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कहानी

एक अमूर्त तकलीफ
रमेश बक्षी


पहले तो डॉक्‍टर, मुझे बार-बार छींकने के लिए क्षमा करेंगे। बाहर भी बैठा था और आपने बुलाया, उससे पहले मैं बुरी तरह छींक रहा था। वहाँ मेरे आस-पास बैठे मरीज यही समझ रहे थे कि मुझे फ्लू या डेंगू किस्‍म की कोई बीमारी हो गई है, लेकिन यह छींकना मेरे साथ क्रॉनिक है। यह आप समझ लीजिए कि कोई बीस बरस मैं इसी तरह छींक रहा हूँ, यह सच है कि मेरी नाक, जो किसी पकौड़े की शक्‍ल में उभर आई है, यह इसी शाश्‍वत नजले के कारण। इस जुकाम के इलाज की बात तो बाद में करूँगा, लेकिन पहले मैं यह बताना चाहूँगा कि आप मुझे सीरियसली लें और चाहें तो ऐसा लाँग-टर्म उपचार भी सुझा सकते हैं, जो अधिक समय तक चले लेकिन मुझे स्‍वस्‍थ कर दे। वैसे अगर आप एकदम मुझसे पूछ लें कि बीमारी क्‍या है तो मैं हकलाने लगूँगा। ऐसी कोई बीमारी मुझे नहीं है, जिसे मैं नाम दे सकूँ या जिसके लक्षण देखकर आप मेडिसिन की किताब में से कोई नाम ढूँढ़ सकें।... उफ् एक्‍सक्‍यूज मी डॉक्‍टर, इसी छींक ने बड़ा परेशान कर रखा है ना। लेकिन यह तो कोई बीमारी नहीं है। मैं घर से चला तो एस्पिरिन लेकर ही चला था कि आपके सामने बैठूँ तब तक तो कम-से-कम न छींकू, लेकिन छींक पर कोई वश नहीं। किसी तरह छींक को अगर मार जाओ तो बड़ा फ्रस्‍ट्रेशन हो आता है। मैं तो इससे घबराता नहीं और बीमारी भी नहीं मानता इसे। जैसे कल जरा भीग गया था। दिन भर पानी बरसते रहने से बोर हो गया था। घर से निकला तब भी रिमझिम रूकी नहीं थी, लेकिन बादल खाली होते जा रहे थे। चार कदम आगे बढ़ा कि जोर की बारिश होने लगी।

कितनी रौनक है इन दिनों में डॉक्‍टर। बच्‍चे चहकते फिरते हैं, लोहड़ी के दिन हैं न। मैं जिस रोड में खड़ा था, वहाँ तिल रखने की जगह नहीं थी। वे सब बेहद प्‍यारे बच्‍चे थे, खुशियाँ उनके चेहरे पर तैर रही थीं और ऐसी अद्भुत सिलाई के कपड़े पहने हुए कि मैं अपने पैर के नीचे की जमीन उन बच्‍चों के लिए छोड़ता रहा और थोड़ी देर बाद मैंने पाया कि मैं बरसते पानी में खड़ा हूँ। लेकिन मानसिक रूप से मैं बहुत प्रसन्‍न था। मैं उन बच्‍चों की बातें सुनता जा रहा था... लेकिन उसे छोड़ूँ डॉक्‍टर। वह एक अलग ही कमजोरी है, लेकिन जुड़ी है मेरे उठने-बैठने के साथ...

ओह, क्षमा करें। आपने अच्‍छा किया कि मुझे रोक दिया और यह याद दिला दिया कि डॉक्‍टर भूमिका में विश्‍वास नहीं रखता। ठीक है, मैं आपके प्रश्‍नों का उत्‍तर पहले दे दूँ...। उम्र इकत्‍तीस वर्ष है...। ना, पिता को कोई बीमारी नहीं थी। वे सेरिब्रल हेमरेज से मरे थे और उनके पिता प्‍लेग से। माँ को हाई ब्‍लड प्रेशर है... लेकिन डॉक्‍टर, मेरा रोग, मेरा रोग है। उसका पैतृकता से संबंध नहीं जोड़ सकते आप। जो मैंने देखा और जो मैंने सहा है, उसका परम्‍परा से कोई दूर-दराज का ताल्‍लुक नहीं। खैर, आप जानकारी के लिए जानना चाहते हैं तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। अच्‍छा, ठीक है, मैं आपके सवालों का जवाब दूँगा। जी, एम.ए. तक पढ़ा हूँ। स्‍मार्ट, इन्‍डस्ट्रियस, इन्‍टेलिजेंट, शार्प एंड ऐन एसेट टु द जॉव गिवन टु हिम...। प्रिंसिपल के सर्टिफिकेट के ही ये शब्‍द नहीं है, सही भी हैं। जी, टॉप किया था युनीवर्सिटी में। आपने ठीक कहा, जब पी.एस.सी. से सिलेक्‍ट हुआ था और सरकारी नौकरी जॉयन की थी तो मेडिकल हुआ था। हाँ, दुबला-पतला ऐसा ही था। तब एन.ए.डी. था। ग्‍लैन्‍ड्स, थायरॉयड, लीवर, कीडनी, लंग्‍ज सब एन.ए.डी.। तब भी डॉक्‍टर, मैं उत्‍सुक था कि कोई बात तो एडवर्स डिटेक्‍ट हो जाय।... ब्‍लड प्रेशर 70 और 112 था। यूरिन एनालिसिस नॉर्मल था। यह आठ साल पहले की बात है। उन लोगों ने मुझे दैहिक रूप से फिट का सर्टिफिकेट दे दिया था लेकिन मुझे अपना आप अन-फिट लगता रहा। सरकारी नौकरी करने से जूते पर पॉलिश करना बेहतर और डिगनिफाइड जॉब है। जिन लोगों के साथ मैं था, वे हमेशा पेंशन, ग्रैच्‍युटी, पदोन्‍नति, इंक्रीमेंट की बातें करते रहते थे और सबको तरह-तरह की बीमारियाँ थीं - किसी को हाइड्रोसील, किसी को पाइल्‍स, यही सब...। मैं तो भागा। मुझे लगा ये मुझे अकालवृद्ध कर देंगे।... नहीं, महीने की पहली को कुछ दिनों का गुजारा करने के लिए गिनती का रुपया मिल जाए, उससे सब कुछ थोड़े ही हो जाता है। माना वह रुपया जरूरी है लेकिन मैं क्‍या हो जाऊँगा उस नियमितता से, उस रोज के क्रम से, उस निश्चिंत जीवन से - यह जानने के लिए किसी बोझ लदे खच्‍चर की तरफ देख लेना काफी है।...

