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कहानी

कोई और
रमेश बक्षी


उठते समय यह लग गया। था कि आज की शाम मैंने उसके घर आकर चौपट कर ली है। मैंने जब पहली बार ही कहा कि अच्छा चलूँ तो उसका पति उठ खड़ा हुआ बोला-ठीक है। साहब, खुशी हुईं मिलकर आपसे... वह यह कहकर दूसरे कमरे में चला गया। मुझे यह लग गया कि अपने पति का यह सूखा व्यववहार उसे भी अच्छा नहीं लगा है लेकिन न कुछ किया जा सकता था न कुछ बोला ही जा सकता था। वह फिर भी बोली-थोड़ी देर और बैठते...

- नहीं, मैं जब चलूँगा। मुझे कुछ दोस्तों से और मिलना है।

- तो मैं आपकी दोस्त नहीं हूँ। देखिये उस दिन आपने प्रामिस किया था कि मुझे पेटिंग सिखायेंगे... उस बात का आप भूलेंगे नहीं। अगली बार जब आयेंगे तभी हम धूमिल के यहाँ चले चलेंगे और रंग खरीद लायेंग-यह मेरे पास बैठी थी और खूब प्रसन्न मन से बात कर रही थी - मैं तो आईल पर ही काम सीखना चाहती हूँ। खूब बड़ा केनवास खरीदवा दीजिये मुझे तो। मैं एक बहुत बड़ा पेंटिग बनाना चाहती हूँ।

मैं उठ खड़ा था क्योंकि पास के कमरे में उसका पति टहल रहा था और मुझे लगा उसे मेरा यहाँ आना पसंद नहीं आया है।

दरवाजे पर जब हम पहुँचे तो उसका पति भी पीछे-पीछे आ गया। शायद वह यह देखना चाहता था कि विदा होते समय हम क्या बोलते हैं। लेकिन वह भी कम नही थी। बोली-आप कपड़े बदलिये तब तक मैं इन्हें लान तक छोड़ देती हूँ।

पति ने कुछ कहा नहीं लेकिन चुप रहा। मैंने नमस्कार किया तो उसने भी नमस्कार कर लिया और फिर अंदर चला गया।

लान तक जाकर मैंने कहा - अब आप जाइये। मैं चला जाऊँगा।

- लेकिन जायेंगे कैसे। बस मिलेगी क्या इस समय?

- मैं देख लूँगा। बस न मिली तो स्कूटर ले लूँगा...।

- लेकिन आप जायेंगे जरूर। मैं जानती हूँ कि आज आप बोर हो गये होंगे। इनका स्वभाव खास मनहूस है...

- नहीं तो। मुझे तो खुशी हुई उनसे मिलकर। तीन-चार बार आया लेकिन वे कभी घर थे ही नहीं। आज ही तो मिले हैं। मैंने शालीनता से कहा और आगे बढ़ गया। मैंने घूमकर देखा कि दूर बहुत दूर आ जाने पर उसने लान की फटकी बंद की यानी वह मुझे दूर तक जाता हुआ देखती रही थी। मैं आगे बढ़ बस स्टाप पर खड़ा हो गया और इत्मीनान से सिगरेट जला ली। मेरे सामने उसके पति को चेहरा बार-बार आ-जा रहा था। वह अफसर किस्म का आदमी लग रहा था सिर पर कुछ गंजा है और तितली किस्म की मूँछें रखे हैं। वह जब कुछ बोलता था तो नाक के साथ वह तितली भी हरकत करती थी। मैं इसके घर कई बार आया हूँ लेकिन हमेशा वह अकेली ही मिली। पहली ही बार में मुझसे खूब खुलकर बात की और वह कह बैठी कि एक्जीबीशन में जो 'लास्ट लव' शीर्षक का चित्र था वह उसे बेहद अच्दा लगा है। मैंने कह दिया कि आप ले लीजिये, तो उसने आग्रह किया कि अगली बार मैं वह चित्र उसके घर पहुँचा दूँ। बात यह है कि उसने मेरी इतनी प्रशंसा की है कि मुझे लगा अब चित्र दे देने में कोई हर्ज नहीं है। मैं पिछले रविवार को ही वह चित्र लेकर आया था। उस दिन भी इसका पति था ही नहीं। उसने बतलाया था - वे दौरे पर गये हैं और कल लौटेंगे।

