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कहानी

केंचुल
प्रत्‍यक्षा


( काही हरे चमड़े से मढ़ी एक डायरी थी जिसके पन्नों की किनारियाँ सुनहरी थीं । उनके भीतर दर्ज़ थी कुछ बातें .. दराज़ में नैप्थलीन की गोलियों की बासी बोसीदा महक जैसे चीज़ों में रच बस जाती है वैसे ही रच गईं , कपड़े की बारीक बुनावट में महीन एक धागा , ऐसा जीवन ही तो था । तो खैर, बात सिर्फ इतनी थी कि एक पिता था जो पति भी था और आदमी भी । जो बेटी पर दिल जान लुटाता था और बीबी पर भी , जिसकी नौकरी गई थी या जाने को थी । एक औरत थी जिसका यथार्थ उस घर के परे था , जो यहाँ सिर्फ एक खामोशी थी , एक छाया और इन सब को देखती एक पाँच साल की बच्ची थी जो फटफट बड़ी हो रही थी , इतनी बड़ी इतनी तेज़ी से । जो जितना प्यार करती थी उससे ज़्यादा नफरत करती थी । डायरी में ये तीन बातें बिलकुल शुरुआत में हरी स्याही से लिखी गई थीं । डायरी हर किसी से छुपा कर महफूज़ रखी गई थी )
हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश

उनको गये लगभग एक साल होने को हुआ । और अजीब बात ये है कि उनका जाना मुझे उनके और करीब आना था । बाकियों के साथ ऐसा नहीं है । उनके लिये रोज़मर्रा के जीवन के तुच्छ दोहरावन ने प्यार के तीखेपन को भोथर कर दिया था । किनारे की ज़मीन एक दूसरे में हिलती मिलती प्यार और नफरत की सीमाओं में लगातार घुसपैठ करतीं । और इस तरह उनके जाने ने उनके दिल और दिमाग को किसी चाकू की तरह काटते दर्द से मरहूम कर दिया था। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं था । मेरे लिये प्यार का समय वहीं थम गया था जिस पल मैंने उनको अंतिम दफे देखा था । मेरा प्यार उस वक्त के ऊपर नाचता घूमता चमकता उस समय में अडिग हो गया था ।
मेरी आँखों में आँसू कभी भी बेसाख्ता चले आते हैं । कल ही पुराने कागज़ातों की पड़ताल में उनको लिखी एक चिट्ठी दिखी ।

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रात के दो बजे हैं । मुझे नींद नहीं आती । आजकल किसी भी बुज़ुर्गवार को देख मेरे भीतर ममता उमड़ती है । कंठ से कोई नदी हरहरा कर बहती है छाती तोड़ती हुई । सफेद बाल और झुर्रियों वाली त्वचा देखते ही एक बार चेहरा सहला देने की इच्छा होती है । पापा आपके लिये क्या क्या नहीं किया , आज , अभी सब कर दूँ , सब ।
शाम को लौटते गाड़ी के ठीक आगे छड़ी के सहारे चलते उन बुज़ुर्ग को देखकर , देर होने के बावज़ूद , हॉर्न नहीं बजाया । सिर्फ गाड़ी धीमी कर रोक दिया था । उन्होंने पलट कर मुड़ कर देखा था फिर धीमे से आभार में और शायद अपने बेसहारेपन की शर्मिन्दगी में मुस्कुराये थे । मेरी आँखें भीग गईं थीं ।

उसको उठाती हूँ । उनींदी आँखों से , भर्राई आवाज़ से मुझे पूछता है ,

क्या हुआ , फिर खींचकर बाँहों में भर लेता है 

दुलार से चुमकारते हुये कहता है , अब सो जाओ

मैं परे धकेलती हूँ , गुस्से में , मुझे बच्ची समझा है , बात करो बात करो

मेरी आवाज़ फँसी हुई कमान है । वो उठता है , पानी पीता है , चप्पल पैरों में फँसा कर बाहर बरामदे की कुर्सी खींचता है ।

आओ , बैठते हैं ।

रात रानी की बेल महक रही है , चाँद की रौशनी धीमे धीमे गिरती है । सब तरफ सन्नाटा है । सिर्फ मेरी साँस बोलती है । मैं हथेली में धड़कते एक नब्ज़ को थाम कर कहती हूँ
प्यार से तुम क्या समझते हो ? मेरे अंदर बदहवास परिन्दों का शोर है ।

