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कविता

गुड़िया
कुँवर नारायण


मेले से लाया हूँ इसको
छोटी सी प्‍यारी गुड़िया,
बेच रही थी इसे भीड़ में
बैठी नुक्‍कड़ पर बुढ़िया

मोल-भव करके लाया हूँ
ठोक-बजाकर देख लिया,
आँखें खोल मूँद सकती है
वह कहती पिया-पिया।

जड़ी सितारों से है इसकी
चुनरी लाल रंग वाली,
बड़ी भली हैं इसकी आँखें
मतवाली काली-काली।

ऊपर से है बड़ी सलोनी
अंदर गुदड़ी है तो क्‍या?
ओ गुड़िया तू इस पल मेरे
शिशुमन पर विजयी माया।

रखूँगा मैं तूझे खिलौने की
अपनी अलमारी में,
कागज के फूलों की नन्‍हीं
रंगारंग फूलवारी में।

नए-नए कपड़े-गहनों से
तुझको रोज सजाऊँगा,
खेल-खिलौनों की दुनिया में
तुझको परी बनाऊँगा।

 


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