उसने ही पूछा था कि इस चित्र को कहाँ लगाया जाये। फिर खुद ही बोली थी कि बेडरूम की दीवार खासी चौड़ी है। वाकई वह दीवार मुझे अच्छी लगी। मैंने खूद कील गाड़कर चित्र लगा दिया था तो वह सामने बेड पर ही बैठकर एक-टक उस चित्र को देखती रही थी। बोली थी-यहाँ पास आइये और अपनी तस्वीर की बारीकी मुझे समझाइये।

मैं संकोच से दूर ही खड़ा रहा, आखिर उसके बेड पर कैसे बैठता और आस-पास कोई कुर्सी स्टूल था ही नहीं। मेरा संकोच वह समझ गई और बोली-अरे, आइये ना, आप भी अजीब संकोची हैं। यहाँ आइये ना।

मैं बेड के कोने पर बैठ गया तो वह मेरे पास सरक आई-देखिये मैं जो समझी हूँ वह पहले बता दूँ...

- हाँ-हाँ बतलाइये। शीर्षक से कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है...

- लेकिन अगर शीर्षक नहीं होता तो भी मतलब साफ था। अपने वह सारे रंगीन फल और तैरते हुए रंग और संगीत की लहरें बनाई थीं... शायद बनाई नहीं थी लेकिन आपके मन में वह सब था जो प्रेम के समय अमूमन हुआ करता है, फिर आपने एक आँधी पैदा कर दी। आँधी के कारण फूल टूटकर झरकर बिखर गये, रंगों का तैरना ज्वार बन गया और संगीत की लहरें दीवारों से छतों से सिर फोड़ने लगीं... प्रेम कैसे उजड़ता है यह दिख रहा है। संगीत जैसे महल की तरह था और वह खंडहर के रूप में उदास हो गया है...

वह चुप हुई और चित्र की तरफ खूब प्रशंसा के भाव से देखने लगी।

- मैं खुद भी इतना अच्छा विश्लेशण नहीं कर पाता जितना अच्छा विश्लेशण आपने किया है - मैं उसकी तरफ देखने लगा तो वह मेरी आँखों पर रुक गई - यही तस्वीर आपकी आँखों में भी है। सच कहूँ इन बिखरे हुए बालों के बीच में आपकी आँखें खूब चमकती हैं।

वह बोलती ही गई थी और मैं पिघलता गया था। वह प्रशंसा मुझे उन्नत कर देनेवाली लगी थी। कभी किसी ने ऐसे मेरी तारीफ नहीं की थी। दिल्ली में कलाकार के सामने इतनी कठिन प्रतियोगिता रहती है कि वह टिक नहीं पाता। मैंने किसी तरह चंदा करके अपना वनमेन किया था और वहीं इससे पहचान हुई थी। इसने पता माँगा था तो मैंने दे दिया था। उसके चार दिन बाद ही एक पत्र मिला था कि मैं उससे मिलूँ। कनाट प्लेस से पचकुइयाँ बहुत नजदीक है सो उसके घर चला गया था। उस शाम भी इसका पति था नहीं घर। पहली बार में ही मुझे इसके कारण खूब अपनापा लगा था। बोली थी - यह जो लेखक होते हैं न उनका दर्द वैसा का वैसा ही कह दिया जा सकता है लेकिन चित्रकार का दर्द कुछ और ही होता है। अगर यह लुटता हे तो पूरे बाग को रुलाता है, अगर वह उदास होता है तो सारे आकाश को काला कर देता है। अगर उस पर कोई संकट आता है तो वह सारी दुनिया में तूफान पैदा कर देता है।

मैं बहुत प्रभावित हुआ था उसके वाक्यों से। फिर उसने पानी गरम किया था और प्याले में खूब घोंट-घोंटकर मेरे लिए झाग वाली काफी बनाई थी। खाने के लिए सेन्डविचेस थे। मैंने खाने को मना किया तो वह एक टुकड़ा हाथ में लेकर मेरे मुँह के पास आ गई। उसके हाथ से जब मैंने टुकड़ा ले लिया तो जाना कि वह दूधिया रंग की कलाई भर चूड़ियाँ पहने थीं। सब कुछ दूधिया था उसके शरीर पर। यहाँ तक कि वह माथे पर जो बिंदी लगाये थी वह भी उसी रंग की थी। साड़ी पर सुनहरी किनार थी और वह मुस्कराते समय भौहें ऊँचा करके नीचे की तरफ देखती थी। इतनी खाली थी उसकी आँखें जैसे दूर तक बियाबान हो। एक बार कुछ बोलते हुए उसने छत की तरफ देखा था। मुझे लगा था किसी ने मुट्ठी में समुद्र को बाँध लिया हो-पुतलियाँ ऊपर और भौहें नीचे जैसे कोई चीज सिकुड़ती जा रही है।

मैं बोला था - आपकी आँखें बहुत एक्सप्रेसिव हैं। मुझे इनमें समुद्र और रेगिस्तान सब कुछ दिख रहा है...

