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आलोचना

संवेदनाओं का किस्सागो - शिवमूर्ति
राहुल सिंह


सर्जनात्मक साहित्य का एक काम मनुष्य की संवेदना की रक्षा और उसका विस्तार करना भी रहा है। शिवमूर्ति इसी अर्थ में मानवीय संवेदना के कथाकार हैं। शिवमूर्ति की कहानियों और उपन्यासों का मूल स्वर इसी मानवीय संवेदना के संरक्षण-संवर्द्धन से जुड़ा है। मुक्तिबोध के संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदन वाली विचार परंपरा का विकास शिवमूर्ति के कथा संसार में देखने को मिलता है, अर्थात्, संवेदनशीलता से अर्जित बोध और उस बोध से चालित संवेदना। यों तो किसी भी साहित्यकार को असंवेदनशील नहीं कहा जा सकता है पर शिवमूर्ति की कहानियों से उनके कुछ अतिरिक्त संवेदनशील होने का पता चलता है। यह अतिरिक्त संवेदनशीलता ही उन्हें अपने समकालीन रचनाकारों से अलग करती है। उनकी यह संवेदनशीलता व्यक्ति जगत तक नहीं अपितु पशु जगत और वस्तु जगत तक व्याप्त है। परिवेश के प्रति एक गाढ़ा रागात्मक संबंध उन्हें पढ़ते हुए लगातार महसूस किया जा सकता है।

शिवमूर्ति की कहानियाँ हमारी आदिम आकांक्षाओं को किस्सागोई के जातीय कलेवर में परोसने का काम करती हैं। उनकी कहानियों में किस्सागोई के इन कुछ आदिम संस्कारों के साथ-साथ कुछ आदिम आकांक्षाएँ भी देखी जा सकती हैं। सभ्यता के विकास के बावजूद अंतर्मन की परतों के नीचे बची रह गई उस आदिम जीवन की महक के प्रति अब भी एक मद्धिम-सा राग शायद हम सबों में कहीं बचा हुआ है। शिवमूर्ति की कहानियाँ हमारे मर्म की उसी परत को थोड़ा सींचने का काम करती है। न्याय की आकांक्षा मुझे एक आदिम आकांक्षा लगती है। शिवमूर्ति की कहानियों का केंद्रीय स्वर न्याय की आकांक्षा है। एक किस्म के 'अनडिजर्व्ड सफरिंग' की व्याप्ति उनकी कहानियों में देखी जा सकती है। शिवमूर्ति के पात्र उन कारणों से दंडित होते हैं जिनके लिए वे कहीं से जिम्मेदार ही नहीं हैं। वे बुनियादी मानवीय अधिकारों से वंचित मनुष्यों को अपनी कहानियों में जगह देते हैं। मनुष्यों के बीच वह उनकी अमानवीयता और पाशविकता की कहानी बयां करते हैं। सभ्यता के विकास के साथ मनुष्यों की इन आदिम आकांक्षाओं को मनुष्यों की महत्वाकांक्षाओं ने किस कदर हाशिए पर डाल दिया है, शिवमूर्ति उसकी कहानी बयां करते हैं।

