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कहानी

पुरोहित जिसने मछलियाँ पालीं
मनोज कुमार पांडेय


जब रामदत्त प्रतिष्ठानपुर के एक आश्रमनुमा संस्कृत विद्यालय से पुरोहिती और कर्मकांड की दीक्षा ले कर वापस लौटे तब तक उनके पिता पंडित कृष्णदत्त त्रिपाठी बूढ़े हो चुके थे। इसके बावजूद उन्होंने अपनी पुरोहिताई बखूबी सँभाल रखी थी। उनकी गर्दन लगातार हिलती रहती थी इसलिए अब वह मुंड़हिलावन पंडित के नाम से जाने जाते थे। मुंड़हिलावन पंडित के बारे में कई चीजें मशहूर थीं, जिनके बारे में गाँव के लोग पीठ पीछे तो मजा लेते ही, कई बार उनके सामने भी कहने से नहीं चूकते थे। जैसे उन्हें प्याज बहुत पसंद था पर उन्होंने प्रचारित कर रखा था कि वह प्याज और लहसुन छूते भी नहीं। इस वजह से उन्हें अपने जजमानों के यहाँ से प्याज, लहसुन नहीं मिला करता था जबकि उनके कई जजमान इनकी खेती भी किया करते थे। इस वजह से उन्हें लहसुन प्याज दूर के बाजारों से चोरी छुपे खरीद कर लाना पड़ता था। वह बात बात में 'हे नाथ नारायण वासुदेवाय' भी कहते थे, इस वजह से लोग उन्हें नाथ नारायण पंडित भी कहते थे। उन्हें उनके असली नाम से शायद ही कोई संबोधित करता था।

जल्दी ही रामदत्त ने सारी पुरोहिताई अपने पास समेट ली। अब अगर एक ही दिन दो जगहों पर जाना होता तभी पंडित कृष्णदत्त जाते नहीं तो वह घर ही रहते। अपने पिता कृष्णदत्त के विपरीत रामदत्त ने अपनी छवि एक संतोषी पंडित की बनाई। जो अपने जजमानों से कुछ माँगता नहीं था, सब कुछ उनकी श्रद्धा पर छोड़ देता था। ऊपर से उनकी यह प्रतिष्ठा कि वह फलाने गुरू जी महाराज के आश्रम से समस्त कर्मकांडों की विधिवत शिक्षा ले कर आए हैं, इन वजहों से उनकी माँग तेजी से बढ़ी। और जब चार गाँव की दूरी पर के एक नामी पंडित मुरारी उपाध्याय ने अपनी बेटी पार्वती की शादी उनसे कर दी तो इसी के साथ वह अपने इलाके के सबसे ज्यादा जजमान वाले पंडित होने की तरफ बढ़े। मुरारी उपाध्याय को कोई बेटा नहीं था और उनके भी जजमान देर-सबेर रामदत्त के पास आने वाले थे। पर युवा रामदत्त का ध्यान अभी तक इन बातों की ओर नहीं गया था। वे तो अपनी नई नवेली पत्नी पार्वती में पूरी तरह से डूब गए थे।

पार्वती उनसे लगभग सात साल छोटी थी। गोरी चिट्टी। तीखे नाक नक्स। रूप और लावण्य से भरपूर। रामदत्त हर समय उन्हें खुश करने की फिकर में डूबे रहते। कस्बे के बाजार से उनके लिए छुपा कर जलेबी समोसे लाते, तरह-तरह की मिठाइयाँ और पकौड़ियाँ लाते, मतलब कि पार्वती का हर कहा मानने को हमेशा तैयार। पंडित कृष्णदत्त मुंडी हिलाते हुए गरियाते कि ससुर यही मेहरई सीखने गए थे आश्रम। थोड़ा जजमानों पर भी ध्यान दो। कुछ न हो तो भी उनके बीच निकल जाया करो। कभी खाली हाथ नहीं लौटोगे। कुछ न कुछ ले कर ही लौटोगे। जवाब में रामदत्त दहेज में मिली नई चमकीली साइकिल उठाते और कहीं इधर-उधर निकल जाते। और जब भी आते खाली हाथ कभी नहीं आते, पार्वती के लिए कुछ न कुछ जरूर ले कर आते। कृष्णदत्त बड़बड़ाते रह जाते।

पार्वती उनसे खूब हँसतीं बोलतीं, अपने मायके की बातें बतातीं रामदत्त के बारे में पूछतीं। शक करने की कोई वजह नहीं थी पर रामदत्त को हमेशा लगता कि कुछ और है जो पार्वती उनसे छुपाती हैं। एक अनमनापन है पार्वती के भीतर जो दिन पर दिन जस का तस बना रहता है। कई बार रामदत्त पार्वती को छुप-छुप कर देखते। चेहरे का एक-एक भाव। पलकों का उठना गिरना। उनका चलना फिरना उठना बैठना। शरीर का एक-एक कटाव। उन्हें अपनी किस्मत पर रश्क होता पर वे पार्वती के अनमनेपन की वजह नहीं जान पाते। कई बार उन्होंने महसूस किया कि जब वे पार्वती के पास जाते हैं तो उनके चेहरे पर कुछ रेखाएँ बढ़ जाती हैं। पर उन्हें कभी इसका कोई कारण नहीं दिखाई पड़ा। वे पार्वती से बार-बार पूछते, उन्हें यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं है? वे रामदत्त से खुश तो हैं? इन सवालों का जवाब उन्हें हमेशा अपने पक्ष में मिलता। पर शक करने की एक वजह और थी। मिलन के मधुरतम क्षणों में पार्वती कई बार अचानक ठंडी पड़ जातीं तो कई बार रामदत्त को लगता कि वह कुछ सूँघने की कोशिश कर रही हैं। पर रामदत्त पार्वती को ले कर कभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए। बाद के दिनों में उन्होंने मान किया कि शायद यह उनका वहम ही है और धीरे-धीरे इसके प्रति लापरवाह होते चले गए।

बाद में पंडित कृष्णदत्त नहीं रहे। इसी के साथ रामदत्त को कोई रोकने-टोकने वाला भी नहीं रहा पर अब तक उन्हें समझ में आ गया था कि उन्हें पुरोहिती और पत्नी प्रेम के बीच एक संतुलन बना कर रखना होगा। नहीं तो दोनों नष्ट हो जाएँगे। प्रेम के लिए जरूरी है कि पेट भी भरा रहे और पेट भरने का पुरोहिती के अलावा उन्हें कोई और रास्ता नहीं आता था। एक बार पुरोहिती पर ध्यान केद्रिंत होने के बाद रामदत्त बहुत जल्दी एक पेशेवर पंडित में बदल गए। उन्होंने विवाह, मुंडन, तिलक, सत्यनारायण व्रत कथा और गृह प्रवेश आदि के साथ-साथ कुछ अनुष्ठानों के भी चक्र चलाए। लोगों को समझाने लगे कि अभीष्ट तो अनुष्ठानों से ही सिद्ध होता है और ये अनुष्ठान किसी भी चीज के लिए कराए जा सकते थे। सुंदर सुलक्षण पत्नी या बहू के लिए, अच्छी फसल के लिए, मुकदमें में जीत के लिए, नौकरी पाने के लिए, संपत्ति और शांति बढ़ाने के लिए या ऐसी ही किसी भी अन्य इच्छा के लिए। उन्होंने अपने जजमानों को छूट दी कि कोई न बताना चाहे कि वह अनुष्ठान क्यों करवा रहा है तो भी वे उसके लिए अनुष्ठान करवा सकते हैं। इस तरह उन्होंने उन लोगों को भी अपने अनुष्ठान के दायरे में खींच लिया जो पत्नी या भाई या दुश्मन की मृत्यु के लिए, पड़ोसी को नष्ट करने के लिए या किसी दूसरे की पत्नी, बहन या बेटी पर हाथ साफ करने के लिए अनुष्ठान करवाना चाहते थे। रामदत्त का ये अनुष्ठान वाला नुस्खा जम कर कामयाब हुआ।

जब कहीं अनुष्ठान वगैरह करवाना होता तो रामदत्त जजमान को बरामदे में छोड़ पूजागृह में जाने की बात कह कर उठ जाते कि देवी से पूछ कर आता हूँ। पूजागृह से वे पार्वती की कोठरी में पहुँच जाते कि घर की जरूरतों के लिए क्या-क्या चाहिए। चीजें सीधे रुपए में भी ली जा सकती थी पर उसकी एक सीमा थी, दूसरे यह कर्मकांड की भव्यता को नष्ट करने वाली बात भी होती। तो रामदत्त देवी से पूछ कर आते और अपने जजमानों को कर्मकांड की सामग्री लिखाते। सौ ग्राम हींग, आधा किलो जीरा, दस किलो चीनी, पाँच किलो गुड़, चाँदी की पायल या बिछिया, सोने की कील या सलाई या सोने का कोई पक्षी या अन्य आकृति, सेर भर सूखा मेवा, एक गद्दा रजाई, तकिया, चादर सहित और पच्चीस बेल आदि। पर पंडित रामदत्त इतना ही नहीं लिखाते थे। वे पूरे पेशेवर थे इसलिए जजमानों को ऐसी भी अनेक चीजें लिखाते थे जो सिर्फ कर्मकांड का भोकाल बनाए रखने के लिए होती थीं। मसलन एक सौ एक कमल के फूल, सवा ग्यारह किलो गंगा की बालू, समी की लकड़ी, पंद्रह कुंओं का पानी, सात व्यक्तियों के खेत की मिट्टी, पाँच तरह के सफेद फूल, सात तरह के पीले फूल या दस ग्राम पारा जैसी अनेक चीजें। या अगर दुश्मन से मुक्ति के लिए कोई तांत्रिक किस्म का अनुष्ठान हो रहा हो तो दुश्मन के घर की मिट्टी, गिद्ध का पंख, मोर और उल्लू की हड्डी, लोहबान, साँप की केंचुल या मदार का एक छटाँक दूध जैसी वस्तुएँ लिखाते। इस तरह के अनुष्ठान रामदत्त गुप्त रूप से करते थे पर वे जानते थे कि चीजों को गुप्त कह देने से उनके साथ एक रहस्यात्मकता जुड़ जाती है और वे और तेजी फैलती हैं। इस तरह की वस्तुओं या कर्मकांड के तरीके का एक फायदा यह भी होता था कि इनके नीचे जीरा, जवाइन, चीनी या गुड़ जैसी वस्तुएँ दब कर रह जाती थीं बल्कि कई बार तो वह जजमान को ज्यादा आसान लगती थीं। उनमें पैसा भले लगता था पर उन्हें जुटाना आसान था जबकि मुफ्त चीजों को जुटाना अक्सर बेहद कठिन या श्रमसाध्य होता था।

इस तरह की चीजें रामदत्त के लिए एक तीसरे तरीके से भी मुनाफे का सौदा होती थीं। कई बार उन्हें इकठ्ठा करने में आने वाली मुश्किलों से बचने के लिए लोग उन्हें एकमुश्त दक्षिणा देने की पेशकश करते थे। बदले में सारी सामग्रियों को जुटाने का काम रामदत्त का हो जाता था। रामदत्त इस तरह की अनेक चीजों का एक बड़ा भंडार अपने पास रखते थे। बहुधा तो पहले के अनुष्ठानों में इस्तेमाल की चुकी चीजें ही होती थीं जिन्हें रामदत्त यह कह कर अपने घर मँगवा लेते थे कि फला दिन या रात को इन्हें मिट्टी में गाड़ देंगे या मंत्रों के साथ जला देंगे। और उसी के साथ अनुष्ठान पूरा हो जाएगा। उनमें से ज्यादातर चीजों को वे अपने पिछवाड़े के खपड़ैल में सुरक्षित रखते जाते थे जो जल्दी ही दोबारा काम में आ जाती थीं। धीरे-धीरे रामदत्त और और लालची होते गए और अपने शुरूआती दिनों के संतोष को कहीं बहुत गहरे दबा दिया। उन्होंने दान दक्षिणा के हिसाब से तरह-तरह के अनुष्ठानों की कोटियाँ तय कर दी। जैसे कोई जजमान सत्यनारायण व्रत कथा के लिए उनके पास आता तो सीधे ही पूछ लेते, एक सौ एक वाली या पाँच सौ एक वाली? दक्षिणा से ही तय हो जाता कि वह कितना समय देंगे और संस्कृत में कथा बाँचने के अलावा किस्सा भी सुनाएँगे या बाँचते समय बीच के कुछ अध्याय भी गायब कर देंगे।

रामदत्त की ऐसी हरकतों के बाद भी उनका रुतबा कायम रहा तो उसकी अनेक वजहें थीं। पहली तो यही कि उन्होंने सभी विधि-विधानों की विधिवत दीक्षा ली थी, इसका या उसका पिछलग्गू बन कर नहीं सीखा। दूसरा छोटे से छोटे अनुष्ठान को भव्य रूप देने की उनकी कला। जैसे किसी भी पूजा या अनुष्ठान की वेदी बनाते समय रामदत्त एक मछली जरूर बनाते थे जिसका चेहरा कुछ कुछ इंसानी शक्ल लिए होता था या जीभ जिसे वह सरस्वती का प्रतीक कहते थे। मछली के बारे में कुछ लोगों ने पूछा तो रामदत्त ने बताया कि उन्हें विष्णु का मत्स्यावतार सिद्ध है। इसी तरह से उन्हें उन्हें पुराणों की बहुत सारी कथाएँ कंठस्थ थीं जो उन्हें एक अच्छा खासा कथावाचक बना देती थीं। वे जब बीच-बीच में अपनी चोटी सहलाते हुए कथाएँ सुनाते तो लोग उनमें डूब जाते। इसके बावजूद ऐसा नहीं था कि उनके विरोधी नहीं थे। उनके विरोधियों में वे लोग तो थे ही जिनके खिलाफ उन्होंने अनुष्ठान संपन्न कराए थे। वे भी थे जिनके लिए रामदत्त ने अनुष्ठान कराए थे पर अनुष्ठान कामयाब नहीं हुए। इसके बावजूद गाँव के अनेक झगड़ों और अनहोनियों का श्रेय रामदत्त को दिया जाता था। पर लोगों ने उन्हें सीधा निशाना इसलिए नहीं बनाया क्योंकि उनके पास इन बातों को कोई प्रमाण नहीं था। दूसरे वे पंडित रामदत्त त्रिपाठी के रहस्यमता से डरते भी थे।