प्यार कोई ज़िंदा चीज़ है जिसकी अपनी उम्र होती है ।

मैं नहीं मानती , तुम चाहे जो कहो

अँधेरे में अचानक कोई रौशनी एक पल को लपकती है , गायब होती है । रेल की सीटी कौंधती है , फिर डब्बों की धड़धड़ाहट और उनकी खिड़कियों से चौकोर भागते रौशनी की सीढ़ियाँ ज़मीन पर एक तेज़ रेखा खींचती विलीन होती है । रेल का सफर मुझमें एक टीस भरा अवसाद भर देता है । एक आश्वस्ति भी । जीवन आखिर एक यात्रा ही तो है ।
जो लोग इस दुनिया से चले जाते हैं , सफर में हमसे आगे हैं , बस । हमारी ट्रेन भी चल पड़ी है ।

उसकी आवाज़ दब जाती है । मैं एक पल को सिहर जाती हूँ । किसी प्लैटफॉर्म पर बिछुड़े लोगों की भीड़ दिखाई देती है । वो अलग खड़े हैं , सफेद कपड़ों में , हँसते । जैसे हमेशा हँसते थे । मेरे अंदर दुख का एक ग्लेशियर है जो हर वक्त धीमे धीमे पिघलता है । भीतर एक नमी बनी रहती है हमेशा । मीठी सी नमी ।

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दिन का आलम कुछ और होता है । रात का कुछ और । सब चीज़ें तब अपना स्वरूप बदल लेती हैं । पेड़ बदल जाता है , चिड़ियों का शोर बदल जाता है । घर के फर्निचर्स ठहर कर तौलते मापते साये बन जाते हैं । खिड़कियाँ बन्द हो जाती हैं । एक भारीपन उतरता है , सूरज डूबते ही मेरी खुशी पर अँधेरा पड़ जाता है । मेरी साँस हदबद छूटती है ।

बाहर सायादार पेड़ झूमता है । चिड़ियों का एक शोर मचाता झुंड उसकी फुनगियों पर टिकता है ।

आयेशा एक पल को झाँकती है , दरवाज़े की ओट से इत्तिला देती है , टेबल लगा दिया , अब जाती हूँ । इस छोटे से शहर के पुराने से बंगले में साँझ प्रेतछाया सी उतरती है । उदासी का ऐसा मनहूस आलम कि दम घुट जाये । बीच रात का आलम कुछ और होता है , सारंगी के उदास धुन जैसा पर शाम डूबती साँसों की बेकल अफरा तफरी होती है ।

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश

मैं अपनी आत्मा में छाले महसूस कर सकती हूँ । वो मुझे देख हँसते हैं , उनकी आँखों के किनारे हँसी की रेखायें नाचती हैं । मुझे तकलीफ होती है , मुझे बेसहारेपन का अहसास होता है । मैं शिकायत करती हूँ , आपने मुझे धोखा दिया । मेरी आवाज़ छोटी बच्ची की आवाज़ है । मैं उनसे कहती हूँ , हमेशा सफेद पहना कीजिये । वो कहते हैं छोटी बच्ची अपने बाल झाड़ लो । मैं उठती हूँ दिशाहारा जैसे कोई चिडिया अनजाने आकाश में उड़ती हो । वो किसी भी समय से ज़्यादा अब मेरे साथ हैं । उनका जाना आखिरकार उनका मेरी तरफ आना ही था । मैं दर्द में नहाये उस चेहरे को परे ठेलती हूँ और हाथ आगे बढ़ाकर उस आवाज़ को छूती हूँ जो हरदम मुस्कुराती थी
उसका कहना है कि प्यार करना और पसंद करना दो अलग चीज़ है । प्यार करते हुये भी आप किसी को सख्त नापसंद कर सकते हैं । जैसे अपने माता पिता को ।

यात्रा में जीवन की फिलासॉफी आसानी से समझ आती है । खासकर जब बाहर झमझम बारिश हो रही हो । मैं समझाना चाहती हूँ कि जीवन में कोई नियम नहीं होता , कि देखो आज सुबह से मन भरा भरा लग रहा है जबकि कहीं कोई दर्द तकलीफ भी नहीं , कहीं पहुँच जाने की जल्दी भी नहीं । तुम्हारी कही बातें तक मुझे बहकाती नहीं अब।

कॉफी के प्याले पर लम्बी धारियों को छूते मैं लम्बे अकेले दिन के वहशीपने को सोचती हूँ । बाहर अगर बारिश होगी मैं पत्तों से गिरते पानी को देखूँगी । वो देर रात को आयेगा । मैं बेचैन बरामदे में टहलूँगी । आयेशा भीतर से मुझे अपलक देखती अचानक कहेगी , आज जल्दी चली जाऊँ बाईसाहब ? मेरी बेटी बारिश से डरती है ।

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उन्होंने सँभाल कर रखा था , दस साल की बच्ची की लिखी चिट्ठी । प्यारे पापा आप कहाँ हैं ? मुर्गी का बच्चा कैसा है , उसको मेरी तरफ से रोज़ चावल खिलाईयेगा और मेरे पौधे को पानी भी । यहाँ कबूतर ने दो अंडे दिये हैं । पिन्नी का कछुआ कल बाल्टी में गिर गया था । मरा नहीं लेकिन उलट गया था । मग से भरकर उसे निकालना पड़ा था । आप कब आयेंगे .........................................................................................................

