी खुट् से जोर के खटाक्‌ तक की यह यात्रा कई वर्षों में पूरी हुई थी। चाय का गिलास कभी भी बेआवाज नहीं रख पाती थीं वे। शादी के कुछ दिनों के बाद ही जब इस बात पर ध्यान दिलाया था तो - 'तो क्या हुआ? पोंछ देती हूँ। एक-दो बूँद ही तो छलकी है।'

'नहीं मतलब, क्लायंट्स के कागज पत्तर रहते हैं, चाय गिरी रहेगी तो खराब हो सकते हैं न।'

मेज पर के कागज पत्तरों की संख्या जैसे-जैसे कम होती गई उसी अनुपात में यह आवाज खुट् से हो कर खट्! और अब तो खटाक्‌! अब तो कागज पत्तर रहता नहीं एक भी।

इसी खटाक! की आवाज के साथ ही रेडियो पर सुबह छह पाँच का समाचार आने लगता था। सुबह का पहला गर्मागर्म समाचार, गर्मागर्म चाय के साथ - यही विलासिता थी स्वप्नमय बाबू की जो धीरे-धीरे जिद में बदलती गई थी। शुरू-शुरू का टोकना भी कब बंद हो गया पता नहीं। जब स्वप्नमय बाबू ने अपने पिता की रोब-दाबवाली कहानी पत्नी को सुनाई कि कैसे कप प्लेट बिना पोंछे ट्रे में रखने पर कैसे नौकरों पर बरस पड़ते थे वे - 'सी क्लास का रास्कल है सब! कुछ मैनर्स सीखा ही नहीं!' पत्नी ने सिर्फ एक तिक्त निगाह डाली थी और कहा था - 'हाँ हाथी चला गया, सिकड़ (जंजीर) रह गया।'

उधर समाचारों में अफगानिस्तान पर कार्पेट बमबारी शुरू हो चुकी थी इधर भी - 'कब से बोल रहा है बाबू कि चलिए दिखा देते हैं शंकर नेत्रालय में। अब नया-नया चीज आ गया है। ठीक भी तो हो सकता है आँख, लेकिन नहीं... क्या जो मिलता है। अंधा साँप के तरह संपत्ति पकड़ के बैठे रहेंगे। जिंदगी भर जान खाया अभी भी नहीं छोड़ेगा। बस एक रट नहीं जाना है। अरे! बेटा है, दुश्मन थोड़े है लेकिन जान छोड़ दिया तो आदमी क्या...।'

'तुमको बेटा के साथ जाके घूमने-फिरने का शौक है तो जाओ न, हम मना थोड़े किए हैं, गई तो थी दार्जीलिंग लौट काहे आई चार दिन में?'

'नहीं आते तो कौन देता रोटी बेल के, तीन जगह तो जला लिए हाथ, सूझता है नहीं। जिद कि अकेले रह लेंगे! जिनगी नरक कर दिया।'

ए क्विक ब्राउन फॉक्स जंप्स ओवर द लेजी डॉग - किसी जमाने में टाइपिंग इंस्टीच्यूट में सिखाया गया यह जुमला याद आया उनको। इसी एक लाइन में ए से जेड तक पूरी वर्णमाला समा जाती थी। तब पता नहीं लेजी डॉग क्या करता होगा। क्याऊँ क्याऊँ करके चुप हो जाता होगा या मुकाबला करता होगा। उसका पाला अगर रोज क्विक ब्राउन फॉक्स से पड़े तो क्या संकल्प शक्ति बरकरार रख पाएगा वह। तभी रेडियो पर 'आज का चिंतन' आने लगा था - 'संकल्प की शक्ति' - 'मनुष्य के पास जो सबसे बड़ी शक्ति है वह है संकल्प, दृढ़संकल्प एवं अटूट आत्मविश्वास के साथ...' खट्, खट्, खटाक, खट्, खटाक, टिंग... पूरी सृष्टि को इसी संगीत से भर देने की इच्छा होती थी। बला की तेजी और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान - कामयाब टाइपिस्टों में शुमार था उनका - जज, मजिस्ट्रेट ने कितनी भी कठिन शब्दावली में आदेश क्यों न पारित किया हो। कौन? स्वप्नमय बाबू? वहाँ बैठते हैं, नकलखाना के बरामदा पर बाएँ से चौथे नंबर पर। रेमिंग्टन की मशीन होगी। सामने के बाल थोड़े झड़ गए हैं... लंबी नाक, पाँच बजते ही उठ जाएँगे। कागजों को समेट कर फाइल में और टाइप मशीन को काठ के बक्से में डाल कर हरक्यूलिस साइकिल के कैरियर पर - खास तरीके का बनवाया है। प्लास्टिक के एक थैले में फाइलें ले जाएँगे घर पर कर लेंगे - सुबह मिल जाएगा आपको... सब्जी वगैरह खरीदते हुए चार किलोमीटर साइकिल चला कर पहुँच जाएँगे शहर के एकदम किनारे गंगातट पर बने पुश्तैनी पुराने मकान में... सब्जी के परिमाण एवं गुणवत्ता से ही आँक लेगी पत्नी आज की कमाई - 'अभी कटहल तो महँगा मिला होगा। अरे! सहजन भी आ गया बाजार में।' बच्चों की पढ़ाई-वढ़ाई हो रही होगी कम धौलधप्पा ज्यादा - बिजली भी कहाँ रहती है? लालटेन में कितना आँख फोड़ेंगे। फिर तुलनात्मक रूप से तेज रोशनीवाली लालटेन तो उन्हें चाहिए - खट् खट् खटाक खुट खटाक टिंग... खेतीबारी का कार्यक्रम आ रहा है रेडियो पर - फलीछेदक कीड़े का उपचार - 'पौधों में फली लगते ही ये छेदक कीड़े उसमें छेद करने लगते हैं। पूरी जीवनीशक्ति ही चूस लेते हैं। इनके उपचार के लिए...'

