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कहानी

अंत्याक्षरी
रमेश बक्षी


बहुत दिनों से लग रहा था कि अपने साथ दिन नहीं बिताया है। अपने साथ यानी अपने अलफतिया तरीके से। जो-जो दिन बीते हैं, किसी-न-किसी के साथ रहे हैं। वैसे निपट अकेला हूँ। लेकिन कभी कोई समस्या है और कभी कोई संकट, कि अनचाहे मेहमान की तरह उन्हें लाल-किला और कुतुब दिखाने ले जाना होता है। अपने साथ दिन तो वह होगा कि कोई दूसरी बात न हो, केवल मैं रहूँ और मेरा अपना आप।

जी चाहे उठो तो उठ गए, मन किया लेट जायँ तो लेट गए, तबियत हुई, आओ एक पान हो जाए और पट्टेवाला पजामा पहनकर ही निकल गए और पान दबा आए... लगे कि चाय पीनी है तो गुनगुनाते हुए और पानी चढ़ा दिया। फिर उसके खौलने का इंतजार करते किसी दोस्त को एक पोस्ट कार्ड लिख दिया।

ऐसे दिन अपने आपसे बड़ी बातें होती हैं और वह अपने आप बहुत निजी होता है। किसी और से बात करो और वह चाहे जैसे धैर्यवान श्रोता हो लेकिन वह लगता ही हे कि यह कोई दूसरा है और ऐसा है कि जो मैं नहीं हूँ। वैसे अपने अंदर का आप भी दूसरा होता है, लेकिन इतना अभिन्न होता है कि उसके सामने खुलने को मन होता है।

मुझे खुले हुए बहुत दिन हो गए। कोई घर आए तो उस आने वाले की औकात के अनुसार मैं विषय ले बैठता हूँ और कभी कोई व्यक्तिगत बात छिड़े भी तो 'हट यार' कहकर सुपारी काटने लगता हूँ। वह व्यक्ति दो-चार दस बार कोशिश करके हार जाता है और उसे लगने लगता है कि मैं खुल नहीं रहा हूँ जबकि हकीकत यह है कि कहीं कुछ छिपा ही नहीं है। उसी-उसी बात को कन्फर्स करते रहने को मन नहीं होता। कारण यह भी है कि मैं सैद्धांतिक रूप से कभी इस बात को पसंद नहीं करता कि किसी बात को खींच-खींचकर कहा या समझाया जाये या उसे सिद्ध किया जाये।

किसी ने कहा था कि तुम अमूर्त होते जा रहे हो। मैं इसका मतलब यही समझता हूँ कि मैं नाम लेकर बात करता या जो बात समझता हूँ, उसमें से मूर्तरूप को बाकी करके हर बात के लिए एक गुएनिंका गढ़ लेता हूँ। यह शायद मानसिक विलास है। परिणाम यह होता है कि गंभीर से गंभीर बात या घटना एक कलात्मक सुख देने वाली बन जाती है। वैसे में सो जाने को मन होता।

सोना। टी-हाउस के सामने रेलिंग से टिके उसने पूछा था कि तुम्हें किसी औरत के साथ सोये कितना समय हुआ? जिसने पूछा उसने कहा कि वह चार साल से नहीं सोया। मैंने उत्तर दिया, 'यही कोई दो-ढाई साल हुए हैं।' कहीं कोई करुणा नहीं थी इस बात में। ऐसे सवालों के बाद हम लोग साधारणतः हल्की-फुल्की बात करने लगते हैं और बात आई-गई हो जाती है। लेकिन कुछ समय पहले किताबी अखबारों की सफाई करते एक फ्रेंचो का पैकेट हाथ आ गया था उस लुब्रिकेटेड प्रोफैलैटिक्स पर बैच नंबर था छियत्तर, मैन्यूफैक्चिरिंग जनवरी छियासठ और एक्सपाइरी दिसंबर सड़सठ। थोड़ी देर सोचता रहा कि इसे कब कैसे-कहाँ खरीदा था। फिर उसे खोलकर देखा कि अब तक वह गीला है। बाद में यह भी लगा कि अभी इसे एक्सपायर होने में समय था, किसी दोस्त को ही दे देता...। उसे फेंक तो दिया लेकिन भावुक हो गया था - कुछ ऐसा ही भाव था जैसे किसी बच्चे के लिए कपड़े खरीदो और सहसा उसकी मृत्यु हो जाए तो बाद में संबंध ज्ञान से वह कपड़ा कैसी पीड़ा देता हैं।