रामदत्त को दो बेटे हुए, जुड़वा। रामदत्त ने उनका राम रखा वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी और विश्वामित्र नारायण त्रिपाठी। जिस दौर में उनके बच्चे धीरे-धीरे बड़े हो रहे थे, रामदत्त की समृद्धि लगातार बढ़ रही थी। खपड़ैल घर अच्छे खासे पक्के घर में बदल गया था। दरवाजे पर का कच्चा कुआँ पक्के कुएँ में। रामदत्त ने कुएँ की बगल में एक छोटा सा मंदिर भी बनवा लिया था। एक-दो जगहों पर थोड़ी-थोड़ी जमीनें दान में मिल गई थीं। कुछ आम और महुए के फलदार पेड़ दान में मिल गए थे। रामदत्त ने पार्वती के नाम पर बीघे भर खेत भी खरीद लिया था। घर दान की चारपाइयों और तख्तों, बिस्तरों, स्टील के बर्तनों और तांबे के कलशों से भरा था। पार्वती ने गाय और भैंस भी पाल ली थी जिनका दूध पी कर के वशिष्ठ और विश्वामित्र अपनी छाती चौड़ी कर रहे थे। बीच-बीच में रामदत्त को पार्वती का अनमनापन फिर सताने लगता जिससे निपटने का रामदत्त ने एक आसान सा तरीका खोज निकाला था। ऐसे मौकों पर रामदत्त सोने चाँदी के सारे पशु-पक्षी निकालते और बदले में पार्वती के लिए कोई जेवर गढ़ा लाते। पार्वती खुशी जाहिर करतीं और रामदत्त को भी लगता कि उन्होंने पार्वती का अनमनापन फिलहाल कुछ समय के लिए तो दूर कर दिया है जिसकी वजह के बारे में रामदत्त अपनी पूरी कोशिश के बाद भी कभी कुछ नहीं जान पाए थे।

रामदत्त के दोनों बेटे हूबहू उन पर जा रहे थे। गोरा रंग तेजी से बढ़ती लंबाई और दोहरी कद-काठी। पर रामदत्त अपने बचपन में शर्मीले और दब्बू थे, उनके विपरीत वशिष्ठ और विश्वामित्र जम कर शरारती निकल रहे थे। उनकी शरारतों और बदमाशियों की शिकायतें उन तक पहुँचती, जिस पर वे उन्हें ऊपर-ऊपर डाँटते रहे पर भीतर-भीतर मुग्ध होते रहे। उन्हें प्यार करते रहे। उनकी बलाएँ लेते रहे। रामदत्त इस बात पर खुशी महसूस करते कि उनके बेटे उनकी तरह दब्बू नहीं हैं इसलिए उनके साथ कभी वैसा कुछ नहीं होगा जैसा रामदत्त के साथ बचपन में होता रहा था। इस तरह से वशिष्ठ और विश्वामित्र के कारनामों के प्रति रामदत्त और पार्वती दोनों में ही एक उपेक्षा का भाव रहा। रामदत्त खुश थे पर उपेक्षा की एक वजह और भी थी कि वे अपने पुरोहिती साम्राज्य में इतने खोए हुए थे कि कभी जान ही नहीं पाए कि दोनों भाइयों की बदमाशियाँ उन्हें किस तरफ ले जा रही हैं। पार्वती अपने अनमनेपन में ही खोई रहतीं। और जब रामदत्त घर पर नहीं रहते तो उनसे पूछने वाला भी कोई नहीं होता कि उनके अनमनेपन की वजह क्या है जिसे वे हमेशा नकारती रहीं थी।

इस स्थिति का फायदा गाँव के उन लोगों ने उठाया जो रामदत्त से किसी वजह से दुखी या नाराज थे। उन्होंने दुश्मन को समूल नष्ट करने के गाँवों के एक प्रचलित और सर्वमान्य तरीके पर अमल करना शुरू कर दिया। यह तरीका था किसी के बेटों को बिगाड़ना या बिगड़े हुए को और शह देना। इसके बाद तो दोनों को रोकना असंभव हो गया। बदमाशी और कमीनापन जैसे दोनों के खून में शामिल था। दोनों की एक जोड़ी बन गई थी जो हमेशा साथ रहती। किसी की चलती हुई साइकिल के पहिए में डंडा डाल देना, किसी बच्चे के ऊपर थूक देना, बच्चों को गालियाँ सिखाना, पौधों को तोड़ देना या दोपहरियों में जब लोग सो रहे हों उनके जानवर खोल देना जैसी बातों से उनकी बदमाशियाँ शुरू हुईं तो बढ़ती ही गईं। रामदत्त को अपने से ही फुर्सत नहीं थी पर पार्वती जब कभी अपने अनमनेपन से बाहर निकलतीं तो दोनों की जम कर पिटाई करतीं या उनका खाना बंद कर देतीं। पर पिटाई के लिए दोनों हाथ में कम ही आते थे और खाना उनके लिए कोई समस्या नहीं थी। ऐसे कई घर थे जहाँ वशिष्ठ और विश्वामित्र चुपचाप खा पी आते थे।

गाँव में एक लड़का था चंपक। चंपक लंबे बाल रखता था और गाँव की नौटंकी मंडली में स्त्रियों की भूमिकाएँ किया करता था। पता नहीं ये भूमिकाएँ करते-करते या ऐसे ही सहज रूप में पर उसके शरीर में स्त्रियों वाली कमनीयता आ गई थी। दोनों भाई एक साथ उसके पीछे पड़े और जाने उसकी सहमति से या कुछ पैसे का लालच दे कर या डरा धमका कर उसके साथ मुँह काला किया और इसके बाद उसकी गुदा में पैट्रोल डाल दिया। वह जलन से चीखता रहा, दोनों भाई हँसते रहे।

उस दिन रामदत्त के घर में खाना नहीं बना। पार्वती का चेहरा पत्थर की तरह सख्त हो गया था। चंपक की माँ रामदत्त के दरवाजे पर जी भर के गालियाँ बक के गई थी। एक तो वशिष्ठ और विश्वामित्र की इतनी गलीज हरकत और ऊपर से चंपक की माँ का दरवाजे पर आ कर गाली बकना। पार्वती सदमें की हालत में थीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या कर डालें। वे भयंकर क्रोध और बेचैनी में घर के एक छोर से दूसरे छोर के बीच घूम रही थीं। ऐसे में जब रामदत्त शाम को घर लौटे और घर में अँधेरा देखा तो सहज ही पूछ बैठे। क्या हुआ पार्वती, घर में अँधेरा क्यों है? तुम्हारे दोनों बेटों की मौत हो गई है इसलिए, पार्वती ने जवाब दिया। क्या बक रही हो होश में तो हो? कहाँ हैं वशिष्ठ और विश्वामित्र? रामदत्त के इस सवाल के जवाब में पार्वती ने कहा कि उन्हें गंगा माई खा गई। रामदत्त को समझ जाना था कि घर में कुछ भयानक घटा है पर रहे तो पंडित ही, नहीं समझ पाए। और बदले में पार्वती को तमाचा खींच मारा।

पार्वती जैसे क्रोध से पागल हो रही थीं। वे चिल्लाईं, मार ले मछरगंधा, एक मैं ही थी जो तेरे साथ निबाह लाई। कोई दूसरी होती तो मुँह पर थूक कर चली गई होती। तेरा ही पाप है कि ऐसे कुकर्मी बेटे मिले हैं। मरते भी नहीं कि फुर्सत मिले। घिन आती है मुझे तुमसे। ये तुम्हारा ही पाप है जो मेरे बेटों के सिर चढ़ कर बोल रहा है। अब तक न रामदत्त ने पार्वती को कभी मारा था न पार्वती ने उनसे कभी ऐसे बात की थी। पार्वती हाँफने लगी थीं, जैसे गिरने को हुईं। रामदत्त सँभालने के लिए बढ़े जिन्हें स्थिति की गंभीरता से ज्यादा उसकी अचानकता ने अपनी गिरफ्त में ले लिया था कि पार्वती दोबारा चीखीं। मत छुओ मुझे। तुम्हारे शरीर से मछलियों की गंध आती है। उबकाई आती है मुझे तुम्हारे साथ सोते जागते। तुम जब सामने होते हो तो मेरा मन करता है कि मैं साँस लेना बंद कर दूँ। जब से तुम्हारे घर आई, मैं कायदे से कभी साँस नहीं ले पाई। वही घिनौनी गंध और अब वही गंध मुझे तुम्हारे बेटों से आने लगी है। तुम्हारी गंध तो घर में ही थी, तुम्हारे बेटे पूरा इलाका गंधवा रहे हैं पंडित। उनको सँभालो। मुझ पर हाथ उठा कर अपनी मर्दानगी मत दिखाओ।

रामदत्त लद से बैठ गए। इस पार्वती को तो वे जानते ही नहीं थे। उस चेहरे जिसे खुश करने के लिए वे उसके आगे पीछे डोलते थे, गहने गढ़ाते थे, के पीछे ये कौन सा रूप छुपा था जिसे वे आज तक नहीं जान पाए। तो यहाँ छुपा था अनमनापन! अचानक उनकी चोटी में बेतरह दर्द उठा। चोटी को हाथ से मसलते हुए उन्होंने कहा मैंने उसे कभी नहीं याद किया पार्वती। मैं तो तुम्हारे पीछे घूमता रहा और तुम्हें मुझसे मछलियों की गंध आती है। इतना तेल, साबुन, चंदन, इत्र! नहीं ये कैसे हो सकता है? मैना को तो मैं कब का भूल चुका हूँ तो क्या वो मेरे इतने भीतर बसी हुई थी कि खुद मुझे भी नहीं पता चला। क्या मेरे चेहरे के पीछे से मैना का चेहरा झाँकता है? क्या मेरी दोनों आँखों की जगह पर दो मछलियाँ हैं? क्या मेरी त्वचा का रंग बदल रहा है? क्या मेरे नाखूनों में मछलियों की चमड़ी भर गई है। अगर नहीं तो ये गंध कहाँ से आई तुम्हें, बोलो पार्वती बोलो, रामदत्त जैसे वहीं पड़े-पड़े बुदबुदा भर रहे थे। वे दरअसल पार्वती से नहीं अपने आप से बात कर रहे थे।

इसी के समानांतर एक दूसरा एकालाप पार्वती का भी चल रहा था। रामदत्त तुम्हारी इस घिनौनी गंध ने मेरा सर्वनाश कर दिया। इसने कभी एक पल को भी मुझे तुम्हारे साथ नहीं होने दिया। मैं हमेशा तरसती रही तुम्हारे ऐसे साथ के लिए जब ये मरजानी गंध हमारे तुम्हारे बीच न आए। जिस क्षण तुम्हारे दोनों बेटे मेरी कोख में आए उस क्षण भी मैं तुमसे घृणा कर रही थी रामदत्त।

उस पूरी रात वशिष्ठ और विश्वामित्र घर नहीं आए। रात भर घर में दीपक नहीं जला। रामदत्त जस के तस पड़े रहे अपनी फुसफुसाहटों में डूबे। पार्वती पूरी रात उन्माद में रहीं। आतीं और रामदत्त को झिंझोड़ने लगती, हमारी क्या गलती थी पंडित की तुम मुझे मिले इस गंध के साथ, ऐसे बच्चे मिले जो नाक कटा रहे हैं गली-गली। सब तुम्हारी उसी गंध की वजह से हुआ। बताओ कहाँ से ले आए ये गंध? दोनों एक साथ बोल रहे थे पर कोई एक, दूसरे को सुनने की स्थिति में नहीं था। पार्वती की वर्षों की संचित घृणा फूट पड़ी थी पर उसे कोई दिशा नहीं मिल रही थी। पलट कर वह पार्वती को और उन्मादी बना रही थी। ऐसे ही रामदत्त उन्हीं मत्स्यगंधा दिनों में पहुँच गए थे। इस क्षण वे पार्वती से इतनी दूर थे कि पार्वती अगर उन्हें मार भी डालतीं तो भी वे जीवित बने रहते। रामदत्त और पार्वती दोनों को जीवन ने दुबारा मौका दिया था। पर दोनों में से कोई भी इस हालत में नहीं था कि उसे सहेज पाता।