आज सी.जे.एम. साहब को उनका पेशकार डाँट रहा था चेंबर के पास बने रेस्टरूम में - 'ऐसे कैसे चलेगा? बचवन का फीस, राशन सब्जी - मेरा नही आपका। कहाँ से बेवस्था होगा? सबका बेल रिजेक्ट कर दीजिएगा तो?' जब्बर सी.जे.एम. के चेहरे पर फलीछेदक कीट लग गया था। जैसे पत्तियाँ भँगुरा जाती हैं न उसी तरह। पिता जी बताते थे एक जमाना था जब सी.जे.एम. या ए.डी.जे. के सामने खड़े होने में बड़े-बड़े पुलिस कप्तानों की घिग्घी बँध जाती थी। घिग्घी तो उनकी भी बँधी हुई थी पता नहीं क्यों सी.जे.एम. ने उन्हें तलब किया था। इंतजार में खड़े थे रेस्टरूम के सामने, तभी पेशकार तीता चेहरा बनाए निकला - 'जाइए, साहब बुला रहें है क्या गड़बड़ किए हैं आर्डरशीट में?' - व्यंग्यपूर्ण मुस्कान!

'आप ही किए हैं टाइप?' वह शेर की माँद में थे, ऐन शेर के सामने और शेर का चेहरा बिल्कुल तना था। भँगुराहट गायब थी। फलीछेदक कीट का उपचार हो चुका था।

'ज्जी'

'कितना दिन नौकरी है?'

'जी आठ साल।'

'वालंटरी रिटायरमेंट ले लीजिए।'

'ज्जी?'

'आप अंग्रेजी सिखाएँगे हमको? स्पेलिंग सुधारने की हिम्मत कैसे हुई?' शेर की दहाड़...

'जी, वो ट्रेसपासिंग में डबल एस...'

'स्लिप ऑफ पेन नहीं होता है, इसका प्रचार करने की क्या जरूरत थी?'

'जी हमने नहीं...'

'ज्यादा होशियार मत बनिए, गेट आउट!' शेर ने सिर्फ घायल करके छोड़ दिया था। वह भँगुराए चेहरे के साथ बाहर आए। टाइपिंग स्पीड साठ से चालीस हो गई थी। उस रात विविध भारती के छायागीत कार्यक्रम में अहमद वसी ने गम शीर्षक से गीत बनाए थे - 'चले भी आओ कि बड़ी उदास है रात'। अहमद वसी की उदास मखमली आवाज और गमगीन करते गाने - उसकी पलकों से आँसू का एक कतरा फिसल कर गिरा जिसकी आवाज सुनी थी उन्होंने। वैसे भी जब आँखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होती जा रही हो तो अनसुनी आवाजें भी सुनाई देने लगती हैं।

इट्स इलेवन फिफ्टीन - सिरहाने रखी टाकिंग क्लॉक का बटन टटोल कर दबाते ही आवाज आई। अपने कमरे में बिछावन पर बैठे-बैठे जब बोर हो जाते हैं स्वप्नमय बाबू तो बातचीत होती है टाकिंग क्लॉक से। रेडियो जब तक बजता रहता है तो समय का अंदाजा होता रहता है। लेकिन दस बजे दिन से बारह बजे तक बड़ी मुश्किल हो जाती थी। किसी आती-जाती आहट को पकड़ कर दाग देते हैं सवाल - 'कितना बजा है?' अड़ोस-पड़ोस का कोई बच्चा हुआ तो बता भी देता है और अगर वे हुईं तो साथ-साथ कुछ सुभाषित भी - 'हुँह! कोन ऑफिस जाना है? बैठे-बैठे कितना बजा है? एक आदमी खड़ा रहेगा इनको बताने, ग्यारह बजा है।' अब किसी आदमी का खड़ा रहना तो मुश्किल ही था और बीच में झपकी आ गई तो समय की डोर हाथ से छूट कर 'भक्काटा'। कब हो गई 'भक्काटा' पता ही नहीं चला। बाबू उस समय आठ नौ साल का रहा होगा। डोर पकड़ कर वह बचपन को जिंदा कर रहे थे। गंगा के ऊपर उड़ती जा रही थी पतंग, तभी रामेश्वर बाबू के बेटे ने बगलवाली छत से कब पेंच लड़ा दी देख ही नहीं पाए। बाबू जब तक - खींचिए, खींचिए अरे, धत्‌ तेरी - भक्काटा हो गया न! रुआँसा हो गया था बाबू - 'दिखा नही आपको?'- हाँ, दिखा तो नहीं। - एकदम नहीं? न!! दूसरे ही दिन आँखों के डॉक्टर को दिखाते हुए आए और एक भयानक सत्य को दबाए हुए आए दिल में -

'आपके खानदान में किसी को ग्लूकॉमा भी था?'

