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कविता

सूरज
हरे प्रकाश उपाध्याय


सूरज
खूब लाल होता है
मगर एकदम लाल नहीं
उसके भीतर भी छिपी रहती है परछाईं
मुझे शक है
सूरज की लालिमा पर
इसलिए
रोज देखता हूँ सूरज का मुँह
और उसकी सच्चाई
जानना चाहता हूँ
मगर सूरज भी बड़ा चालाक है
तोड़ देता है हिम्मत मेरी आँखों की
धमकी देता है जलाने की
अपने तेज से
मैं
उस पर अभियोग भी नहीं चला सकता
क्योंकि वह ऊपर है
खूब ऊपर
मेरे सिर के ऊपर...।

 


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