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कविता

दफ्तर
हरे प्रकाश उपाध्याय


मेरे घर से दफ्तर की दूरी
अलग अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर
एक तरफ से मापो तो सोलह घंटे हैं
दूसरी तरफ से आठ घंटे हैं
रोज रोज जंजीर गिराओ तो कुछ समय, जो कि दूरी का भी एक पैमाना है
इधर से उधर सरक जाता है
इस तरफ से मापो तो भागा-भागी है, काँव-कीच है
एसाइनमेंट, कांट्रैक्ट, सैलरी, एबसेंट आदि की सहूलियतें हैं
उस तरफ से मापो तो थोड़ी-सी नींद, थोड़ी-सी प्यास है
थोड़ी-सी छुट्टियों, रविवार, बाजार, इंडिया गेट, लोटस टेंपल, बिड़ला मंदिर आदि के पड़ाव हैं
इन सारी चीजों का अर्थ राजधानी के दफ्तर के निमित्त जिंदगी में
लगभग एक ही है
हर चीज में थोड़ी-सी रेत है, चप-चप पसीना है, बजता हुआ हार्न है
इस दूरी को जो रेल मापती है उसमें खूब रेलमपेल है
इन सब चीजों को जो घड़ी नचाती है
उसमें चाँद, आकाश, प्रेम, नफरत, उमंग, हसरत, सपना सेकंड के पड़ाव भर हैं
यह साजिशों, चालाक समझौतों, कनखियों और सामाजिक होने के आवरण में
अकेला पड़ जाने की हाहा...हीही...हूहू... में व्यक्त समय है
इस घड़ी की परिधि घिसे हुए रुटीन की दूरी भर है
समाज की सारी घटनाएँ प्रायोजित हैं जल्दी विस्मृत होती हैं अच्छा है... अच्छा है...

दफ्तर और घर के बीच
आ-जा रही जिंदगी में कोई दोस्त न दुश्मन है
सब सिर्फ मौके का खेल है
यों ही नहीं बदल जाता है रोज राष्ट्रीय राजनीति में सांप्रदायिकता का मुहावरा
ये सारे लोग लगभग एक जैसे जो चारों ओर फैल गये
इनकी जिंदगी में
थोड़ा-सा कर्ज, थोड़ा-सा बैंक बैलेन्स
थोड़ा-सा मंजन घिसा हुआ ब्रश है
बगैर साबुन की साफ शफ्फाक कमीज है पैंट है टाई है
आटो मेट्रो लोकल ट्रेन और उनका एक घिसा हुआ पास है
सुबह का दस है, शाम का दस है
बाकी सब धूल है
जो पैर से उड़ कर सिर पर
सिर से उड़ कर पैर पर बैठती रहती है
और पूरा शरीर उस उड़ान की बीट से पटा रहता है
महँगी कार में चलने वाले अपनी जानें यह कविता
दूरी के बारे में सोचने वालों की कविता है

जैसे मेरी सुबह दफ्तर जाने के लिए होती है
और शाम दफ्तर से घर लौट आने के लिए
दोपहर दफ्तर के लंच आवर के लिए
रात में मैं दफ्तर जाने के लिए आराम करता हूँ सोता हूँ
उसके पहले टी.वी. देखता हूँ
बीवी को गले लगाता हूँ
उसके हाथों से बनाया खाना खाकर
उसकी बाँहों में जल्दी सो लेता हूँ
कि सुबह जब हो
मेरे दफ्तर जाने में तनिक देर नहीं हो
तीन दिन की थोड़ी-थोड़ी देर पूरे एक दिन का
भरपूर काम करने के बावजूद आकस्मिक अवकाश होती है

नींद में मैं दफ्तर के सपने देखता हूँ
सपने में दफ्तर के सहकर्मियों के षड्यंत्र सूँघता हूँ
जिससे बहुत तेज बदबू आती है
इस बदबू में मुझे धीरे-धीरे बहुत मजा आता है
मैं नींद में बड़बड़ाता हूँ
बॉस को चूतिया कह कर चिल्लाता हूँ
नींद में हाथ पैर भाँज-भाँज कर
बॉस की, कलीग की, सीनियर की, जूनियर की

दफ्तर के कोने में काजल लगाये बैठी उस लड़की की ऐसी-तैसी कर देता हूँ
इस तरह चरम-सुख पाता हूँ मैं
मेरे इस करतब को देख कर