ऑडिपस का उल्टा क्या होता है ? मैंने उससे पूछा था ।

एलेक्ट्रा कॉम्प्लेक्स ? अपनी साईको अनालिसिस कर रही हो ?

मैं खुद को पढ़ती हूँ आजकल । चश्मा नाक पर सरकाते मैंने गँभीरता से कहा था । बेडलाईट की रौशनी में उसका चेहरा पत्थर और कालिख का बना दिखता था । पीछे दीवार पर उसकी छाया अपने में मशगूल थी । कमरे में रौशनी का सिर्फ एक टुकडा था । थोड़ी देर में उसकी नाक बजने लगी थी । रात के बियाबान में किताब में नाक घुसाये मैं धीमे धीमे सिहरती थी । जैसे पूरी छाती में धूँआ भर गया हो ।

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उसने बिफर कर कहा था एक दिन ,

तुम कभी भी खुश नहीं रह सकती ।

मैंने कहा था , मुझे अपनी माँ से नफरत है ।

उसने कहा था , तुम्हारे अंदर फज़ूल की शिकायतों का पुलिन्दा है। मैंने कहा था , आखिर उन्होंने कब क्या किया है मेरे लिये ?

तुम अपने पिता की वजह से नफरत करती हो उनसे मैं पापा से बेहद ....

इसमें तुम्हारी माँ का क्या दोष ? तुम कुछ भी नहीं समझते , मुझे भी नहीं , मैं हिस्टेरिकल हो रही थी ।
मेरे होठों के कोनों से झाग निकल रहा था । मेरा बदन काँप रहा था ।

उसने शाँत होते हुये कहा था, तुम्हारी माँ एक बेहद भली औरत हैं ।

उस वक्त मैंने उससे भी बेईंतहा नफरत की थी । मेरी छाती कट कट कर गिर रही थी । मैंने फुँफकारते हुये कहा था , जब मुझे उनकी ज़रूरत थी , कहाँ थीं वो , नॉट लाईक पापा....

योर फादर वाज़ अ ड्रीमर

मैं रोने लगी थी फूटफूट करके । उसने मुझे बाँहों में भर कर चुप नहीं कराया था । मुझे तौलती गहरी नज़रों से देखता हुआ बाहर निकल गया था ।

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पीछे के जंगल में टहलते मुझे पहली बार इस शहर से अपनापन हुआ । बड़े पुराने पेड़ और झाड़ झँखाड़ के बीच नम छाया में सुस्ताते आवारा कुत्ते , किनारे की दो तीन झुग्गियों के सामने सूखते कपड़े , औरतें मुड़ कर मुझे भौंचक देखते हुये और मेरे कुछ पूछ देने पर फिक्क से हंसती हुईं । दिन भर मैं चली थी । शाम को धूल से अटी लौटी थी । बरामदे में सिगरेट पीते वो मेरे इंतज़ार में था ।

कुछ खास कहा नहीं बस इतना कि आयेशा को कमसे कम बता दिया करो , कहाँ गई थी ।

आयेशा ने वहीं पैर धोने को पानी ला दिया था । मैं झुकी अपने तलवे रगड़ रही थी । खट ! उसने अपने फोन से मेरी एक फोटो खींच ली । बाद में कभी उसका एक प्रिंट निकाला था , जो यहाँ वहाँ होते शायद डायरी के पन्नों में खो गया था ।
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पापा की एक तस्वीर मुझे याद है । बड़े से फ्रेम के चश्मे में ऊपर देखते और शायद कैमरा सामने पाकर अचानक मुस्कुराने के ठीक पहले का चेहरा । माँ की भी एक तस्वीर याद है मुझे । लेकिन मैं याद नहीं करना चाहती उस दूसरी शकल को जो उनके साथ खड़ी है ।

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश
उन्होंने मुझे सटा लिया , मेरे बाल सीटे , मेरे माथे को चूमा । मैंने अपना चेहरा ऊपर उठाया , फिर उनको वापस चूम लिया ठीक उनके होंठों पर । वो हँसे फिर मुझे अपने से अलग किया , तुरत वापस करीब खींचा , मेरे काँख में गुदगुदी की । मेरी हँसी अफरा तफरी में छलक रही थी टूटते झिलमिलाते पानी की तरह । मैं पूरे पाँच साल की थी । …………………………………………………………………………………………………….
तुम उनको पसंद नहीं करती ? उसकी आवाज़ में अचानक समझ आ जाने वाला ज्ञान था । ऐसा नहीं है , मैं उनको प्यार करती हूँ

