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कविता

प्रस्थान के बाद
कुँवर नारायण


दीवार पर टँगी घड़ी
कहती - "उठो अब वक्त आ गया।"

कोने में खड़ी छड़ी
कहती - "चलो अब, बहुत दूर जाना है।"

पैताने रखे जूते पाँव छूते
"पहन लो हमें, रास्ता ऊबड़-खाबड़ है।"

सन्नाटा कहता - "घबराओ मत
मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

यादें कहतीं - "भूल जाओ हमें अब
हमारा कोई ठिकाना नहीं।"

सिरहाने खड़ा अँधेरे का लबादा
कहता - "ओढ़ लो मुझे
बाहर बर्फ पड़ रही
और हमें मुँह-अँधेरे ही निकल जाना है..."

एक बीमार
बिस्तर से उठे बिना ही
घर से बाहर चला जाता।

बाकी बची दुनिया
उसके बाद का आयोजन है।

 


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हिंदी समय में कुँवर नारायण की रचनाएँ



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