नहीं जानता बगल में जग गई पत्नी पर क्या गुजरती है
जैसा कि उसे मैं जितना जानता हूँ हतप्रभ होती होगी\
कहती होगी बड़े वैसे हैं ये
सुबह उठ कर पत्नी चाय बनाती है मेरी नींद के बारे में पूछती है
मैं अनसुना करता हूँ
और लगा रहता हूँ युद्ध की तैयारी में एक औसत आदमी जैसा लड़ता है युद्ध
ब्रश, शेविंग, बूट पालिश, स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ सब जल्दी में
इस बीच कभी भूल जाता हूँ फूल को पानी देना
किसी बच्चे को दो झापड़ मारता हूँ
पिता कहते हैं जैसे जैसे मुझे समझदार होना चाहिए मैं चिड़चिड़ा होता जा रहा हूँ
दफ्तर जाकर काम निपटाता हूँ
इसको डाँटता हूँ उससे डाँट खाता हूँ
दफ्तर में ढेर सारे गड्ढे
इसमें गिरता हूँ, उसे फाँदता हूँ
यहाँ डूबता हूँ वहाँ निकलता हूँ
कुर्सी तोड़ता हूँ कान खोदता हूँ
तीर मारता हूँ अपनी पीठ ठोकता हूँ

अखबार पढ़ता हूँ देश में तरह तरह के फैसले हो रहे हैं
प्रधानमंत्री, फलाँ मंत्री इस देश जा रहे हैं उस देश जा रहे हैं
देश में यहाँ-वहाँ बम फूट रहे हैं
इसमें मुसलमानों के नाम आते हैं
और एक दिन कहीं किसी साध्वी के हाथ होने के सबूत भी मिलते हैं
तो तमाम राष्ट्रवादी उसकी संतई और विद्वता के किस्से बताने लगते हैं
उसे चुनाव लड़ाने लगते हैं
किसी प्रांत में कुछ लोग ईसाइयों की सफाई में लग जाते हैं
हमारे दफ्तर में इससे उत्तेजना फैलती है
इस आधार पर फाइलों को लेकर भी साजिशें होने लगती हैं
फिर कहा जाता है देश के कर्णधार ही सब पगले और भ्रष्ट हैं
तो हम जो कुछ कर रहे हैं कौन गलत कर रहे हैं
अलग-अलग गुट बन जाते हैं
और अपने गुट के कर्णधार को कुछ कहे जाने पर जैसे सबकी फटने लगती है
गुस्सा करने लगते हैं लोग गाली-गलौज
प्रमोशन करने-कराने रोकने का यह एक आधार बन जाता है... बनने लगता है

हमने अपने-अपने घरों में मनोरंजन के लिए टी.वी. लगा रखा है
यह कम जिम्मेदार नहीं है हमारे द्रोहपूर्ण ज्ञान के विकास में
यहीं से हम नई-नई गालियाँ, डिस्को, गुस्सा, प्यार करना और अवैध संबंध बनाना
सीख आते हैं और दफ्तर में उसकी आजमाइश करना चाहते हैं
वहाँ एक से एक अच्छी चीजें हैं
नचबलिए हैं, लाफ्टर शो हैं, टैलेंट हंट हैं, क्रिकेट मैच, बिग बॉस और
एकता कपूर के धारावाहिक
पर मैं सोचता हूँ इससे अपन का क्या
दफ्तर न हो तो पैसा न मिले
पैसा न मिले तो केबल कट जाए
फिर ये साले रहें न रहें
भाड़ में जाए सब कुछ
गिरे शेयर बाजार लुढ़के रुपया
सुनते हैं गिरता है रुपया तो अपन की गरीबी बढ़ती है - बढ़ती होगी
अपन का क्या अपन कर ही क्या सकते हैं

बस सलामत रहे नौकरी
बॉस थोड़ा बदतमीज है
कलीग साले धूर्त हैं
कोई नहीं,
कहाँ जाइएगा सब जगह यही है
अपन ही कौन कम हैं

राजधानी में इधर बहुत बम विस्फोट हो रहे हैं
क्या पता किसी दिन अपन भी किसी ट्रेन के इंतजार में ही निपट जाएँ
माँ रोज सचेत करती है
बेटा, जमाना बहुत बुरा हो गया है
खाक बुरा हो गया है
हो गया है तो हो गया है
अपन को कोई डर नहीं
मुझे तो दफ्तर जाते न डर लगता है न कोई उमंग
न चिंता न खुशी
यही है कि आने-जाने वाली ट्रेन लेट हो
तो थोड़ी बेसब्री जगती है
सरकार पर थोड़ा गुस्सा आता है
बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर प्यार उमड़ आता है
वैसे वे कौन सी दूध की धुली हैं
आदमी तो सब जगह एक से...

 


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