शिवमूर्ति की किस्सागोई में भारतीय आख्यान परंपरा की भी कुछ तासीर दिखाई पड़ती है। ऊपर मैं जिस न्याय की आकांक्षा की चर्चा उनकी कहानियों के संदर्भ में कर रहा था। उसके साथ यदि इनके पात्रों की तर्कशीलता को भी जोड़ दें तो अमर्त्य सेन द्वारा भारतीयों के संदर्भ में रेखांकित की गई 'आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन' की छवि की छाप भी शिवमूर्ति के यहाँ दिखती है। अमर्त्य सेन की ही एक और किताब है 'दि आइडिया ऑफ जस्टिस'। प्रकारांतर से यह दोनों विचार पुरजोर तरीके से शिवमूर्ति की कहानियों में देखे जा सकते हैं। 'केशर कस्तूरी' के फ्लैप पर शिवमूर्ति के संदर्भ में यह लिखा है कि "प्रकृतवाद में वे जोला के आस-पास दिखते हैं तो पात्रों के जीवंत चित्रण में गोर्की के समीप।" पर मुझे वे अपनी लेखनी से अंतोन चेखव और ओ. हेनरी की याद दिलाते हैं। जैसे चेखव अपनी कहानियों में छोटे-छोटे वाक्यों के सटीक इस्तेमाल द्वारा यथार्थ को पकड़ने का काम करते थे, शिवमूर्ति भी अपनी कहानियों के वाक्य विन्यास में वैसे ही हैं, संक्षिप्त और बेधक (ब्रीफ एंड डायरेक्ट) और कहानियों के ट्रीटमेंट के स्तर पर वे मुझे ओ. हेनरी के समीप जान पड़ते हैं। जिस तरह ओ. हेनरी की कहानियों में एक किस्म की 'अप्रत्याशा' हमें मिलती है, शिवमूर्ति की कहानियों में भी आने वाले 'ट्विस्ट' और 'टर्न' अंततः वैसी ही अप्रत्याशा को रचने का काम करते हैं। ओ. हेनरी की तरह शिवमूर्ति भी अपनी कहानियों के अंत के साथ बाज दफा चौंकाते हैं। (चेखव और हेनरी से की गई इन तुलनाओं को केवल कहानी के शिल्प और आस्वाद के धरातल पर मेरे मन में पड़नेवाले प्रभाव के संदर्भ में लें।) हिंदी कथा साहित्य में वे फणीश्वरनाथ 'रेणु की परंपरा में गिने जाते हैं। सतही तौर पर यह सही भी जान पड़ता है। लेकिन मामला जब गाँव का हो तो रेणु के साथ-साथ प्रेमचंद की परंपरा से भी कई उदाहरण उनके कथा साहित्य में देखे-गिनाए जा सकते हैं। दरअसल परंपरा की निगाह से देखना हिंदी साहित्य की पुरानी रवायत रही है। यह कई सहूलियतें एक साथ मुहैया करा देती हैं। एक तो बतौर रचनाकार आप एक विचारधारा और खेमे में खींच लिए जाते हैं। उसके बाद आपके व्यक्तिगत गुण-दोषों की चर्चा न कर विशेषताओं के बने-बनाए लबादे से ढाँप दिया जाता है। प्रेमचंद और रेणु के लेखन से कई साम्यतायें होने के बावजूद शिवमूर्ति की अपनी लीक रही है। उनके कथा संसार में किसान और गाँव की उपस्थिति जहाँ उनको एक ओर प्रेमचंद से जोड़ती है वहीं दूसरी ओर आंचलिक शब्दों का प्रयोग और उसकी ध्वन्यात्मकता रेणु से। लेकिन यह ऊपरी या सतही साम्यताएँ हैं। बल्कि कहें कि इस दृष्टि से बहुत आसानी से प्रेमचंद और रेणु की परंपरा में शामिल हुआ जा सकता है। किसी परंपरा में शामिल होने की बुनियादी शर्त रचनाकार की सोच या विचारधारा होनी चाहिए न कि साहित्यिक कौशल या युक्तियों का अनुसरण। इस लिहाज से देखें तो शिवमूर्ति का यह वक्तव्य ध्यान देने लायक है कि "मेरा नजरिया किसी पूर्वनिर्धारित सोच या विचारधारा से नियंत्रित नहीं होता। जीवन को उसकी सघनता और निश्छलता में जीते हुए ही मेरे रचनात्मक सरोकार आकार ग्रहण करते हैं। पहले का यथार्थ यह था कि 'कसाईबाड़ा' की हरिजन स्त्री सनीचरी धोखे / जबरदस्ती से मार दी जाती थी... उसकी खेती-बारी हड़प ली जाती थी। आज का यथार्थ 'तर्पण' में है। सनीचरी जैसे चरित्रों की अगली पीढ़ी रजपतिया के साथ जबरदस्ती का प्रयास होता है तो गाँव के सारे दलित इकट्ठा हो जाते हैं। सिर्फ इकट्ठा नहीं, बल्कि उस लड़ाई में वे हर संकट का सामना करते हैं। वे लड़ाई जीतने के लिए हर चीज का सहारा लेते हैं। उसमें उचित या अनुचित का सवाल भी इतना प्रासंगिक नहीं लगता। उनके लिए हर वह सहारा उचित है जो उनके संघर्ष को धार दे सके। पहले थोड़ा अमूतर्न भी था। अब टोले का विभाजन दो प्रतिद्वंद्वियों के रुप में सामने खड़ा है। जातियों के समीकरण पहली कतार में आ गए हैं। 1980 से 2000 तक जो परिवर्तन आया वह मेरी रचनाओं में साफ दिखता है। ...मैं 'तर्पण' को ध्यान में रख कर कह रहा हूँ। इससे आगे का यथार्थ मेरी रचनाओं में आ रहा है... और उससे आप मेरा नजरिया समझ सकते हैं। 'भरतनाट्यम' के लिखे जाने का समय एक दूसरी तरह की समझदारी का था। तब यह स्वर नहीं उठता था कि जो दुख-दर्द घेरे है, उसके आँकड़े क्या हैं! कारण क्या हैं! पैदावार और लागत का जो अनमेल अनुपात है उसके पीछे कैसे-कैसे षड्यंत्र हैं! यानी परदे के पीछे चल रहा खेल क्या है? ...आज इन सब पर नजर जा रही है। दुखी दलित लोग संगठन बना रहे हैं। एका बनाकर सामने आ रहे हैं।" (नया ज्ञानोदय, जनवरी 2008, पृ 107)। परदे के पीछे चलने वाला खेल अनुभूति से ज्यादा विचार जगत का मामला होता है। कहानी या उपन्यास में जब इन खेलों का पर्दाफाश करना होता है तो वह कथात्मकता के दायरे में रह कर करना होता है। इस दृष्टि से देखें तो शिवमूर्ति के लिए कथात्मकता बुनियादी चीज है। शिवमूर्ति अपनी कहानियों में विचार की तुलना में अनुभूति को तरजीह देने वाले रचनाकार हैं, लेकिन उनके उपन्यासों में इस विचार और अनुभूति का सम्यक् परिपाक देखने को मिलता है। शिवमूर्ति की रचनाओं से दूसरी शिकायतें हो सकती हैं मसलन् 'त्रिशूल' को लें, यह शिवमूर्ति के अन्य उपन्यासों की तुलना में कमजोर उपन्यास है। कारण, इसमें उनका फोकस गड़बड़ा गया है। मंडल और कमंडल के बीच जो परिपाक होना था, जो आनुपातिक संबंध बनना था, वह हो न सका। शिवमूर्ति की जो खासियत रही है कि विचार भी अनुभूति के रास्ते कथा के गलियारे में दाखिल हो, वह यहाँ नहीं होता है। वह विचार के स्तर पर कई जगहों पर संचरण करती रह जाती है। लेकिन इसके बाद के 'तर्पण' और 'आखिरी छलांग' की बात करें तो उसमें यह कमी सिरे से गायब है। मैं 'आखिरी छलाँग' की तुलना में 'तर्पण' को ज्यादा ऊँचा आँकता हूँ। 'तर्पण' अकेले शिवमूर्ति की रचनाशीलता को समग्रता में रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है। 'तर्पण' में जो संरचनात्मक कसाव है, वह प्रशंसनीय है। 'तर्पण' में दलितों की उभरती और संगठित होती राजनीतिक चेतना का चेहरा उसके अंतर्विरोधों के साथ शिवमूर्ति ने उकेरा है। शिवमूर्ति की दलित चेतना का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि कहीं बाबा साहब भीम राव अंबेडकर का जिक्र तक नहीं आता है, लेकिन महात्मा गांधी का अक्स कई जगहों पर दिखता है। ऐसी कोई भी रचना जो अपने समय के दस्तावेज होने का दर्जा हासिल करती है। उसमें कई अन्य खूबियों के साथ यह दो खूबियाँ जरूर होती हैं। एक, 'ऐतिहासिक यथार्थ की जटिलता का समग्रता में अंकन' (कॉम्पलेक्स टोटैलिटी ऑफ हिस्टॉरिकल रियलिटी) और दूसरा 'विचारधारात्मक यथार्थ की जटिलता का समग्रता में अंकन' (कॉम्पलेक्स टोटैलिटी ऑफ आइडियोलॉजिकल रियलिटी)। कहना न होगा कि 'तर्पण' में यह दोनों विशेषताएँ मौजूद है। इस कारण से दलित चेतना के उभार के साथ उसकी सीमा और संभावनाओं का भी अनुमान लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में दलित चेतना के उभार को समझने की दृष्टि से यह बेजोड़ उपन्यास है, जिस ढंग से यह अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया को पकड़ता है उससे यह साहित्य की देहरी लाँघ कर सामाजिक विज्ञान के चौखटे तक जा पहुँचता है। इस लिहाज से देखें तो शिवमूर्ति प्रेमचंद और रेणु की विरासत को कायदन बढ़ाते हुए नजर आते हैं।

शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा है कि "मेरे मन में कहानी सर्वप्रथम सूत्र रूप में कौंधती है... कोई घटना, संवाद और दृश्य को देखकर... खासकर उसकी परिणति या मूलभूत वक्तव्य परिदृश्य के रुप में पहले उभरता है... फिर शुरू होती है उन परिदृश्यों को तारतम्य देने की प्रक्रिया... फिर बुनावट की प्रक्रिया... कथा में विश्वसनीयता और स्वाभाविकता लाने का कार्य... प्रायः अंतिम ड्राफ्ट में पहले ड्राफ्ट का पाँचवाँ भाग ही शेष रह जाता है... उसका बहुत कम अंश तलछट में रह जाता है। ...मगर एक बात स्पष्ट कर देना चाहूँगा... चरित्र ही मेरी कहानी का आद्यंत है, मेरी कहानियाँ मुख्यतः चरित्र प्रधान है। मेरी कहानियों में जो कुछ भी किया गया है सबकुछ उन चरित्रों को 'बताने' के लिए... मेरी कहानियाँ उन चरित्रों के बारे में बतियाती हैं... इसके अतिरिक्त वह कुछ भी नहीं कर पातीं।" (मंच, जनवरी-मार्च 2011, पृ 154)। शिवमूर्ति के उपरोक्त वक्तव्य में तीन महत्वपूर्ण संकेत-सूत्र हैं, जिनसे उनकी कहानियों के पैटर्न को पहचाना जा सकता है। पहला, कहानी का सर्वप्रथम सूत्र रुप में कौंधना और उसकी परिणति का परिदृश्य पहले उभरना, इस कारण से शिवमूर्ति की कहानियाँ निष्पत्तिमूलक होती हैं। दूसरा, बुनावट के क्रम में उसकी विश्वसनीयता और स्वाभाविकता की रक्षा, इस कारण से न उनकी कहानियों में पठनीयता बनी रहती है। तीसरा, कहानियों का चरित्रमूलक होना, यह उनकी संजीदगी को बयां करती हैं। चरित्रों को तब तक 'कन्विसिंगली' कहानी में नहीं ढाला जा सकता है जब तक हम खुद उनसे गहरे मुतास्सिर न हों या उन पात्रों ने हमारी संवेदना को गहरे न छुआ हो। शिवमूर्ति की हर कहानी में कम से कम एक ऐसा किरदार जरूर मिलेगा जो हमारी संवेदना की तंतुओं को छू जाता है। आखिर हर कहानी के साथ ऐसा क्योंकर होता है? दरअसल पाठकों की संवेदना को छूने और उनके मस्तिष्क को प्रभावित करने की क्षमता शिवमूर्ति के किस्सागोई के अंदाज में छिपी है। एक खास बात जो उनकी कहानियों में लक्ष्य की जा सकती है वह यह कि चरित्रप्रधान इन कहानियों के केंद्रीय चरित्रों को शिवमूर्ति की हार्दिकता का संस्पर्श प्राप्त होता है। यह सुनने में जितना सहज लगता है, उसे कहानी के स्तर पर अंजाम तक पहुँचाना उतना ही मुश्किल है। जिन पात्रों को कहानीकार की हार्दिकता का संस्पर्श मिलता है, उनके साथ जीवन का अच्छा हिस्सा गुजरा होना चाहिए। शिवमूर्ति के द्वारा लिखी गई कहानियों के अंतराल पर गौर फरमाएँ - 'कसाईबाड़ा' 1980, 'भरतनाट्यम' 1981, 'सिरी उपमा जोग' 1984, 'तिरिया चरित्तर' 1987, 'केसर कस्तूरी' 1991, 'अकाल दंड' 1992 आदि। इससे इस बात की तस्दीक की जा सकती है कि शिवमूर्ति अपनी कहानियों को पन्नों पर उतारने से पहले उन्हें लंबे समय तक जीने-सँजोने वाले कथाकार हैं। इसलिए यह पात्र पन्नों पर उतरने से पहले शिवमूर्ति के मानस संसार में बतौर एक नागरिक रहते हैं और जब वह हमारे सामने आते हैं, तब वे गढ़े हुए नहीं बल्कि स्वाभाविक और वास्तविक लगते हैं। चरित्रों के साथ बर्ताव का एक दूसरा ढंग भी शिवमूर्ति के यहाँ उपलब्ध है। वह यह कि जो खल चरित्र होते हैं उनके लिए नाम का इस्तेमाल नाम मात्र के लिए ही वह करते हैं बल्कि उनका जोर उनके ओहदे, उनकी ताकत, उनकी प्रभावशीलता आदि पर होता है। वे एक साथ चरित्र होने के साथ हमारे समय की प्रतिकूलताओं के प्रतीक भी जान पड़ते हैं। यह अकारण नहीं है कि शिवमूर्ति की कहानियों में लीडर, परधान, सिकरेटरी, नेता, दारोगा, संचालक, ए.डी.एम. साहब, ठेकेदार, पुजारी, पंच, भाईजी आदि के व्यक्तिगत नामों पर जोर नहीं दिया जाता। दरअसल शिवमूर्ति यह भी जताना चाहते हैं कि कोई ओहदेदार गर प्रभावशाली हो जाता है, तब उसकी प्राथमिक पहचान उस ओहदे से ही तय होने लगती है। वे मनुष्य होने का आभास भर कराते हैं लेकिन बुनियादी तौर पर वे उन ओहदों में ही तब्दील हो चुके होते हैं। उनकी संवेदनाएँ अप्रत्याशित रुप से सूख चुकी होती हैं। इसलिए शिवमूर्ति उन्हें उनके नामों के बजाय ओहदों से याद करना पसंद करते हैं। इसका दोहरा लाभ पाठकों को मिलता है एक तो उनकी संवेदनाएँ सीधे-सीधे शनिचरी, सूरजी, विमली, केसर आदि के साथ जुड़ती हैं और दूसरे स्तर पर उनके दुखों के मूल में जो व्यक्ति होते हैं वे व्यवस्था के प्रतीक हो जाते हैं। इस तरह देखें तो किसी भी अन्य कहानीकार की तुलना में शिवमूर्ति की कहानियों में पाठकों को 'साधारणीकरण' के दोहरे अवसर सहजता से मिल जाते हैं। स्थानीय समीकरणों की बिसात पर अशक्तों का जीवन ऐसे मामूली प्यादों में तब्दील हो चुका है, जिनकी नियति में पिटना ही बदा है। व्यवस्था का अजगर जिन्हें अपनी कुंडली में कस कर इत्मीनान से लीलने में लगा हुआ है। पाठकों के पास मूक दर्शक बने रहने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा है। इन पात्रों की निरुपायता, अशक्तता, असमर्थता पढ़ने के दौरान पाठकों को अपनी गिरफ्त में ले लेती है। इस तरह कहानी के खत्म होने के बावजूद वह हमें देर तक 'हांट' करती रहती है। अंग्रेजी में लिखने वाले साइरस मिस्त्री ने फिक्शन के बारे में एक बात कही थी जो शिवमूर्ति के कथा साहित्य के संदर्भ में भी प्रासंगिक जान पड़ता है कि "फिक्शन को कम से कम अपने पाठकों को उस बुनियादी स्तर तक तो जरूर ले जाना चाहिए जहाँ वह उन्हें परेशान कर सके, उन्हें अपने जीवन के प्रति नजरिए को फिर से संयोजित करने को प्रेरित कर सके, यदि संभव हो सके तो बतौर व्यक्ति वह उसे बदल सके।" ("fiction should be able to move its reader at some fundamental level, to disturb and rearrange his outlook on life, perhaps even change him as a person...")। शिवमूर्ति की कहानियाँ पाठकों को उस बुनियादी स्तर तक ले जाने का काम करती है, जहाँ से साइरस मिस्त्री बाकी की उम्मीद करते हैं। इसके अलावे भी शिवमूर्ति के लेखन में कई विशिष्टताओं को लक्ष्य किया जा सकता है। पहला, शिवमूर्ति का यथार्थ को अपनी कहानियों में बरतने का तरीका अपने समकालीनों से अलहदा है। मसलन् शिवमूर्ति यथार्थ को अपनी कहानियों में लाने से पहले उसे थोड़ा हल्का करते हैं। मतलब यथार्थ को अनुभूति और कहानी का हिस्सा बनाकर संप्रेषित करते हैं। और गर, इसे ज्यादा बेहतर तरीके से समझना हो तो शिवमूर्ति के बरक्स संजीव को रख कर पढ़ें तो यथार्थ को हल्का करने के मतलब आसानी से समझा जा सकता है। दूसरा, हिंदी कथा साहित्य में पशुओं के स्वभाव और मनोविज्ञान को सूक्ष्मता से समझनेवाले वे अपने किस्म के अनूठे कथाकार हैं। भले इनकी कहानियों में माननीयों की पहचान उनके ओहदों से हो लेकिन पशुओं के नाम हैं। हर कहानी में किसी न किसी रुप में पशु-पक्षी की उपस्थिति को लक्ष्य किया जा सकता है। मनुष्य के स्वभाव और आचरण की तुलना करने के लिए बतौर नजीर शिवमूर्ति अक्सर पशुओं के स्वभाव और आचरण से ही उनकी तुलना करना पसंद करते हैं। तीसरा, शिवमूर्ति मुहावरों के नहीं लोकोक्तियों और कहावतों के कथाकार हैं। कहावतों और लोकोक्तियों में जो जीवन का गाढ़ा अनुभव सभ्यता की परतों से छनकर सार रुप में जमा रहता है। शिवमूर्ति कहावतों और लोकोक्तियों के जरिए जीवन के उस फलसफे को सूत्र रुप में अभिव्यक्त करना पसंद करते हैं। यह कहावतें और लोकोक्तियाँ भी उनकी 'ठेठ हिंदी के ठाठ' में चार चाँद लगाने का ही काम करती है। यदि हितोपदेश और पंचतंत्र की कहानियों में व्यक्त पशु जगत में निहित मानवीयता के पाठ को हम भूले नहीं हैं, यदि अपभ्रंश, अवधी, ब्रज के रास्ते हिंदी की लोकानुभूति की परंपरा को हम ध्यान में रखें और शिवमूर्ति की कहानी लिखने की बजाय कहानी को बयां करने के अंदाज को जेहन में रखें तो इस बात से इत्तेफाक रखा जा सकता है कि शिवमूर्ति की कहानियों में हमारे जातीय संस्कारों की अनुगूँज सुनाई पड़ती है। यही कारण है कि किस्सागोई की जातीय परंपरा के कुछ अवशेष अब भी शिवमूर्ति के यहाँ मुझे दिखलाई पड़ती है। उनकी कहानियों में 'मास अपील' की जो क्षमता है, उसके कुछ सूत्र इसमें निहित हैं। चौथा, 'तिरिया चरित्र' की उनकी जानकारी। स्त्री के मन, संवेदन, स्वभाव, चाल-चरित्र, आचार-विचार की समझ। यह उनका ऐसा गुण है जिसके समकक्ष दूसरा रचनाकार नहीं दिखता है। इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि शिवमूर्ति की कहानियों का इकलौता संग्रह 'केसर कस्तूरी' 1991 में आया, जिसमें छः कहानियाँ थीं। इनमें से 'भरतनाट्यम' को छोड़कर बाकी पाँच कहानियाँ प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से स्त्री के होने को संबोधित है। शिवमूर्ति के कथा साहित्य में स्त्रियों की बहुरंगी छठाएँ हैं। छठा, दलित दृष्टि। उत्तर प्रदेश में अस्सी के दशक के बाद शुरु हुए दलित उभार को समग्रता में उसके अंतर्विरोधों के साथ शिवमूर्ति के यहाँ देखा जा सकता है।