हाँ प्यार करती होगी लेकिन पसंद नहीं करती अरे ? ये क्या कह रहे हो , मैं डिफेंसिव हुई थी । फिर हँसने लगी थी ।

क्या बेकार की बातें करते हो तुम भी न वो मेरी कुर्सी के पीछे खड़ा था । उसने झुक कर मेरे बाल समेटे , मेरी खुली नंगी गर्दन पर अपनी उँगलियाँ फिरायीं । सुनो मैं कुछ दिनों के लिये बाहर जा रहा हूँ । तुम ठीक तो रहोगी ?

मेरी आँखों में अचानक आँसू उमड़ आये । मैंने उसके हाथ कठोरता से थाम लिया । मुझे ऐसे अकेले छोड़ कर मत जाओ .. मुझे अपने पर भरोसा नहीं । मैं दिन निकाल लूँगी , निकालती रही हूँ न , पर रात ...................................................................................................

पापा दूर चले गये थे । बहुत दूर । सिर्फ चिट्ठियाँ थीं । लम्बी चिट्ठियाँ । मैंने उनकी एक भी चिट्ठी सँभाल कर नहीं रखी । मैंने सब कुछ खो दिया । बचपन के साथ सब । उन्होंने मेरी सब चिट्ठियाँ सहेज रखी थीं । मेरे बचकाने आई लव यू पापा डियरेस्ट कार्ड्स , मेरी आड़ी तिरछी लकीरें , मेरे टॉफी रैपर्स , मेरा हाईट चार्ट ।

मैं उन्हें कुछ भी पोस्ट कर देती थी । जब चिट्ठी न लिखी हो तब रफ कॉपी का एक पेज , ड्राईंग शीट , लूज़ पेपर पर पेंसिल की चिचकारी , छोटे पुरजे , कुछ भी ।
बच्ची , जूते पहन कर आओ , हम घूमने चलेंगे

बच्ची दवाई खा लो फिर मैं तुम्हें अपने से सटा कर सुला दूँगा

बच्ची मेरी प्यारी बच्ची , वो मुझे खींचकर सटा लेते और मेरे बाल सहलाते । उनकी आँखों से आँसू की एक बून्द रिस जाती ।

आप रो रहे हैं ?

नहीं बच्ची , मेरे आँख दुखते हैं , वो मुझे देखकर मुस्कुराते । मैं उनके कनपटी को देखती और पूछती , आप बूढ़े तो नहीं हो जायेंगे ?
नहीं बच्ची मैं कभी बूढ़ा नहीं होउँगा , देखो मेरी कनपटी पर झुर्रियाँ नहीं है , मेरे बाल काले हैं ।

फिर हर सुबह मैं एक बार उनकी कनपटी पर उँगली फिराकर देखती , चिकनी त्वचा । वो धीमे से मुस्कुराते और मुझे प्यार कर लेते ।

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उनकी त्वचा निस्तेज हो गई थी । ज़र्द पीलापन और कान के पास झुर्रियों का जाल ।

आपने मुझसे झूठ कहा था पापा ..

माँ का चेहरा एक दमक से भरा रहता जबकि । वो हर उम्र में जवान थीं । एजलेस । उनके बाल भी काले थे , बिना रंगे हुये । उनके कपड़े हमेशा कलफ लगे सलीकेदार होते । पैरों में पतले चप्पल और हाथ में सोने का एक पतला कंगन । वो गोरी थीं । बहुत । लोग उन्हें मेरी बड़ी बहन समझते थे । मुझे लगता था एक दिन वो मुझसे भी छोटी हो जायेंगी । वो मुझसे सुंदर थी । मैं पापा जैसी थी । साँवली , पतली और चश्मा लगाये । मेरे सब दोस्त उनके दोस्त ज़्यादा बन जाते थे । मेरे दोस्त सिर्फ पापा थे । पापा जो बहुत दूर रहते थे और छुट्टियाँ खत्म होने पर लौटने वक्त स्टेशन पर अँधाधुन्द सिगरेट पीते थे । उनके जाने के बाद मैं उनके तकिये पर मुँह गड़ाये उनकी खुशबू सूँघती थी । रात मुझे खराब सपने आते कि पापा मर गये हैं । सुबह उठकर मैं खुश हो जाती थी इसलिये कि किसी ने बताया था कि मरने का सपना झूठा होता है ।