आपने ठीक कहा, एक-एक बात लेना ही ठीक होगा। तो मैं पहले ही आपको अपनी पास्ट-डिजीज के बारे में बतला दूँ। ठीक है, मैं आपको छोटी-से-छोटी बात भी कह दूँगा। वैसे भी किसी से कुछ छिपाने का सवाल नहीं और आप तो डॉक्टर हैं। आपको तो अपनी बात बतलाऊँगा तो आप को रास्ता ही ढूँढेंगें मेरे लिए। देखिए, मैं अपनी बीमारियों के साथ ही उन डॉक्टरों की भी चर्चा करता जाऊँगा, जिन्होंने मेरा इलाज किया है। एक छोटी-सी भूमिका यहाँ भी देनी होगी, जिसके लिए आप मुझे क्षमा करेंगे। हुआ यह कि जब मैं कॉलेज के फर्स्ट इयर में था, अपने से अधिक उम्र के कवि से मेरी पहचान थी। वह बेहद सिगरेट पीता था और जीवन की किसी भी समस्या को चुटकी बजाकर राख की तरह झाड़ देता था। उसे बहुत तेज चलने की आदत थी और उसकी आवाज में बड़ी क्षमता थी। उसका एक लड़की से प्रेम था और एकाध साल में यह स्थिति आ गई कि वे दोनों शादी कर लें। लड़की में कोई बनावट नहीं थी, वह सच ही उस कवि पर जान देती थी। सहसा एक सवेरे वह कवि मेरे पास आया और बोला कि डॉक्टर के पास चलना है। वह बोला - 'शादी मैं भी करना चाहता हूँ, लेकिन पहले चेक-अप करवा लेना जरूरी है।' उसने मुझे जो समझाया, वह यह था कि उसे अपने स्वास्थ्य पर संदेह है। एक्सरे के लिए डॉक्टर ने कहा। उसे निकली टी.वी.। मैं परेशान हो गया, लेकिन वह कवि उसी तरह सिगरेट पीता रहा। उसने आहिस्ता से उस लड़की का मन घुमा दिया। कहीं कोई आहट नहीं। फिर वह सेनीटोरियम चला गया। उस लड़की की शादी हो गई और वह कवि भी स्वस्थ हो गया और अब उसने भी शादी कर ली है। वह अब कविताएँ लिखता भी नहीं और पढ़ता भी नहीं, केवल जिंदा रहता है। मेरे मन में वह कवि हमेशा फँसा रहता है कि जीवन में कोई भी ऐसा काम करना हो, जो जरा लंबे समय चले तो पहले चेक-अप करवा लेना अच्छा है। वैसे मेरे पिता 'एक तंदुरुस्ती हजार नियामत' वाली बात सिखाया करते थे और बचपन में सूर्य-नमस्कार मेरा सबसे प्रिय व्यायाम था, लेकिन अपने स्वास्थ्य के प्रति संदेह करने की आदत तब से ही पड़ी। एक अवांतर बात और कहूँगा। उन्हीं दिनों मेरी एक कजिन घर आई थी उसने अपनी कुछ सहेलियों के सामने मेरी कलाई का ऐसा मजाक उड़ाया कि अपने दुबलेपन पर मैं सरासर रो दिया था। तभी मैं डॉक्टर से मिला था। डॉक्टर कपूर से। मैंने इतना ही कहा था - 'मैं बहुत कमजोर हूँ डॉक्टर और लगता है कि अंदर-ही-अंदर डिके होता जा रहा हूँ।' यह शब्द मैंने दोस्तोयव्स्की से सीखा था। मेरी बात सुनकर कपूर साहब हँस दिए थे - 'तुम्हारा दिमाग खराब हुआ है। तुम सरासर स्वस्थ हो। यह ऐवरेज नॉर्मल इंडियन हेल्थ है। अंडे खाया करो। खा सको तो गोश्त भी खाओ। ये विटामिन की कुछ गोलियाँ है, जब मन में हो तब खा लिया करो।...' तब मैंने दूध पीना शुरू भी कर दिया था। ...उन्हीं दिनों मेरे कान ने मुझे परेशान कर दिया। यह पुराना रोग है। यह नहीं कि उन दिनों कोई विशेष कष्ट उभर आया था... यही कि सहसा मैं अपने कान के प्रति कॉन्शस हो गया था। मैं साफ बतला दूँ। माँ से सुना है मैंने कि जब मैं चार या तीन दिन का था तब मेरे कान में दर्द उठा था। माँ ने तेल गरम करके डाल दिया। कान का टपकना बंद हो गया, लेकिन वह बहने लगा। हाँ डॉक्टर, रोज कान में थोड़ा-सा पीब आता है। माँ-बाप ने इलाज की कोई कसर नहीं छोड़ी थी मुझे याद है, झाड़-फूँक से लगाकर वैद्य-हकीम कोई नहीं कसर नहीं छोड़े थे उन लोगों ने। और-तो-और समुद्रफेन भी पीस कर मेरे कान में डाला जाता था। सच बताऊँ मेरे कान में दर्द न तब होता था और न अब ही होता है। लेकिन मैं धीरे-धीरे बहरा होता गया। दाहिना कान है। कई बार फोन पर लंबी बात करनी हो तो एक ही कान पर चोंगा लगाए कान दुख आता है, लेकिन कोई उपचार नहीं। नहीं, मुझे कोई शर्म नहीं। होटल में भी जब बैठता हूँ तो दोस्त को अपनी बाँई तरफ बैठने को कह देता हूँ कि सुनने में तकलीफ न हो।

...सॉरी। मैं कह रहा था कि सहसा कॉन्शस हो गया कान के प्रति। मैं रोज ई.एन.टी. में जाने लगा। कान का एक्सरे हुआ था। डॉक्टर ग्रवाल थे वे। बहुत ही अच्छे डॉक्टर। मुझे चितिंत देख कर कई बार हँसे देते थे। हाँ, इलाज यह किया गया कि पहले तो मेरे टान्सिल्स निकाल दिए गए। वह छोटा-सा ऑपरेशन था, लेकिन मेरा पहला ऑपरेशन था, मेरी आवाज बदल गई उससे। मैंने पर्सनली फील किया है कि उस ऑपरेशन से गले में एक अजीब किस्म की मर्दानगी आ गई थी। ऑपरेशन के बाद कई बार मेरी गाने की इच्छा होने लगती। गले में दर्द बना रहता था। फिर कान का एक और ऑपरेशन होने वाला था। मैं तैयार था उस ऑपरेशन के लिए लेकिन डॉक्टर ग्रेवाल ने मुझसे कहा - 'कोई लाभ नहीं ऑपरेशन से। कान के ब्लड-सेल्स इफेक्टेड हैं और यह इसी तरह चलेगा। तुम इस जख्म को मेन्टेन किए रहो। सबेरे कान साफ कर लिया। कभी-कभार लोकुला डाल दिया। इस कान को भूल जाओ।...' जो हो। उस डॉक्टर के कहने में वजन था। उसका परिणाम यह हुआ कि पहली बार जब एक लड़की के संपर्क में आया तो अपने बारे में उसे प्रभावित करने वाली बात बतलाने की बजाय मैं बोला - 'मैं एक कान से बहरा हूँ। कभी मेरा दूसरा कान भी चला जाय तो...।' वह लड़की हँस कर बोली थी - 'हियरिंग मशीन के खास दाम तो लगते नहीं।... आप समझ सकते हैं मेरे मनोविज्ञान को। ...मैं आपको उसके बारे में सारी बातें कहूँगा। पहले मैं यह बतला दूँ कि वह एडोलोसेण्ट उम्र थी। इण्टर -मीडिएट का छात्र था और उन दिनों प्रेम रेअर होता था। मैं अपनी गैलरी में बैठे -बैठे तरह-तरह की कल्पना करता रहता। हालत यह हुई कि रोज मैं कल्पना करूँ और रोज मुझे जुकाम हो जाए। वाकई, मोहब्बत और जुकाम को थेसारस में एक ही पंक्ति में डाल देना चाहिए। अब मैं बतलाऊँगा कि कैसे एक बीमारी में से दूसरी बीमारी निकलती है। मुझे यह भ्रम रहने लगा कि मेरी हड्डी में बुखार है। बड़ी फनी है यह बात। उस लड़की से एकाध बात होती और बस। मैं दिन-रात अनाप-शनाप बातें सोचता रहा। सेक्स के बारे मे मेरे कितने प्रगतिशील विचार है, यह बाद में कहूँगा; लेकिन उन दिनों मैं शंख था। स्कूल की सोहबत में जो गंदी-गंदी बातें सभी लड़के सीख लेते हैं, वे ही सब मैं भी सीख गया था। एक दिन चौराहे पर एक हकीम साहब का भाषण सुना -'मेहरबानो, क्या है राज आपके चश्मे का? क्या है राज आपके जुकाम का। क्या है राज कि सुबह जब जगते हैं तब चेहरे पर मक्खियाँ बैठी रहती हैं...?' वह भाषण मुझे पूरा याद है, लेकिन यह बताऊँ कि उस दिन भाषण से आहत होकर लौटा तो वाकई मेरे चेहरे पर एक मक्खी बैठ गई अैर उड़ाने से भी नहीं उड़ी। मुझे लगा, हो-न-हो वही सब मुझे भी है। सबेरे जगा तो चश्मे का नंबर भी बढ़ता हुआ लगा और एक साथ सात छीकें आयीं।... दो दिन तक कॉलेज नहीं गया तो हकीम साहब का ख्याल बार-बार आता रहा और मुझे उस डॉक्टर के पास जाना पड़ा, जिससे वह कवि इलाज करवाया करता था।