भावुक होने वाली बात बाज वक्त ऐसी लगती है जैसे अपमानित हो गए हों। अभी उस दिन पहला पानी बरसा, घिरे हुए बादल, छहरती बरसात। बाहर देखा तो लॉन ताजा लग रहा था। नींबू का पेड़ धुलकर बड़ा ताजा लग रहा था। अपने कमरे में आकर मेज पर मैं झुक गया था। मौसम के बदलने का उत्साह मेरे चहरे पर आ गया था। कुछ कर डालने या पकौड़े खाने की इच्छा से परेशान होने लगा मैं।

बाहर जाकर खड़ा हुआ और भीगने लगा। सामने बच्चे नंगे होकर बरसात का स्वागत कर रहे थे। खिड़की से बाद में बाहर देखते मैं डूबने लगा था। अपने अंदर से ही किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा था 'बस!... मैंने चौंककर अपने आप को ठीक किया तो आवाज आई : 'रेशनल बनने का नाटक ऐसे समय नहीं चल सकता। लग रहा है ना सब कुछ अकेला? लग रहा है, सब कुछ बियाबां? है न यह घर उजाड़? देखो, कैसी आबाज आ रही है?' ऐसा लगा था उन शब्दों से जैसे चोरी करते पकड़ लिया गया हूँ।

मैं वैसी उदासी को जो भोग रहा था, वह पीड़क नहीं थी लेकिन उस उदासी का नायक बनकर कहीं अंसतुष्ट महसूस कर रहा था। एक किस्म के आत्म-योग में डूबा था। दुखी होने की स्वीकृति चाहे जैसी विवशता हो लेकिन लगातार दुखी होने पर जो अनायास पद्दाश्री मिल जाता है, वह महिला ही नहीं देता, सुख भी देता है और हिंदी में दुखी होने की होड़ लगी है। सोचते-सोचते मैं घबरा गया... बेहद घबरा उठा।

अभी इस देश के प्रधानमंत्री का भाषण सुन रहा था। आज पंद्रह अगस्त है ना, आजादी की इक्कीसवीं सालगिरह। वही औपचारिकता और अमूर्त भाषण, उसमें एक पंक्ति थी : 'लेकिन हम घबराये हुए देश या असंतुष्ट देश के रूप् में अपने देश की तस्वीर दूसरों के सामने नहीं रखना चाहते।' एक घबराया हुआ देश यह नाटक करना चाहता है कि वह घबराया हुआ नहीं है। अगर है घबराये हुए तो इस समय किसी दूसरी तरह का रोल करने की क्या जरूरत? कितना मुश्किल होता है घबराई स्थिति में चेहरे पर संजीदगी लाना या प्रसन्न दिखाई देना। वह भी ऐसी स्थिति में जब सारी दुनिया हम पर आँख लगाए हो। यह भी लगता है उम्र जैसे सीमा होती है।

अगर दस की उम्र तक बच्चा पढ़ना-लिखना न सीखे और उसका आई.क्यू. औसत न हो तो परेशानी होने लगती है और हम मनोविद् के पास दौड़े चले जाते हैं। बीस की उम्र तक अगर पढ़ाई पूरी होने के नजदीक न आए तो लगता है कहीं कोई देरी हो रही है। पच्चीस की उम्र तक नौकरी न आए तो एज-बार सामने आ जाता है। कई ऐसी नौकरियाँ हैं जो उम्र ऊपर हो जाने से मिलती ही नहीं। या पच्चीस की उम्र हुई तो माँ-बाप को तो क्या, स्वयं लड़की को डर लगने लगता है कि कहीं अकेले ही उम्र न ढोनी पड़े यानी विकास में उम्र का वैज्ञानिक यथाक्रम होता है। एक उम्र तक उम्र 'चढ़ती' फिर एक उम्र तक उम्र बढ़ती है फिर एक उम्र से उम्र 'ढलती' है...।