'हाँ! माँ को था मेरी।'

'ओह!' डॉक्टर ने सिर्फ अफसोस व्यक्त किया था। फिर तो आवाजों पर ही निर्भरता बढ़ती गई थी उनकी। टाइप के अक्षर धुँधले होते जा रहे थे। फाइल पढ़ना तक मुश्किल होता जा रहा था। पत्नी ने कुछ दिन पढ़ने की कोशिश की, उकता कर छोड़ दिया - 'सारा दिन खटो, खाना बनाओ, कपड़ा धोओ, बरतन बाशन, झाड़ू पोछा, फिर रात को आँख फोड़ो। हमसे नहीं होगा।'

'लाइए हम पढ़ दें।' रामेश्वर बाबू का बड़ा बेटा कहता था। एक दीवार के आर-पार आवाजें तो आवाजाही करती ही हैं बेरोकटोक। लड़का जहीन था। ठीक पढ़ता था, जहाँ नहीं पढ़ पाता था स्वप्नमय बाबू अंदाज से ठीक करवा देते थे - खट् खटा खट् खुट् टिंग... पर जैसे ही पौने नौ बजे न्यूजरीडर की आवाज गूँजी कि लगा देता था पूर्णविराम - 'रुकिए काका! न्यूज सुन लें जरा।' और खेलों का समाचार आते आते आवाज आ जाती थी दीवार के उस पार से - 'मंटू आ जाओ!' समाचार के सिग्नेचर ट्यून पर लहराते हुए मंटू बाबू अपने घर और उनकी उँगलियाँ टाइपराइटर के की बोर्ड पर ही रखी रह जातीं।

खटाक्‌! थाली टेबल पर आ गिरती थी तब तक, हड़बड़ा कर फाइलें समेटते थे वे। कहीं पानी वानी छलक कर गिरा तो मुवक्किल दुर्गति कर देंगे - दुर्गति तो हो गई थी तब तक - आज भी वही कद्दू की सब्जी और रोटी थी। लेकिन कुछ कहना मतलब - 'नहीं तो कौन-सा मीट-मछली लाके धर दिए हैं जो पका दें। जो रहेगा वही न!'

'फिर भी, यही कद्दू का सब्जी वहाँ भाभी बनाती हैं तो...।'

'हाँ! तो जाइए न वहीं खा आइए। बेटा तो मार खा के आया ही है चप्पल से। आप भी जाइए, हुँह! भाई और भाभी।' जहर उगलने के लिए किसी प्रशिक्षण की जरूरत नहीं - सोचते हैं स्वप्नमय बाबू। फरमाइशी गानों के प्रोग्राम में 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' गीत की फरमाइश थी और आशा भोंसले की चुलबुली आवाज कमरे में फुदक रही थी, पर स्वप्नमय बाबू तो आशा भोंसले की गायन प्रतिभा की मौलिकता की जगह बेटे की उस मौलिक प्रतिभा को याद कर रहे थे जब...

'रंजू! घड़ी कहाँ है मेरी?' भैया कचहरी जाने के लिए तैयार थे।

'क्या पता! आप ही रखे होंगे कहीं।' भाभी व्यस्त थीं।

'यहीं तो रखे थे, अच्छा खोजना, यहीं होगी कहीं।'

'बाबू कहाँ गया है?' स्वप्नमय बाबू ने पूछा था पत्नी से।

'दोस्त लोग के साथ सिनेमा गया है।'

'यहाँ कौन दोस्त मिल गया इतना जल्दी, और पैसा? तुमने...।'

'नहीं, कह रहा था कि दोस्त लोग ही ले जा रहा है।' दो घंटे के अंदर ही भैया वापस आए थे कॉलर से बाबू को पकड़े। उनका दंतकथा क्रोध प्रसिद्ध था। रास्ते से ही चप्पलों से पीटते ला रहे थे - 'बोल! करेगा फिर? इसी उमर से... ओफ!'

'छोड़िए छोड़िए किया क्या है इसने।' भाभी ने बीच-बचाव किया।

'क्या किया है? भोलवा पाकिटमार के साथ जा के घड़ी बेच आया है हिंदुस्तान वॉच में। भोलवा दोस्त हो गया इसका। वो तो हिंदुस्तान वॉचवाला घड़ी पहचानता था। भोलवा को सिपाही लोग का लात पड़ा तो गलगला के उगल दिया सब बात। अब शरम के मारे क्या बोलते हम - इ पापी! माथा नीचा कर दिया।'

गुस्से की एक तेज लहर स्वप्नमय बाबू के दिमाग में भी उठी और चप्पल उठा कर दौड़े...

'छोड़िए न! बच्चा है, गलती हो गया मारिए दीजिएगा क्या?' पत्नी ने प्रतिभाशाली पुत्र को छत्र-छाया में ले लिया था साथ ही जहर की एक तेज पिचकारी - 'घर का बड़ा लोग से ही सीखा है।' दूसरे कमरे से अदृश्य दिशा में छोड़ी गई पिचकारी खदबदा कर भैया भाभी के कानों में भी पड़ी।

'क्या बोल रही हो, होश है कुछ?'

'हाँ! खूब है, क्या गलत बोले?'

भाभी के जोर से रोने की आवाज आई तो स्वप्नमय बाबू ने उछल कर ढूँढ़ कर (शाम हो रही थी और कम दिख रहा था उन्हें) गला पकड़ लिया पत्नी का - 'साली! टेंटुए दबा देंगे। अंटशंट बोले जा रही है।'

शायद यही एकमात्र अवसर था जब लेजी डॉग ने पौरुष-प्रदर्शन करते हुए क्विक ब्राउन फॉक्स को दबोच लिया था। भाभी ने रोते हुए आ कर छुड़ाया था और कहा था... 'हम लोग का समय ही खराब चल रहा है तो सुनना ही पड़ेगा। समय खराब होने से तो हाथी के उपर बैठे आदमी को भी कुत्ता काट लेता है। सबको पढ़ा-लिखा के आदमी बना दिए तो कमा खा रहा है सब। किसी से माँगने गए कुछ?'