वह मुस्कराई और उसने सिर नीचे झुका लिया। फिर सिर उठाकर बोली - और अब? उसने दोनों पुतलियों को नाक की तरफ खीचं लिया था और उन्हें भेंगा बना लिया था। मैं हँस दिया-अरे आप तो खासी कलाकार हैं। मैं आँखों को ऐसी नहीं कर सकता।

- अब भी आँखें सुंदर है...? वह वैसी आँखों से ही बोली।

- जैसे किसी ने पानी में बांटा डाल दिया हो और दो मछलियाँ एक साथ फँस गई हों...वह हँस दी औश्र उसने आँखों को फिर ढीला छोड़कर ठीक कर लिया-तो लीजिये, छोड़ दिया मछलियों को...

उस कसरत से उसकी आँखों में लाली तैर आई थी और ऐसा लगने लगा जैसे दूर तक रेगिस्तान है और सूरज डूब रहा है।

मैं मुग्ध उसकी तरफ देखता ही रह गया था। सच कहूँ, उसकी आँखों पर से मेरी आँखें हटती ही नहीं...। मैंने मन में तय किया था कि मोनालिजा की मुस्कान अगर लिनादो ने चित्रित की है तो मैं उसकी आँखें बनाऊँगा-ऐसी आँखें कि वह विश्वविख्यात मुस्कान उसके सामने पानी भरे।

सहसा एक कार के अपने सामने आ रुकने से मैं चौंक गया। हार्न बजा तो मुझे लगा कि कार मेरे लिए ही रूकी थी। आगे जाकर देखा तो पाया कि उसका पति है। दरवाजा उँड़ेलता वह बोला - अरे, अब तक नहीं मिली बस। आइये, मैं आपको छोड़ दूँ। मैं कह नहीं पाया कि इस कृपा की कोई जरूरत नहीं है और अंदर जा बैठा। कार बढ़ाते हुए उसने कहा - मैं तो समझा था आप चले गये होंगे। मुझे बाहर जाना था तो सोचा कि आपको छोड़ दूँ।...

मैंने केवल उसकी तरफ देखा था क्योंकि जब तक इसके घर में बैठा था इसका व्यवहार डरावना था। मैं यूँ ही अपराधी महसूस कर रहा था क्योंकि इसकी पत्नी मेरी तारीफ किये जा रही थी। यह यहाँ तक कर गया कि जब उसने मेरा परिचय कराते कहा कि ये बहुत बड़े चित्रकार हैं तो यह मुझसे हाथ मिलाये बगैर ही एक अखबार लेकर सामने बैठ गया। मैंने सरासर अपमानित अनुभव किया था। शायद गलती मेरी ही थी क्योंकि आज यहाँ आने का तय था ही नहीं। मैं बहुत बोर हो रहा था शाम को इधर-उधर काफी पीते और यह सोचकर इनके घर आ गया था कि जरा शुगल रहेगा। मेरे मन की ही है यह बात कि मुझे प्रशंसा अच्छी लगती है और यहाँ की प्रशंसा एक औरत की प्रशंसा थी, सुंदर आँखों वाली औरत की प्रशंसा।...

- अगर ठीक समझे तो एक प्याला कॉफी पी लें। उसने कार एक तरफ लगा ली।

वैसे अभी ही पी थी कॉफी। मैंने मना करना चाहा। यह सहज इंकार था क्योंकि मैं इनके घर जब गया तब ये दोनों खाना खा रहे थे। शायद मैनर्स में मेरी गलती हो गई कि अंदर जाकर मैं सोफे पर बैठने की बजाय डाइनिंग टेबिल पर जा पहुँचा और बेतकल्लुफी से बोला-आप लोग बड़ी जल्दी खाना खा लेते हैं। जहाँ मेरे वाक्य को सुनकर इसकी पत्नी को गुदगुदी लग गयी यह मनहूस मेरी तरफ देखकर इतना ही बोला था-जी...। इतने फूहड़ ढंग से जी बोला था जैसे कह रहा हो - खाना जल्दी खा लेते हैं लेकिन खाना खाते समय मूर्खों की तरह किसी के घर नहीं जाते।...