अवध प्रांत से आए हिंदी के कथाकारों में उनकी माटी की महक जिस रुप में पैवस्त रहती आई है, शिवमूर्ति के कथा साहित्य में उसकी बानगी एक अंतर के साथ देखी जा सकती है। वह अंतर है कि शिवमूर्ति गाँव का नामोल्लेख नहीं करते हैं बल्कि केवल इस ढंग से लिखते हैं कि 'गाँव में खबर बिजली की तरह फैलती है।' (कसाईबाड़ा, पृ 7) या 'सिकरेटरी के खिलाफ इस गाँव में बोलनेवाला कौन है।' (अकालदंड, पृ 27), ' चबूतरे पर गाँव नहीं है।' (सिरी उपमा जोग, पृ 68), 'गाँव के पश्चिम आधा किलोमीटर पर बहती है बिसुई नदी।' (तिरिया चरित्तर, पृ 94), 'तिथि निर्धारित होते ही केशर को वापस गाँव भेज देना है।' (केशर-कस्तूरी, पृ 148) और 'चौथे दिन ही घर, पड़ोस और फिर पूरे गाँव की नजरों में नालायक हो गया।' (भरतनाट्यम, पृ 85) शिवमूर्ति के इस गाँव की निर्मिति खासी दिलचस्प है। बिना किसी नाम-पते के शिवमूर्ति के कथा साहित्य में बारंबार गूँजनेवाला यह ' गाँव' वस्तुतः क्या है ? एक विचार, अवधारणा या वास्तविकता? क्यों नहीं प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, श्रीलाल शुक्ल की भाँति शिवमूर्ति ने भी उसे क्रमशः सेमारी-बेलारी, लखनऊ के चौक-मोहल्ले और शिवपालगंज की तरह एक नाम देना जरुरी समझा। आर.के. नारायण के की तरह वे भी एक 'मालगुडी' रच सकते थे पर क्या वजहें रहीं कि उनके कथा साहित्य में केवल गाँव ही गूँजता रह गया? शिवमूर्ति ने अपने इस गाँव के जरिए भी अपनी कहानियों के साथ पाठकों के तादात्मीकरण की संभावनाओं को कई गुना बढ़ाने का काम किया। यह गाँव कौन-सा है, इसकी चिंता आलोचकों को हो सकती है लेकिन एक पाठक का मतलब कहानी मात्र से होता है। कुछ सजग पाठक जो 'गाँव' को पहचानना ही चाहते हैं, उनके लिए भाषा की स्थानीयता और आंचलिकता के मार्फत् पर्याप्त संकेत सूत्र छोड़ दिए गए हैं। इस तरह जो उस प्रदेश या जनपद के ठहरें, वह तो अपनी भाषा की छौंक से ही अपने गाँव को पहचान जाते हैं और दूसरे उनके चरित्र और घटनाओं से खुद को जोड़ते हुए उस कहानी की भौगोलिकता का विस्तार करते हैं।

