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कविता

घंटी
कुँवर नारायण


फोन की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
        और करवट बदलकर सो गया

दरवाजे की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
        और करवट बदलकर सो गया

अलार्म की घंटी बजी
मैंने कहा - मैं नहीं हूँ
        और करवट बदलकर सो गया

एक दिन
मौत की घंटी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा -
मैं हूँ - मैं हूँ - मैं हूँ
मौत ने कहा -
        करवट बदलकर सो जाओ।

 


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हिंदी समय में कुँवर नारायण की रचनाएँ



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