रात भर डूबे रहना मछलियों की गंध में

रामदत्त त्रिपाठी के पिता कृष्णदत्त त्रिपाठी एक छोटे-मोटे गँवई पुरोहित थे। वे पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें पुरोहिती का कोई काम-काज नहीं आता था पर अभ्यास से संस्कृत का ऐसा कामचलाऊ ज्ञान उन्होंने अर्जित कर लिया था कि अटक-अटक कर सत्यनारायण कथा वगैरह का पाठ कर लेते थे। कृष्णदत्त के पास लोग तभी आते थे जब कोई दूसरा पंडित उन्हें ढूँढ़े भी नहीं मिलता था। कुछ गजब नहीं कि ऐसे में कृष्णदत्त का सबसे बड़ा सपना ही यही बन गया कि वह अपने बेटे रामदत्त को इलाके का सबसे बड़ा पंडित बनाएँ। वे जानते थे कि यह उनके किए धरे नहीं हो सकता इसलिए उन्होंने रामदत्त को किसी जानकार पंडित के साथ लगाने की सोची। पर जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि इस तरह से उनका बेटा सिर्फ झोला उठाना या सीदा सामान बाँधना सीखेगा। दूसरा जीवन भर के लिए इसी पिछलग्गू की छवि में बँध जाएगा। कृष्णदत्त खुद कुछ दिनों तक एक पंडित का झोला ढो चुके थे इसलिए इस दर्द को जानते बूझते थे। इन्हीं दिनों उनको कहीं से इलाहाबाद में गंगा किनारे प्रतिष्ठानपुर में चलने वाले एक आवासीय संस्कृत विद्यालय के बारे में पता चला जहाँ न सिर्फ संस्कृत की तालीम दी जाती थी बल्कि तरह-तरह के कर्मकांड भी सिखाए जाते थे।

जब कृष्णदत्त त्रिपाठी अपने इकलौते मातृविहीन बालक रामदत्त को ले कर वहाँ पहुँचे तो धोती-कुर्ता पहनने वाले और लंबी चोटी रखने वाले किशोरों के सस्वर संस्कृत पाठ पर मुग्ध हो गए और बिना कुछ भी सोचे समझे बालक रामदत्त को आश्रम में छोड़ कर चले आए। रामदत्त की उम्र उस समय पंद्रह-सोलह साल से अधिक नहीं थी। अगले सात-आठ साल उन्हें वहीं रहना था। आश्रम एक अविवाहित आचार्य चलाते थे और वहाँ स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था।

आश्रम में रामदत्त का सिर घुटा दिया गया। सिर पर एक मोटी सी चोटी छोड़ दी गई। उनका यज्ञोपवीत कराया गया। जांघिए की जगह पर लँगोट बाँधना सिखाया गया और पैंट-शर्ट की जगह पर धोती कुर्ता। इसी तरह उन्हें बैठने, खड़े होने, नहाने, चंदन लगाने और सोने के तरीके भी बताए गए। उन्हें यह भी बताया गया कि नहाते समय गंगा में किस दिशा की ओर मुँह करके कितनी डुबकियाँ लगानी हैं। आश्रम में मुफ्त शिक्षा और रहने खाने के बदले इन विद्यार्थियों को कुछ खास नहीं करना था। उन्हें आश्रम के कठोर अनुशासन का पालन करना था। और आचार्य जी के द्वारा अपने जजमानों या शिष्यों के हित में आए दिन संपन्न होने वाले कर्मकांडों में स्वयंसेवक की भूमिका निभानी थी। यहाँ रामदत्त को अपने जैसे अनेक बच्चे मिले जो लंबी चोटी और जनेऊ धारण किए हुए संस्कृत भाषा और कर्मकांड को सीखने का सपना ले कर आए थे। हालाँकि यह जान पाना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं था कि इस सपने में कितना हिस्सा इन बच्चों का खुद का था और कितना उसमें उनके पिताओं के सपने या मजबूरियाँ थीं। यहाँ अनाथ बच्चों की भी एक बड़ी संख्या थी जिन्हें उनके निकट संबंधी यहाँ छोड़ गए थे। आधे अनाथ तो रामदत्त भी थे। बिना माँ के।

आश्रम के कठोर अनुशासन में बच्चे सहमे और बुझे से रहते। रात में कई बार कुछ बच्चे रोने लगते जिन्हें उनके साथी ही चुप कराते। या थोड़ा पहले आए बच्चे डाँटते। धीरे-धीरे आश्रम में बच्चों का एक समूह बनने लगता। वे एक दूसरे से लड़ते झगड़ते साथ रहना सीखते। शुरूआती दिनों में बच्चों लँगोट बाँधना न आता। उनके लँगोट अक्सर खुल जाते और दूसरे बच्चों का मनोरंजन हो जाता। आश्रम में मनोरंजन के साधन बहुत सीमित थे। आचार्य जी के पास एक रेडियो था जो उन्हीं के पास रहता था। बच्चों को मनोरंजन के लिए सोते समय एक दूसरे की चोटी बाँध देने या लँगोट खोल देने जैसे कामों तक ही सीमित रहना पड़ता था। एक उपाचार्य थे जिनके ऊपर बच्चों की देखरेख की समूची जिम्मेवारी थी। ये आचार्य बेहद सख्त थे और जरा सी भी गलती पर भयंकर पिटाई करते थे। बच्चे उन से बेहद डरते थे। इतना कि जब वे बच्चों को ले कर गंगा स्नान आदि के लिए जाते तो उनके पीछे चलने वाले सैकड़ों बच्चों के कदमों से आवाज तक नहीं निकलती थी। वे जोर से साँस लेना तक भूल जाते थे। इसी तरह उन्हें अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की शिक्षा दी जा रही थी।

पर इस दुनिया के नीचे एक और दुनिया थी। नए आए बच्चे पुराने हो रहे थे। उपाचार्य के आतंक के बावजूद वह चुहलें करना, इशारे करना सीख रहे थे। पल भर के लिए ही सही उनकी किशोरावस्था आती और कुछ खेल करके चली जाती। बहुत बार ये खेल पकड़े जाते। मार पड़ती, सजाएँ मिलतीं फिर भी। इन्हीं सब के बीच बच्चों को ठोंक पीट कर इस लायक बनाया जाना था कि वह भविष्य में धर्म की ध्वजा को सँभाल सकें। सफलतापूर्वक कर्मकांड संपन्न करा सकें। सफल कथावाचक बन सकें। चाहे माहौल का असर हो या वहाँ रत्ती-रत्ती में फैली विकल्पहीनता का अगले दो-तीन सालों में रामदत्त आश्रम में पूरी तरह रम गए। और संस्कृत में तो कुछ इस तरह रमे कि कोई भी और भाषा न जानने के बावजूद संस्कृत को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भाषा मानने लगे। रामदत्त के साथ के ज्यादातर बच्चे ऐसे ही सोचते थे। यहाँ से निकल कर उन्हें पुरोहिती या अन्य कर्मकांडों को अपनाना था। वे धार्मिक कर्मकांडों के लिए तैयार किए जा रहे पेशेवर थे। उनकी शिक्षा पूरी तरह से रोजगारपरक थी। उनका अपना ड्रेस कोड थ। उनका अपना छल-छद्म था जिसकी आड़ में उन्हें जीवन भर रहना था। उनके शब्द, शैली, उठने, बैठने के तरीके से ले कर तकिया कलाम तक सब कुछ तय किया जा रहा था। यही उनका भविष्य था। यही उनकी दुनिया थी। उन्हें लोगों के विश्वासों और डर के बीच अपना रोजगार तलाश करना था। वे पूरी तरह से पेशेवर होने वाले थे बावजूद इसके उन्हें जीवन भर फ्रीलांसर रहना था।

अक्सर किसी विद्यार्थी को आचार्य या उपाचार्य लोगों का पैर आदि दबाने जाना पड़ता था। यह विद्यार्थियों के नैतिक कर्तव्यों में शामिल था। रामदत्त उपाचार्यों के पैर तो दबाते रहे थे पर आचार्य से उनका सीधा साबका कभी नहीं पड़ा था। एक दिन आचार्य ने उन्हें अपनी सेवा के लिए बुलवाया। आचार्य लँगोट के ऊपर पीली धोती पहन कर लेटे हुए थे। रामदत्त के आते ही आचार्य ने धोती उतार कर बगल रख दी और रामदत्त को पैर दबाने के लिए कहा। रामदत्त पैर दबाते रहे और आचार्य उनसे उनकी पढ़ाई के बारे में, घर बार के बारे में और यहाँ कोई दिक्कत तो नहीं है आदि पूछते रहे। यह भी आश्वासन दिया कोई दिक्कत हो तो सीधे मुझसे बताया करो। रामदत्त खुश हो गए। बेकार में ही सब लोग आचार्य से इतना डरते हैं। आचार्य तो उनसे कितना हँस-हँस कर बात कर रहे हैं। उनका गाल भी सहलाया पर रामदत्त की खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी। आचार्य ने अपना लँगोट खोल दिया और बोले यहाँ भी दबा दो। देखो ये बेचारा दर्द से बेहोश सा पड़ा है। रामदत्त शर्म और अपमान से कुंठित हो गए। उनका मन वहाँ से भाग जाने को हुआ पर वे भाग नहीं पाए। आचार्य ने रामदत्त का हाथ पकड़ कर उस मरे हुए घिनौने चूहे पर रख दिया और उनके हाथों को अपने हाथों में ले कर चूहे को दबाने सहलाने लगे। चूहा जिंदा होने लगा। तब आचार्य ने कहा कि नहीं इसका जिंदा होना ठीक नहीं। इसे मार दो पर इसे मारने का एक खास तरीका है। रामदत्त आँखें मूँद लेते हैं। कसमसाते रहते हैं। शर्म और उत्तेजना से ठंडे पड़ जाते हैं। डर से काँपते रहते हैं और उनकी धोती और लँगोट उतर जाती है। रामदत्त पूरी ताकत से चीखने को होते हैं पर अनुभवी आचार्य का हाथ पहले ही ही उनके मुँह पर है। चीख भीतर ही घुट कर रह जाती है। थोड़ी देर बाद लगभग बेहोश रामदत्त को आचार्य एक तेज धार वाला लंबा चाकू दिखाते हैं कि किसी से कुछ कहा तो इसी से तुम्हें काट काट कर गंगा की मछलियों को खिला देंगे। वे बाहर निकले तो उन्हें कहीं बगल से एक उपाचार्य की हँसी सुनाई दी कि आचार्य ने आज इसे भी गूढ़ ज्ञान दे दिया।

उस पूरी रात रामदत्त बार-बार बेहोश होते रहे। बुखार और अर्द्धबेहोशी में मर जाऊँगा आचार्य जी या चूहा चूहा जैसा कुछ बुदबुदाते रहे। मर जाऊँगा आचार्य जी को आचार्य जी के प्रति उनका प्रेम और चूहा को बुखार से उपजा डर मान लिया गया। आचार्य मुस्कुराते रहे। उनके साथ कुछ बच्चे भी मुस्कुराते रहे। तो दूसरे कुछ बच्चे डरे सहमे रहे। उनकी रही सही मुस्कानें भी गायब हो गईं। ऐसे ही कई दिनों तक चलता रहा। चाकू वाले आचार्य जी न सिर्फ रामदत्त के सपनों में आते रहे बल्कि हकीकत में भी रोज आ कर उनका हालचाल लेते रहे। रामदत्त दिन रात डरे सहमे रहते। रात में सोते सोते चौंक पड़ते। उन्हें सपने में भी अपने साथ वही गंदा काम दोहराया जाता दिखता, चाकू की उसी चमकती हुई नोंक पर। वे बार-बार चाकू का अपने भीतर जाना महसूस करते और जड़ हो जाते।

जल्दी ही वे ठीक हो गए पर किशोर दिनों का चमकदार उल्लास उनके चेहरे से गायब हो गया। उनकी चंचलता दुनिया की हर चीज को अपने तरीके से जानने समझने की उत्सुकता सब गायब हो गई। आँखों की चमक गायब हो गई। उसकी जगह पर आँखों के नीचे एक धुँधला स्याह अँधेरा आ बैठा। पहले मस्ती और बेफ्रिकी की वजह से वे पैर कहीं और रखते थे तो पैर कहीं और पड़ता था, अब डर संशय और आत्महीनता की वजह से पैर कहीं और रखते हैं तो पैर कहीं और पड़ता है। एक ठंडा अनमनापन, उदासी और अपने आप में ही खोए रहने ने उन्हें उनके दोस्तों से भी काट दिया। वे हमेशा इस बात से डरे रहते कि जो कुछ उनके साथ हुआ इस बात का उनके किसी दोस्त को पता न चल जाए। नहीं तो सब दोस्त उनसे दूर हो जाएँगे, उनसे घृणा करेंगे, उनका मजाक बनाएँगे। एक चुप्पी उनके चेहरे पर स्थायी छाया की शक्ल में जमा हो रही थी। ये चुप्पी कभी चिड़चिड़ेपन के साथ टूटती तो कभी वीतरागी भाव से। दोस्तों के खुद से दूर हो जाने का डर या अपना मजाक उड़ाने का डर उनके ऊपर कुछ इस कदर हावी हो गया कि वे खुद ही सबसे दूर हो गए। कोई उनकी तरफ देख कर मुस्कराता तो रामदत्त को उसका चेहरा टेढ़ा दिखाई पड़ता। उन्हें लगता कि शायद वह जान गया है कि उस दिन उनके साथ क्या हुआ था।