शिवमूर्तिै के कथा साहित्य में गाँव एक विचार या अवधारणा के बतौर व्यवहृत नहीं हुआ है बल्कि एक जिंदा अहसास के रुप में आया है। शिवमूर्ति ने 'गाँव' के बाहरी आवरण को नहीं भीतरी मर्म को पकड़ा है। इस कारण से उनके गाँव जिंदा लगते हैं। एक ऐसे दौर में जब शहर लगातार हमारे गाँवों को चर रहे हैं, खुद गाँवों मे रोज अबाध गति से शहरों का उगना जारी है। ऐसे समय में शिवमूर्ति अपनी कहानियों में गाँवों को जिंदगी बख्शने के लिए कटिबद्ध हैं। आज भारत सरकार की आर्थिक नीतियों पर गौर करें तो क्या यह अलग से बताने की जरूरत है कि वह शहरों के पक्ष में है या गाँवों के पक्ष में। 'सिरी उपमा जोग' कहानी को चरित्र और व्यक्तिगत संबंधों से इतर बदलते भारत के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य की पृष्ठभूमि में देखें तो आधुनिक भारत के विकासशील चरित्र की एक अवांतर कथा सामने आती है। गाँव की कोख से निकला नौकरशाह पूँजीवादी शहर की गोद में जा बैठता है। गाँव उसके लिए परेशानी का सबब है। यह अकारण नहीं है कि शिवमूर्ति कहानी के अंत में लिखते हैं कि "सबेरे उठकर वे (ए.डी.एम. साहब) देखते हैं कि चबूतरे पर 'गाँव' नहीं है। वै चैन की साँस लेते हैं।" (पृ 68) यह सर्जनात्मक विरोध है। यही कारण है कि शिवमूर्ति के कथा साहित्य में 'गाँव' की इतनी दमदार और सार्थक उपस्थिति होने के बावजूद मैं उन्हें देशज यथार्थ या ग्रामीण यथार्थ के कथाकार के बतौर प्रस्तावित नहीं कर रहा हूँ, बल्कि वे व्यापक अर्थ में भारतीय यथार्थ के कथाकार हैं। शिवमूर्ति को देशज या ग्रामीण यथार्थ के कथाकार के रुप में देखना उनकी भूमिका को कम करके तो आँकना है ही खुद अपनी अदूरदर्शिता और तंग नजरिए को भी सामने रखना है।

वस्तुतः गाँव एक संरचना है, जिसके सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक कई आयाम हैं। इन आयामों के समुच्च्य से न सिर्फ उसमें जीवंतता आती है, बल्कि उसका स्वरुप भी निर्मित होता है। इस संरचना को उसी बहुआयामिता और जीवंतता के साथ साहित्यिक संरचना में रूपांतरित कर सकना मामूली काम नहीं है। अब सवाल उठता है कि शिवमूर्ति ने इसे सफलतापूर्वक अंजाम तक कैसे पहुँचाया? इसे अपने पहले प्रयास में ही बखूबी अंजाम देने का काम फणीश्वरनाथ 'रेणु' ने किया था। बाद के दिनों में इक्के-दुक्के रचनाकारों ने अपनी काबलियत के बल पर इस कामयाबी को जरूर दुहराया। लेकिन इस दिशा में हाल के वर्षों में सर्वाधिक उल्लेखनीय जत्था दलित कथाकारों का रहा है, ऐसा पहली बार हुआ है कि लेखकों के किसी समूह ने इस दिशा में सफलता अर्जित की हो। क्या गाँव के इस मर्म को पकड़ने में शिवमूर्ति ने किसी साहित्यिक युक्ति का सहारा लिया है? यद्यपि शिवमूर्ति ने परंपरा से काफी कुछ आयत्त किया है लेकिन साथ ही उन्होंने इस परंपरा में कुछ जोड़ने का काम भी किया है। शिवमूर्ति ने गाँव के खास किस्म की चित्ति (साइकि) और गाँव की 'बॉडी लैंग्वेज' (भाव-भंगिमा) को पकड़ा है। गाँव के संदर्भ में साइकि या बॉडी लैंग्वेज जैसी बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है। पर यह शिवमूर्ति की खूबसूरती और खासियत है।