वह था डॉक्टर पीटर - मद्रासी था, बिलकुल आबनूस के रँग का, लेकिन युवा लोगों का इलाज करने में उसे विशेष दिलचस्पी थी। कहता भी था - 'मैं बूढ़ों का इलाज नहीं करता। यह नई पीढ़ी जिंदा रहे कि हिंदुस्तान मैदान फतह कर लेगा।' हाँ, शायद स्वतंत्रता संग्राम का डसा हुआ था। बात पर आऊँ... उस डॉक्टर के सामने मैं बड़ी परेशानी में पड़ गया। समझ नहीं पाऊँ कि इससे कहूँ तो क्या? वह मेरा चेहरा देखता रहा। सहसा बोला - 'जबान दिखाइए।' मैंने जबान दिखादी। पूछा उसने - 'पेट साफ रहता है? अपच तो नहीं है? कभी संग्रहणी हुई?' - कहने का मतलब यह कि वह मेरे पेट को लेकर जिज्ञासा करता रहा, जब कि मैं दोनों बार जमकर खाता था और सबेरे उठते ही बाथरूम भागता था। तभी शायद एक मक्खी मेरे चेहरे पर आ बैठी थी या सहसा मेरा चेहरा बड़ा दयावना हो आया था कि वह बोला -'मेरे पास तुम-जैसे कई लोग आते हैं। देखो यह शुरूआत है और दुनिया में कोई बात गलत नहीं है। अब मुझे मालूम नहीं, लेकिन हो सकता है कि तुम्हारा किसी से प्रेम हो और उसके बारे में सोचने से ही तुम्हें सब कुछ उदास-सा लगता हो। और अगर यह बात नहीं भी है तब भी उम्र की गरमी आदमी को बेचैन करती ही है। तुम खूले मन से रहो। अपनी लड़की-दोस्तों के साथ पिकनिक मनाओ। सारी दुनिया तुम्हारी है। गो एंड एन्जॉय...। उस कारण को अगर पकड़ने की कोशिश करते, जिसने तुम्हें बीमार बना रखा है तो मेरे पास नहीं आते, कहीं और जाते।...' पीटर ने उपदेश समाप्त करके मेरे कंधे पर हाथ रख कर सीटी बजा दी थी और फिर मेरे कंधे पर सीटियाँ लगातार बजती रही।...

मैं जरा एक बार नाक ठीक से साफ कर लूँ। माफ करेंगे डॉक्टर, नाक नदी हो गई है।... यह आदत ही पड़ गई है, मैं किसी बात को संक्षेप में कह ही नहीं सकता। मेरे पिता कहा करते थे कि इसे विस्तृति-रोग है। शायद यह डिजीज ऑफ एक्सपैंशन का अनुवाद हो। हाँ, वे संस्कृत के स्कॉलर थे। तो अब डॉक्टर, अपने पिता के शब्दों में मैं अपने दंत-रोग के बारे में आपसे कुछ कहूँगा। आश्चर्य करेंगे आप कि मैं दस की उम्र तक यह नहीं जानता था कि ब्रश कैसे किया जाता है। जी, यह समझिए हमारा परिवार महान ही था। चूँकि मैं नीम की टहनी से दातौन नहीं कर सकता था, वह बड़ी कड़वी लगती थी, सो मेरे लिए कंडे की राख का इंतजाम था। हाँ, उसी का यह परिणाम है कि दाँत सड़ते रहे। सामने का एक दाँत टूटा हुआ है। यह बचपन की शैतानी का परिणाम है। मैं इस दाँत को भी नहीं छिपाता। हुआ यह कि सहसा एक दिन दर्द शुरू हुआ। मेरे दोस्त मेरे जुकाम की तरह ही इसे भी स्वाभाविक धर्म समझे। जी, आप मेरा मतलब नहीं समझे, मतलब यह कि मोहब्बत में दाँत का दर्द भी शुमार होगा, लेकिन मेरी जान पर आ गई। डॉक्टर के पास जाना पड़ा। उसने तत्काल आराम के लिए इक्वेजिस्टिक दे दी। लेकिन मेरी दाढ़ों का बाकायदा एक्सरे हुआ और उस डॉक्टर के अनुसार मेरी दोनों दाढ़ें खराब निकलीं। एक सुझाव यह था उसका कि मैं ये दाँत निकलवा दूँ और नकली दाँत लगवा लूँ। उस समय मैंने उस डॉक्टर का मुँह ही नोंच लिया। मैं आपे से बाहर हो गया। करीब-करीब चीख कर बोला था -'मैं इस समय केवल बीस वर्ष का हूँ और आप मुझे नकली दाँत लगवाने की सलाह दे रहे हैं...।' किसी डॉक्टर पर मुझे वैसा गुस्सा नहीं आया। शाम को मन जब ठंडा हुआ तो खुद ही सोचा कि उस डॉक्टर पर बिगड़ने में क्या रखा है। जब कान से बहरे हैं और आँखें इतनी खराब हैं कि बगैर चश्मे के सारी दुनिया भैंस बराबर है तो क्या किसी से झगड़ते हैं?

यूँ कहूँ डॉक्टर, यह मेरे गंभीर होने की शुरूआत थी। आपको यह लग सकता है कि इस केस-हिस्ट्री को सुनाते मैं इसमें ह्यू मर डालता जा रहा हूँ या कोई मेरी इस छींकती और सुड़कड़ाती शक्ल को देखे तो उसे हँसी भी आ सकती है। लेकिन मैं अपनी भाषा और चेहरे से अधिक अपने एक्सप्रेशन के लिए असहाय हूँ। जो कुछ सहा है, अगर वह किसी कीमत का नहीं है, इस योग्य भी नहीं है कि कोई उस बात को सुनने का कष्ट भी उठाए... फिर भी डॉक्टर, यह वह स्थिति है, जिसमें से मैं गुजरा हूँ।... नहीं, यह पसीना तो ऐसे ही आ गया। असल में इन परेशानियों ने तंग कर रखा है इतना, कि ढंग से मैं बोल भी नहीं सकता, कोई अगर मुझे हिंदुस्तान के बारे में भाषण देने को कहे तो मैं तन्मयतापूर्वक फ्रांस के बारे में बोल जाऊँगा और मुझे यह ख्याल भी नहीं रहेगा कि मेरे श्रोता मेरे भाषण का विषय जानते हैं।... फिर कहाँ-से-कँहा पहुँच गया...। मैं दाँतों के बारे में बात कर रहा था डॉक्टर। तब से दाँत का दर्द एक अनिमंत्रित बीमारी हो गया। जब-तब दर्द उठने लगा। वही डेन्टोल का फाहा कैविटी में रखना और अपने कमरे में कराहना... एक क्रम-सा हो गया। मैं एक ओर डॉक्टर से भी मिला। वह मनोवैज्ञानिक भी था। उसने कहा मुझे दाँतों में सीमेंट लगवा लेनी चाहिए। उसने सीमेंट लगा भी दी। एक-दो दिन के बाद ही फिर कुछ फँस गया कैविटी में और मुझे वह सीमेंट निकलवा भी देनी पड़ी। कहने में कैसा लगता है लेकिन दाँत का दर्द बड़ी निराशा देता है। कई बार इस दर्द के मारे मैंने आगे से थाली सरका दी है। मुझे सपने भी अजीब-अजीब आते कि सारे दाँत गिर गए हैं और मैं बूढ़े लोगों की तरह कोई चीज चिंगल-चिंगल कर चबा रहा हूँ इस सपने के बाद अब आँख खुलती तो शादी करने ख्याल भी पोस्टपोन हो जाता। कहा ना मैंने कि वह डॉक्टर बहुत अच्छा था। मेरे मन को ताड़ गया था शायद ओझा था उसका नाम। उसने कहा - 'ये सिल्वर और सीमेंट मन की समझाइश पके लिए हैं। कभी इनसे दाँत ठीक नहीं हुए। अच्छा यह होगा कि दाँत के बारे में आप सोचना बंद कर दें। मैं नहीं कहता कि दाँत आप निकलवा दें। करना यह होगा कि कैविटी को मैं खरोंच कर बड़ा कर देता हूँ। केवल खाते समय सावधानी रखनी होगी कि पिक साथ रखी और कैविटी को साफ कर लिया। उसमें कोई तकलीफ भी नहीं होगी।' मैंने बात मान ली। और सच बताऊँ, मुझे बड़ा आराम है तबसे। मेरी हर जेब में सींक रहती है और खाने से पहले मैं अपनी टुथपिक का डिब्बा उठा लाता हूँ। मैं समझता हूँ ये रास्ते हैं किसी परेशानी से नजात पाने के। हैं भी मस्ती, बारह आने में एक हजार टुथपिक्स आती हैं - बारहसिंगा ब्रांड।...