दोस्तों से कट जाने के बाद अकेले पड़ गए रामदत्त ने अपने आस-पास की दुनिया को नए-सिरे से पहचानना शुरू किया ही था कि वही घटना फिर से दुहराई गई। इस बार उन्हें बुखार नहीं आया। अपने आप को खत्म कर लेने की इच्छा आई। यह इच्छा क्षणिक थी जीवन से प्यार इस पर हावी रहा। पर जब वही घटना उनके साथ बार बार दुहराई जाने लगी और कभी-कभी एक उपाचार्य ने भी उन्हें बुलाना शुरू कर दिया तो जान देने की उनकी इच्छा बलवान होती चली गई। जीवन का मोह खत्म होता गया और इस खत्म होते मोह के बीच उन्होंने जाना कि यह दारुण नरक भुगतने वाले वे अकेले नहीं थे। उनके जैसे और भी कई थे जो चुपचाप इस यातना से गुजर रहे थे। उनका आत्मविश्वास खत्म हो गया था। वे अकेले पड़ रहे थे। वे अपने से ही जूझ रहे थे और हार रहे थे। पर कुछ उन चीजों के अभ्यस्त भी हो रहे थे। कुछ इसका बदला दूसरे बच्चों से निकालने की कोशिश में थे। एक बार इस पूरे यथार्थ से परिचित हो जाने के बाद रामदत्त चुपचाप घर भाग आए। पर बहुत कोशिश के बाद भी उन्हें वे शब्द नहीं मिले जिनमें वे अपने पिता को अपने साथ घट रहीं घटनाओं के बारे में बता पाते। नतीजे में पिता उन्हें दूसरे दिन फिर से आश्रम छोड़ आए। शाम को उपाचार्य ने उन्हें बेंतों से मारा और रात को पैर दबाने के लिए बुलाया। इसके बाद अब जीने को क्या बचा है, रामदत्त ने सोचा।

एक बार तय कर लेने के बाद जान देने का जो सबसे आसान तरीका उन्हें समझ में आया वह गंगा में डूब जाने का था। रामदत्त के मन में अपनी माँ की बहुत धुँधली सी स्मृति थी। फिर भी उन्होंने माँ के न होने को गहरे महसूस किया। उन्हें लगा अगर माँ होती तो सब कुछ उनके बिना बताए भी जान जाती। माँ को सब कुछ सपने में दिखाई पड़ जाता। उन्हें पिता का ख्याल आया और इसी के साथ गुस्सा भी कि वे यहाँ रामदत्त को इन राक्षसों के बीच में छोड़ गए थे। उन्हें गाँव के अपने साथ के दूसरे बच्चे याद आए जो पढ़ लिख भले ही न रहे हों पर घर में तो होंगे। गाँव के उनके हमउम्र दोस्तों का भी अपना नरक हो सकता था यह सोचने के लिए रामदत्त अभी छोटे थे।

अपने दोस्तों से कटने के बाद गंगा का किनारा उन्हें वैसे भी अच्छा लगने लगा था। कई बार रामदत्त को इस वजह से भी डाँट पड़ी थी कि हमेशा गंगा किनारे क्या करते रहते हो पर जब भी उन्हें मौका मिलता गंगा की तरफ भाग निकलते। वहाँ उन्हें सुकून मिलता, जम कर उदास होने और रोने के लिए एकांत मिलता ओर कई बार पल भर के लिए ही सही पर सब कुछ भूल जाने का मौका भी। तो जब रामदत्त ने मरने का तय किया तो गंगा की गोद के सिवा कुछ और उनकी समझ में नहीं आया। वे धीरे धीरे पानी में उतरते गए पर जैसे-जैसे वे भीतर जाते गए जान देने का उनका हौसला डगमगाता गया। जब पानी ठुड्डी तक पहुँच गया तो उन्हें मौत का भयानक चेहरा दिखाई पड़ा। वे वहीं जड़ हो गए। पल भर में ही रामदत्त ने वहाँ से लौटना चाहा पर पैरों के नीचे की नरम बालू उनको अपनी तरफ बुला रही थी। पानी का बहाव और दबाव उनके खिलाफ था। अपनी पूरी कोशिश के बाद भी वे किनारे की तरफ एक भी कदम नहीं बढ़ा पाए बल्कि बाहर निकलने की घबराई हुई कोशिश में खड़े रहने का भी संतुलन बिगड़ गया और वे गहरे में पहुँच गए। अपनी लंबाई से ज्यादा गहराई में। पानी से लड़ने की बेतरतीब कोशिश में उन्होंने पानी के ऊपर आना चाहा और पता नहीं उनकी कोशिश से या पानी के खेल से ही उनका सिर जरा सा बाहर निकला। वे पानी में थे। पैर के नीचे भी पानी ही था। ऊपर आसमान था। उस एक पल में उन्हें फिर से माँ की याद आई। वे अपनी पूरी ताकत से अनजाने ही पुकार उठे 'अम्माँ'। और इसी के साथ वे पानी में समा गए। उनके खुले मुँह में पानी भरने लगा।

जब रामदत्त को होश आया तो उन्होंने पाया कि कोई उनका पेट दबा दबा कर पेट का पानी निकालने की कोशिश कर रहा है। जब रामदत्त ने आँखें खोली तो यह उनका इसी शरीर में नया जन्म था जिसे अपने मजबूत मेहनती शरीर के सहारे एक युवती ने पैदा किया था। रामदत्त ने आँखें खोल कर उसे देखा और आँखें बंद कर ली। रामदत्त पल भर के लिए सब कुछ भूल गए। वे सोचने लगे कि वे यहाँ कैसे पहुँचे। तब उन्हें पिछला सब कुछ एक झटके में याद आता चला गया। इस क्षण उन्हें वो सारी बातें किसी बुरे सपने की तरह लगीं। पल भर में वे दुबारा सब कुछ उसी तरह से भूल गए जैसे सपना स्मृतियों से धुल-पुँछ जाता है। उन्हें एक दूसरी छवि दिखी जो अब थोड़ी निश्चिंत सी उनके ऊपर झुकी थी। वो खुश थी कि उसकी मेहनत बेकार नहीं गई थी।

तभी उस लड़की ने, जिसका नाम मैना था और जिसे बाद के दिनों में रामदत्त ने अपने पौराणिक ज्ञान के खुमार में मत्स्यगंधा नाम दिया था, उनसे पूछा कि पंडित हो। रामदत्त की समझ में ही नहीं आया कि वह क्या जवाब दें। तब उसने बताया कि जब उसने रामदत्त को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया तो बस उनकी चुटिया ही हाथ में आ पाई। इस पर रामदत्त ने अपनी चोटी की जड़ों में एक मीठा सा दर्द महसूस किया जो सारी जिंदगी उनकी चोटी में बना रहने वाला था। वे शरमा गए। उनका शरीर बेदम हो गया था। हाथ पैर भारी हो गए थे जैसे उन पर किसी ने गीली मिट्टी के लोंदे छोप दिए हों। फिर भी उन्होंने उठने की कोशिश की तो लड़की ने कहा कि थोड़ी देर लेटे रहो पंडित जी, तुम्हें मेरा कहा मानना चाहिए। रामदत्त ने चुपचाप आँखें मूँद ली और कहा कि तुम जाओ मैं चला जाऊँगा। मैं अब ठीक हूँ। लड़की ने कहा कि ये तो बताओ कि तुम डूब कैसे रहे थे तो घबराए हुए रामदत्त ने जवाब दिया कि बाद में बताऊँगा। लड़की हँसने लगी। उसने कहा कि तुम क्या सोचते हो मैं बाद में भी तुमसे मिलूँगी। रामदत्त हाँ नहीं हाँ करके रह गए। वे कई वजहों से शरमा रहे थे। वे खुश थे कि बच गए थे पर इस बात पर शरमा रहे थे कि उन्हें एक लड़की ने बचाया था। इससे भी ज्यादा शर्म उन्हें इस बात पर आ रही थी कि एक लड़की उनके इतने पास बैठ कर उन्हें देखती रही थी। इस शर्माने में थोड़ा अच्छा लगने का भाव भी शामिल था कि उसने उनका पेट दबाया था और चोटी पकड़ कर पानी से खींच लाई थी। रामदत्त ने दोबारा आँखें खोली तो पाया कि लड़की एकटक उन्हीं की तरफ देख रही है। उन्होंने झटपट आँखें मूँद ली और कहा कि तुम जाओ। लड़की ने कहा कि ठीक है पंडित जी मैं जाती हूँ। रामदत्त ने दूर जाते हुए कदमों की आवाज सुनी और आँखें खोल लीं। उन्हें चोटी जी जड़ों में मीठा-मीठा दर्द महसूस हो रहा था। उन्होंने चोटी सहलाई और उठ बैठे और पिछले दो तीन सालों के अभ्यास की वजह से स्वाभाविक रूप से आलती-पालथी मार कर बैठ गए। बैठते ही उनकी नाक ने एक परिचित सी गंध महसूस की। जब रामदत्त को लगा कि गंध पीछे की तरफ से आ रही है तो झट से पीछे की तरफ घूम गए। पीछे वही मत्स्यगंधा मुस्कुराती हुई खड़ी थी। उन्होंने चिढ़ कर कहा कि आप जाती क्यों नहीं। रामदत्त का पूरा शरीर अजीब तरीके से टूट रहा था पर वे उठे और बिना लड़की की तरफ देखे या उससे कुछ कहे सुने आश्रम की तरफ चल पड़े। आश्रम पहुँचने तक उन्होंने पीछे मुड़ कर एक बार भी नहीं देखा पर गंध जस की तस बनी रही और उनका पीछा करती रही।

आश्रम में विद्यार्थियों को साबुन लगाने की मनाही थी। आचार्य जी का मानना था कि सुगंधित चीजों से वासनाएँ भड़कती हैं इसलिए विद्यार्थियों को उनसे बच कर रहना चाहिए। आश्रम में वह गंगा की बालू मल मल कर देर तक नहाते रहे। जब उन्होंने सोचा कि अब तक गंध चली गई होगी तभी उन्हें लगा कि मत्स्यगंधा उनके पीछे ही खड़ी है। उनसे इतनी सट कर कि वह उसकी साँसों की गर्मी को भी अपनी गर्दन पर महसूस कर सकते हैं। रामदत्त को लगा कि अगर वह पलटे तो जरूर उसके चेहरे पर पलटेंगे। वे पलटे पर मत्स्यगंधा कहीं नहीं थी। सिर्फ उसकी महक थी। उनकी चोटी में दुबारा दर्द होने लगा। चोटी सहलाते हुए रामदत्त ने सोचा कि ऐसा क्यों हो रहा है पर कुछ समझ नहीं पाए। वे एक साथ ही इस गंध से बचना भी चाह रहे थे और यह भी चाह रहे थे कि यह गंध उनके आसपास बनी रहे। कहीं वह चुड़ैल तो नहीं थी, अपनी चोटी को सहलाते हुए रामदत्त ने सोचा।

किशोर रामदत्त ने पहली बार किसी लड़की को इतना करीब से महसूस किया था। वे बार-बार सोचते उसके बारे में। उसने उन्हें डूबते देखा होगा, दौड़ कर आई होगी। उन्हें छुआ होगा पर इसके बाद वह कुछ भी नहीं सोच पाते और उनकी चोटी दर्द करने लगती। वह चोटी सहलाते हुए बैठे रहते। यूँ तो रोज ही सुबह वह नहाने के लिए गंगा की तरफ जाते थे पर उन्हें मत्स्यगंधा नहीं दिखी। तीसरे दिन शाम उसे देखने की ललक आखिरकार उन्हें गंगा की तरफ अकेले खींच ही ले गई। बहुत देर तक इधर-उधर ताकने खोजने के बाद जब वह निराश हो कर लौटने लगे तो वह सामने की तरफ से आती हुई दिखी। वह रामदत्त को देख कर मुस्कुराई तो वह शरमा गए। उनकी चाल धीमी हो गई पर उन्होंने जाहिर किया कि जैसे उन्होंने उसे देखा ही नहीं। रामदत्त प्रकृति का नजारा लेते हुए धीरे-धीरे बढ़ते रहे। जैसे ही उन्हें लगा कि वह नहीं रूकी और चलती चली गई तो तुरंत पलट गए और बिना किसी कोशिश के उनकी नजरें उस साँवली सलोनी लड़की पर टिक गईं।

लड़की ने कहा घोंचू पंडित जब मुझी को खोज रहे हो तो इतनी नौटंकी क्यों कर रहे हो। रामदत्त हकबका गए। जवाब में उन्होंने कहा कि हाँ, हाँ, नहीं, नहीं। लड़की हँसने लगी और बोली पहले तय कर लो कि हाँ कहना है कि नहीं कहना है। रामदत्त लजा गए तो वह बोली उस दिन डूब कैसे रहे थे? तैरना नहीं आता? रामदत्त ने मुंडी हिला कर कहा हाँ, हाँ नहीं, नहीं। डर लगता है? हाँ, इस मुलाकात में ऐसा कुछ खास नहीं है कि याद आए पर याद का क्या है उसके अपने ही तर्क होते हैं। इस मुलाकात के बाद रामदत्त अक्सर गंगा किनारे जाने लगे। लड़की रामदत्त से दो तीन साल बड़ी थी और उसका नाम मैना था। उसका घर वहीं मछुआरों की बस्ती में था। उसके पिता मछली पकड़ने का और माँ मछली बेचने का काम करती थी। जब रामदत्त लड़की के साथ होते तो अमूमन वही बोलती। रामदत्त बस हूँ हाँ करते। पर पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने उनका जो आत्मविश्वास पूरी तरह से खंडित कर दिया था वह फिर से पनपने लगा।