'समय खराब' का निहितार्थ था भैया का सस्पेंशन जो उन पर लादा गया था दंतकथा क्रोध के कारण झूठे गबन का मामला बना कर। सुबह ही सपरिवार प्रस्थान कर गए स्वप्नमय बाबू।

कितने खुश हो कर बेटे के जनम की खुशी की मिठाई खिलाई थी घोष दा को... घोष दा ने कहा था अपने इसी अंदाज में - 'अरे वाहवा बाजी मात कर दिया स्वपन! यही दो ठो मेशीन तो पूरा हिंदुस्तान में फस्सकिलास काम कर रहा है - एक रेमिंग्टन का टाइपराइटर और दूसरा इ बच्चा पैदा करने का मेशीन।' फिर लीला भाभी को आवाज दी - 'ओगो शुन छो! स्वपनेर छेले होय छे। वंशेर उद्धारक एसेछे। गोरोम गोरोम चा करो।' (सुनती हो, स्वप्न के लड़का हुआ है, वंश का उद्धारक आया है, गरमागरम चाय बनाओ तो)। हरदम चाय पीने का कोई नया बहाना चाहिए होता था घोष दा को। घोषबाड़ी की प्रतिष्ठा थी मुहल्ले में एक जमाने में लेकिन अब... वही पत्नी जिसे कहती है न अपने अंदाज में - हाथी चला गया था सिकड़ (जंजीर) रह गया था। पर घोष दा अलमस्त जीव, वही जंजीर बजाते घूमते थे मस्ती में। हाथों में हुनर था। चुटकी बजाते ही रेडियो, घड़ी, बिजली का सामान सब ठीक... और टाइपराइटर के तो विशेषज्ञ ही थे। शहर के दूसरे छोर से भी लोग लादे पहुँचते - मोहल्ले के बच्चों के प्रिय घोष काकू जब तब रेलगाड़ी का इंजन बन बच्चों की कतार बनाए अशोक कुमार का प्रसिद्ध 'रेलगाड़ी छुक छुक' गाते हुए बगान में घूमते। लीला भाभी हँस कर कहती - 'बूड़ोर भीमरति होयेछे' (बूढ़े का दिमाग फिर गया है)। रेलगाड़ी में हरदम बाबू गार्ड बनने की जिद करता क्योंकि सीटी बजाने को मिलती थी और घोष दा हो हो करके हँसते हुए उसे गार्ड नियुक्त कर लेते। स्वपन बाबू को तो पहले से ही रेडियो सखा बना रखा था - कि हे रेडियो सखा! काल सुना सचिन देव बर्मन का गाना, सचिन दा का जवाब नहीं, बोलो?

'घोष दा! बड़ी चिंता में हूँ।'

'क्यों, क्या हुआ?' घोष दा गुनगुनाते हुए ट्रांजिस्टर की मरम्मत कर रहे थे।

'बाबू फिर फेल हो गया मैथ्स और इंगलिश में।'

'अरे हम तो केतना बार बोला हमारा पास भेजो हम पढ़ाएगा उसको। कार्तिक घोष का पढ़ाया लड़का कभी फेल नहीं होता। टेन उद्धार कर लेगा।'

कर भी लिया उद्धार उसने। खटाक्‌ की आवाज के साथ पंडित भीमसेन जोशी की सात पुश्तों का उद्धार कर दिया पत्नी ने - 'रात में भी आदमी जरा चैन से सोएगा सो नहीं। पें...पें...। बाबू, ले जा रेडियो अपना रूम में...' बाबू जो पढ़ाई के मूकाभिनय में व्यस्त था अब संगीत के बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ पढ़ने का अभिनय करने लगा। फलाँ 'एफ.एम. हिल्ला के रख दे' के साथ... और जब बी.ए. में एक दो असफल प्रयासों के बाद अंतिम रूप से घोषणा कर दी बाबू ने कि पढ़ाई-वढ़ाई से साला कुछ नहीं होता, असल बात है पैसा कमाना - बालीवुडीय शब्दावली में कहा था - 'रोकड़ा होना माँगता समझा क्या?' तो उसकी माँ ने एकदम समझा और इस बात की जोरदार शब्दों में वकालत भी की - 'पढ़-लिख के दो-चार हजार रुपल्ली के नौकरी से क्या होगा। ठीक ही तो कह रहा है बाबू, आखिर बाबू के बाप ने जिंदगी में खटाखट की नौकरी कर पाया क्या? कौन सा कद्दू में तीर मार लिया। दोस्तों के साथ पार्टनरशिप में बिजनेस में उतर रहा है तो क्या बुरा है? कल को छोटू कहीं इंजीनियरिंग में कंपीट कर गया तो औकात है 'खटाखट बाबू' की उसको पढ़ाने की?' ऐसे ही पलों में स्वप्नमय बाबू इतना अकेलापन महसूस करने लगते कि बतियाने लगते थे रेडियो से और टाकिंग क्लॉक से -

'इट्स इलेवन पी.एम., ठीक तो कहती है मैडम।'

'तुम भी!'

'हाँ तो, तुम्हारी जो तनख्वाह है उसमें तो मेरी मरम्मत तक नहीं करवा पाते हो। घोष दा के पास पहुँच जाते हो फ्रीफंड का...'