नहीं डॉक्टर। आप यह जो कह रहे है कि मेरा इलाज किसी दवाई से नहीं, सायको-थेरपी से हो सकता है, गलत है। आप को अभी तक मैं कवेल पच्चीस प्रतिशत बीमारियों के बारे में बता सका हूँ और आज जिस दर्द से तड़प कर अपके पास आया हूँ। उसका मनोविज्ञान से कोई संबंध नहीं है। वैसे आप अगर मनो वैज्ञानिक होते तो मैं आपके पास आता भी नहीं। मेरी समझ से हर इण्टेलिजेंट आदमी, वह मर्द हो चाहे औरत, खुद अपना साइकेट्रिस्ट होता है। जो, विदेशों में लोग मनोविद के पास केवल इसलिए जाते हैं, कि वे अपने से अधिक सामने वाले व्यक्ति पर भरोसा करते है। और यहाँ डॉक्टर? क्या क्या कहूँ... मेरे पास तो केवल अपना आप ही है, जिस पर यदि जरूरत पड़े तो रिलाई किया जा सकता है। मैं खूब अच्छे से जानता हूँ कि मैं क्या हूँ... हाँ, भ्रम हो सकते हैं, लेकिन वे टूटते भी है। और डॉक्टर मनोविज्ञान यही करता है न कि खाल चीर कर सामने रखा देता है, दिल उधेड़ कर उसका प्रदर्शन कर देता है। सो उसकी मुझे जरूरत नहीं। मेरे जीवन की शुरूआत ही यहाँ से हुई थी कि खाल के नीचे गोश्त और नसों का जाल है और दिल खून की आवाजाही के लिए एक ट्रैफिक यंत्र है लेकिन यह होते भी अगर मेरे भ्रम दूर नहीं होते तो मैं यह कहूँगा कि वे भ्रम मुझे इम्यून कर दें, वे दूर होकर मुझे आराम नहीं देंगे...। मैं समझा नहीं पा रहा हूँ डॉक्टर, कहना यह चाहता हूँ कि सारे रोगों का इलाज है संवेदनहींनता। जो हिस्सा हरकत करे, उसी को सुला दो...। अरे डॉक्टर, मैं वह वज्र दिमाग वाला आदमी हूँ, जिसके कारण नींद की गोली खाकर भी जग बैठता हूँ। हाँ डॉक्टर, मजाक करने को भी मन होता है कि गोलियाँ नकली थीं...।

फिर आप मुझे गलत समझे। ठीक है, यह बात मैं मानने को तैयार हूँ कि कई बार सेक्स के कारण मन में ग्रंथि बन जाती है। जबान लड़कियों को हिस्टीरिया इसी सबसे होता होगा। लेकिन मेरे मन में गइान बनने को कुछ भी रहा ही नहीं, मैं आपके प्रश्न को सहज ही मानता हूँ। मैं कह नहीं पाया, लेकिन वह जो एक डॉक्टर पीटर था, जो अपने आपको नई पीढ़ी का रखवाला कहा करता था, वह यही सब करता था। सिवाय मासिक धर्म को नियमित करने और कंट्रासेप्टिव्ज बाँटने के, उसने कुछ नहीं किया। उस डॉक्टर के कारण ही मैं सेक्स का पाप की जगह, शरीर का धर्म मानने लगा। वह सहज है, व होना चाहिए, जरूरत के मुताबिक बगैरह-बगैरह तरीके से... मैं सोचने लगा था। हाँ, कई से संपर्क रहा। यह देश जैसा है, वैसा है, लेकिन अपनी समझ की किसी लड़की दोस्त को खुले दिमाग से जीने की सलाह देना कोई गलत बात नहीं है। अब इतनी उम्र हो गई डॉक्टर और दोस्तों के बीच बड़ा बदनाम हूँ अपनी तथाकथित प्रगतिशीलता के कारण। कई दोस्त मुझे एच.एच. कहते हैं - वही लोलिता का हीरो। कई कारपेट-बैगर भी कहते हैं, लेकिन मेरा सारा जीवन गुनाहे बेज्जत होकर रह गया है। मेरी फीलिंग यह है और सहज दोस्तियाँ रही। विचारों की स्पष्टता के कारण किसी भी लड़की को मुझसे अलग होते समय गंगा नहीं नहाना पड़ा, न अग्नि परीक्षा ही देनी पड़ी, लेकिन मैं अपने बारे में सोचता हूँ तो यह साफ लगता है कि मैं घाट के पत्थर की तरह बैठा हुआ आने वाले अच्छे वक्त की प्रतीक्षा ही करता रह गया। मेरा कमरा जैसे कैबिटी है। कई दोस्त आते है, उनकी दोस्तियाँ मुझे भी सुख देती हैं, लेकिन वे गुजर जाते हैं। जो लगा है, वह यह कि मैं एक मेल-प्रॉस्टिच्यूट की तरह बैठा हुआ हूँ और आने वाले और वालियाँ दोस्त नहीं, ग्राहक हैं। हाँ, वॉल्ट व्हिटमैन की यह लाइन रोते रहेः 'आई से यू शैल येट फाइंड द फ्रेंड यू वेअर लूकिंग फॉर'... यह 'येट' जाने कब होगा। ...नहीं, ये साँसें और उसाँसें जैसी भी हैं, सही तो हैं ही। लेकिन मेरे विचारों को आप अश्लील नहीं कह सकते। यह जन्म भर किसी की प्रतीक्षा करते रहना अनैतिक कैसे है... मैं तो नहीं समझता ऐसा। अरे डॉक्टर, वह एक स्टीफेन स्पेंडर है ना। नहीं, उसने मेरा इलाज नहीं किया। वह बड़ा प्रसिद्ध लेखक है। वह बाल सफेद हो जाने तक सामाजिक पार्टियों में पर्टीक्यूलर हो कर जाया करता था। तर्क मैंने रट लिया है। आप भी सुन लीजिए डॉक्टर : 'आई हैड ऑलवेज द रोमेंटिक होप दैट वन डे आई शुड मीट सम वन, परहैप्स ऐट सच ए पार्टी, हूँ वुड ऑल्टर र्माठ व्होल लाइफ।...' तो यह स्पष्ट है कि जो ख्यालों से इतना रोशन होगा, उसे कुंदजहनी का रोग नहीं हो सकता। नहीं कोई वी.डी. कभी नहीं हुई। वैसे उसके बारे में खासा ज्ञान है और कभी संदेह हो तो इंजेक्शन लगवाया ही जा सकता है। मैंने अपने कई दोस्तों को स्वस्थ कर दिया है। यह बात बोलकर बताने की नहीं है डॉक्टर कि आदमी को आत्म-निर्भर भी होना पड़ता है। अरे, आप तो हँस रहे है...

नहीं, मैं तो केवल यह कहना चाहता हूँ कि मुझे ये सब छुटकी-छुटकी बीमारियाँ होती रही, ये सब ऐसी रही हैं, जो दिखाई नहीं देती। जैसे किसी कौ कैंसर हो तो वह हुई सुनाई देने वाली बीमारी, एकदम हल्ला-सा हो जाता है कि फलाँ को कैंसर है। इससे होता यह है कि इलाज का एक निश्चित रास्ता तो रहता है सामने। केवल एक डॉक्टर ने मेरे जुकाम को सीरियसली लिखा था। हफीज ने। वह मेरा दोस्त भी था। मुझे हर समय छींकते देखकर उसने कहा था - 'तुझे किसी चीज की एलर्जी है।' एक रात उसने मुझे हिस्टेमिन दी। रात-भर मुझे ऐसा लगा कि किसी ने मेरे फेफड़ों पर गरम प्रेस फिरा दी हो। मैं एकदम सूख गया। अब उसने मुझे प्रयोगशाला बना दिया। वह मेरे सामने प्याज काटता, वह मेरे सामने तीखा इत्र ले आता, वह मेरे सामने टैल्कम पाउडर बिखरा देता... वह यह प्रयोग कर रहा था कि किस चीज की एलर्जी है मुझे। करते-करते हम दुश्मन को खोज पाए। मेरी रैक से उसने एक किताब निकाली और मेरे सामने उसे दिया -उस धूल के कारण मैं जोर से छींका। उसके बाद बस-स्टैण्ड पर यही हुआ। सुनने में डॉक्टर, शहर के अंदेशे से बीमार होने और शहर की धूल से बीमारी होने में कोई खास अंतर नहीं है। धूल से कोई कट कैसे सकता है और चूँकि मैं धूल से अलग नहीं हो सकता, मेरा जुकाम भी समाप्त नहीं हो सकता। ओह...रूकिए...। उफ्...। यही बड़ी बुरी हालत होती है डॉक्टर कि छींक आने को होती है और आती नहीं... जेब में एविल टैब्लेट्स पड़ी रहती हैं, यही इलाज है और कोई इलाज नहीं...।