इस बीच मैना ने रामदत्त के साथ तैरते हुए उन्हें तैरने के गुर बताए। उसने रामदत्त को घुमरी नाम का एक पानी पर तैरने वाला कीड़ा जिंदा निगलने के लिए विवश किया जिसके बारे में मैना का भरोसा था कि उसे निगलने के बाद तैरना अपने आप ही आ जाता है। फिलहाल चाहे मैना के साथ का असर हो या घुमरी निगलने का कि वह उस कीड़े की तरह ही पानी पर तैरने लगे। रामदत्त के चेहरे की चमक दोबारा लौटने लगी। आश्रम में उन्हें कई बार सजा मिली फिर भी मौका लगते ही वह गंगा किनारे भागते। शाम के झुटपुट अँधेरे में वे साथ साथ तैरते, शर्त लगाते कि कौन आगे जाएगा, चहुलें करते बालू पर एक दूसरे को खदेड़ते पकड़ते और गुत्थमगुत्था हो जाते। हालाँकि दोनों में से किसी ने नहीं कहा था कि उनके बीच प्यार जैसा कुछ है इसके बावजूद दोनों ने एक दूसरे को तन मन से महसूससना शुरू कर दिया था।

इसी क्रम में दोनों ने धीरे-धीरे एक दूसरे को पहचाना और रामदत्त के मन में अपने शरीर के घृणित होने को ले कर जो एक ग्रंथि बन गई थी उससे वह मुक्त होने की तरफ बढ़े। जब रात के अँधेरे में गंगा की बालू पर दोनों एक हुए तो उसके बाद रामदत्त ने तुरंत कसम खाई कि अब शादी करेंगे तो मैना से ही करेंगें। रामदत्त ने अपने इस दृढ़ निश्चय के बारे में मैना को बताया तो उसने हँसी में उड़ा दिया। बोली पंडित जात से शादी कौन करेगा। वहाँ जा कर मछली की जगह कोंहड़े की सब्जी खानी पड़ेगी। ऊपर से तुम्हारी ये मोटी सी चुटिया, मुझे तो तुम्हारे साथ चलते भी शर्म आएगी। मैं तो किसी मछेरे से ही शादी करूँगी। तुम झूठ-मूठ का सपना मत देखो।

आश्रम वापस लौटते समय रामदत्त ने अपनी चोटी कटाने के बारे में सोचा। एक के बाद एक कई बहाने आए पर सबको उन्होंने खारिज कर दिया। असल बात यह थी कि वह खुद बिना चोटी के अपनी कोई कल्पना नहीं कर पाए। एक चोटी के कट जाते ही उनकी जाति चली जानी थी, कुछ इसी तरह के संस्कार उनके मन में बसे हुए थे। अपनी जाति की श्रेष्ठता का ख्याल तो ऐसे ही उनके खून में बसा हुआ था, ऊपर से उनकी आश्रम की पिछले पाँच-छह सालों की पढ़ाई, कि दुनिया ब्राह्मणों के ही इर्द-गिर्द घूमती है। या नहीं घूमती तो घूमनी चाहिए, कि सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने के साथ-साथ ब्राह्मणों की भी परिक्रमा करते हैं। और ब्राह्मणों के कुछ धर्म और संस्कार होते हैं। चोटी, चंदन और जनेऊ जैसे संस्कार उन्हें अपवित्र दुनिया के बीच में पवित्र बनाए रखते हैं। वे उस किस्से की पिनक में खोए थे जो आश्रम में उन्हें कई बार सुनाया जा चुका था कि पहले ब्राह्मणों की धोतियाँ आकाश में सूखतीं थीं। वे नहा कर धोती ऊपर उछाल देते और धोती सूखने के बाद तह हो कर नीचे आ जाती। पर ब्राह्मणों की पवित्रता और जलाल अब पहले जैसा नहीं बचा है इसलिए अब उन्हें अपनी धोतियाँ जमीन पर ही सुखानी पड़ती हैं। पंडित रामदत्त ने ये किस्सा सुनने के कुछ दिनों बाद ही तय कर लिया था कि वे भी अपनी धोती आकाश में सुखाएँगे।

इसके पहले आश्रम की घटनाओं ने उनके पवित्रता के ख्याल की धज्जियाँ उड़ा दी थी। हालाँकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं थी पर अपने आप से घृणा और एक गहरा अपवित्रता बोध उनके भीतर कहीं गहरे धँस कर बैठ गया था। मैना के साथ ने उन्हें शरीर की अपवित्रता के ख्याल से पूरी तरह मुक्त कर दिया था। कई बार वह अपनी जीभ पर किसी मिठाई का टुकड़ा, कोई फल या और कोई चीज रख लेती और कहती, खाओगे घोंचू पंडित और रामदत्त खाने के लिए मरे रहते। वह अँजुरी में पानी भर कर पूछती, घोंचू पंडित प्यास तो नहीं लगी है और रामदत्त का गला प्यास से सूखने लगता। रामदत्त उसकी अँजुरी से पानी पीते और मैना की उँगलियाँ उनके मुँह में आ जातीं। वह पूछती और प्यास लगी है पंडित तो रामदत्त झट से मुंडी हिला देते। वह अंजुरी में पानी भरती और बदमाशी से अपने शरीर के किसी हिस्से पर गिरा लेती। कहती, थोड़ा सा ही तो पानी था, गिर गया राम जी। जहाँ गिरा है वहीं से पी लो और रामदत्त पीने लगते। सामने गंगा लहलहाती रहती पर ऐसे क्षणों में गंगा का पानी खारा हो जाता। ऐसे ही एक दिन उसने अपनी जीभ पर रख कर पंडित को मछलियाँ भी खिलाई। वह एक-एक टुकड़ा अपनी जीभ पर रखती जाती और रामदत्त खाते जाते। ऐसे तो पंडित रामदत्त जहर भी खा सकते थे। वही मछलियों की गंध तो वह मैना के शरीर में महसूस करते थे जो उन्हें बार-बार मैना की तरफ खींच ले आती थी। एक तीखी और उत्तेजित करने वाली गंध। हवा में बस कर अपनी तरफ खींच कर अपने में मिला लेने वाली गंध। ऐसे क्षणों में वह खुद को महर्षि पराशर और मैना को योजनगंधा सत्यवती समझने लगते।

पर यही पूरा सच नहीं था। जिस दिन रामदत्त ने मछलियाँ खाईं लौटते हुए रास्ते में जम कर उल्टियाँ की। अपना पतित होना महसूस किया। ऐसा हमेशा होता था। रामदत्त मैना के सामने अपना ब्राह्मण होना या उच्चता के सारे संस्कार भूल जाते थे पर आश्रम की तरफ बढ़ते ही उन्हें फिर से अपना ब्राह्मण होना याद आने लगता। धोती आकाश में सुखाने का संकल्प याद आने लगता। अपनी चोटी, चंदन और जनेऊ याद याद आने लगता। रटे हुए मंत्र याद आने लगते और पुराणों में पढ़ी गई पतित ब्राह्मणों की अनेक कथाएँ याद आने लगतीं। पर और भी कुछ उल्टा-पुल्टा हो गया था रामदत्त के भीतर। पुराणों को पढ़ते हुए श्रृंगार और काम के प्रसंगों पर रामदत्त ठहर ठहर जाते थे। वे प्रसंग उन्हें बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के याद हो जाते थे। संस्कृत के ऐसे बहुत सारे श्लोक इस बीच रामदत्त को याद हो गए थे जिनमें प्रेम, काम या श्रृंगारिक अठखेलियों का चित्रण होता था। और ऐसे प्रसंग पुराणों में भरे हुए थे। पर जब वह मैना के मछलियाँ मारने के पुश्तैनी पेशे के बारे में सोचते तो उन्हें घिन आने लगती। आश्रम में पढ़ाई के दौरान जिस जीवन के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा था वह ज्यादा श्रेष्ठ और पवित्र लगता। मैना की जीभ पर मछलियाँ उन्हें अमृत लगतीं पर मछलियाँ मारने की कल्पना ही उन्हें भयानक और घृणित लगती।

एक बार रामदत्त ने वैसे ही मैना को भाग चलने का प्रस्ताव किया था। रामदत्त ने कहा कि मैं बप्पा से कह दूँगा कि तुम अनाथ लड़की हो। तुम्हारे पिता वहीं आश्रम के बगल के एक मंदिर में पुजारी थे। वे अब जीवित नहीं हैं। इतने पर ही मैना गुस्से में बोली, पंडित रामदत्त मेरे पिता जीवित हैं और मुझे पंडित नहीं बनना है। तुम्हें बनना हो तो मछुवारे बन जाओ। अभी मेरे साथ चलो। मैं तुमको अपने पिता के पास ले चलूँगी। तुम्हें झूठ भी नहीं बोलना पड़ेगा। तुम आराम से बता देना कि तुम मछुवारे नहीं पंडित हो। रामदत्त मैना से बहस करने लगे, जैसे कि वह तैयार हो जाती तो सब कुछ इतना आसान ही होता।

रामदत्त को अपना भविष्य का जीवन दिखा। मिलने वाला सम्मान और प्रतिष्ठा दिखी और अपने भीतर के सदियों पुराने श्रेष्ठता के खयाल दिखे। उन्हें मैना पुराणों की उन अप्सराओं की तरह लगी जो ऋषियों को पतित करने की ताक में ही बनी रहती थीं। उन्हें यह भी याद आया कि मैना ने उन्हें नया जीवन दिया था। मैना न होती तो रामदत्त भी न होते पर जल्दी ही इस ख्याल को उन्होंने यह सोच कर खारिज कर दिया था कि अगर उन्हें बचना ही होता तो तब कोई और होता।

रामदत्त मैना को ले कर दो अतिरेकी स्थितियों के शिकार थे। एक स्थिति में सब कुछ होता था, मैना नहीं होती थी या कई बार उन्हें पतित करने के एक कारक के रूप में होती थी। जबकि दूसरी स्थिति में सिर्फ मैना होती थी। दुनिया नहीं होती थी। उस दिन मैना ने उन्हें जिंदगी का एक दूसरा विकल्प सुझाया था। जिसमें मैना जीवन भर के लिए उनकी हो जाती पर रामदत्त को विकल्प मंजूर नहीं था। सब कुछ ऐसे चलता रहा और एक दिन वे मैना को छोड़ कर घर चले आए। बिना मैना को बताए। उनके अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैना की आँखों में आँखें डाल कर कह सकते कि अब मैं तुमसे नहीं मिलूँगा क्योंकि तुम मुझे पतित कर रही हो। इसके उलट वे जानते थे कि जब जिस क्षण वे मैना को यह बताने जाएँगे उनका लौटना स्थगित हो जाएगा। रामदत्त के भीतर इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैना से अपने ब्राह्मणत्व की बात भी कर पाते जो मैना और उनके बीच द्वंद्व पैदा कर रहा था सो वे भाग गए। पर उस मैना से भागना इतना आसान था क्या जिसने उन्हें जीभ पर रख कर मछलियाँ खिलाई थीं। मैना जिसकी गंध उन्हें पागल करती थी और रामदत्त के भीतर कहीं धँस कर गायब हो गई थी। उसी तरह जैसे मछलियों के भीतर उनकी गंध रहती है पर जिसके बारे मे उन्हें खुद शायद ही पता होता हो।

घर लौट कर रामदत्त ने तय किया कि अब मैना से कभी नहीं मिलेंगे और जीवन को उसी तरीके से जिएँगे जिस तरह जीने के लिए वे पैदा हुए हैं। पर यह सवाल भी उनके भीतर बना रहा कि क्या वह धोखा करने के लिए पैदा हुए हैं अगर नहीं तो छुप करके भाग आ कर उन्होंने मैना के साथ क्या किया था। यह शायद मैना ही थी जिसने उनके भीतर बैठे हुए धीरे-धीरे उन्हें यह बताया था कि जिस ब्राह्मणत्व के खुमार वे खोए हुए हैं और जो जीवन वह जी रहे हैं वह ठगी के अलावा और कुछ भी नहीं है भले ही उसे कितना भी बड़ा नाम क्यों न दिया जाए। यह बात अलग है कि यह ज्ञान होते ही वह उसी ठगी में ही जम कर डूब गए थे। जब रामदत्त के जीवन में पार्वती आईं, सुंदर सुकोमल पार्वती, उन्हें लगा कि अब मैना को भुलाना आसान हो जाएगा। और यह कोई झूठ भी नहीं था। अपनी समझ में वह मैना को भूल ही गए। उनकी चोटी का दर्द जब तब उभर आता था पर वह उसकी वजह भूल गए। और गंध तो...