उम्र के बारे में मैं हमेशा गंभीर रहा। अभी कल-परसों ही डायरी में 15-8-36 लिखा और वहाँ से 68 तक यात्रा की। पूरे 32 साल। बत्तीस साल। सुनने में भी कैसा लगता है। याद है 52 में मैट्रिक किया था सोलह साल पहले। वे सोलह साल जनरल लॉलेज प्राप्त करने और हड्डियों के विकसित होने के होते हैं लेकिन मेरे लिए वे बीमारियों के थे, अभावों के थे और उम्र के पहले मेच्योर हो जाने के थे। हर बात खूब ठीक से समझ में आती थी और मैं सारे समय तस्वीरें बनाया करता था। बाद के सोलह साल अनुभव के होते हैं, व्यवस्थित होने के होते हैं।

मैं व्यवस्थित होने के बजाय उखड़ा अधिक हूँ। 29 की उम्र तक मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं 30 का या 31 का या 32 का हो जाऊँगा। लेकिन उस 30 की लकीर को लाँघने पर भ्रमहीन जरूर हो गया हूँ। जिस तरफ बढ़ रहा हूँ उस तरफ शोर नहीं है, मेरे चलने से आवाज कोलाहलों से बहुत दूर है, मैं समय पर खाना खाता हूँ, समय पर सोता हूँ, समय पर जागता हूँ। बीस के बाद मेरे खून में उबाल आ यगा था, ऐसा उबाल कि पैर ठीक से जमीन नहीं छूते थे, मन में महत्वाकाँक्षाएँ थीं, असंभव से असंभव बात सोच लेने की ताकत थी और कुछ कर गुजरने की इच्छा जिंदा रहने की शर्त थी। अब वह नहीं रहा। उम्र के 'बढ़ने' की स्थिति में हूँ कि चाल तेज नहीं हो सकती और चाल कम भी नहीं हो सकती, एक ऐसी लगातार रफ्तार है कि सिवाय चलने के कोई और चारा नहीं बचा...।

'चारा' के कई अर्थ होते हैं, चारा उस खाने को भी कहते हैं जिसे गाय-बैल खाते हैं और जो घास के नाम से प्रसिद्ध है। चारा डालना मुहावरा है जिसका अर्थ होता है किसी को छल-फरेब से फंसाने के लिए कोई मोहक वस्तु रास्ते में रख देना कि वह व्यक्ति उसके आकर्षण में नजदीक आए और फँस जाएं चारा शब्द मछली पकड़ने वालों के शब्दकोष से लिया गया है। वे लोग तालाब-किनारे जाकर अपने कांटे में एक केंचुआ बांध देते हैं और उसे पानी में डालकर बैठ जाते हैं। मछली केंचुआ खाने आती हैं और उसके जबड़े में काँटा फँस जाता है। फिर झटके से डंडा ऊपर खींच लिया जाता है। मुझे मछली पकड़ा हमेशा अच्छा लगता है लेकिन एक भी मछली आज तक हाथ नहीं आई। वैसे मछली पकड़ना एक टैकनीक है जिसे जाल डालना आता है, जो चारा डालकर पानी में तैरती मछली को जो फँसा सकता है, वह सफल और दुनियादार आदमी माना जाता है। हर आदमी यही कहता है - अपना कैरियर बनाओ कैरियर...।