'पहले तो टाइप करके कुछ एक्स्ट्रा भी... अब तो बत्ती भी गुल हो रही है तो करो बत्ती गुल और सो जाओ।'

'अरे अंधे को बत्ती गुल करने को कहती हो मूर्ख घड़ी।'

'शटअप! इट्स ट्वेल्व।'

इसी बीच बाबू के कमरे से तेज आवाज में टी.वी. चलने की आवाज आने लगती है - 'इट्स टाइम टू डिस्को'। पत्नी ने बताया था कल मुहल्ले में - सबसे बड़ा है और सबसे रंगीन। पहली कमाई से खरीदा है बाबू ने - 'पूरे बीस हजार का है। जिंदगी में कभी खरीद पाते तुम। जब आँख थोड़ी ठीक भी थी तो रामायण के समय पहुँच जाते थे घोष बाबू के घर। अब तो खैर... जा रही हूँ पकौड़ी तलने बाबू के बिजनेस पार्टनर लोग आए हैं...'

हुँह! बिजनेस पार्टनर! - पार्टनर लोगों की आवाजें लहक-लहक कर उनके कुढ़ते कानों तक पहुँच रही थीं।

'क्या आंटी! इतना टैलेंट है आप में, हम लोग तो जानते ही नहीं थे।'

'कितना बढ़िया कामेडी कर लेती हैं।'

आंटी फूल-फूल जा रही थीं। किसी कॉमेडी शो की फूहड़ नकल से बेटे के बिजनेस पार्टनर्स को हँसा रही थीं और पहली बार उनके इस रूप के श्रवण किए थे उन्होंने क्योंकि दर्शन तो संभव नहीं था उनके लिए...

'अरे, तो पुराने जमाने की मैट्रिक है मम्मी। जब मोहल्ले टोले में एकाध आदमी ही मैट्रिक पास करता था। वो तो ऐसी जगह शादी हो गई कि...' यह मम्मी की प्रतिभा पर मुग्ध बाबू था - 'तो रात में मीटिंग है न? मिलते है वहीं।' पता नहीं कौन सा बिजनेस था कि हमेशा रात में ही मीटिंग रहती थी... चार पाँच बाइक्स के कोरस ने चौंकाया था -'और कल ही तो करना है न सामाजिक काम।' बाबू के इस जुमले पर सबने ठहाका लगाया था जोर का।

'तुम्हारा लेड़का तो सामाजिक टाइप का है स्वपन। अब हमारा चिंता नहीं है।' घोष दा की कुछ दिनों पहले की बात... उनकी अकल्पनीय चिंता थी कि जब वह नहीं होंगे तो आसपास के मोहल्ले में जब किसी की मृत्यु होगी तो मृतक की सद्गति... हँसते हुए कहते थे घोष दा -

'इस फील्ड का सचिन तो हम ही है।'

लड़के पूछते - 'कितना हो गया काकू स्कोर?'

'बाढ़ो साब का मिला के फोर हंड्रेड नाइंटी फाइव। पाँच होने से ही फाइव सेंचुरी।'

...और ये डाबर चौका ...सचिन के बल्ले से निकली गेंद गोली की रफ्तार से बाउंडरी लाइन के बाहर जा रही है। किसी फील्डर के लिए हिलने तक का मौका नहीं और ये चार रन... इसके साथ ही भारत का स्कोर हो गया... रेडियो का नॉब घुमाते हुए क्रिकेट की कमेंट्री आ रही थी...

किसी भी मृत्यु की सूचना सिर्फ मिल जानी चाहिए घोष दा को। सबसे पहले पहुँच कर कमान थाम लेंगे। घी, पंचकाठ, तिल, लावा... सामानों की कंठस्थ लिस्ट... अर्थी अपनी देख-रेख में बनवाते घोष दा, हाथ से नाप कर कफन का कपड़ा फाड़ते घोष दा, लकड़ियाँ सजाते घोष दा, श्मशान के शिबू डोम से मोल-भाव करते घोष दा - 'हमारा अपना आदमी था शिबू। बस रख लो। दुख में है आदमी।'

शिबू झुँझलाता - 'सब तो आपका अपना ही है घोष बाबू, हमारा भी तो यही कमाई है न।' लाल आँखोंवाला शिबू लुकाठी सुलगा देता था। क्या मजाल कि बिना पूरी तरह फूँके, पानी में दहाए चलें घोष दा - कितनी भी ठंड हो, कितनी भी रात हो जाए गंगा में दो डुबकी लगा कर ही लौटेंगे - लीला भाभी तब तक गरमागरम चाय की कई प्यालियाँ हाजिर रखेंगी - पहुँचते ही चाहिए होगा उनको।

'सीख लो बाबू, सीख लो हमारा रहते। सामाजिक काम है। बहुत पुण्यात्मा लोग को सौभाग्य मिलता है अंतिम समय का साथी बनने का।' बाबू को एकाध बार उन कार्यों में रुचि लेते देख प्रसन्न थे घोष दा...