दिन में खिडकी के सामने मोटर साईकिल पर टिका लड़का मुझे खिड़की पर देख गाता था , जानेमन जानेमन , तुमको मैं चुरा लूँगा तुमसे , दिल में बसा लूँगा ...
मैं खिड़की बन्द करती माँ को देखती थी । वो लड़का माँ के कॉलेज में पढ़ता था और एक दिन मैंने देखा था उसे माँ को देखकर सीटी बजाते हुये ।
हमारा घर बीमार रौशनियों का घर था । कोनों में चुप्पियाँ लटकी रहतीं । छतों से मनहूसियत टपकती ।

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश उन्होंने मार्मलेड पाव रोटी के टुकड़े पर फैलाया और मुझे खिलाया । उन्होंने तब मेरे होंठ अपनी उँगलियों से पोछे और कहा , अब सपने देखो । मैंने उनकी तरफ देखा , मेरा प्यार मेरी आँखों में सूरज की तरह चमक रहा था । काला कौव्वा मुंडेर पर बैठा बेतहाशा काँव काँव कर रहा था । मुझे पता था वो आज आयेंगे । मुझे पक्का पता था । रात में शीशे की खिड़की पर कंकड़ पड़े थे ।

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मैं नहीं चाहती थी कि आज पापा आयें । मेरे अंदर एक डर था । भयानक डर । माँ ने नीली साड़ी पहनी थी और उनके शरीर से एक मद्धम खुशबू उठती थी । उनकी आँखें अधमुन्दी सी थीं ।

मुझे लगा था आज मुझे जागना है रात भर । मेरे जागे रहने से खतरा टल सकता है । मेरी छाती धड़धड़ ऐसे धड़कती थी जैसे फट जायेगी । बीच रात नीम बेहोश आलम में मैंने एक चीख एक कराहट सुनी थी । फिर तुरत माँ की आवाज़ आई थी , कुछ नहीं बच्चे , सब ठीक है तुम सो जाओ ।

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पुराने कागज़ात खंगालते एक अखबार की कतरन दिखी थी और एक अधफटी तस्वीर । किसकी तस्वीर थी और किस खबर की कतरन , मुझे उन सरोकारों की खबर नहीं थी ।

कोई मौत, कोई टूटी ज़िंदगी ? क्या पता किसकी ।
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यू हैव टू लेट गो समडे । मेरी बात पर ध्यान दो

ये कौन आदमी है जिसके साथ मैं समय बिता रही हूँ , मैंने आश्चर्य से देखा था उसे । तुम्हें लगता है मैं किसी छोटी चीज़ पकड़े बैठी हूँ ?

तुम उनको माफ कब करोगी ? जबकि उन्होंने कुछ किया भी नहीं है ?

तुम कुछ नहीं जानते , मैं बिफर रही थी । फिर एकदम ठंडी पड़ गई थी ।

माँ के शरीर से उठते उस मद्धम खुशबू को मैं कैसे एक्स्प्लेन कर सकती हूँ ? और पापा? जो उस बच्ची के बच्चे थे ?

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश

वो मेरी तरफ लड़खड़ाते बढ़े थे और मुझ तक पहुँचते लहराकर गिर पड़े थे । मैंने उन्हें मजबूती से थाम लिया था , उसी वक्त मैं उम्र दराज़ हो गई थी । वो रो नहीं रहे थे । उनका शरीर सूखे बंजर रूदन में हिल रहा था । मैंने उनका माथा थामा था और बेसिन में उन्होंने अपने को खाली कर दिया । बेसिन के इनामेल में हरी उबकाई के अवशेष बहुत दिनों तक सूखे चकत्ते बनाते रहे थे ।मैं अब बच्ची नहीं रही थी । माँ अपनी महक के साथ इस घर से अनुपस्थित थीं ।मैंने रगड़ रगड़ कर घर साफ किया था । पर बेसिन का इनामेल छूआ तक नहीं । वो सिर्फ दूसरे लोग थे अब , मेरे माता पिता नहीं ।दीवार पर की तस्वीर दो अनजान लोगों की थी ।
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उनकी आँखों में अब चुप्पी रहती । मैं उनका चेहरा सहलाती तो उनकी आँखें दर्द में झपक जातीं । वो कहते, बच्ची , मुझे अकेला छोड़ दो

फिर देर रात बत्ती जलाकर कागज़ों को सँभाला करते । मैं दबे पाँव कमरे में झाँकती तो मुड़ कर मुझे देखते और कहते , बच्ची तुम सो जाओ , मुझे काम है ।

मैं बुदबुदाती , अब मैं बच्ची नहीं सोलह साल की औरत हूँ । और आप अब सो जाईये । कभी कभी वो मेरी बात मान लेते थे । कभी नाराज़ हो जाते थे ।

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आलमारी से माँ के कपड़े मैंने हटा दिये थे । माँ जब आई थीं तो बेतरह नाराज़ हो गई थीं ।

ये किसलिये किया तुमने ? उनकी आवाज़ में एक अजीब किस्म की हैरानी थी ?

