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कविता

भूलनेवाले
हरे प्रकाश उपाध्याय


भूलनेवाले तो ऐसे भूले हैं
जैसे कि कुछ भूले ही न हों
वे अतीत भूले हैं समूचा
इस तरह जैसे किसी का कोई अतीत होता ही न हो
वे वर्तमान के उस मोड़ पर खड़े हैं
जहाँ से उन्हें उनका भविष्यपथ राजपथ जैसा दीखता है

वे सिर्फ राजपथ देखते हैं
और कुछ नहीं देखते हैं
राजपथ पर वे लार टपकाते हुए स्मृति में
अपना ही प्रतिबिंब देखते हैं
वे मासूम हैं वे हिंसक हैं
उनके हाथों में चमकती हुई कटार है
आपकी गर्दन झुकी हुई है
साँसें आपकी रुकी हुई हैं

वे अवसर को समझते हैं
वे इतिहास को समझते हैं
वे आपकी कीमत समझते हैं
वे अपनी औकात समझते हैं
इसलिए वे ऐसे भूलते हैं
जैसे कि वे भूले ही न हों

वे सिद्धहस्त भुलक्कड़ हैं
इसलिए वे सब याद रखते हैं
और बदला लेते हैं
जैसे कि आपके उपकारों का बदला
वे आपको मिटाकर लेते हैं
वे वर्तमान को ऐसे क्षण से शुरू करना चाहते हैं
जहाँ से उनकी कमजोरियाँ उनकी ताकत बनती हैं
गर इतिहास लौटा फिर अपनी ताकत से
तो वे निस्संदेह वर्तमान भूल जाएँगे
भूलनेवाले अपनी दुम सलामत रखते हैं
हर कुर्सी के आगे हर ताकत के आगे
हर चमकती हुई चीजे के आगे
वे डुलाते रहते हैं इसे वे कभी नहीं भूलते हैं...

वे अपनी क्षमताओं से अधिक अपनी दुम पर भरोसा रखते हैं।

 


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