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कविता

लालटेनें-1
नरेश सक्सेना


रोशनी का नाम लेते ही
याद आता है सूरज
याद आती हैं बिजली की बत्तियाँ और टार्चें
लेकिन अंधे तहखानों
और जहरीली गैसों से भरे मैनहोलों में
उतारी जाती हैं सिर्फ लालटेनें
जो अक्सर वहाँ से बुझी और तड़की हुई लौटती हैं
हमें खतरों का पता देती हुई
क्योंकि वहाँ जाकर लालटेनें बुझ जाती हैं
वहाँ जाकर आदमी का दम घुट जाता है।

 


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हिंदी समय में नरेश सक्सेना की रचनाएँ