अरे, आप ऐसे गंभीर क्यों हो गए? मैंने आप से समय लेते ही कह दिया था कि मुझे पूरा चेक-अप करवाना है। और जब तक मैं सारी बातें आपसे कहूँगा नहीं तब तक आप इलाज नहीं कर सकेंगे मेरा। यह लग सकता है आपको कि मैं थूकने-छींकने जैसी बातों को अननेसेसरी महत्व द रहा हूँ, लेकिन यह सोचना पड़ेगा आपको कि मुझे जैसा युवा बुद्धिमान व्यक्ति अगर किसी 'न-कुछ' बात से परेशान है तो वह भी सीरियस बीमारी है। आप कल्पना नहीं कर सकते हैं, लेकिन अपने आपको स्वस्थ रखने के लिए मैं तरह-तरह के नाटक कर चुका हूँ। अब मेरे ऑफिस के स्टेनो के मुझे बतला दिया कि ब्रायोनिया थर्टी खाया करो। लीजिए, ये गोलियाँ अब भी मेरी जेब में हैं। नहीं, मैं दिमाग से खारिज नहीं हूँ डॉक्टर। मैंने योग तक में विश्वास किया है। उसके लिए योग संघ भी जॉयन किया। सबेरे से मैदान में बिछे, तिरपाल पर खुले बदल बैठकर प्राणायाम और षट्कर्म सीखे हैं मैंने। 'उत्कट-आसन' इतना मुश्किल होता है कि सारा जोर जाँघों पर पड़ता है, लेकिन वह भी साध लिया मैंने। वस्त्रधौति और जलनेति सीखते समय मेरी आँखों में आँसू तक आ गए। सबेरे-शाम गोश्त खाने वाला आदमी अंकुरित चने और गाय का धारोष्ण दूध पीने लगा। लेकिन... अगर मुझे हार्ट-अटैक नहीं होता तो मैं शायद स्वस्थ हो जाता।... हाँ डॉक्टर, हार्ट-अटैक। जुशांदा पियो या मेडिसन बॉक्स में से कोई दवाई खा लो, पथ्य तो जरूरी होता है ना। वह मैं नहीं कर पाया। मैं हमेशा अल्कोहल के पक्ष में रहा हूँ। उसी ने मारा मुझे। फिजूल बिस्तार में मैं नहीं जाऊँगा, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जीवन में कि पूरे सप्ताह मैं केवल पीता रहा। जी, पूरे सप्ताह। सबेरे आँख खुलते ही शुरू होता था और रात या देर रात या जब तक चले, फिर वह स्थिति आ जाती कि मैं बेहोश हो जाता। यह जिद नहीं थी, एक विवेकहीनता थी। मेरे दोस्त कहते हैं कि प्रयोग में विश्वास भी विवेकहीनता है। लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि मरे साथ ऐसा हुआ... और ऐसा हकीकत में हुआ है, इसलिए उसके सुख-दुख दोनों से मैं निकट हूँ। जी, ये जो मद्य-सप्ताह चलते थे। इनके गवाह कुछ दोस्त है। शुरू करते समय पाँच-छह लोग होते थे और विकेट की तरफ डाउन होते जाते थे...। अंत में मैं नॉट-आउट रह जाता था। इसे मैं शान या उपलब्धि नहीं मानता। किसी बियाबान रास्तें में हम भटक जाएँ तो उससे परेशानी ही मिलती है, लेकिन बाद के जीवन में वह एक अनुभव हमारे चेहरे पर एक और ही रंग ला देता है। तब पाँव या तो उठते ही नहीं या फिर उठते हैं तो जो भी सामने आए, उसे ही रौंद डालते हैं। ऐसी ही एक स्थिति थी। जाने कितनी पी, जाने कब से पी रहा था, शायद चार दिन, या छह दिन या और भी अधिक। यह याद है कि सुबह थीं मैंने देखा कि बाहर वाले दरवाजे के गलियारे में मैं जूते पहने हुए खड़ा हूँ, दरवाजा बंद था अंदर से। स्थिति यह हुई होगी कि पीने की धुन में मुझे कुछ सूझा होगा। मैंने कपड़े बदले थे क्योंकि पायजामे के ऊपर बुश्शर्ट पहने था... यानी पैंट पहनना भूल गया और बाहर निकलने लगा था। जूते के तसमे खूब अच्छे-से बँधे थे, इससे यह साबित है कि कोई बड़ा निर्णय नशे में हो गया था। देखा मैंने कि आसपास के पड़ी हुई थी। बुश्शर्ट गंदा हो गया था। मैंने किसी तरह उठकर सँभलने की कोशिश की। लेकिन सिर घूम गया। थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि मेरे पास एक छुरा भी पड़ा हुआ है। वैसा ही, जैसा कश्मीर एम्पोरियम में मिलता है और हर कोई जिसे खरीद लाता है। वह रक्षा से अधिक शो के लिए होता है। हो सकता है, मैं रात को दुरा लेकर कहीं जा रहा था और बरामदे में ही ढेर हो गया। हाँ, मैं अभी-अभी अपने आपको बुद्धिमान कह रहा था, लेकिन सबेरे उस दिन मुझे खुद लगा था कि मेरा विवके कहीं चला गया है। इस बात को छोडूँ लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे लगा कि धड़कन हाथ से छूट रही है। मैंने लेटने की कोशिश की, बैठने की कोशिश की, टहलने की कोशिश की, यहाँ तक कि भविष्य में कभी नहीं पीने की कसम तक खा डाली, लेकिन लगा कि मैं जरा देर बाद ही लड़खड़ा कर गिर जाऊँगा। अपने आपको सँभालने की गरज से जेब में रुपया रखा और और सड़क पर आ खड़ा हुआ। सोचा था, जो भी गाड़ी दिखे, उसी में बैठकर अस्पताल चला जाऊँ। थोड़ी देर में टैक्सी मिल गई। मैंने उसे केमिस्ट की दूकान पर रुकवाया और कोरामिन खरीदी। आप आश्चर्य करेंगे, मैंने उस शीशी से ही एक घूँट पी लिया। फिर बहुत देर इमर्जेंसी में ढेर पड़ा रहा। डॉक्टर मेरी कनपटी को मसल कर ब्लडप्रेशर से खेलता रहा। वह टेकी कार्जिया था। फिर वही ई.सी.जी.। बचतो गया, लेकिन डॉक्टर ने जो पूछा, वह अद्भुत था।

'चाय-कॉपी कितनी पीते हो?'

'करीब बीस प्याला। ...कभी उससे भी ज्यादा।'

'शराब कितनी?'

'कितनी भी।'

'कब?'

'कभी भी।'

'कौन-सी?'

'जो मिल जाए।'

डॉक्टर फिर चुप हो गया। बोला - 'किसी के पास आखिरी काम के लिए रुपया जमा कर दो, क्योंकि तुम्हारे मरने की कोई तारीख नहीं हो सकती।...'

मैं गंभीर हो गया। जीवन में कई लोगों से मरने की बातें की हैं, लेकिन यह कभी नहीं हुआ कि कोई डायरेक्टली कुछ बोला हो...। मुझे उदास देख डॉक्टर बोला था - 'बुरा मत मानना इस बात का, लेकिन मरने के और तरीके भी हैं...।'

मैं उस समय तिलमिला कर बोला था - 'आप गलत समझ रहे हैं। मैं जो कहता हूँ, उसी में से मौत निकलती है, लेकिन मैं मौत को ढूँढ़ने के लिए यह सब करता हूँ, यह गलत है।...'

उस डॉक्टर ने मुझे वहाँ से उठा दिया था, खूब प्यार सहित। पी.जी. के कैंटीन में कॉफी का आर्डर देते बोला था - 'यह जो दिल की बीमारी है, इसका किसी जादू से इलाज नहीं होता। यह एक ऐसी स्थिति है कि जीना और मरना दोनों हाथ में है। मैं समझता हूँ कि स्वेच्छा की मौत भी अब तुम मर सकते हो। जरा-सा जोर डाला इस पर किसी भी बात का, कि शेष समाप्त, और जरा-सी सावधानी रखी कि भले-चंगे। ये सब चीजें छोड़ दो। और देखों, दिल का इलाज तो नट-विद्या है। देखा होगा तुमने, रस्सी पर जो नट चलता है, कितना साधता है अपने आप को, किस तरह संतुलन बनाए रखता है और उस कठिन रास्ते पर चलता हुआ भी उस डोर पर से गिरता नहीं... वैसे ही तुम्हें भी चलना होगा...'

