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कविता

बारिश
हरे प्रकाश उपाध्याय


रात भर बारिश होती रही
और बारिश में भीगती रही धरती
भीगते रहे पौधे
अँधेरा भीगता रहा
और काँपता रहा थर-थर

बारिश की रात में बिजली चमकी
रोशनी कौंधी
और गुम हो गयी रोशनी
रोशनी गुम हो गयी और
रात भर नहीं रहा अता-पता चाँद का
बारिश खुली और रात ढली
तो चूल्हे में अँगीठी सजाई रामदियाल चाय वाले ने
चूल्हे से धुआँ उठा घनघोर
और रामदियाल की आँखें बरसीं

जब सूरज चमका
बारिश का पानी चमका, कादो-कीचड़ चमका
नुक्कड़ पर वैद्य की आँखें चमकीं

सूरज ने घूम घूमकर जायजा लिया बारिश का
घटा-नफा जिसका जितना था
उसने नोट किया
और थककर आकाश का ओट लिया

फिर घिर आयी रात
फिर छाये बारिश के खुशी-डर
अर्द्धस्पष्ट खुशी के बिस्तरों में दुबके कुछ लोग

कुछ लोगों ने इंतजार की चादर तानी
कुछ लोगों ने मुआवजे के
मुआवजे के आधे अधूरे बकाये
दर्ज किये अपनी अपनी डायरी में
कवियों ने इसी दुख को
लिखा है अपनी-अपनी शायरी में

 


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