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कविता

दरार
नरेश सक्सेना


खत्म हुआ ईंटों के जोड़ों का तनाव
प्लास्टर पर उभर आई हल्की-सी मुस्कान
दौड़ी-दौड़ी चीटियाँ ले आईं अपना अन्न-जल
फूटने लगे अंकुर
जहाँ था तनाव वहाँ
होने लगा उत्सव
हँसी
हँसी

हँसते-हँसते दोहरी हुई जाती है दीवार।

 


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हिंदी समय में नरेश सक्सेना की रचनाएँ