कैरियर शब्‍द से मुझे बड़ी चिढ़ है। मुझे हर कैरिअरिस्ट आदमी उस बैल की तरह लगता है जो बधिया कर दिया गया है और जो कंधे पर जुआ ढोने में सफल बन गया हे। किसी सफल गधे और सफल खच्चर और सफल आदमी में बहुत कम भेद होता है। आप नकेल पहन नहीं होती, मेरे कहीं रुक जाने अट-पटापन पैदा नहीं होता, मेरा घर लें या लगाम लगावा लें या जीन कसवा लें, मुझे सब-कुछ एक बराबर लगता है। औसत भारतीय की परिणति भी यही होती है, वह किसी-न-किसी किस्म का जानवर होकर रह जाता है। ऊपर से मजा यह है कि महाप्रभु बैल या महाप्रभु गधे अपना एक फलसफा भी दुनिया पर ढोते हैं। जेसे अगर महाप्रभु खच्चर मुझे देखें तो दुखी होकर कहेंगे : ''राम-राम! बत्तीस की उम्र में तुम बेकार हो; इतनी अच्छी डिग्री और इतने अनुभव के बाद तुम्हें तीन सौ की नौकरी भी नहीं मिल पाई? भइया, अॅडजस्ट करो, अॅडजस्ट। अॅडजस्ट करने से सब ठीक हो जायगा। अॅडजस्ट किसने नहीं किया? राजाराम तक ने अॅडजस्ट किया था। ढंग की नौकरी करो। बूढ़ी माँ की सेवा करेा। लोन लेकर मकान की जुगाड़ बैठाओं बीवी-बच्चों के बारे में सोचो। बीमा क्यों नहीं करवाते भले आदमी? क्यों अपनी जवानी को गारद करने पर तुले हो?''

जवानी? यानी यूथ। यानी युवक होना। यानी खून में गरमी महसूस करना। यानी पहाड़ झुका देना। यानी कल के लिए संग्रह करना कि बुढ़ापा ठीक से व्यतीत हो। यानी अब बचपन गया और जिम्मेदारी सिर पर है। यानी अब तो कुछ कर मरदूद। यानी क्यों नहीं कोई भी नौकरी कर लेते? यानी क्यों नहीं भइया किसी को मक्खन मारता और सुख की 'ब्रँड' खाता? यानी ये रंगीन बुशर्ट क्यों पहनता है? यानी गिरस्ती से क्यों भागता है, बच्चा? यानी ये आये दिन दारू क्यों पीता है? यानी जलजीरा क्यों नहीं पीता? यानी इस तरह क्यों नहीं रहता कि लोग तेरी तरफ नजर-न उठाएँ, प्यारे? यानी अपने साथ के हम उम्रों को, समकालीनों को तो देख, सबके सब ख्याति की चोटी पर पहुँच गए और तू 'वान्टेड' ही देखता रहा गया।

मैं शहीद भी नहीं हो सकता। शहीद थे भगतसिंह, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गाँधी थे शहीद...। मैं सोचता ही रह जाता हूँ कि राजनीति में घुस कर जो लोग स्वार्थ साधन के लिए अपने अशिक्षित दिमाग से नाकामयाब हो गए, वे कैसे और क्यों शहीद हुए? मैं इन सबकी तुलना में बड़ा शहीद हूँ। है किसी की माँ, जो अपने बेटे का घर में रहना हराम कर दे, है किसी की ऐसी समस्या कि हम यह नहीं कर सकते तो नहीं कर सकते भले ही जान से हाथ धोना पड़े? है कोई माई का लाल जिसकी जेब में एक पैसा भी न हो और जिसे रीगल जाकर अपने यारों से बात करनी हो? कौन है जो सामने आये और कहे कि मेरे मुँह का कौर छीना गया है? शहीदों की मजारों पर जुड़ेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालों का यही बाकी निशां होगा...।

गोल गप्पे (पानी पूरी) की दुकान खोलना मेरा स्वप्न है। हनुमान मंदिर के सामने एक दुकान किराये पर ली जाये और उसमें कुर्सी, मेजें पंचकुइयां रोड से संडे के नीलाम में से लाई जायं, दो बड़े मटके। एक में नमकीन पानी, दूसरे में खटाई, आलू की टिकिया के लिए बहुत बड़ा तवा, एक बड़ी अंगीठी, दही-बड़ों के लिए बड़ा सकोरा, अचारों के लिए मुरबदान, कुछ प्लेटें-चम्मच, गिलास और छोटी-सी तिजोरी, कप-प्लेटें धोने के लिए दो लौंडे, आवाज मारने के लिए एक छोरा। एक रेडियो जो सारे समय बजता रहे और गाना सुनने के मूड में लोग ज्यादा गोल गप्पे खा लें या जो लड़की गोल गप्पे खा चुकी है वह ज्यादा पानी सुड़क ले। मैंने यह देखा कि पानी में मिर्च ज्यादा हो तो उसे सुड़कते समय लड़की ज्यादा रोमांटिक दिखने लगती है। मुँह से सी-सी निकलता हो और छोटी-सी रूमाल से नाक पोंछ रही हो वह, तो लगता है गोल गप्पे की दुकान पर नहीं खड़े हैं, कोई ड्रीम देख रहे हैं...