आप को अजीब लग रहा है ना कि शोक-सभा की तरह कैसे अपने आप को श्रद्धांजलि देने के लिए मैं चुप हो गया। हाँ डॉक्टर इमर्जेंसी से घर गया, और उस मकान को देखा, जिसे मैं खुला छोड़कर चला गया था। कमरे में पंखा चल रहा था, जैसे मैं छह घंटे की यंत्रणा से नहीं लौटा था, केवल डाक लेने बाहर गया था... शीशे में चेहरा देखा था और उसे गाल पर रख कर फफक उठा था।... बहुत धीरे से बिस्तर पर लेट गया था और उस दिन चेहरा जैसे गंभीर हो गया था, वैसा ही आज भी है। अब मैं लपक कर बस में चढ़ नहीं सकता, अब मैं कूद कर बिस्तर से उठ नहीं सकता, अब मैं किसी बात को अधिक देर सोचता नहीं रह सकता, अब मैं बेफिक्रे की तरह झूमता हुआ चल नहीं सकता। उस एक बीमारी ने डॉक्टर मेरी जवानी पर पानी फेर दिया। हाँ डॉक्टर, अब जो कुछ कर रहा हूँ, वह सब नट-विद्या मुझे जैसा आदमी किस डॉक्टर से ऐसी घिघियाई आवाज में बात करेगा! दोस्त यह सुनेंगे तो हँसेंगे। लेकिन यह सबसे ताजा हकीकत है। देख रहे हैं आप, सहसा जुकाम हो गया। यह अक्सर होता है। मैं समझता हूँ एक्सपोजर से छींकें आने लगती हैं और जैसे ही उसी तापमान में से हम दुबारा गुजरते हैं, सहसा स्वस्थ हो जाते हैं। मैं अब बहुत फ्रेंश महसूस कर रहा हूँ। अब इसका परिणाम आप खुद देख सकेंगे कि मेरे बोलने में अब तक जो कंपन था, वह सुधर जाएगा। अब मैं बुरी-से-बुरी हालत का ध्यान अच्छे-से-अच्छे शब्दों में कर सकता हूँ।...

यह रूटीन हो गया डॉक्टर। जब भी थर्मामीटर लगाओ बुखार 99 या 100 होगा। फिर जरा देर लेटे, ठीक से मुँह-हाथ धोया कि बुखार चला जाता है। रात-रात भर नीद नहीं आती, फिर एक छोटी-सी गोली रात भर मेरे लिए लोरी गाती रहती है। मैं सबेरे उठकर सूरज की दिशा में देखता हूँ। सोते समय अपनी हथेलियों को सारे चेहरे पर फिराता हूँ। जब भी मन को इधर-उधर कर देता हूँ या कोई-सी भी फिल्म देखने चला जाता हूँ। हाँ डॉक्टर, योग की भाषा में त्रिपुटी की एकाग्र चिंतना हो या सरकम की भाषा में नट-विद्या, वह इसीलिए तो है कि यह मन इधर-उधर हो जाए। मैं इस बिंदु पर दिमाग से सुलझा हुआ, विवेकहीनता के सामयिक मृगी रोग से निवृत्त, एक ऐसा व्यक्ति हो उठा हूँ सहसा कि डर लगता है मेरे कपड़ों का रंग गेरूआ न हो जाय। कहीं ससा मैं किसी सबेरे यह न देखूँ कि मेरा सिर घुटा हुआ है, और वानप्रस्थी की तरह कही प्रवृज्या धारण कर अनिश्चित दिशा में चलने लगूँ। मैं नहीं सोचता कि मुझे रक्तचाप भी है। मैं नहीं सोचता कि कल तक मैं किसी कार्जियालॉजिकल बीमारी से परेशान था। मैंने सब को साध लिया है डॉक्टर। वह दाँतों की कैविटी हो या कान का जख्म हो या आँखों का धुँधलापन हो या एलर्जी की तकलीफ हो। मैं पीछे नहीं देखता, मैं चलना नहीं रोक सकता, मैं किसी के लिए रूक नहीं सकता डॉक्टर। नहीं। फिर आप मनोविज्ञान को खींच लाए हैं तो साफ-साफ कह दूँ कि मुझमें कोई महत्वाकांक्षा नहीं, मेरा कोई भविष्य नहीं, मेरा कोई मिशन भी नहीं। जो वर्तमान है, वह जैसा भी है, है। मुझे कोई चुनौती नहीं लेनी, मुझे किसी को परास्त नहीं करना, मुझे अपने आप की रक्षा के लिए किसी डिफेन्स की जरूरत नहीं। जी। जी। जी डॉक्टर, मैं अगर जीवित नहीं रहना फलसफा मैं भी जानता हूँ। विल टु लिव...हुँह। बिल टु पावर...हुँह। विल टु...। उन सबसे कुछ नहीं होने का। माफ करें। मेरा यह उत्तेजित हो उठना स्वाभाविक है डॉक्टर। बल्कि मुझे उत्तेजित देखकर मेरी उस बीमारी के बारे में आप अनुमान लगा सकते हैं, जिसके इलाज के लिए मैं आपके पास आया हूँ। मैंने बात शुरू करते समय ही कहा था आपसे कि मेरी इस बीमारी का कोई नाम नहीं है, इसके जाहिरा ऐसे लक्षण नहीं है कि आप डॉक्टरी की किसी किताब का इण्डेक्स खोज लें। मैं यह कह सकता हूँ कि जाग्रत अवस्था से निद्रित अवस्था अधिक भयावह होती है। मेरे दिमाग का नींद वाला ग्राफ अगर आप लें तो ग्राफ पर निश्चित ही मकड़ी का जाला बन जायगा। जी, आराम क्या होता है, वह मुझे नहीं मालूम। अब मैं भी किसी महेश योगी को ढूँढूगा, जो मुझे मेडिटेशन सिखा सके। रामकृष्ण मिशन की खाक मैं भी छान चुका हूँ। स्वामी जी से मिला। उन्होंने बताया कि मुझे 'साइलेंस' चाहिए, एक एकांत चुप्पी; यानी ऐसी स्थिति, जहाँ कोई आवाज नहीं हो। सलाह थी जप, और जप भी 'ओम नमः शिवाय' का। जब कलकत्ता था, कालीघाट से माला भी खरीद लाया था। लेकिन मैं पूरे 108 तक भी नहीं पहुँच सका और उसे तोड़ कर उन मनकों से नीचे सड़क पर सोये हुए कुत्ते की टाँग का निशाना साधता रहा। ना, मुझसे अब और कुछ नहीं होगा।

हो-हो-ह -हो-हो...

मुझे जरा हँस लेने दीजिए डॉक्टर - हो-हो-हो। टापने अद्भुत बात कही। सचमुच इससे बड़ी गाली क्या हो सकती है कि आपकी सलाह की सुनूँ। आपने नेक सलाह दी - घर बसा कर रहूँ। यानी एक ड्रॉइंगरूम हो, जहाँ मैं खड़ा हो कर यह देखूँ कि पत्नी से कितना ऊँचा हूँ। यानी एक बेडरूम हो, जहाँ से बोर हो जाऊँ और उठ कर बाथरूम के आईने में अपनी शक्ल देखूँ।...यानी...रूकिए डॉक्टर; एक महत्त्वपूर्ण बात छूटी ही जा रही थी। मुझे शिकायत थी ना कि मेरी कोई बीमारी ऐसी नहीं है कि जो दिखाई दे या सुनाई दे सो वह हो गया। मेरे बाल सफेद होने शुरू हो गए। एक दिन आईंने में देखा कि कनपटी के पास का एक बाल चमक रहा है। मैं जाने किस विचार में डूब गया, फिर बड़ी मेहनत से उस बाल को मैंने तोड़ डाला। उसे मैं अपनी काली पेंट के ऊपर चिपकाये रहा और देखा कि वह बेहद चमकदार था...तभी माथे पर दूसरा बाल भी दिखा। और फिर तब से जब भी आईना ले कर बैठता हूँ, सारे समय सफेद बालों को नोचता रहता हूँ। राजा दशरथ के जब बाल सफेद हुए तब उनके आस-पास तीन रानियाँ थी और उन्हें चिंता थी उत्तराधिकारी की, लेकिन किस बात का उत्तराधिकार सौंपना है हम लोगों को -इस बीमारी का? जिसका नाम भी नहीं। अरे डॉक्टर, आप मुझे बहकने से रोकते क्यों नहीं, क्यों नहीं जजों की तरह 'ऑर्डर -ऑर्डर' चीखने लगते हैं?...

