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कविता

गले तक धरती में
कुँवर नारायण


गले तक धरती में गड़े हुए भी
सोच रहा हूँ
कि बँधे हों हाथ और पाँव
तो आकाश हो जाती है उड़ने की ताकत

जितना बचा हूँ
उससे भी बचाये रख सकता हूँ यह अभिमान
कि अगर नाक हूँ
तो वहाँ तक हूँ जहाँ तक हवा
मिट्टी की महक को
हलकोर कर बाँधती
फूलों की सूक्तियों में
और फिर खोल देती
सुगंधि के न जाने कितने अर्थों को
हजारों मुक्तियों में

कि अगर कान हूँ
तो एक धारावाहिक कथानक की
सूक्ष्मतम प्रतिध्वनियों में
सुन सकने का वह पूरा संदर्भ हूँ
जिसमें अनेक प्राथनाएँ और संगीत
चीखें और हाहाकार
आश्रित हैं एक केंद्रीय ग्राह्यता पर

अगर जबान हूँ
तो दे सकता हूँ जबान
जबान के लिए तरसती खामोशियों को -
शब्द रख सकता हूँ वहाँ
जहाँ केवल निःशब्द बैचैनी है

अगर ओंठ हूँ
तो रख सकता हूँ मुर्झाते ओंठों पर भी
क्रूरताओं को लज्जित करती
एक बच्चे की विश्वासी हँसी का बयान
अगर आँखें हूँ
तो तिल-भर जगह में
भी वह संपूर्ण विस्तार हूँ
जिसमें जगमगा सकती है असंख्य सृष्टियाँ...

गले तक धरती में गड़े हुए भी
जितनी देर बचा रह पाता है सिर
उतने समय को ही अगर
दे सकूँ एक वैकल्पिक शरीर
तो दुनिया से करोड़ों गुना बड़ा हो सकता है
एक आदमकद विचार।

 


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