'त्रिशूल को छोड़ दें तो शिवमूर्ति के सम्पूर्ण कथा साहित्य में आए चरित्रों के आचार-विचार पर गौर करें तो वह व्यक्तिगत विशेषताओं को धारण करने के बावजूद समग्रता में गाँव की 'साइकि' को ही समृद्ध करने का काम करते हैं। शिवमूर्ति के हर पात्र चाहे वह किसी भी जाति, वय, हैसियत के हों, उसके आचरण के मूल में गाँव के स्थानीय समीकरणों की प्रभावशाली उपस्थिति देखी जा सकती है। 'तर्पण' और 'आखिरी छलाँग' उपन्यास में इसे सहजता से देखा जा सकता है। 'कसाईबाड़ा' और 'तिरिया चरित्तर' कहानी में इसे सतह पर और 'अकालदंड' तथा 'भरतनाट्यम' में इसे सतह के नीचे देखा जा सकता है। गाँव की इस मानसिकता को सर्वाधिक दक्षता से धारण करने का काम शिवमूर्ति की स्त्रियों ने किया है और उसके बाद इसमें किसी की निर्णायक भूमिका ठहरती है तो वह उनकी कहानियों में आए महत्वाकांक्षी और लोलुप किस्म के चरित्रों की है। 'तिरिया चरित्तर' कहानी के निर्णायक क्षण में जब बिमली के सच का संहार झूठों के गिरोह के द्वारा किया जाना तय है, उस क्षण में बाल विधवा बिरजा अकेली आशा की किरण है। उसका आचरण इस क्षण में देखने लायक है। "बाल विधवा बिरजा बैठी सोच रही थी अगर वह कह दे कि मछली का चिखना तो उसी से बनवाया था विसराम ने। शिवाले से लौटते समय लेते हुए आया था - तो? अभी सारी पंचायत उलट जाएगी... लेकिन तब उससे भी पूछा जा सकता है। कितने साल से वह विसराम का चिखना बनाती रही है? आगे से चिखना बनाना बंद हो जाएगा सो अलग।" (पृ 140) 'तिरिया चरित्तर' की एक बानगी यह भी है। गाँव में अफवाह को हवा देने का काम भले पुरुष करते हों, पर उसके प्रचार-प्रसार का प्रभार महिलाओं के जिम्मे ही है।

आज जब सरकारें गाँव के गाँव उजाड़ रही हैं, ऐसे गाँव-किसान विरोधी समय में शिवमूर्ति ने 'कथा में गाँव' को फिर से बसाने का काम किया है। गाँव की बसावट के मूल में शिवमूर्ति ने यों तो बुनावट के पारंपरिक कौशलों का उपयोग किया है। जैसे भाषा के स्तर पर स्थानीयता और आंचलिकता की छौंक, लोकगीतों का तड़का, कहावतों और लोकोक्तियों की धजा इत्यादि, लेकिन इन पारंपरिक कौशलों को दरकिनार कर दिया जाए तब भी कुछ तत्व हैं जो खास शिवमूर्ति के यहाँ उपलब्ध हैं। जैसे गाँव और किसान के पारस्परिक संबंध को अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है वैसे ही किसान, पशु और प्रकृति की पारस्परिकता को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता नहीं है। प्रकृति ओर पशु जगत का जैसा इस्तेमाल शिवमूर्ति के यहाँ है, वह उन्हें अपने समकालीन रचनाकारों में विशिष्ट बनाता है। शिवमूर्ति के यहाँ पशु मानवीय मूल्यों के सूचकांक के बतौर व्यवहृत होते आए हैं। उसका केवल एक उदाहरण शिवमूर्ति की कहानी 'अकालदंड' से दे रहा हूँ। "पेड़ों के पत्ते सूखकर झड़ चुके हैं या मवेशियों के पेट में चले गए हैं और गाएँ भैंसें बिक चुकी हैं। जिन्होंने नहीं बेचा उन्हें अब कोई मुफ्त में ले जाने को तैयार नहीं है। लेकिन बाँधकर रखें तो खिलाएँ क्या? तो गले से पगहा खोल कर हाँक दे रहे हैं लोग - जाओ 'फिरी' कर दिया आज से। सुतंत्र हो। मरने के लिए सुतंत्र। नेह-नाता तोड़ो। चारे-पानी की खोज करते हुए मरो। लेकिन दूर जाकर। दुर्गंध से तो बचा दो गाँव को। इन फिरी हुए जानवरों को किसी भी ठूँठ पेड़ के नीचे पड़े पैर पटकते, पूँछ ऐंठते और आँख के बड़े-बड़े कोयों से आँसू बहाते देखा जा सकता है। मरने का इंतजार करते जानवर। जानवर नहीं, उनकी ठठरी जिनके निष्प्राण होने का इंतजार पेड़ के ठूँठ पर बैठे गिद्धों को कभी-कभी तीन-तीन चार-चार दिन करना पड़ जाता है। बैलों को लोग अंत तक बचाए रखना चाहते थे। कभी पानी बरसा तो जोताई कैसे होगी। लेकिन चारे और पानी के अभाव और बीमारी के चलते अब वे भी धीरे-धीरे साफ हो रहे हैं। सरकार की तरफ से मिलने वाला प्रति जानवर चारा एक वक्त के लिए भी पूरा नहीं पड़ता। अब बैल बचे हैं तो कुछ गाड़ीवानों के पास या गाँव के दो-चार बड़े घरों में। 'जबरा' लोगों के पास। जो दबदबे वाले हैं। पानी का टैंकर आने पर जो पहले अपने बैलों को पिलाने के लिए बड़े-बड़े ड्रम और 'छोड़' भर लेते हैं, तब गाँव के कमजोर लोगों की बारी आती है - अपने लिए गगरा-गगरी भरने की। चिड़ियों की बोली के नाम पर अब मध्य दोपहरी के आकाश में वृत्ताकार उड़ती चील की टिंहकारी ही सुनाई पड़ती है। या मृत जानवर के शव पर झपटते गिद्धों की चीं-चीं! किच-किच! बाकी पक्षी या तो भूख-प्यास से मर गए हैं या किसी अजाने देश को उड़ गए हैं।" (पृ 29)

शिवमूर्ति शब्दों के पारखी हैं। शब्दों को चुनने की और उसे अपनी कथा में बरतने की उनकी तमीज काबिल-ए-तारिफ है। शिवमूर्ति की भाषा में निहित बेधकता, संप्रेषणीयता, सांगीतिकता, चित्रात्मकता, सांकेतिकता, ध्वन्यात्मकता आदि गुणों के मूल में उनकी 'शब्द शक्ति' को सूँघने-महसूसने की क्षमता है। वे एक साथ अभिधा, लक्षणा और व्यंजना का मारक इस्तेमाल करने वाले कथाकार हैं। भाषा के स्तर पर उनकी कुछ शरारतें बदमाशी की हदों को छूती हैं। उनके उपन्यास 'तर्पण' से दो उदाहरण दे रहा हूँ। जब चंदर रजपतिया के साथ बलात्कार का असफल प्रयास करता है तो मिस्त्री बहू कहती है "इसकी (चंदर की) तरवार बहक गई है।" (पृ 11) थोड़ा आगे जब रजपतिया को थाने से बुलावा आता है तब उसके परिवार के मर्द तय करते हैं कि "भोरवाली गाड़ी पकड़कर पियारे रजपत्ती को लेकर भाई जी के घर चले जाएँ। खतरे से बचाव के लिहाज से स्टेशन तक पाँच लोग साथ चलें। इस बात की भनक घर की औरतों तक को न लगने पाए। सारा भेद औरतों से ही 'लीक' होता है। (पृ 47) भाषा के स्तर पर ऐसी हरकतें शिवमूर्ति के यहाँ देखी जा सकती है। ऐसे समग्रता में उनकी कहानी की संरचना किसी कुशल कारीगर की कारस्तानी लगती है। जैसे एक राजमिस्त्री एक-एक ईंटें जोड़कर एक मजबूत दीवार का निर्माण करता है, वैसे ही शिवमूर्ति अनुभूति, संवेदना और विचारों के मेल से एक मजबूत कथात्मक संरचना का निर्माण करते हैं।