हिलस्टेशन! यह भी आपने खूब कही लोग बीमार होते हैं तो पहाड़ जाते हैं और मुझे पहाड़ जाने की बीमारी ही हो तो? ये शिमला, मसूरी और नैनीताल दिमाग के चोंचले हैं -कब तक झील में चप्पू साधें, कब तक अपर और लोअर माल की लम्बाई नापें? मुझे हर पहाड़ पर एक जैसे रास्ते, एक जैसे फोटोग्राफर, एक जैसे घोड़े, एक जैसी बर्फ दिखाई देती है। यहाँ तक कि वहाँ की हर लड़की यदि टूरिस्ट है तो सालों से पहना जाने वाला एक जैसा कार्डिगन कंधे पर डाल कर घूमती हुई दिखाई देती है। वैसे-के-वैसे ही चपटी नाकों वाले चेहरे...। उफ -उफ! क्या? ? ? क्या वाकई डॉक्टर, मेरे चेहरे पर, मेरी अभिव्यक्ति में, केवल फ्रस्ट्रेशन ही झलकता है। आपके इस रिमार्क का कोई जवाब नहीं कि फ्रस्ट्रेशन केवल नारी का है। यह 'नारी' का है। यह 'नारी' शब्द आप क्यों बोले? आप औरत बोल सकते थे, लड़की बोल सकते थे, पत्नी या प्रेमिका भी बोल सकते थे...। जानता हूँ, 'नारी' बोल कर आप मेरे शरीर की बुनियादी जरूरत पर हमला करना चाहते हैं, जब कि मैं आपको बतला चुका हूँ कि इन सब बातों के बारे में मेरे विचार क्या है।...वह ? ओह। क्या मैंने कहा था कि बाद में मैं किसी अफेसर के बारे में भी आपको कुछ बताऊँगा...? मुझे याद नहीं। नहीं, शायद मैं बोल गया होऊँ। लेकिन किसी के बारे में कोई बात कहनी नहीं है मुझे। देखिए न, जितने डॉक्टरों से मैं अब तक मिला हूँ, अमूमन सभी ने उपदेश दिए हैं -वह अपने जख्म को मेंटेन करने का हो या कैविटी को खरोंच कर उसे फ्री पैसेज बना देने का हो...लेकिन मैंने डॉक्टर की बात को आदर ही दिया है। जी, यह भी सही है कि मैं जो बात बोल रहा हूँ, वह किसी पागल का भाषण लग रहा होगा आपको... लेकिन मैं दावे से कहता हूँ डॉक्टर कि मेरी उम्र के किसी भी युवक को ले आइये, उसे भी ये ही सब कष्ट हैं। और मैं जिधर सिर उठा कर देखता हूँ, उधर ही जानलेवा घुटन या अनमनापन या उमेठन या -

आपने गुंथर ग्रास पढ़ा है? 'डॉग ईयर्ज' में सब लोग डिसकशन करते हैं। तो आर्थर मिलर जरूर पढ़ा होगा, उसमें...। खैर, छोड़ देता हूँ उसे लेकिन सॉल बैलो ने...। ठीक है। मैं केवल डॉक्टरों की बात करूँगा, मैं आपको बोर करने के लिए यह नहीं कह रहा हूँ, मैं तो अपने केस को बहुत साफ-साफ आपके सामने रखने के लिए इधर-उधर के उदाहरण बटोर रहा था। तो, अभी कल की बात है, मैं न्यूजवीक पढ़ रहा था, यह इस 23 अक्टूबर वाला अंक। उसमें 'ब्रोकन हाटर्स' का एक सर्वे है कि क्या किसी कारण से दिल टूट जाए तो आदमी मर जाता है। बड़ी बढ़िया रिपोर्ट है। उसमें लिखा है, छह दिल के टूटने से आदमी एक ऐसी मनोवैज्ञानिक स्थिति में पहुँच जाता है कि वह किसी भी स्थिति का सामना कर ही नहीं पाता। उसे कहते हैं -'गिविंग अप, गिवन अप कॉम्पलेक्स'...पहले आदमी हेल्पलेस होता है। और फिर होपलेस हो जाता है। किसी पहिए में से हवा निकल जाने जैसा कॉम्पलेक्स है यह -'गए...गए...और गए...' वही हालत इस देश में भी तो है, लेकिन इसके बारे में सोचने को किसे वक्त है। घबराइए नहीं मैं राजनीति के बारे में बात नहीं करूँगा। वह मेरे लिए इतनी फिजूल है कि मैं उसके बारे में सोच कर समय खराब नहीं करना चाहता।...

आपने ठीक कहा कि बात अब पिन -पॉइंट पर आई है। सच कहूँ डॉक्टर, मैंने अपने आपको अपने आपसे बात करते पकड़ा है। बाकायदा मेरे होठ हिलते हैं, बोलने के साथ मेरे चेहरे पर रंग आते-जाते हैं और पागलखाने में लोग अपनी ही धुन में डूबे चाहे जो बालते रहते हैं, वही मेरी हालत है। यह अपने आपसे बोलना इतना भयंकर होता है कि कोई दूसरा आदमी बर्दाश्त नहीं होता। कोई घर आ जाय तो उसे घर से निकाल देने को मन होता है। मुश्किल यह है कि मैं क्या बात करता हूँ, यह मैं जानता भी नहीं। ऐसा लगता है किसी को खत डिक्टेट करवा रहा हूँ या ऐसा लगता है, किसी वकील के सामने जिरह चल रही है। ना। मैं कुछ लिख नहीं सकता सच्ची डॉक्टर, मेरे कमरे के कोने में लाइट बुझा देने के बाद एक अस्थिपंजर रोज आ खड़ा होता है -मुझे जब नींद नहीं आती तो वह नीचे का जबड़ा फैलाकर जमुहाइयाँ लेता है। ऐसा लगता है, उसके सिर पर एक गंदा गिद्ध बैठा है और वह कबूतर की तरह बोलता है। जरा दे में मेरा अपना कमरा इतना अधिक डरावना हो जाता है। कि या तो मैं आँखों पर रूमाल बाँध लेता हूँ या...। ओह ! हथेलियों से पसीना छूटता है। भौंहों के ऊपर पानी तैर आता है। जब भी कॉफी पीता हूँ, प्लेट से कप उठता है और एक गति से होठों तक पहुँचते -पहुँचते वह बीच में लटक जाता है। मैं काफी पी नहीं सकत। मैं कप को नीचे नहीं रख सकता। कप मेरे हाथ से छूट कर गिर भी नहीं सकता। मैं स्टिल हो जाता हूँ। लगता है कोई दहाड़ मार कर मेरी खिड़की के सीखचों से सिर फोड़ लेगा। वह कप हाथ में सधा-का-सधा रहता है। कोई चीज तड़ाक से टूटती है। मैं कॉफी पी नहीं पाता। कई बार वैसी स्थिति में मैंने प्रार्थना तक की है कि यह कप मेरे हाथ से दूट कर गिर ही जाय या कुछ हो तो कि गरम कॉफी छलक जाय और मेरे हाथ -पैर जल जाएँ, लेकिन कुछ -कुछ -कुछ नहीं होता। मैं अपने आपसे बोलने के लिए कितना -कितना मना करता हूँ, लेकिन मेरा 'मैं' चुप ही नहीं रहता। यह सन्निपात ही हो सकता है। यह नाम मरते हुए आदमी के सत्य -कथन पर परदा डालने के लिए बहाना है। सनिपात कह कर हम दुनिया के बड़े-से-बड़े सच को टाल जाते हैं। नहीं, मेरा कफ-वात-पित्त - तीनों दुरूस्त हैं। जो खाओ, सो मिट्टी; जो पियो, सो पानी; जो पहना, सो अर्थहीन...। यह क्या है डॉक्टर, टाई की आधी बँधी हुई नॉट, जूते के आधे बँधे तसमे, आधी गूँथी हुई चोटी, पढ़ते-पढ़ते छोड़ दी गई कहानी...। डॉक्टर उठने नहीं दूँगा मैं। मेरी बात सुननी होगी पहले। अधर में लटका हुआ कॉफी का प्याला मजाक नहीं है डॉक्टर, वह डेमॉक्लीस की तलवार से भी भयंकर है। वह प्याला गिरेगा तो तुम्हारे सारे आवरण बिगड़ जाएँगे। तुम्हारे हाथ-पैर जल जाएँगे। गिरेगा वह, टूटोगे तुम।... आप समझ रहे होंगे, अपने नजले का इलाज करवाने आपके पास आया हूँ। आप समझ रहे होंगे, उस कवि-दोस्त की तरह मुझे नए सिर से कोई लाँग टर्म जिंदगी शुरू करनी है और चेक-अप के लिए आया हूँ मैं आपके पास। अपना स्टेथ-स्कोप अपने पास रखिए...