पापा को मैं सँभाल लूँगी , आपकी ज़रूरत नहीं ।

क्या पागलपन की बातें कर रही हो ? दिमाग सही है ?

मैंने ढिठाई से कहा था , रात को मैं उनके बाल सहला देती हूँ , उन्हें नींद आ जाती है ।

माँ सिर्फ आधे दिन के लिये आई थीं । लौटने के पहले वो पापा के कमरे में एक घँटे के लिये बन्द थीं । मैं बाहर बिफरे शेर की तरह टहल रही थी ।

उस रात पापा ने मुझे अपने कमरे में बुलाया था ।

बच्ची तुम्हें कोई तकलीफ है ? कोई शिकायत है ?

पापा आई लव यू , मैं रोने लगी थी ।

पापा ने उजाड़ आँखों से देखते कहा था, बच्ची तुम्हारी माँ भी तुमसे प्यार करती हैं ।

और पापा आप ?

उन्होंने कुछ कहा नहीं था सिर्फ एकबार मुझे सटा कर कहा था , बच्ची सो जाओ अब
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तुम्हें कभी ऐसा लगा कि तुमने पूरी स्थिति गलत पकड़ी हो ?

मेरी आँखों में मक्कारी थी । चलो तुम्हारी बात एकबार को मान लेते हैं । फिर पापा ऐसे क्यों हो गये ? ज़िंदादिल प्यार करने वाला इंसान जीते जी मर जाये ?

शायद इसलिये कि उनका मन ही ऐसा था , अवसाद भरा ?

जीवन में फॉरगिवनेस बड़ी चीज़ है ।

तुम उनसे कभी मिले नहीं , तुम नहीं समझ पाओगे। तुम उस बच्ची को कहाँ देख पाते हो जो खिली धूप में पिता की गोद से दुनिया देखती है ।और उसको भी नहीं जो पिता की माँ बन जाती है । तुम कहाँ जानते हो वो मेरे माँस मज्जा रक्त में हैं , जैसे मैं उनके में थी ।

हमारे बीच प्यार कहाँ था , समझदारी कहाँ थी । हमारे बीच सिर्फ मेरे कॉम्प्लेक्सेज़ थे । ऐसा वो कहता था । उसकी लड़ाईयाँ ठंडी लड़ाईयाँ होती थीं । अलग और दूर रहकर लड़ी जाने वाली । उसमें बर्फ सा ठंडापन था । उसमें शायद पापा के तत्व मौज़ूद थे । मैं आग सी लहकती थी ।

पिछले दिनों केले के पेड़ के पास कोई साँप निकला था । ड्राईवर और चौकीदार ने मिलकर मार डाला था उसे । आयेशा लपकती झपकती आई थी मुझे बताने । पैरों के पंजों पर झुक कर बैठते मैंने हल्के हाथ से छूआ था उसका शरीर । ठंडा लिसलिसा बेजान । उसके कुचले फन पर खून की पिचकारी थी । उन्होंने बहुत देर तक फेंका नहीं था उसे । लाठी पर लटकाये दिखाने आये थे , ज़रा साहब को दिखा दें ।

उसके साथ लड़ाई ऐसी ही थी । कुचले फन पर चोटखाये खून के निशान ।

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश उनकी तस्वीर मेरे कमरे में लगी थी । धूप की किरणें खिड़की से बहती उनकी तस्वीर पर गिरती थीं । वो मुस्कुराते से दिखते थे , अंतत:। केतली से भाप के छोटे बदहवास हकबक साँस छूटते थे । चाय की खुशबू कमरे में स्थिर लटक जाती थी । ये वही महक थी जो माँ पहनती थीं । मैंने अलमारी से नीली साड़ी निकाली और अपने गिर्द लपेट लिया । 
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अखबार की कतरन में एक छोटी सी खबर छपी थी। सतरह साल की नाबालिग लड़की ने अपनी माँ की हत्या की । उसका कहना है कि उसकी माँ ने अपने प्रेमी के लिये घर छोड़ा । उस सदमें से उसके पिता की मृत्यु हो गई ।

अधफटी तस्वीर में माँ अपने कॉलेज के छात्र के साथ डिपार्टमेंट के किसी फंक्शन में हँसती हुई दिखाई दे रही है ।

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इस बात को वो मानने से इंकार करती है कि माँ दूसरे शहर तबादले पर गईं थी। जाना ज़रूरी था , पिता अपनी नौकरी कुछ दिन पहले खो चुके थे । घर चलाने के लिये उनका नौकरी करना ज़रूरी था । पिता मानसिक अवसाद के शिकार थे ।