प्रसन्न थीं पत्नी - घर में सामानों की तादाद बढ़ती देख कर - टी.वी. का गुणगान तो कर ही चुकीं - फ्रिज भी आ चुका था और यह स्वप्नमय बाबू को उससे टकराने पर मालूम हुआ। दरअसल पानी सिरहाने रख दिया जाता था। अब था नहीं तो उठ कर खोजने लगे और धड़ाम से टकरा गए फ्रिज से। पत्नी दूसरे कमरे से आईं और विषाक्त स्वर में बोलीं कि इतना बड़ा फ्रिज रखा है जरा खोल कर निकाल नहीं सकते थे पानी की बोतल। उनके यह भुनभुनाने पर कि फ्रिज का पानी उनका गला खराब कर देगा मजाक उड़ाया गया कि कौन सा इंडियन ऑइडल बनना है उन्हें और सलाह भी दी गई कि बाबू के पार्टनर लोगों के सामने ऐसी देहाती भुच्च की बात न कह दें।

घोष दा के फ्रिज का ठंडा पानी गटागट पीते हुए जब ये वाकया उन्हें सुनाया तो बोले - 'तुम भी अजब जिद्दी हो। अरे! बेटा नया फ्रिज लाया है तो पियो पानी। फ्रिज का पानी कैसे पी रहा है यहाँ।'

'नहीं घोष दा, कुछ ठीक नहीं लग रहा।'

'अरे बाबा, तुम्हारा लेड़का उन्नति कर रहा है तो तुमको तो खुशी होना चाहिए। सिरिफ नजर रखेगा कि कुछ उल्टा सीधा काम तो नहीं कर रहा है।'

स्वप्नमय बाबू ने खुद को व्यंग्य से मुस्कराते महसूस किया। करीब करीब अंधे हो चुके आदमी को नजर रखने को कह रहे थे घोष दा।

रात को बात करनी चाही पत्नी से -

'सुनती हो।'

'हाँ! सुनिए तो रहे हैं इतना दिन से।'

'बाबू क्या बिजनेस करता है पूछी हो कभी?'

'पूछना का है? नजर नहीं आ रहा। आपके तरह थोड़े हैं हम। बैंकवाला लोग रखा है रिकवरी एजेंट कि क्या कहता है।'

'काम क्या करना पड़ता है?'

'लोन उन लेके जो वापस नहीं करता उससे वापस करवाने का काम है।'

'तनख्वाह?'

'सब चीज करिए रहा है तो तनखा का पूछें। चुपचाप सुत रहिए। एतना दिन के बाद तो नजर फेरा है भगवान। आपके फेरा में तो जिनगी नरक हो गया था। बाबू बोलता है छोटुआ के पढ़ाई-वढ़ाई का चिंता नहीं है। इंजीनियरिंग में का कम पैसा लगता है बंगलोर में? करा देगा एडमीशन बोलता है। सुतिए अब। रातों में तो चैन दीजिए। एतना दिन बाद तो रात को नींद आता है ठीक से...। और ई अपना पिनपिनिया रेडियो बंद कीजिए अब।'

दोपहर में भी इसका एक्सटेंशन चला - 'इ देखिए जी, इतना मोटा सिकड़ बना के लाया है सोना का। हम बोले कि अब इ उमर में सोना हम का पहनेंगे जिनगी भर तो दुख काट लिए, अब तुम्हारी वाइफ आएगी तो पहनेगी। लेकिन वाह रे बेटा! कहता है जो भी अरमान बचा है पूरा कर लो। पैसा का फिकिर मत करो। घर में भी हाथ लगाएगा अब। टाइल्स लगा के झकाझक करेगा। पुराना तोड़-तोड़ के - हाँ जी मिठाई कौन पूछता है, भोज खिलाएँगे भोज! गृहप्रवेश का। हाँ जी! तो घर तो नए न होगा।' इस बार तो पड़ोस की महिलाओं को दी गई ये गर्वमिश्रित सूचनाएँ अपने कमरे में धीमी आवाज में रेडियो सुन रहे उनींदे स्वप्नमय बाबू तक भी पहुँच रही थीं। उन्हें लगा टाकिंग क्लॉक हँसी थी - इट्स थ्री पी.एम.। ठीक से चलना चिकने फर्श पर टाइल्सवाला। अभी तो पुराने घर में अंदाज हो गया है चलने का। रेडियो ने भी सुर मिलाया - 'चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना' - फरमाइशी गीत के कार्यक्रम का आखिरी गीत बज रहा था। खटाक्‌! की आवाज के साथ चाय का प्याला आ चुका था। साथ ही कई बाइक्स भी रुके थे घर्र-घर्र... टीं टीं पीं पीं की ध्वनियों से गुंजायमान हो चुका था मोहल्ला। पत्नी की खुशी भरी व्यस्तता छलक-छलक पड़ने लगी... बीच-बीच में बाबू उसे बाइक पर पीछे बिठा कर बाजार ले जाता था छोटी-मोटी खरीदारी करने। बहुत ही उत्साहित रहती थी तब वह। फुर्र-फुर्र हवा में उड़ रही हो जैसे एक रंगीन चिड़िया की तरह - शायद हल्का मेकअप वगैरह भी करती हो भला क्या पता... घर्र-घर्र करते हुए बाइक पर बैठने के पहले प्रस्ताव को ही ठुकरा दिया था स्वप्नमय बाबू ने, जब हर पहली तारीख को पेंशन का थोड़ा सा रुपया निकालने वह बैंक जाया करते थे, पूरे समारोहपूर्वक। पहले रामेश्वर बाबू के बेटे की खोज करते फिर मोहल्ले के रिक्शेवाले जागेसर की। फिर चलती थी सवारी तकरीबन चार किलोमीटर की यात्रा पर। पत्नी ने प्रस्ताव रखा - 'कहाँ इतना झमेला करते हैं। बाबू के साथ बाइक पर चले जाइए। दस मिनट में काम हो जाएगा।' ठोस से 'नहीं' के बाद - 'हाँ! पूरा मोहल्ला जब तक जानेगा नहीं कि खटाखट बाबू आज पेंशन का कुछ हजार रुपल्ली उठाने जा रहे हैं। तब तक...' उनकी तबियत होती कि कहें - 'इसी कुछ रुपल्ली पर जिंदा थे अब तक' लेकिन फिर 'ए क्विक ब्राउन फॉक्स'...