सपना शब्द ऐसा लगता है जैसे शहनाई बज रही हो और किसी कस्बे में कावेरी नाम की किसी लड़की लड़की से हमारी शादी हो रही है... ड्रीम से ऐसा लगता है कि बैंड पर डम-डम डम-डम चल रहा हो और नायलोन स्ट्रैच वाली लड़की खादी भंडार का सिंदूरी कुरता पहन कर हमारे साथ ट्विस्ट कर रही हो। मैं समझता हूँ, योजना भौतिक सपना है और सपना आध्यात्मिक सपना, उसमें हींग-फिटकरी कुछ नहीं लगती। कमरे में बैठिए और सोचिए कि पड़ोस की लड़की आपके पास आ जायगी। लाटरी का एक टिकट खरीद लीजिए और कल्पना कीजिए कि ढाई लाख रुपया आपको मिल गया। हिंदुस्तान में नोबुल-प्राइज की स्नॉबरी खत्म हो गई है और अब भारतीय ढंग से यहाँ के प्रतिष्ठित लोग सोचते हैं कि एक लाख रुपया उन्हें कैसे मिलेगा? इस देश के बुरे हाल हैं - सेना लाटरी, सरकार लाटरी, साहित्य लाटरी। इधर कमा कर लाये और उधर लाटरी में लगा दिया, फिर स्वप्न बनाने लगे। बूढ़े लोग खैनी मुँह में दबाकर जुगाली करते हैं और जवान लोग एक आइडिया रख लेते हैं मुँह में और फिर उसे जुगालने लगते हैं।

मैं अपने माँ-बाप के दकियानूस व्यवहारों के प्रति क्रांति कर दूँगा। मेरी बर्दाश्त से बाहर है, बूढ़ी और गलीज मूर्खता को सहना। उठे और प्लाजा में 'टू फार दी रोड' देख आए। यार क्या करें डैडी भी अजीब जीव हैं। मैं जिससे प्रेम करती हूँ, उसी से शादी करूँगी। देखती हूँ पापा क्या कर लेते हैं? आखिर ये मेरी अपनी जिंदगी है। मैं यह नौकरी छोड़ दूँगा, इसमें गुलामी है, इसमें मेरे अहम् की तौहीन है, यह तो एक तानाशाह के सामने झुकना है। उठकर खिड़की से बाहर देखते हुए एक अकथा लिखने लगे : प्रिय भाई, कहानी भेज रहा हूँ - यह आपकी पत्रिका के ही योग्य बनी है...।

कहानी कहानी को कहते हैं। एक अच्छी कहानी भी कहानी है ओर एक बुरी कहानी भी कहानी है। कहानी वह नहीं है जो कविता है। कविता जैसा हर कुछपन कहानी में नहीं हेाता। कहानी के बारे में चेखव ने गलत कहा है कि वह एक अश्व की मृत्यु से कसी के प्रथम प्रेम संबंध तक कुछ भी हो सकती है। कुछ भी वह कैसे हो सकती है? जिसके पास अनुभव है वह कुछ भी कैसे लिखेगा? जिसने लीला से प्रेम किया है, वह लीला के प्रेम के बारे में बात कहेगा; जिसने कमला से प्रेम किया है वह कमला के बारे में लिखेगा। लीला से प्रेम और कमला से प्रेम में जमीन-आसमान का अंतर है। कहानी उन फाउण्टेनपेन की तरह हे जिसमें स्याही भरी है और कविता उस पेसिंल की तरह है, जिसकी नोक टूटी हुई हो। कहानी आलवेव ट्रांजिस्टर है और साहित्य की अन्य विधायें लोकन सैट। कहानी क्षितिज तक फैली हैं। कहानी में हर रंग समाहित हैं। कहानी माँ-पत्नी-प्रेमिका से लगाकर रंडी-चुड़ैल-जोगिन पर भी लिखी जा सकती है। कहानी खुशी पर हो सकती है, दुख पर हो सकती है, मृत्यु पर हो सकती है, जन्म पर हो सकती है, चाय पर हो सकती है, शराब पर हो सकती है, प्रेम पर हो सकती है, वियोग पर हो सकती है, रोने पर हो सकती है, छींकने पर हो सकती हैं, जुकाम पर हो सकती है, बुश्शर्ट पर हो सकती है, कमीज पर हो सकती है, जुड़े पर हो सकती है, दाढ़ी पर हो सकती है, लेखक पर हो सकती है, क्लर्क पर हो सकती है, वीरेंद्र पर हो सकती है, राजेंद्र पर हो सकती है...

