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कविता

लायी हयात, आये, क़ज़ा ले चली, चले
मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़


लायी हयात[1], आये, क़ज़ा[2] ले चली, चले
अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले

बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे
पर क्या करें जो काम न बे-दिल्लगी चले

कम होंगे इस बिसात[3] पे हम जैसे बद-क़िमार[4]
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले

हो उम्रे-ख़िज़्र[5] तो भी कहेंगे ब-वक़्ते-मर्ग[6]
हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो युँ ही जब तक चली चले

नाज़ाँ[7] न हो ख़िरद[8] पे जो होना है वो ही हो
दानिश[9] तेरी न कुछ मेरी दानिशवरी चले

जा कि हवा-ए-शौक़[10] में हैं इस चमन से 'ज़ौक़'
अपनी बला से बादे-सबा[11] अब कहीं चले

शब्दार्थ:
1. ज़िन्दगी
2. मौत
3. जुए के खेल में
4. कच्चे जुआरी
5. अमरता
6. मृत्यु के समय
7. घमंडी
8. बुद्धि
9. समझदार
10. प्रेम की हवा
11. सुबह की शीतल वायु


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