घोष दा ने भी कहा था - 'बेकार का जिद है तुम्हारा, बाइक पर घर्र से चले जाओ।'

कुमार गंधर्व की आवाज रह-रह कर पछाड़ खा रही थी। ऐंठ-ऐंठ कर लपक-लपक कर बढ़ती फिर पछाड़ खा कर गिर जाती थी - 'साधो देखो जग बैराना'।

'एकदम पागोल हो गया तुम। हजारों हजार कमा रहा है तुम्हारा लेड़का? सब छोड़ के इ पुराना जमाना का रेडियो, टाइपराइटर मरम्मत का काम सीख के क्या करेगा? अरे, अब तो मोबाइल, कंप्यूटर का जमाना है।' घोष दा भड़क उठे थे। फिर मुलायमियत से बोले - 'जानता है स्वपन हम खुद ही कुछ दिन से सीरियसली सोच रहा है, लोन ले के दो तीन कंप्यूटर खरीदेगा। और मोहल्ला का लेड़का लोग को सिखाएगा। अरे, फ्री में नहीं, नॉमिनल फीस पर। हाँ एकदम जो गरीब है उसका...'

लीला भाभी तब तक कूद गईं - 'सबका ठेका ले लिया है तुम्हारा घोष दा। रात रात भर सोता नहीं टेंशन में रहता है। बोलता है लेड़का लोग नष्ट हो रहा है। सबको लाइन पर लाना है। जब से गंगापुल बना तब से मोहल्ला खाराप हो गिया।'

'ओह लीला!' घोष दा ने रोका - लीला भाभी रुकनेवालों में नहीं थी - 'एक महीना से जिद, लोन ले के कंप्यूटर खरीदेगा। इंस्टीट्यूट खोलेगा। हम बोला काहे झूठ झामेला करता है। लोन चुकेगा कैसे। अभी से तो बैंकवाला दौड़ा-दौड़ा के परेशान कर दिया। कौन-कौन छोकरा लोग आता है कभी इ कागज कभी उ कागज, क्या जरूरत है आराम से रहो ना बाबू। एक बार माइल्ड अटैक हो चुका है। क्या गलत बोला, बोलो?'

स्वप्नमय बाबू भला क्या बोलते? बोले घोष दा ही हँसते हुए - 'उ सब बात नहीं है, बैंकवाला तैयार है, बोला कुछ मोर्टगेज करना होगा। हम बोला - मोर्टगेज के लिए घर ठो है तो, इसी से तुम्हारा भाभी ज्यादा परेशान है। बोलता है घोषबाड़ी का इज्जत चला जाएगा। बोलो तुम आदमी का इज्जत होता है कि घर का - हो हो बूझे ना लीला किछुई...' (नहीं समझती है लीला कुछ भी)

लीला भाभी ने तो तब बूझा जब चुपके से घोष दा कंप्यूटर के विशेषज्ञ हो गए, लोन ले कर कई कंप्यूटर भी ले आए और मोहल्लेवालों ने तब जाना जब 'घोषबाड़ी' की पुरानी इबारत पर झकाझक साइनबोर्ड लग गया - लीला कंप्यूटर सेंटर। घोष दा ने कॉलर ऊँचा कर पत्नी की तरफ देखते हुए पूछा था - 'बोलो तो लीला, केमन लागछे?' (कैसा लग रहा है) हेमंत कुमार के बँगला गाने की एक धुन गुनगुनाते हुए उनकी तरफ रोमांटिक नजरों से देखने भी लगे थे।

'दुत्‌! बूड़ो वयसे भीमरति (बुढ़ापे में मति मारी गई है)।' लीला भाभी ने कहा था और रेडियो की टाइमिंग देखिए कि इसी रात विविध भारती ने हेमंत कुमार का वह गीत भी बजाया - 'जरा नजरों से कह दो जी निशाना चूक ना जाए'।

पर चूक गया था घोष दा का निशाना। कहाँ-कहाँ से कंप्यूटर सीखनेवाले छात्रों को पकड़-पकड़ के लाते। अच्छी तरह सिखाते भी, सस्ते के चक्कर में कुछ आए भी पर घोष दा नीट, एप्टेक थोड़े ही हो जाते। धीरे-धीरे शिबू डोम का बेटा, मुसहर टोली, भुइयाँ टोली के लड़के रह गए और घोष दा तो किसी के चाचा, किसी के दादा ठहरे। तीसरे ही महीने से इएमआई का दैत्य घोष दा के पीछे पड़ गया। घोष दा भागते जाते पसीने-पसीने हो कर हाँफते हाँफते, इएमआई का दैत्य पीछे-पीछे। साथ में बाइक्स का हॉरर म्यूजिक। घोष दा रेडियो भी लगाते तो उसमें घर्र-घर्र सुनाई पड़ता। कई दिनों के बाद स्वप्नमय बाबू जब एक शाम घोष दा के घर पहुँचे किसी बच्चे का हाथ पकड़े जैसा कि तकरीबन हर शाम को करते थे वे - तो घोष दा सिर मुँह लपेटे लेटे हैं। लीला भाभी ने बताया - 'दो रोज से बुखार है। हम बोला था इ सब झूट झमेला नहीं करने लेकिन आप लोग तो सब जिद्दी का दल।' कहते हुए अंदर चली गईं शायद चाय लाने। घोष दा ने हाथ पकड़ा था स्वप्नमय बाबू का - पसीने से भींगा था हाथ - फुसफुसाहट भरी आवाज में कहा - 'रास्ता में बैंक का रिकवरी एजेंट लोग बहुत बेइज्जत किया। बोला है घर में भी आएगा। अभी हम टाइम माँगा है थोड़ा। कुछ इंस्टालमेंट दिया था, फिर... अँधेरा में बाइक में बगल से गुजरता है - बोलता जाता है - 'इएमआई दे देना बुढ़ऊ।' चेहरा पहचान नहीं पाया नहीं तो कांप्लेन करता।' फिर गहरी साँस ली घोष दा ने। निराश स्वर में बोले - 'किसका कांप्लेन भी करेगा। एक दिन पेशाब करने बैठा तो पीछे में दो छोकरा बाइक रोक के खड़ा है। शाम को... फिर देखा नहीं... छोड़ो...'