वे नहीं, मछलियाँ खाएँगी उन्हें

सुबह जब रामदत्त उठे तो उन्हें भी अपने शरीर में मछलियों की गंध महसूस हुई। रात भर में उनका शरीर और थुलथुल हो गया था। आँखें मटमैली हो गई थीं। चाल में वही पुराना आत्मविश्वास हीन बेढंगापन। वे अपने शरीर पर ही नहीं शरीर के भीतर भी एक सिकुड़न महसूस कर रहे थे। उनके लिए यह जानना ही उनको बदल देने के लिए काफी था कि मैना को वह अपने भीतर से कभी नहीं निकाल पाए। उनकी समझ में वेदी पर मछली या जीभ बनाना एक खेल भर ही था और कुछ नहीं। रामदत्त नहीं जान पाए पर वह हमेशा बनी रही उनके भीतर। एक हत्यारी गंध की शक्ल में। पर अब जिस स्थिति में चीजें थी उनमें पार्वती को इस बारे में बताने या न बताने का कोई मतलब नहीं रह गया था।

उन्हें अपनी खड़ाऊँ खोजने में काफी समय लगा। उन्होंने पाया कि उनकी आँखों की रोशनी रात भर में ही धुँधली हो गई थी। और थोड़ा दूर जा कर जब वे लघुशंका के लिए बैठे तो उन्होंने पाया कि उनका लिंग कुछ उसी तरह सूख कर ऐंठ गया था जैसे कोई मछली सूख कर ऐंठ जाती है। वे घबरा गए। घबराए हुए रामदत्त की समझ में कुछ और नहीं आया तो उन्होंने झाड़ू उठाई और दुआरे पर झाड़ू लगाने लगे। इसी तरह जानवरों की सानी-पानी की, गोबर फेंका। मेहनत से दूर भागने वाले रामदत्त ने जो भी काम सामने पड़ा देखा कर डाला। जब पार्वती उठीं सुबह के सारे काम रामदत्त ने निपटा डाले थे। पूरे दिन वह पार्वती के सामने पड़ने से बचने की कोशिश करते रहे, जिससे मछलियों की गंध पार्वती को परेशान न कर सके। रात में पार्वती और रामदत्त के बिस्तर अलग-अलग हो गए। एक दूसरे से दूर।

अगले दिन ही पता नहीं कैसे पर यह बात चारों तरफ फैल गई कि पंडित रामदत्त त्रिपाठी के शरीर से मछलियों की गंध आती है। अचानक ढेरों लोगों को याद आया कि यह गंध तो उन्हें भी आई थी पर एकाएक वह कुछ समझ नहीं पाए इसलिए किसी से कुछ नहीं कहा। इस तरह यह बात रामदत्त के घर से चारों दिशाओं में फैल गई और जल्दी ही नए रूप में लौटी कि पंडित रामदत्त त्रिपाठी रोज सुबह शाम बिना नागा मछली खाते हैं। इसीलिए हमेशा उनके मुँह से मछली की बास आती रहती है जबकि आश्रम से लौटने के बाद रामदत्त ने मछली को कभी हाथ भी नहीं लगाया था। आस-पास के जिन गाँवों में लोग रामदत्त को सीधे-सीधे नहीं जानते थे वहाँ भी उनके मछली खाने की अफवाहें फैल गई। किसी ने कहा कि वह अपने शरीर में मछली का तेल लगाते हैं तो किसी ने उन्हें गाँव की हाट में अँगोछे से मुँह छुपाए मछली खरीदते देखा था। और तो और कुछ लोगों ने उन्हें शहर के नानवेज होटल में भी मछली भात खाते हुए देख लिया था। तब रामदत्त पैंट शर्ट पहने हुए थे और सिर पर टोपी लगाए हुए थे।

अपनी लालच और लायक बेटों वशिष्ठ और विश्वामित्र की वजह से रामदत्त पहले से ही गाँव भर की आँखों में चढ़े हुए थे। ऐसे में मछली वाली अफवाह ने अनेक लोगों को सामूहिक रूप से रामदत्त के बारे में खुलेआम कुछ भी कहने का मौका दे दिया। धीरे-धीरे लोग उनसे कटने लगे। साइत वगैरह लोग उनके दरवाजे पर ही आ कर पूछ जाते पर उन्हें अपने दरवाजे पर बुलाने से बचते। साइत भी विवाह, लगन या मुंडन आदि की नहीं, बस ऐसे ही कि बाँस काटना हैं पाँचक तो नहीं लगा है, एकादशी कब पड़ रही है या परसों बहू को घर ले आना ठीक रहेगा या नहीं।

बदले में लोग कुछ सीदा वगैरह दे जाते। किसान कई बार पुआल का गठ्ठर या ताजी तरकारियाँ लाते पर घर बुलाना तो बंद ही कर दिया था लोगों ने। यह जैसे पूरे गाँव का अघोषित निर्णय था। इसमें वे जातियाँ भी शामिल थीं जो घोषित रूप से मछलियाँ खाती थीं, चिड़ियों का शिकार करती थीं, खरगोश खा जाती थीं या मोरों के अंडे हजम कर जाती थीं। उनके लिए भी किसी पंडित का मछलियाँ खाना धर्मविरूद्ध था। और अब पंडित रामदत्त त्रिपाठी इस लायक नहीं रह गए थे कि लोग उनसे धार्मिक कर्मकांड करवाएँ। बदले में लोगों ने बगल में गाँव के लंबोदर पांड़े के पास जाना शुरू कर दिया था जो इन दिनों आश्चर्यजनक रूप से निस्पृह हो गए थे। वे खाली होने पर इस बिना पर भी पूजा सुनाने चले जाते कि कोई उन्हें दो जून का सीदा दे दे और एक जून भरपेट भोजन करा दे। एक बार भरपेट भोजन कर लेने के बाद वैसे भी उन्हें दो तीन दिनों तक भोजन की जरूरत नहीं पड़ती थी।

लंबोदर पांड़े ने लोगों को एक किस्सा सुनाया जिसके अनुसार पूर्वजन्म में पंडित रामदत्त मछुआरों की बस्ती में कुत्ते थे, जो प्रयाग में गंगा किनारे बसी हुई थी। वहीं थोड़ी दूर पर प्रभु हनुमान जी का एक मंदिर भी था जिसमें भक्तगण दिन रात हनुमान जी की महिमा का गान करते रहते थे। इस तरह कुत्ते के कान में हमेशा प्रभु का नाम पड़ता रहता था। इसलिए यह बिना किसी पुण्य के भी इस जन्म में पंडित रामदत्त बना। पर संस्कारवश इसकी पूर्वजन्म की कुत्ते की प्रवृत्ति अभी तक नहीं गई। न ही पिछले जन्म में खाई मछलियों का स्वाद ही इसे भूला। इसी से इस जन्म में भी यह मछली के स्वाद का दिवाना बना फिरता है। अगले जन्म में यह फिर कुत्ते के रूप में जन्म लेगा। यही कर्म का विधान है। लंबोदर पांड़े रस ले ले कर यह किस्सा सुनाते और अपने लंबे चौड़े उदरों पर हाथ फेरते रहते।

दूसरी तरफ रामदत्त के बेटों के नाम भले ही वशिष्ठ और विश्वामित्र थे पर इन नामों के मान्य रूपों के साथ उनका कोई रिश्ता बन सकने की संभावना कब की खत्म हो गई थी। वे पुराणों में वर्णित उन राक्षसों के रास्ते पर चल रहे थे जो अकारण ही बुरा करते फिरते थे। वशिष्ठ और विश्वामित्र बगल में देशी पिस्तौल और चाकू रखते और बाहर निकल जाते। गाय भैंस बकरी चराने वाली बच्चियाँ और घास छीलने वाली औरतें उनका सबसे आसान शिकार बनतीं। दोनों ही हरी घास के लोभ में दूर तक चली जातीं। घसवारिनें तो खेतों के भीतर तक चलीं जातीं। दोनों अपने मुँह पर कस कर अँगोछा बाँधे रखते। वे चीखतीं पर हाथ में पिस्तौल या चाकू देख कर शांत पड़ जातीं। कभी वे प्रतिरोध भी करतीं तो उनका प्रतिरोध एक डरा हुआ प्रतिरोध होता। तो एक पिस्तौल या चाकू लिए खड़ा रहता और दूसरा बलात्कार को अंजाम देता। फिर यह क्रम बदल जाता। ताकत की हिंसक खुशी से लबालब दोनों बाद में जबरदस्ती के साथ साथ जेवर भी लूटने लगे। जो ज्यादा से ज्यादा पैरों के बिछुवे, नाक की कील या कानों की बाली बुंदी तक ही सीमित होता था। जिस इलाके में वे वैसा करते अगले कई दिनों तक उधर का रूख नहीं करते। बाद में जब उन्होंने जाना कि औरतें अपने ऊपर की गई यौनिक हिंसा तो छुपा ले जाती हैं क्योंकि उन्हें अपने घरवालों की प्रतिक्रिया पर भरोसा नहीं होता पर बिछुवे जैसा मामूली जेवर गुम हो जाने की स्थिति में भी घर पर बताना जरूरी हो जाता था। इस स्थिति के बारे में पता चलते ही दोनों भाइयों ने जेवर लूटना बंद कर दिया। वे जेवर पर तभी हाथ डालते जब वह सोने का होता। ऐसा मौका उनके हाथ सिर्फ एक बार आया जब एक नई बहू कानों में सोने के झुमके पहने पहने ही घास छीलने आ गई थी।

वशिष्ठ और विश्वामित्र के बारे में गाँव के सारे लोग जान गए थे सिर्फ रामदत्त और पार्वती को छोड़ कर। इसकी पहली वजह तो यही थी कि रामदत्त और पार्वती का गाँव के साथ सहज संपर्क सीमित होता गया था पर इसकी एक दूसरी वजह भी है। गाँवों में लोग अपने घरों को छोड़ कर पूरे गाँव के बारे में जानते हैं। किसकी लड़की किसके साथ फँसी है, कौन किसके यहाँ उठ बैठ रहा है, कौन कलिया मछरी खा रहा है, कौन शराब सिगरेट पी रहा है, किसकी बहू या बेटी साल भर से मायके या ससुराल नहीं गई, राई रत्ती सब कुछ, एक एक बात। पर वे बेचारे नहीं जानते कि उनके घरों में भी यही सब कुछ हो रहा है। या फिर इसकी एक दूसरी वजह भी हो सकती है कि उन्हें अपने घरों के बारे में भी सब कुछ पता है। पर उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सीधे-सीधे अपनी औलादों से कुछ कहें इसलिए सीधे कुछ कहने की बजाय गाँव के दूसरे लड़के लड़कियों के माध्यम से अपनी बात कहते थे। लड़के-लड़कियाँ सुनते और अनजान बन कर वहाँ से हट जाते। उनके माँ बाप हवा में अस्फुट स्वरों में जाने क्या-क्या बुदबुदाते रह जाते।

बाहर मन बढ़ा तो वशिष्ठ और विश्वामित्र ने अपने गाँव में भी वही सब कुछ करने की ठानी। शुरूआती दो चार मौकों पर वे कामयाब भी रहे पर एक दिन दोनों भोला मुनक्का के नशे में चूर गाँव की पुलिया पर राहजनी करते धर लिए गए। गोहार लगी। चारों तरफ से लोग लाठियाँ ले कर दौड़े। उस दिन वशिष्ठ और विश्वामित्र की जम कर पूजा की गई। दोनों तमाम टूट-फूट के शिकार हो गए। कुछ लोग थाने जाना चाहते थे पर गाँव की इज्जत के नाम पर कुछ बड़े बुजुर्गों के समझाने पर रुक गए। वशिष्ठ और विश्वामित्र महीनों घर में पड़े-पड़े हल्दी मठ्ठा पीते रहे, तरह-तरह की देशी दवाइयाँ खाते रहे। लेप और पुलटिश बाँधते रहे।

विश्वामित्र और वशिष्ठ के बारे में फुसफुसाहटें तो लंबे समय से चल रही थीं पर एक बार बात सार्वजनिक होने के बाद फुसफुसाहटों की जरूरतें खत्म हो गई और खुलेआम उनकी बुराइयाँ की जाने लगीं। बातें पुलिस तक भी पहुँची। इसी के साथ दोनों समय समय पर धरे जाने लगे। इलाके में कोई भी वारदात होती, दोनों उसमें शामिल होते या न होते पर पुलिस उन्हें उठा ले जाती। कुछ दिन उनकी सरकारी आवभगत होती फिर वे छूट जाते। शुरूआत में एक दो बार उन्हें छुड़ाने रामदत्त भी गए पर जब ये रोज-रोज का काम हो गया तो उन्होंने जाना बंद कर दिया। उनकी जगह गाँव के कुछ दूसरे लोगों ने ले ली जो बाकायदा इस गैंग में शामिल हो चुके थे या इस गैंग का फायदा उठा रहे थे। इस गैंग ने जानवर चुराने, घर लूटने, औरतों पर हाथ डालने, राहजनी करने जैसे हर उपलब्ध अपराध किए, वे पकड़े जाते, जमानत पर छूटते और इसके बाद गायब हो जाते। तब कुर्की आती। ऐसे ही दो तीन कुर्कियों के बाद रामदत्त की सारी जमा पूँजी स्वाहा हो गई। जो थोड़ी बहुत बचत थी वह भी तेजी से खत्म हो रही थी। जजमानों ने उनके घर की तरफ रुख करना बंद कर दिया था। रामदत्त ने वशिष्ठ और विश्वामित्र को समझाने और सख्त होने की कोशिश की पर इन बातों का समय बहुत पहले ही बीत गया था। वशिष्ठ ने सीधा सा जवाब दिया कि जो तुम करते हो वह क्या है? एक तरह की ठगी हो तो। लोगों को डराना या उन्हें झूठे प्रलोभन दे कर उल्लू बनाना और रुपए या सामान ऐंठना गलत नहीं है तो हमारा काम कैसे गलत है। रामदत्त चुप हो गए। उनसे बेहतर कौन जानता था कि वे जो काम करते रहे हैं वह है तो ऐसा ही कुछ। भले ही इतने सीधे सीधे न कहा जा सके या भले ही एक ऐसा ढाँचा बन गया है कि ठगा जाने वाला कई बार खुद ही हाथ जोड़ कर खुद को ठगने का निवेदन करे। वे चुप हो गए। वैसे भी चुप्पी उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन रही थी।