चलते-चलते अब समग्रता से इतर एक-एक कर शिवमूर्ति की कहानियों पर एक उड़ती-सी निगाह डाल लेना अनुचित न होगा। यों तो शिवमूर्ति की कहानी लेखन की यात्रा 1968 में आरंभ हो चुकी थी ('मुझे जीना है', 1968, 'पान फूल', 1969, 'उड़ि जाओ पंछी', 1970, यह अलग बात है कि स्वयं शिवमूर्ति की पहली कहानी संग्रह में इनका कोई उल्लेख नहीं है। उनकी पहली कहानी संग्रह 'केशर कस्तूरी' के अनुसार उनके कायदन छपने का सिलसिला 1980 में 'कसाईबाड़ा' के प्रकाशन से आरंभ होता है)। बचपन से ही हमारे मन-मस्तिष्क में भारत के बारे में एक छवि बिठाई जाती है कि भारत गांवों का देश है। इसकी अस्सी फीसदी आबादी गाँवों में निवास करती है और इतने ही प्रतिशत के आस-पास खेती होती है, आदि। फिर सवाल उठता है कि एक रचनाकार जिसकी खुद की आत्मा गाँवों में बसती हो, वह क्यों अपनी शुरुआत एक आम भारतीय की भारत के संदर्भ में बनी प्रचलित समझदारी (कन्वेंशनल विजडम) को चुनौती देने से करता है? शिवमूर्ति बतलाते हैं कि पुराने सामंती अवशेष (जातिवाद) और नई व्यवस्था (पुलिस-प्रशासन) के आपसी गठजोड़ ने गाँवों को 'कसाईबाड़े' में तब्दील कर दिया है। कहानी के दौरान यथार्थ को बहुत छोटे-छोट क्षणों में पकड़ने की शिवमूर्ति की जो कला है, वह अलग से रेखांकित करने योग्य है। जैसे 'तिरिया चरित्तर' में जब शनिचरी की बेटी रूपमति की बिदाई हो रही है तो वह अपनी बकरी तक को भेंटना नहीं भूलती है। औरतों के आपसी डाह को कथानक में गति पैदा करने के उपादान में व्यवहृत करने का कौशल और गाँव के स्थानीय और जातीय समीकरणों के पल-पल बनते-बिगड़ते गुणा-गणित को कहानी के पन्नों पर दर्ज करने की योग्यता काबिल-ए-गौर है। शनीचरी की बेबसी का जो फायदा प्रधान, लीडर और दारोगा उठाते हैं, वह एक स्तर पर मन्नू भंडारी रचित 'महाभोज' की याद दिलाता है। महत्वाकांक्षा कैसे व्यक्ति को दयनीय और घृणास्पद बनाती है, 'कसाईबाड़ा' के प्रधान और लीडर दोनों इसके जीते-जागते उदाहरण हैं। इसी महत्वाकांक्षा की एक अलग छवि 1981 में प्रकाशित 'भरतनाट्यम' में देखने को मिलती है। जहाँ एक पत्नी की पुत्र पाने की महत्वाकांक्षा उसके पति के आत्मसम्मान, साफगोई और भलमनसाहत की बलि ले लेता है। अंत में उसका पति अपना मानसिक संतुलन गँवा कर खरबूजे के खेत में 'भरतनाट्यम' करने लगता है। कहानी अपने अंत में एक ऐसा तोड़ देने वाला ट्रैजिक भाव बोध रचती है कि उस पर अलग से कुछ भी कहना कम पड़ेगा।

1984 में आया 'सिरी उपमा जोग' कथा के स्तर पर 'भरतनाट्यम' का प्रतिपूरक है। अगर वहाँ एक स्त्री की महत्वाकांक्षा उसे घृणा के केंद्र में लाती है तो यहाँ एक पुरुष की। मानव स्वभाव को संबोधित यह दोनों कहानी यों तो स्वाभाविक लगती हैं लेकिन यह स्वाभाविकता जिस अस्वाभाविकता से पैदा होती है, वह डराती है। मन में एक दुःख और गहरी करुणा फूटती है।

1991 में आई 'केशर-कस्तूरी' शिवमूर्ति की शेष कहानियों से अलग मिजाज की है। पिता की अकर्मण्यता और बेटी की उदात्तता के बीच पसरी यह कहानी अत्यंत कारुणिक है। अपने सामान्यपने में वह बेधती है। पूरी कहानी अभिधात्मक है; अपने कहन के ढंग से लेकर संप्रेषण के स्तर तक। केशर में नियति को स्वीकार कर प्रारब्ध से लड़ने का जो जज्बा है, वह अत्यंत मार्मिक है। झूठी मरजाद में लिपटी पिता की अकर्मण्यता-लापरवाही को अपने प्रयत्नों से इंच दर इंच ढकने की कोशिश करती केशर पास-पड़ोस की बहन-बेटी-सी लगती है। 'केशर-कस्तूरी' को पढ़ते हुए शिवमूर्ति की कहानियों के संदर्भ में एक बात बड़ी शिद्दत से महसूस होती है कि शिवमूर्ति 'आत्म संवेदना के कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रचना में प्रवृत्त होने वाले रचनाकार जान पड़ते हैं।' मतलब यह कि शिवमूर्ति की कहानियाँ व्यक्तिगत अनुभवों से जन्मी हैं। यह अनुभव जब उनकी संवेदना तंत्र पर हावी होने लगता है और उससे मुक्ति की कोई राह नहीं सूझती तब शिवमूर्ति कहानी के माध्यम से आत्म संवेदना के उस कष्ट का कहानी के रुप में 'तर्पण' करते हैं। शिवमूर्ति की कहानियों में निहित मार्मिकता, करुणा, त्रासद भाव-बोध की वह तीव्रता और सांद्रता उसे लंबे समय तक धारण करने से उपजी है। ऐसा लगता है कि शिवमूर्ति के जीवन में निजी या दूसरों के अनुभव के रुप में आए ये क्षण, उनकी आत्मा में नक्श होते चले गए थे और जब उनकी आत्मा इन अनुभवों ओर दुखों को धारण कर सकने में अशक्य होने लगी तभी उन्होंने इसका साझा करना जरुरी समझा और इन निजताओं को सामाजिकता के दायरे में ले आए।