'नहीं, क्या हुआ घोष दा?'

घोष दा के हाथ थरथरा रहे थे। काँपती उत्तेजित मगर मद्धिम आवाज में बोले -'सब नष्ट कर देगा। सब नष्ट हो जाएगा।' डरी आवाज जैसे कुएँ के अंदर से आ रही हो - 'किसी से चर्चा मत करना, हो सकता है मेरा वहम भी हो। कुछ बाइकवाला लोग घेरा था हमको, बोला - क्या आलतू-फालतू बात का प्रचार करता है। अपना काम कीजिए चुपचाप। बाइक पर पुलिस का वर्दी में गंगापुल के पार लड़का लोग रोड होल्डिंग करता है। ट्रक लूटता है इ सब, फालतू बात काहे करते हैं। क्या मतलब है आपका... सब मफलर से चेहरा ढका था लेकिन आवाज से लगा बाबू भी था उसमें - तुम्हारा लेड़का।' फिर अस्फुट स्वर में बोले - 'सब नष्ट हो गया, स्वप्न सब नष्ट... 'आवाज भीगी हुई थी और हाथों में आतंक की कँपकँपी...'

लीला भाभी आ गई थीं और वे चुप हो गए थे और दूसरी रात को पूरी तरह ही चुप हो गए - डॉक्टर ने बताया - 'मैसिव हार्ट अटैक' और मोहल्ले के आँकड़ेबाजों ने कहा कि घोष दा नर्वस नाइंटीज के शिकार हो गए, क्योंकि रघू की दादी, त्रिवेणी का बाप और सीताराम की माँ को ले के चार सौ अट्ठानबे तो हो गया था स्कोर लेकिन चार सौ निन्यानवे में खुद ही...

लीला भाभी ने बताया कि कुछ लड़के जीप पर बैठ कर आए और गाली-गलौज, धक्का-मुक्की भी शायद करके सारा कंप्यूटर वगैरह उठा कर ले गए। बैंक की जबान में रिकवरी... 'नहीं - बाबू नहीं था उसमें'... क्योंकि बाबू तो गृहप्रवेश की पार्टी में व्यस्त था उस रात - पुराने मकान को नया करवा के नए सिरे से गृहप्रवेश। पत्नी के तो पाँव ही जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। पड़ते भी तो कैसे, ऐसा चिकना टाइल्स ही था कि पाँव बिछल बिछल जा रहा था - फ्राईड राइस, कचौड़ी, पनीर बटर मसाला, - नहीं गृहप्रवेश में नॉनवेज नहीं चलता है न - अंत में आइसक्रीम थी... मतलब दहापेल...।

कंठ सूख रहा था स्वप्नमय बाबू का। आज पानी रखना भूल गई थीं शायद। सौ काम होते हैं गृहप्रवेश में, कोई मामूली फंक्शन थोड़े ही था, कानों में कुछ चर्चा भी पड़ी- 'भोज तो लाजवाब था लेकिन गृहप्रवेश के कार्ड में सिर्फ माँ बेटे का ही नाम था, क्या कीजिएगा खैर...'

पानी पीने उठे स्वप्नमय बाबू ... दो तीन कदम ही चले होंगे कि रपट गए एकदम चिकने फर्श पर - धड़ाम।

'क्या हुआ?' थकी उनींदी आवाज आई पत्नी की दूसरे कमरे से।

बाबू दौड़ा आया। जीभ एक तरफ लटक गई थी, सिर टकरा गया था फ्रिज से।

'मम्मी दौड़ो, देखो क्या हो गया पप्पा को।'

मुँह के एक कोर से लार बह रही थी और आँखों से आँसू।

- 'हाँ हाँ तुरंत चले आओ। गाड़ी ले आना। क्या घोष काकू के यहाँ... क्यों? - क्या हार्ट अटैक - अच्छा जल्दी आओ पापा का एक्सीडेंट हो गया है। लगता है हैमरेज हुआ है - फिसल गए थे यार - जल्दी करो।' बाबू मोबाइल पर व्यस्त था। वह मना करना चाहते थे लेकिन एक गुँगुवाहट और अशक्त हो चुके दाएँ हाथ की हल्की-सी जुंबिश के अलावा कुछ नहीं कर पाए। गाड़ी नर्सिंग होम की तरफ दौड़ पड़ी थी... मोबाइल की घंटी बजी।

बाबू - 'क्या आदमी नहीं जुट रहा है? अच्छा! उधर का लड़का लोग को फोन कर देते हैं, घोष काकू के यहाँ पहुँच जाएगा सब। हम तो...'

घबराहट में किसी ने गाड़ी का रेडियो चला दिया था। रेडियो में भी अब उतनी जिद नहीं बची थी शायद, नहीं तो रात के बारह बजे, भला कोई समय है राग यमन कल्याण बजाने का...


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