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मैं उस साईकियाट्रिस्ट. से नफरत करती हूँ । वो मुझे बच्चे की तरह ट्रीट करता है । मैं औरत हूँ , भरी पूरी औरत । वो मेरी तरफ देखता तक नहीं । मुझसे बात करते बाहर खिड़की से देखता रहता है । पापा आज फिर सपने में आये थे । कहते थे, बच्ची , तुम प्यारी बच्ची हो । उनकी हँसी वही हँसी थी

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मैं आईने में देखती हूँ उस पीली दुबली लड़की को । आँखों के नीचे स्याह धब्बे हैं । कुहनी निकली हुई है और गले की हड्डी भी । फिर उस औरत को देखती हूँ । उसकी पीठ ब्लाउज़ के नीचे अश्लीलता की हद तक माँसल है । उसकी छाती भरी भरी है । लड़की आईने के सामने अपने कपड़े उतारती है । उसके स्तन छाती पर दो नन्हे फूल हैं । लड़की अपनी हथेलियों में फूल भरती है । हाथ अब भी भरा नहीं है । माँ पेट के बल लेट कर किताब पढ़ रही हैं । ब्लाउज़ के बड़े गले से उनका भरपूर वक्ष फटा पड़ा है । लड़की की इच्छा होती है उनको झकझोर कर उठा दे और तेज़ी से उनको कपड़े से लपेट दे । उसके मुँह से भद्दी गाली निकलती है , छिनाल । प्रगट में लड़की कुछ नहीं कहती सिर्फ आईने में देखती है । आईने में खिड़की का एक हिस्सा प्रतिबिंबित होता है । मोटर साईकिलवाला लड़का गेट के पास वाले पेड़ के नीचे खड़ा है । पापा बरामदे में बैठे हैं । उनके सामने कागज़ों का अंबार है । वकील कहता है आपका केस कमज़ोर है पर मैं भरपूर कोशिश कर रहा हूँ , आप रीइंस्टेट हो जायें । पापा अकेले हैं । मैं चाहती हूँ माँ पापा के साथ बैठें । माँ पेट के बल किताब पढ़तीं हैं । लड़की नफरत करती है ।

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हरी स्याही में लिखे डायरी के अंश नफरत नाभि के भीतर मोती है । उसकी महक धड़कती है न चाहे भी । वो जंगली लतर है बेतहाशा फलती है और नन्हे सफेद फूल झरते हैं , झरते ही राख हो जाते हैं । अंगार की दहक में चीते की आँख कौंधती है , उसके नख भी । भोर में चिरैया कितनी भोली दिखती है , कितनी निष्पाप ।
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तुम बारबार पीछे क्यों लौटती हो ? तुम जानती हो तुम्हारी माँ ने पिछले हफ्ते तुम्हें तीन बार खोजा था ? हर बार निराश लौटीं ।

और तुम जानते हो , अगले महीने पापा की बरसी है ?

साईकियाट्रिस्ट का फोन आया था । तुमने पिछली दफा अप्यांटमेंट मिस किया ?

मुझे उससे कोई फायदा नहीं दिख रहा । तुम समझते हो पापा का अवसाद मुझमें आ गया है ?

मेरे भीतर अँधेरा गिरने लगा था । पापा के जाने साथ मेरे भीतर की रौशनी भी चली गई थी ।

वो हफ्ते भर के लिये फिर बाहर गया था । मैंने आयेशा को रोक लिया था ।

रात यहीं सो जाना

बाई साहब मैं अपने बच्ची को भी ले आऊँ
मेरी पलंग के पास फर्श पर पड़े गद्दे पर बच्ची को सुलाते उसने मेरी तरफ मुस्कुरा कर देखा था । फिर फुसफुसा कर कहा था , ये बच्ची मेरे मरद से नहीं है बाईसाहब कमरे में अँधेरा था , सिर्फ बच्ची की साँस थी । बेडसाईड टेबल पर एक इनलैंड था । दिन में आया था , मैंने अब तक खोला नहीं था । माँ एक औरत थीं , मैं भी और अयेशा भी और एक दिन ये बच्ची भी ।
औरत ने अपने शरीर को छुआ । पानी में रौशनी झिलमिलाई । बच्ची की साँस मीठी खुश्बू थी ।

