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कविता

फूल
हरे प्रकाश उपाध्याय


तेतरी ने फूल गढ़ा है
अपने घर के बाहर
अपनी मिट्टी की दीवार पर

फूल बहुत सुंदर है
बहुत सच्चा लगता है
गली से आते-जाते लोगों को
वह बहुत अच्छा लगता है

पर कैसी भी हवा चले
तेतरी के बिन दरवाजे घर में
फूल की सुगंध कोई, कभी नहीं आती
घर के भीतर तो
कालिख भरा धुआँ फैला रहता है
जो तेतरी की आँखों में पानी
भरता रहता है

यह कैसा मजाक है
कि तेतरी के हाथ से
बने फूल
हँसते हैं
और तेतरी के हाथ
हँसी को तरसते हैं!

 


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