यह भी मत सोचिए डॉक्टर कि मैं केवल अपने स्वार्थ के लिए आपके पास आया हूँ। यह सब जो हो। जो मैं कह रहा था। ये मैं जगह-जगह देख रहा हूँ। मेरे घर के सामने वाले फ्लैट में जो लड़की रहती है, उसके हाथ में कल शाम चाय का प्याला लटक गया। मेरे जितने दोस्त हैं, उनके हाथ में ग्लास लटक जाते है... यह क्लॉट है या खून पानी हो जाता है सहसा। यह रेडियो -ऐक्टिविटी जैसी कोई चीज है। इसमें कुछ होता नहीं, कुछ होता है कि बस... कुछ ऐसा होता है कि, कि, कि, कि... बस हाथ में जो चीज हो, वह लटक जाती है। यह संक्रामक है। यह उड़ने वाली बीमारी है। या शायद बीमारी है ही नहीं और, और कुछ है। परेशान मत होइए। मुझे कोई उपचार नहीं चाहिए। यह बीमारी नहीं मौत है। आप तो डॉक्टर हैं और जानते होंगे। कहते हैं, जब मच्छरों की आवाज में सरगम सुनाई दे तो समझो कि मलेरिया फैलने वाला है। कहते हैं ना डॉक्टर कि जब सड़क पर कुत्ते कै करते हुए दिखाई दें तो समझो कि हैजा फैलने वाला है। मैं इससे अधिक प्लेग के बारे में जानता हूँ। चूहे जब अपने बिल के सामने चलते -चलते ही मर जाएँ तो लोग भागने लगते हैं कि प्लेग फैल गयां लोगों की बगलों में गिल्टियाँ उभर आती हैं और चूहे की मौत आदमी भी मरने लगता है। मुझे वही लग रहा है डॉक्टर कि कही हम सब भी चूहे-मच्छर ही तो नहीं हैं। जैसा कि हर डॉक्टर कहता है कि मैं मर रहा हूँ और अगर आप मुझे मरते देख रहे हैं तो क्या मतलब हुआ इसका? आज आप घर जाएँ तो अपने लड़के को देखिए गौर से... उससे कोई फर्क नहीं पड़ता... लड़की को ही सही। अपनी बेटी को गौर से देखिए, देखिए उसके स्थिर चेहरे पर कया है? जब वह चाय पी रही हो उस समय केवल उसकी तरफ देखिए... अगर डॉक्टर उसके हाथ का प्याला हाथ में ही लटक जाए तो समझ लीजिए कि सारा आवाँ बिगड़ गया है। आप तो डॉक्टर हैं, एकदम प्रिकॉशन लेने चाहिए आपको कि यह महामारी आपको भी न छू ले... आप सब स्वस्थ और संपन्न लोगों को शहर छोड़ कर भागना चाहिए क्योंकि, ठीक यही स्थिति। यही कि इस 'क्योंकि' के साथ कैसे मेरा हाथ जहाँ-का-तहाँ रह गया - अभी-अभी देखा न आपने? यही। यही तो लक्षण है। दुख इस बात का नहीं है कि हर चीज को सहे जा रहे हैं। कान का जख्म हो या पिता की जिद हो या दमघोंटू दीवारों के बीच में अपना मरघिल्ला अस्तित्व हो -सबको मेंटेन कर रहे हैं। दाँत की कैविटी हो, या वैसी ही गुफानुमा पत्नी हो या उसकी तरह के खाली दिमाग वाला मंगेतर हो - सबके लिए रास्ते खुले। टेकी कॉजिया का नाजुक दर्द हो या 'ब्रोकन हार्टस' हों या अकेले बिस्तर पर अकेली रात हो, सबमें नट-विद्या। हय, कित्ते सफल नट हैं हम। अपने आप पर प्यार आता है डॉक्टर। आपको खुशी होनी चाहिए कि दधीचि की तरह हम अपनी हड्डियाँ क्या, अपना गोश्त भी दे सकते हैं, पुरू की तरह हम अपनी जवानी दे सकते हैं। अपनी बेटी से अगर आप कहेंगे कि इस अस्पताल के कंपाउंडर से शादी कर लो तो वह मना नहीं करेगी। और-तो-और वह शादी के समय प्रसन्न भी दिखाई देगी और उसके एकाध साल बाद हाथ में लटका हुआ प्याला लिए मर जाएगी, तब भी वह मुस्कराते हुए ही मरेगी, क्योंकि यह नट-विद्या है, मेंटेन करने के गुर हैं, गुर। येस डॉक्टर, आई नो यू वेरी वेल एंड योर कमिटमेंट फार द वर्ल्ड ऑफ द ह्यूमन रेस...। नहीं, यह अंग्रेजी तो इसलिए बोलने लगा कि बात जरा आपके गले उतर जाए। वैसे अंग्रेजी छाँटने का कोई रोग नहीं है मुझे। तो ठीक है, आपको समय नहीं है और कुछ सुनने का, तो मुझे भी समय नहीं आप जैसे आदमी के सामने और कुछ बोलने का। लेकिन याद रखिए...।

देख रहा हूँ कि आप जोर से मुस्कराने लगे हैं। जी डॉक्टर, आपकी मुस्कान देख रहा हूँ। आप के प्रति आभारी हूँ। आपके विज्ञान को जानता हूँ कि आप मुझे उठा कर लेबोरेटरी में किसी जगह रख देंगे। क्योंकि आपको इस संक्रामक की सीरिज बनानी हैं। आपकी रूचि हाथ में लटके हुए प्याले के वैक्टोरिया में है। आपकी रूचि मेरे आत्म-प्रलाप के वायरस में है। आपकी रूचि मेरे एकटक किसी भी तरफ देखते चेहरे पर रेंगने वाली कीड़ों में है। आप जरूर टीका ईजाद करेंगे और उस टीके से डब्ल्यू.एच.आ. (विश्व स्वास्थ्य संघ) के शब्दों में निश्चित ही सारी मानवता की रक्षा कर सकेंगे। आप डॉक्टर, टी.वी. सील्ज की तरह हमारी बीमारी की भी दस पैसे वाली सील्ज चलवाना ना, उस पर हमारे मरगिल्ले चेहरे बना देना। वैसे, आपको क्या, मुझे भी विश्वास है कि यह बीमारी जड़ से समाप्त हो जाएगी। प्लेग जैसी बीमारी का नामोनिशान नहीं रहा तो यह बगैर नाम-निशान वाली बीमारी क्या दम मारेगी! न, नाक पर रूमाल मत रखिए। ये कीड़े ट्यूबरक्युलोसिस की तरह साँसों से नहीं बिखरते। हो सके तो आँखों पर पट्टी बाँध लीजिए, क्योंकि अगर मुझे लगातार देखते रहे तो जरूर बीमार हो जाएँगे।...

जी नहीं। पसीना ही है यह। यह तो ऐसे ही आँखे पोंछ लीं। वैसे हम क्या रोएँगे डॉक्टर, कहीं चूहे और मच्छर भी रोते हैं, वे या तो जन्म लेते हैं या मरते हैं। ना डॉक्टर, बात कहे चुका हूँ। वैसे इस कहने का कोई अंत नहीं है। आप ऐसा क्यो नहीं करते कि राष्ट्रमय गीत का रेकॉर्ड यहाँ रखवा लीजिए। बात समाप्त होने पर जन-गण-मन सुन समाप्ति का बोध होता है। मरेन पर भी नेशनल एंथेम अच्छी लगती है ना? कैसा सुकून आ जाता है - चलो खत्म हुआ - या पाप कटा...या छुट्टी मिली... जय हे... लेकिन आज मैं तीन बार जय नहीं बोल सकूँगा - मेरी ओर से आप बोल दीजिए डॉक्टर...


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हिंदी समय में रमेश बक्षी की रचनाएँ