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पुराने अखबार , किताबें और फाईल्स के बीच वो डायरी भी , हरे काही खोल से मढ़ी डायरी भी रद्दीवाले के हाथ बिक गई । वो पाँच साल की बच्ची अचानक औरत बन गई थी । उस साईकियाट्रिस्टा का नाम उसे मालूम पड़ गया था । उसने एक सेशन के दौरान उसे उदास आँखों से देखते हुये कहा था , तुम एक बेहद सुंदर औरत हो । ऐसा तो पति ने भी नहीं कहा था कभी । उस दिन साँझ के गिरने में एक संगीत था । दिल तोड़ देने वाला । औरत ने कुछ नहीं कहा था बस निढाल लेट गई थी । वो भी उसके पास लेट गया था । उसने कहा था मैं सिर्फ तुम्हें अपनी बाँहों में थाम कर लेटना चाहता हूँ , बस और कुछ नहीं और सुबह तुम्हारे साथ जागना चाहता हूँ । औरत रोने लगी थी । उस आदमी की बाँहों में लेटी रोती रही थी । आदमी उसके नमकीन आँसुओं को पीता रहा था । फिर अचानक कुछ वहशी उन्माद में अपनी पहली कही बात को झुठलाते हुये , एक तीखेपन , हदस और छूट जाने के भय से भरा हुआ पागल उन्मत्त प्यार किया था । ये सिर्फ एक बार का प्यार था । ..................................................................................................
मैंने कहा था अब मैं ठीक हूँ उसने तौलती नज़रों से मुझे देखा था , तुम अब ज़्यादा उदास दिखती हो , लेकिन ठहरी हुई । शायद शायद मेरी कुर्सी के पीछे खड़े होते हुये उसने मेरे बाल समेटे , मेरी कनपटी सहलाई खुश रहना जवाब में मैंने कहा सुनो शायद तुम ठीक कहते थे , मैं भी अपनी माँ जैसी ही हूँ , फिर फूट फूट कर रोने लगी । मैंने पापा को दुबारा धोखा दिया हो जैसे ।

उसने मुझे समेट लिया , बच्ची मेरी प्यारी बच्ची , मैं तुमसे प्यार करता हूँ , बहुत । मैंने चौंक कर देखा , पापा सफेद कपड़ों में मुस्कुरा रहे थे ।
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आयेशा की बच्ची चिड़िया जैसे फकफक कर रही है । उसके नर्म बाल उसकी पतली गर्दन पर चिपक गये हैं । मैं एक उँगली उसकी तरफ बढ़ाती हूँ । दो डग आगे बढ़कर मुँह गिरा कर हँसती है , फिर मुड़ कर माँ को देखती है । उसकी गाल पर मच्छर के काटे का निशान लाल दाने की तरह उभर आया है । फिर डगमग डगमग आगे बढ़कर मेरी उँगली पकड़ लेती है ।

मेरे अंदर कुछ ऐंठता है । हिचकियों का एक रेला मेरे अंदर उमड़ता है । मैं फिर बच्ची बन जाना चाहती हूँ । बच्ची मुझे देख डर जाती है , बुक्का फाड़ कर रो पड़ती है । मेरे भीतर कोई चीज़ है जो मरती नहीं ।

चुप हो जा मेरी बच्ची , प्यारी बच्ची आयेशा बच्ची को पुचकारते उठा ले जाती है , बाई साहब को दिक का रही थी मेरी गुड़िया । छाती से उसे चिपटा लेती है । कँधे पर सर टिकाये आँसुओं भरे गाल से गुड़िया मुझे अपनी निर्दोष गीली आँखों से तकती है । 
केले के पेड़ के पास मिट्टी नम है । एक छोटा नल है । कोई अनजाने पौधे की लतर है , नन्हे पीले फूल हैं । पत्थर के दो चार चौकोर उबड़ खाबड़ टुकड़े आड़े तिरछे रखे हैं । उनके बीच में बेतरतीब घास की बढ़त है , थोड़ी सी मिट्टी चिकनी है । पेड़ से छन कर आती धूप गज़ब मीठी है । हाते के उस छोटे कोने में पहुँचते ही मेरी साँस थम गई है । इस थोड़ी सी ज़मीन की हवा अलग है , समय अलग है । मेरी साँस रुक जाती है एक पल को । इतना साफ , इतना सच्चा , इतना निष्पाप । मैं लड़खड़ाती हूँ , मेरी त्वचा में एक लहर उठती है , उदासी की पहले , फिर खुशी की । धूप नरम है और अचानक एक कौव्वा , एकदम काला कौव्वा जाने कहाँ से उड़ता आकर बैठ जाता है नल के पाईप पर ।
भीगे ज़मीन पर चुपचाप मैं चुकुमुकु बैठ जाती हूँ । हथेली फैलाती हूँ । नल से पानी की एक बूँद , फिर एक बूँद गिरती है । मेरी हथेली धीरे धीरे पूरी भीग जाती है ।


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हिंदी समय में प्रत्‍यक्षा की रचनाएँ