है चमन वीरान तेरे बगैर
है वतन वीरान तेरे बगैर
तेरी शादी के बाद से बसंती
है सपन वीरान तेरे बगैर।

तालियाँ, खूब जोर की तालियाँ, दोस्तो। कल तक दाढ़ी थी, आज दाढ़ी मुड़वा ली, दोस्तो। बजाइए तालियाँ, मेहरबानो। कल तक जमाने को मुट्ठी में लेकर पिस्सू की तरह उसे मसलते थे और आज, पशुओं की नस्ल पर लेख लिखते है! भाइयो, इस बात पर भी तालियाँ बजाइए। जी, कल तक, याद रखें कल तक, हथेली पर सरसों उगाते थे और आज हथेली पर खाते हैं।

क्या खाते हैं, यह मत पूछिए, बन्दो! अगर आपके पास दो हथेलियाँ हैं तो अहसान कीजिए मुझ पर और तालियाँ बजाइए। इससे मेरी आत्मा को शांति मिलेगी। आपको मेरे बोलने में कविता लग रही है, लेकिन यह कविता नहीं है, हकीकत है। मेरे खून से लिखी मेरी कहानी है। डालिए, भाइये, इस हकीकत के लिए डालिए चवन्नी-अठन्नी, पैसा-दो-पैसा, जो भी आपकी जेब में हो, न हो तो बजाइए तालियाँ। एक बेरोजगार आदमी दार्शनिक बनने की बजाय मदारी बन गया है। हैं आप खुश? मेरे चेहरे पर है उदासी, आँखों में आँसू, जबान पर गजल, हलक में संगीत, बाजू में कुव्वत, पैरों में ताकत, छाती में जोश और जेब में जहर...।

ज्हर तो हर तरफ है। मुझे किसी ने स्लोपाइजनिंग कर दिया है, दोस्तो। मैं धीरे-धीरे उस जहर से मरता जा रहता हूँ। अंदर से आँतें कट रही हैं, खून में जहर घुलता जा रहा है। मैं किसी को अगर चूम दूँ तो उसके ओठों पर भी जहर फैल जायगा। मैं जहाँ थूकता हूँ साँप पैदा होते हैं; मैं जहाँ दस्तखत करता हूँ, वहाँ बिच्छू जन्म लेते हैं, जिस पेड़ की दीवारों में दरार पड़ने लगती है। इसलिए सब मेरे पास से भाग जाते हैं।

लोग दूर-दूर से मुझे देख रहे हैं कि जिस क्षण अंतिम रूप से गिर जाऊँगा, वे दौड़कर आयेंगे और दहाड़ें मारेंगे, इतनी जोर से रोयेंगे कि पूरी शताब्दी में कोई उतनी जोर से किसी के लिए नहीं रोया। वे निश्चिंत हैं। वे उस घड़ी को जानते हैं जब इस जहर का करिश्मा बाहर दिखाई देगा। मुझे ऐसा लगेगा कि मैं गर्म मौसम के कारण मरा हूँ। मुझे ऐसा लगेगा कि अकेले रहने से मेरा दम घूट गया है, लेकिन कारण कुछ और होगा। कल तय है, सवाल केवल आज का है। आज इस जहर को कैसे पचायें... आज? आज?... आज... आज?

जन गण मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता...


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हिंदी समय में रमेश बक्षी की रचनाएँ