अगर 'कसाईबाड़ा' का आरंभ इस वाक्य में निहित तनाव और सस्पेंस के इस मिले-जुले वाक्य से होता है कि "गाँव में बिजली की तरह खबर फैलती है कि शनीचरी धरने पर बैठ गई है, परधानजी के दुआरे। लीडरजी कहते हैं - जब तब परधानजी उसकी बेटी वापस नहीं करते, शनिचरी अनशन करेगी, आमरण अनशन।" ऐसी ही जिज्ञासा के साथ 'अकालदंड' का आगाज होता है कि "सुरजी के साथ सिकरेटरी बाबू ने गजब कर दिया। लेकिन उसने इस हादसे के बारे में किसी से मुँह नहीं खोला, क्या फायदा? (पृ 27) यह दोनों कहानियाँ अपनी आरंभिक पंक्तियों में निहित तनाव और जिज्ञासा की खुलती परतों के साथ आगे बढ़ती हैं। कहानी के केंद्र में है सुरजी की देह और उस पर अटकी सिकरेटरी की निगाह ("सालों-साल अधपेट रूखे-सूखे भोजन के चलते देह की अतिरिक्त चिकनाई कब की गल चुकी है। शेष है तो प्रकृति से मिला रंग, पानीदार आँखें, बरबस खींच लेने वाला बोलता चेहरा और चौबीस-पच्चीस की उम्र वाले शरीर की स्वतःस्फूर्त चमक। इसे इस दुर्दिन में कहाँ छिपाकर ले जाए वह और इसी पर सिकरेटरी की नजर चढ़ गई है।" पृ 28)। कहानी सुरजी के देह को पाने के उपक्रम में सिकरेटरी द्वारा चलने वाले दाँव और उससे बचने की सुरजी की भंगिमाओं के बीच की है। पृष्ठभूमि में अकाल की भयावहता है। यह अकाल ही है जो असमय काल बन कर उपस्थित है। लेकिन इस अकालदंड की भागी सुरजी बन कर भी नहीं बनती बल्कि यह वास्तव में सिकरेटरी के लिए अकालदंड साबित होता है।

'केशर-कस्तूरी' संग्रह में शामिल उनकी एक और कहानी है, 'तिरिया-चरित्तर'। 'तिरिया-चरित्तर' के केंद्र में बिमली है। बिमली की उपस्थिति से कहानी में अन्य चीजें परिभाषित होती हैं। बिमली से व्यक्ति और वस्तुओं का संबंध निर्धारित होता है। बिमली जवान है और सैकड़ों निगाहें उसके यौवन पर लगी हैं। शिवमूर्ति बिमली की इस अवस्था के संदर्भ में टिप्पणी करते हैं कि "पके आम के पेड़ की रखवाली जैसा कठिन काम। कितनी निगाहें हैं, पके आम के पेड़ पर!" (पृ 115)। बिमली अपने अनदेखे-अनजाने भावी पति के लिए अपनी शुचिता और कौमार्य को ईमान की तरह बचाए रखती है। 'तिरिया चरित्तर' में बिमली का पति कभी नहीं आता। सैमुएल बैकेट के नाटक 'वेटिंग फोर गोदो' की तरह बिमली भी एक अंतहीन प्रतीक्षा का शिकार हो जाती है। 'तिरिया चरित्तर' एक साथ विडंबनात्मक और त्रासद है। शिवमूर्ति की इस कहानी और अन्य कहानियों में इतनी परतें हैं कि हर एक पर अलग से लेख लिखे जाने की आवश्यकता है। यहाँ 'तिरिया-चरित्तर' के कई अन्य पहलुओं को दरकिनार करते हुए उसकी उस केंद्रीय प्रवृत्ति को रेखांकित किया जा रहा है, जो शिवमूर्ति के कथा साहित्य की खासियत रही है। एक तो महज अशक्त होने के कारण उन गुनाहों के लिए दंडित होना जो उन्होंने किए ही नहीं है और दूसरा न्याय की आकांक्षा। समस्त संसार में स्त्रियाँ मनुष्य होने के बावजूद सबसे ज्यादा यातनाओं की जद में आने वाली प्राणी हैं। स्त्रियाँ जिन यातनाओं का शिकार पूरे संसार में होती है उन यातनाओं की प्रकृति और चरित्र एक वैश्विक एकरूपता है। अंतर है तो, बस राष्ट्रीयता और धर्मों का। संसार भर में बोली जाने वाली भाषाओं में हिंदी के अलावा मुझे थोड़ी अंग्रेजी आती है, जिसके मार्फत् संसार भर में बननेवाली उल्लेखनीय फिल्मों को सहजता से देखता-समझता आया हूँ। अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, चीनी, जापानी, ईरानी, अफगानी, डच, कोरियाई, रूसी, स्पैनिश और हिंदी फिल्मों में स्त्री होने के कारण गैर वाजिब यातनाओं की अंतहीन श्रृंखला को फिल्माया गया है। यहाँ उसके विस्तार में जाने की गुंजाइश नहीं है, फिर भी ईरानी पृष्ठभूमि पर सच्ची घटना पर बनी 'स्टोनिंग ऑफ सोराया एम' (2008) का उल्लेख महज इसलिए करना चाहूँगा कि ईरान की पृष्ठभूमि और इस्लाम की छाँह को हटा दिया जाए तो इस फिल्म और 'तिरिया-चरित्तर' (1987) की कहानियों में हतप्रभ करने वाली समानता है।

मुख्तसर सी बात इतनी है कि अपने सुदीर्घ रचनाकाल में अत्यंत संक्षिप्त रचनाओं की सूची प्रस्तुत करने वाले शिवमूर्ति के कथा साहित्य ने आज के दौर में एक दुर्लभ-सी लगनेवाली ख्याति और विश्वसनीयता दोनों अर्जित की है। यही कारण है कि अल्प लेखन के बावजूद शिवमूर्ति हिंदी कथा साहित्य में विश्वसनीयता के किसी 'हॉलमार्क' की तरह हैं। जिनके पास यथार्थ को कथा में बरतने का अपना तरीका है। यदि इस दुर्लभ-सी जान पड़ने वाली लोकप्रियता और विश्वसनीयता को समझ सकने लायक एकाध सूत्र भी इस लेख में उपलब्ध हो सके हैं तब तो मेहनत सार्थक रही और गर नहीं तो... अब वह भी क्या कहने की जरूरत है!


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