एक दिन गाँव की ही एक औरत को अकेला पा कर दोनों उसके घर में घुस गए। औरत किसी तरह उनके चंगुल से छूट गई और उसने गोहार मचा दी। दोनों घर भाग आए। उन्होंने रामदत्त से कहा कि कोई आए तो कहिएगा, दोनों घर में नहीं हैं। बाहर शोर मचा हुआ था उसमें से आवाजें छन छन कर रामदत्त तक पहुँच रही थीं। रामदत्त ने जीवन में शायद पहली बार लाठी उठाई और जब तक दोनों कुछ समझ पाते उन्हें तीन-चार लाठियाँ पड़ चुकी थीं। समझ पाते ही वशिष्ठ ने लाठी छीन ली और रामदत्त के ऊपर दनादन लाठियाँ बरसाने लगे। रामदत्त की चीख सुन कर पार्वती दौड़ीं। रामदत्त पर एक के बाद एक लाठी पड़ रही थी। पार्वती की समझ में और कुछ नहीं आया तो वे अरे-अरे करते हुए रामदत्त से लिपट गईं। बदले में जवान हाथों की एक भरपूर लाठी उनकी पीठ पर पड़ी। पार्वती एक चीख के साथ रामदत्त की बाँहों में झूल गई। तब तक गाँव के लोगों का झुंड रामदत्त के दरवाजे पर पहुँच चुका था। दोनों भाग खड़े हुए। कुछ लोग उनके पीछे दौड़े कुछ रामदत्त के पास रूक गए, जहाँ रामदत्त के शरीर से मछली की गंध आने की शिकायत करने वाली पार्वती अपनी पूरी ताकत से रामदत्त को जकड़े हुए थीं। गाँव वालों को सामने देख कर जब रामदत्त ने पार्वती पार्वती पुकारा और खुद को छुड़ाने की कोशिश की तो पार्वती जमीन पर ढेर हो गईं। वे बेहोश थीं पर उनके चेहरे पर अथाह पीड़ा के निशान थे। रामदत्त उन्हें उठाने लगे तो एक दो लोग और आगे आ गए। पार्वती को बगल में पड़े तख्ते पर लिटा दिया गया। गाँव की कई औरतें रोने लगीं। वे पूरे के पूरे समूह में अपनी पूरी ताकत और इच्छा के साथ वशिष्ठ और विश्वामित्र को शाप देने लगीं। इनमें से अनेक ने बचपन में दोनों के गाल चूमे थे। उनके सिरों पर हाथ फेरा था और उन्हें जी भर प्यार किया था। कइयों ने उन्हें राखी बाँधी थी और कुछ उन दोनों की खूबसूरती और रंग-ढंग पर मोहित हुई थीं। कुछ ऐसी भी थीं जिनके साथ दोनों ने समय समय पर जबरदस्ती की थी पर उस समय वे चुप रह गई थीं। उन सबके भीतर बेपनाह घृणा और क्रोध था। उन सब का गुस्सा सामूहिक रूप से फूट पड़ा था। ऐसा लग रहा था कि पूरे गाँव की सामूहिक अच्छाई, उसकी सम्मिलित ताकत, महक और मधुरता सब मिल कर दोनों को शाप दे रहीं थी।

पार्वती इसके बाद अपने पैरों पर कभी नहीं खड़ी हो पाईं। उनकी कमर के नीचे का हिस्सा मांस के निष्क्रिय लोथड़े में बदल गया। वे पीछे से टेक लगा कर बैठी रहतीं या लेटी रहतीं। ऐसे ही टट्टी पेशाब, खाना पीना सब कुछ। पार्वती को टट्टी पेशाब हो जाती और उन्हें पता नहीं चलता। जब पता चलता तो गालियाँ बकना शुरू कर देतीं। अगले कुछ महीनों में उन्होंने इतनी गालियाँ खोज निकालीं जो दुनिया में कहीं भी एक जगह पर मिल पानी असंभव थीं। कभी वे अपनी माँ को गालियाँ बकतीं जिन्होंने उन्हें पैदा किया तो कभी अपने पिता को जो उन्हें एक मछरगंधा के पल्ले बाँध गए। रामदत्त को, जिन्होंने पार्वती को जीवन में कभी किसी तरह का सुख नहीं दिया और मछलियों की गंध में डूबे रहे। वे खुलेआम चिल्लातीं की उन्होंने जाना ही नहीं कि औरत मर्द का रिश्ता क्या होता है। वशिष्ठ और विश्वामित्र को गालियाँ बकतीं कि उन्हें पैदा होते ही मार क्यों नहीं दिया। मार के ऊपर बोरी भर कर नमक रख देतीं और गल जाते दोनों। पार्वती चौबीसों घंटे दोनों का मरना मनाया करतीं। वे चाहतीं कि दोनों को मरता हुआ देख कर मरें।

पार्वती के उलट रामदत्त हर बात पर मुस्कुराते रहते थे। उन्हें गुस्सा आना ही बंद हो गया था। उन्होंने स्थितियों के सामने समर्पण कर दिया था और अपने लिए एक दयनीय मुस्कुराहट उधार माँग ली थी। लोग उनकी मुस्कुराहट को बेशर्मी कहते क्योंकि उनके जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं बचा था जिस पर वह मुस्कुरा सकें। पार्वती बिस्तर पर थीं और बेटे घृणित थे। कहने को पक्का घर था पर उसका सारा सामान एक के बाद एक कुर्कियों में थाने जा चुका था। पार्वती के सारे जेवर बिक चुके थे। जजमानों ने अभिशप्त और पतित मान कर उन्हें छोड़ दिया था। उनके बारे में तमाम अफवाहों को सच मानते हुए ज्यादातर लोगों की राय थी कि उन्होंने जैसा किया था वैसा ही भुगत रहे हैं। कुल मिला कर भूखों मरने की नौबत थी।

इसी समय प्रधानी के चुनाव आए। वर्तमान प्रधान को अपनी हालत पतली दिख रही थी। ऐसे में जब वो रामदत्त के घर का दो वोट पक्का करने उनके घर आए तो रामदत्त ने उनके सामने विजय अनुष्ठान का पाँसा फेंका। रामदत्त ने प्रधान को प्रभावित करने के लिए अपने पूरे पुरोहिती कौशल को दाँव पर लगा दिया। प्रधान इस समय कोई भी कसर बाकी न रखना चाहते थे। उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी पर यह भी कहा कि ये अनुष्ठान रामदत्त अपने घर पर गुप्त रूप से करें। वे नहीं चाहते थे कि इसके बारे में किसी को पता चले जिससे कि चुनाव पर किसी तरह का असर पड़े। रामदत्त सामग्री लिखने लगे तो प्रधान ने कहा कि पंडित जी आप देख लीजिए। हम इस समय यह सब कहाँ खोजते फिरेंगे। प्रधान ने उन्हें सामग्री के लिए रुपए दिए और चुनाव जीत जाने पर रामदत्त के घर के सामने का ग्राम सभा का तालाब रामदत्त के नाम पट्टा करने का वचन दिया। रही रामदत्त की बात तो उनके पास खोने को कुछ नहीं था। प्रधान हार भी जाते तो कुछ दिनों की रोटी का इंतजाम तो उन्होंने कर ही लिया था।

यह अनुष्ठान का प्रभाव हो या दिन-रात बँटने वाली शराब और साड़ियों का या प्रधान के भट्ठे पर दिन रात पक रहे मुर्गों और बकरों की खपत का, जो भी हो प्रधान चुनाव जीत गए। उनको अपना वादा याद रहा और उन्होंने रामदत्त के घर के सामने का तालाब उन्हें इस शर्त पर पट्टे पर दे दिया कि उससे होने वाली कमाई का आधा हिस्सा वह प्रधान को देते रहेंगे। साथ में प्रधान ने रामदत्त को यह सलाह भी दी कि अगर वह तालाब में मछली पलवा लें तो उन्हें साल भर में बिना किसी मेहनत के लाखों का फायदा हो सकता है। उन्हें कुछ भी नहीं करना पड़ेगा। बीज पड़वाने से ले कर मछलियाँ बिकवाने तक सारा जिम्मा प्रधान का रहेगा। रामदत्त ने एक बार यह भी नहीं कहा कि देवी से पूछ कर बताता हूँ। तुरंत हाँ कर दिया। अब क्या सोचना? पार्वती बिस्तर पर थीं और दुनिया की सबसे अश्लील गालियाँ बका करती थीं। वशिष्ठ और विश्वामित्र के बारे में बहुत दिनों से कोई खोज खबर नहीं थी। रामदत्त को खुद अपने शरीर से मछलियों की गंध आने लगी थी और चोटी का दर्द इतना बढ़ गया था कि उनका मन करने लगता था कि चोटी ही उखाड़ फेंके। पर रामदत्त ऐसा कुछ भी करने के बदले मुस्कुराते थे। वे पार्वती की टट्टी पेशाब की हँडिया साफ करते, आँगन में ले जा कर उन्हें नहलाते धुलाते, तेल फुलेल लगाते, कपड़े पहनाते और पार्वती गालियाँ बकती रहतीं। वह रामदत्त को कोसती रहतीं कि यह सब उन्हीं के पापों का फल है कि औलादें बिगड़ गईं, वे बिस्तर पर पड़ी हैं, सारे जजमान लुट गए और पता नहीं कब तक उन्हें इसी तरह घिसटना पड़ेगा। अब तक पार्वती भी मानने लगी थीं कि रामदत्त छुप छुप कर मछलियाँ खाते हैं नहीं तो इस बुढ़ापे में वो मछली पालने जैसा निकृष्ट काम क्यों करते। पार्वती उनके हाथ का पानी भी पीना नहीं पसंद करतीं, पर उनके पास कोई विकल्प नहीं रह गया था। वे गालियाँ बकती जातीं, रामदत्त गालियाँ सुनते जाते और मुस्कुराते जाते।

इधर वशिष्ठ और विश्वामित्र दोबारा घर में आने लगे थे। उनकी जब मर्जी होती घर में आते। उनके साथ उनके दोस्त भी होते। वे जो मर्जी होती पकाते, खाते पीते और चले जाते। पार्वती के बिस्तर पर पड़ जाने के बाद से रामदत्त ने बेटों से बात करना बंद कर दिया था। वशिष्ठ और विश्वामित्र जब भी आते उनकी चोटी में दर्द बढ़ जाता और वे कराहने लगते। उधर पार्वती चुप हो जातीं। उनका चेहरा विकृत हो जाता, कई बार दांत बैठने लगते और मुँह से अबूझ आवाजें निकलने लगतीं जो पूरे घर में चक्कर खाती गूँजती रहतीं। वशिष्ठ और विश्वामित्र के जाने के थोड़ी देर बाद सब कुछ सामान्य हो जाता। रामदत्त मुस्कुराते हुए घर की साफ सफाई में जुट जाते और पार्वती नई-नई गालियों के आविष्कार के अपने मनपसंद काम में जुट जातीं। जब कभी मौका मिलता रामदत्त तालाब किनारे जा कर बैठ जाते और हसरत भरी निगाहों से तालाब को ताकते रहते। पर एक यही समय होता जब उनकी मुस्कुराहट गायब हो जाती। वे उदास होने लगते। ऐसे समय में उनका चेहरा इतना पारदर्शी हो जाता कि उसमें न जाने कितनी चीजें तैरती दिखाई देने लगतीं। ऐसा समय देर तक न टिकता। घर तक आते-आते वे फिर मुस्कुराने लगते और चोटी सहलाते हुए घर की सफाई या पार्वती की सेवा में जुट जाते।

जिस दिन मछलियाँ बिकीं और प्रधान ने रामदत्त को उनके हिस्से का पैसा दिया, पता नहीं कैसे उन सबको पता चल गया जिनसे उन्होंने उधार ले रखा था। कोई ऐसे ही घूमते हुए आ गया, कोई पार्वती का हालचाल लेने के बहाने आ गया। उन लोगों का सारा उधार चुकाने के बाद भी रामदत्त के हाथ में इतना पैसा बचा हुआ था कि वह अगले पाँच छह महीने के लिए पेट की चिंता से मुक्त हो ही सकते थे। पर अचानक वशिष्ठ और विश्वामित्र आ धमके। उन्होंने अपना हिस्सा माँगा। जब रामदत्त ने कहा कि पैसा नहीं बचा, सब उधार चुका दिया तब वशिष्ठ ने रामदत्त को धक्का दिया और कहा कि रामदत्त हम तुम्हारी रग-रग जानते हैं। अपना बुढ़ापा और खराब मत करो। हम सबेरे फिर आएँगे तब तक हमको हमारा हिस्सा मिल जाना चाहिए।

रात भर रामदत्त चोटी के दर्द से कराहते रहे। पार्वती का चेहरा विकृत बना रहा। उनके मुँह से ऐसी भाषाओं में लगातार शब्द निकलते रहे जो दुनिया के किसी भी कोने में नहीं थीं। रामदत्त की कराहों और पार्वती के अनजाने शब्दों की अनुगूँजों से सुबह तक घर काँपने लगा था। इतना कि अब वह कभी भी गिर सकता था।

सुबह वशिष्ठ और विश्वामित्र के आने की बात सोच-सोच कर रामदत्त की कराहें बढ़ रही थीं कि हल्ला मचा। एक साथ कई लोग रामदत्त के घर पर थे। रामदत्त बाहर निकले तो उन्हें बताया गया कि एक अरहर के खेत में वशिष्ठ की लाश पड़ी है। रामदत्त उन लोगों के साथ कुछ इस तरह से चल पड़े जैसे किसी अनजाने व्यक्ति की लाश देखने जा रहे हों। अपने साथ वालों की उत्तेजना की परवाह न करते हुए, हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए। वह लोगों से कुछ कह भी रहे थे। उन बातों में जाति, मछली, गुरू, मछुवारा, और चोटी के दर्द का उल्लेख था। लोगों को कुछ समझ में नहीं आया तो उन्होंने मान लिया कि बेटे की मौत के सदमे में रामदत्त पागल हो गए हैं। खेत में पहुँच कर रामदत्त ने देखा कि वशिष्ठ को लगभग चीर डाला गया है। हँसिए से कट कर गर्दन झूल गई थी। शरीर पर फरसे और कुल्हाड़ियों के निशान भी पेट और कमर पर पहिचाने जा सकते थे। एक कान कट कर दूर पड़ा हुआ था। रामदत्त ने देखा कि वहाँ टूटी हुई हालत में कुछ चूड़ियाँ भी बिखरी पड़ी थीं। जो अलग-अलग रंगों की थीं।

वे बैठ गए। उनकी मुस्कराहट पल भर के लिए न जाने कहाँ गुम हो गई। उन्होंने वशिष्ठ के शरीर पर हाथ फेरा। इतने लगाव के साथ और धीरे धीरे कि इसमें उन्हें घंटों लग गए। वशिष्ठ का शरीर तिरछा पड़ा था। रामदत्त ने उसे सीधा करना चाहा तो उन्हें वशिष्ठ के नीचे एक तीसरा हाथ दिखाई पड़ा जिसमें एक लोहे का कड़ा पड़ा हुआ था। यह विश्वामित्र का था जिसे शायद फरसे के एक ही भरपूर वार ने शरीर से अलग कर दिया था। रामदत्त दोबारा मुस्कुराने लगे। जैसे कि इस दृश्य से उनका कोई संबंध ही नहीं था। उन्हें दिखाई पड़ा कि एक तरफ खून के ऐसे निशान दिखाई पड़ रहे हैं जैसे कोई खून का स्प्रे करता हुआ उधर से गया हो। अभी तक उस तरफ किसी का ध्यान नहीं गया था। रामदत्त उठे तो बाकी लोगों का ध्यान भी उधर को गया। यह एक ताजा बना रास्ता था जो उसी तालाब की ओर जाता था जिसमें रामदत्त ने मछलियाँ पाली हुई थीं। रामदत्त हवा में कुछ सूँघ रहे थे, रामदत्त हवा में कुछ कह रहे थे, पता नहीं क्या! तालाब के एक कोने की तरफ जिधर चोपियहवा आम का पेड़ था, उसी के नीचे पंडित विश्वामित्र त्रिपाठी अधनंगे पानी में तैर रहे थे। एक ही हाथ के विश्वामित्र। रामदत्त उनकी तरफ ऐसे चलते चले जा रहे थे जैसे जमीन पर चलते चले जा रहे हों। उन्हें एक दो लोगों ने पकड़ लिया। कुछ दूसरे लोग पानी में उतरने को हुए तो उन्हें गाँव के ही कुछ लोगों ने बरज दिया कि पुलिस केस है। पुलिस को आने दिया जाए। वे रुक गए।

रामदत्त को लोग पकड़े हुए थे। उन्होंने अपने को छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने बगल वाले व्यक्ति से कहा कि इसी चक्कर में आज मछलियों को चारा डालने में कितनी देर हो गई। उधर पार्वती भी सुबह-सुबह उन्हें न पा कर चिल्ला रही होंगी। यह कह कर रामदत्त ने अपने को छुड़ाया तो उन्हें ताकत लगाने की जरा भी जरूरत नहीं पड़ी। लोगों ने उन्हें आसानी से छोड़ दिया। पंडित रामदत्त सिर झुकाए, अपने में गुम मुस्कुराते हुए अपने घर की तरफ चल पड़े। गाँव के लोग अभी भी तालाब के किनारे और अरहर के खेत में जमे हुए थे। धीरे-धीरे वे भी कम होने लगे। पुलिस के आने के पहले सभी जवान लोगों को गाँव छोड़ देना था। यह एक ऐसी चीज थी जिसके बारे में किसी को भी समझाने की जरूरत नहीं थी।

रामदत्त ने घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। पार्वती धाराप्रवाह गालियों के बीच उनसे पूछ रही थीं कि वह सुबह-सुबह कहाँ चले गए थे। रामदत्त ने उन्हें कोई जबाव नहीं दिया। उन्होंने देखा कि पार्वती अपनी स्वाभाविक अवस्था में लौट आई थीं। तो क्या इस बीच पार्वती वशिष्ठ और विश्वामित्र की तरफ से निश्चिंत हो गई हैं? वे डर गए। कहीं पार्वती को किसी ने इस बारे में बता तो नहीं दिया। फिर उन्होंने इस बात को तब तक के लिए टाल दिया जब तक कि पार्वती खुद उनसे कुछ न कहें। उन्होंने पार्वती के बिस्तर के पास से उनका हंडिया उठाया और उसे साफ करने चले। अनेक आँखें उनके घर की तरफ लगी हुई थीं पर उन्होंने किसी को नहीं देखा। चापाकल की खटर पटर के बीच पानी भरा। आज उन्हें बहुत ताकत लगानी पड़ी। पार्वती को उठाने गए तो पार्वती का शरीर आज बहुत भारी लगा। वे पूरी ताकत लगाने के बाद भी उन्हें नहीं उठा पा रहे थे। उन्होंने पार्वती पर ये सच जाहिर नहीं होने दिया। उन्होंने दोबारा कोशिश की और पार्वती को एक झटके में उठा लिया पर आँगन तक पहुँचते पहुँचते अपने शरीर का संतुलन साध नहीं पाए और पार्वती को ले कर जमीन पर आ गिरे। पार्वती ने एक कराह के साथ गाली बकी पर रामदत्त के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। पार्वती की गालियों ने बहुत पहले ही अपना असर खो दिया था। रामदत्त मुस्कुराए और पार्वती को नहलाने लगे। ये एक नई बात थी। नहाने का काम तो पार्वती खुद से ही करती थीं। उन्होंने रामदत्त को झिड़का पर वे नहीं माने। पूरे इत्मीनान और प्यार के साथ उन्होंने पार्वती के शरीर को मल मल कर साफ किया। इस क्रम में उनके हाथ जहाँ तहाँ देर देर तक रूकते रहे। पार्वती ने शुरू में तो भरपूर गालियाँ बकी पर जल्दी ही उनको लग गया कि आज का दिन और दिनों से बहुत अलग है। उन्होंने बहुत दिनों के बाद रामदत्त से सीधे मुँह बात की, पूछा क्या हुआ पंडित। जवाब में रामदत्त ने कहा कि कुछ नहीं। हफ्ते में एक बार तो कायदे से नहाना ही चाहिए। पार्वती को यह सब इतना अबूझ लगा कि थोड़ी देर के लिए वे अपनी गालियाँ भी भूल गईं। उन्होंने रामदत्त को वह सब कुछ करने दिया जो उन्होंने करना चाहा।

नहला कर रामदत्त ने पार्वती के शरीर को पोंछा, पाउडर लगाया और पहनाने के लिए एक नई साड़ी निकाल लाए। अपने हाथों से साड़ी पहनाई, आईना दिखाया और बोले, देखो कितनी सुंदर लग रही हो। तुम थोड़ा सा चावल बीन लो, मैं सब्जी काट लेता हूँ। आज मैं तुम्हारी पसंद की कटहल की सब्जी बनाता हूँ। अचानक उन्हें लगा कि ये जीवन शायद और बेहतर हो सकता था। ये वाक्य एक पीड़ा भरी हूक के साथ उनके भीतर से आया पर उन्होंने इसे झटका और कटहल तोड़ने चल दिए। पता नहीं क्यों पर कटहल तोड़ते समय उन्हें मत्स्यगंधा की याद आई। पर इस याद के साथ उनके भीतर जो चेहरा बना वह पार्वती के जवान दिनों का था। लौट कर उन्होंने पार्वती की ओर देखा और उस जवान चेहरे से इस बूढ़े चेहरे का मिलान करना चाहा। उनके मुँह से एक अजीब सी आवाज निकली। इस चेहरे का नाश भी मैंने ही किया है। इसी के साथ रामदत्त का सिर कुछ कुछ अपने पिता की तरह हिलने लगा। इस क्षण रामदत्त सभी चीजों के लिए खुद को ही जिम्मेदार मान रहे थे। वशिष्ठ और विश्वामित्र के इस निर्मम अंत के लिए भी। अपने जीवन के इस हाल के लिए भी। अपने भीतर की उस घातक गंध के लिए भी जिसने पार्वती को हमेशा के लिए उनसे दूर ढकेल दिया था। और इस बात को लगभग नामुमकिन बना दिया था कि पार्वती उन्हें प्यार कर सकें। उन्होंने अपने भीतर एक कँपकँपी महसूस की जो उनके रोएँ- रोएँ में उतर गई। पर मैं तुम्हें प्यार करता हूँ पार्वती, रामदत्त ने एक गहरी जिद के साथ खुद से कहा और कटहल काटने लगे।

आज खाना बनाने में रामदत्त ने अपना पूरा कौशल लगा दिया। पार्वती की पसंद की कटहल की तीखी मसालेदार सब्जी और चावल, फिर उन्होंने सब्जी में सल्फास मिला दिया। ऐसा करते हुए उन्हें पानी में अपना डूबना याद आया जब मैना ने उन्हें बचाया था। इस समय मैना नहीं थी। सामने पार्वती थीं, बूढ़ी लाचार और अपंग पार्वती, जिन्होंने आज घर में कुछ अलग सी गंध सूँघ ली थी और चुप हो गई थीं। जब रामदत्त थाली ले कर पार्वती के सामने पहुँचे तो उन्होंने जैसे माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश में गाली बकी जिसमें रामदत्त के पिछवाड़े का संबंध गदहे के साथ कायम किया गया था। रामदत्त ने जैसे सुना ही नहीं। अपने काँपते हुए चेहरे के साथ मुस्कुराए और बोले आओ आज तुम्हें अपने हाथों से खिला दूँ और कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ ही खा लूँ। पार्वती को अपने कानों पर भरोसा नहीं हुआ। वह अगली कोई गाली खोज रही थीं कि उनकी आँखें रामदत्त से जा मिलीं। रामदत्त मुस्कुरा रहे थे पर उनकी आँखें लाल थीं। और आँखों की कोरों पर आँसू टिके हुए थे जो आँखों की ललाई की आभा में खून की बूँदों की तरह दिखाई दे रहे थे। पार्वती जब तक कुछ और समझ पातीं सब्जी और चावल का बहुत प्यार से बनाया हुआ कौर उनके मुँह में था। रामदत्त की आँखों की कोरों में फँसी बूदें थोड़ा और नीचे सरक आई थीं और उनकी खसखसी दाढ़ी में फँस गईं थीं। रामदत्त ने पूछा, मैं भी इसी में खा लूँ पार्वती, तुम्हारे साथ?

पार्वती को लगा कि उनके सामने कोई और रामदत्त है। यह वो तो नहीं हो सकता जिसके शरीर से मछलियों की बास आती थी। जिसके साथ वह सोती जागती रही थीं, न चाहने के बावजूद। तब ये कौन है जो उन आँखों के भीतर से झाँक रहा है और उसी चेहरे के भीतर बैठा हुआ है। तभी पार्वती के भीतर अचानक कुछ कट सा गया। उन्हें बहुत तीखा दर्द हुआ। लगा जैसे भीतर का एक एक हिस्सा कोई चाकू से काट रहा है। पार्वती ने रामदत्त के चेहरे की तरफ देखा तो उन्हें रामदत्त का चेहरा भी बिखरता हुआ लगा। जिस हरजाई गंध की वजह से वो रामदत्त को कभी प्यार नहीं कर पाईं वो गंध रामदत्त का साथ छोड़ गई थी। उन्हें इस दर्द भरे क्षण में भी रामदत्त पर बहुत प्यार आया पर अभी प्यार करने को कोई चेहरा नहीं बचा था। रामदत्त का सिर काँप रहा था। आँखें जैसे बाहर निकल आने के लिए लगातार बिछल रही थीं। पर होठों पर एक मासूम मुस्कुराहट बनी हुई थी। इस मुस्कुराहट से प्यार किया जा सकता था। पार्वती ने उन्हें जीवन भर बर्दाश्त किया था पर यही वे क्षण थे जब उन्होंने जाना कि गलत सिर्फ उनके साथ ही नहीं हुआ था। शायद रामदत्त के साथ भी कुछ बहुत गलत हुआ था। शायद मछली की गंध एक धोखा थी पर अब उस हत्यारी गंध को याद करने का कोई मतलब नहीं था। पार्वती जान गईं कि कम से कम इस क्षण तो दोनों के बीच कोई गंध नहीं बची हुई है। पार्वती के भीतर एक भयानक तोड़-फोड़ मची हुई थी। उन्होंने रामदत्त को अपनी तरफ खींचा और खींच कर अपनी बाँहों में भर लिया। उन्होंने रामदत्त को चूमा पर अब इसका कोई मतलब नहीं था या कि इसका मतलब तो हमेशा ही बना रहता है। दर्द भीषण था और इतना दर्द कोई भी अकेले नहीं सह सकता था।

जीवन जिसे जीने के अनेक विकल्प हो सकते थे, तेजी से नष्ट हो रहा था।


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हिंदी समय में मनोज कुमार पांडेय की रचनाएँ