मॅनर्स की गलती समझकर मैं उठ भी गया था और सोफे की तरफ जा रहा था कि इसकी पत्नी जिद पर आ गई - नहीं, आप यहीं बैठेंगे और खाना खाने जाना है।

- लेकिन यहीं बैठिये। कॉफी मँगवाती हूँ अभी आपके लिए।

- यहाँ इन्हें तकलीफ होगी। इन्हें ड्राइंगरूम में ही बैठने दो...। यही व्यक्ति बोला था और मैं उठकर सोफे पर जा बैठा था। यहाँ तक कि मैंने जब कॉफी का घूँट भरा तो इसने डकार भी ली थी।

घर की तुलना में इसका व्यवहार अच्छा लगा। कॉफी हाउस में यह मुझ ले गया। बोला-क्या खायेंगे?

- खाने को कुछ नहीं चाहिए...।

- आप संकोच क्यों कर रहे हैं। कला से मुझे भी प्यार है। हुआ यह कि बिजनेस में फँस जाने से मुझे वक्त ही नहीं मिलता। सोचिये आप ही घर का दो ढाई-हजार का खर्च निकले कैसे।...

मुझे वह व्यक्ति सहसा सहन करने योग्य लगने लगा। मैं बोला-वाकई पैसे का अपनी जगह महत्त्व है।...

- एक बात कहूँ - वह क्रीमवाली कॉफी का अर्डर देकर बोला - कभी पैसे को लेकर आप परेशान न होइये। यह मत सोचिये कि मेरे पास पैसा है इसलिए ऐसा बोल रहा हूँ। सच तो यह कि मेरे मन कलाकारों के प्रति बड़ा सम्मान है और उनकी भिखारियों जैसी हालत देखकर बड़ा दुख होता है।

- धन्यवाद! - मैं अपने सम्मान से बोला था - वैसे मुझे कोई तकलीफ नहीं।

वह मुस्करा दिया - वैसे खुशनसीब आप ही लोग हैं। हम लोग सम्पन्न भले ही माने जायें लेकिन हमारा जीवना बिल्कुल वीरान है...

मुझे उसका यह वाक्य बहुत नाटकीय लगा क्योंकि वह साँसें छोड़कर बोला - पहले तो मैंने सोचा था कि आपसे पहली मुलाकात में कुछ न कहूँ लेकिन जैसे ही वह लान तक छोड़कर आई मुझे आप तक आने का निर्णय लेना पड़ा।...

मैं उसके इस वाक्य को ठीक से समझ नहीं पाया जो जिज्ञासा से बोला - जी...?

- जानते हैं वह कमरे में आकर क्या बोली मुझसे...! - वह जरा रुका और मुझे आशंकित देखकर बोला-उसने कहा कि उस आदमी का आपने अपमान किया है, आप ही बताइये कि क्या मैंने आपका अपमान किया था। यह मैं मानता हूँ कि दिन भर मर-खपकर लौटा हूँ तो बहुत शिथिल हो जाता हूँ और यही हुआ आज भी मेरे साथ। शायद आपको भी लगा हो कि मैं मनहूस आदमी हूँ।...

- जी मुझे नहीं लगा ऐसा और यह उनकी गलती है जो आपसे ऐसा कहा। वैसे आज मैं आनेवाला भी नहीं था लेकिन...।

- मैं कोई सफाई नहीं माँग रहा हूँ आपसे-वह कॉफी ढालता बोला - 'मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि आप घर कितनी बार आये हैं। आपको चित्र बेडरूम में जब टँगा देखा तो पूछा था मैंने उससे। तभी उसने आपको नाम बतलाया और कहा कि आपसे लिया है उसने वह चित्र।...

'हाँ उन्हें वह चित्र पसंद आया था...।'

'मुझे उससे कोई एतराज नहीं' - वह बोला - 'लेकिन आप ही सोचिये प्यारी चीजें ड्राइंगरूम में लगती हैं या बेडरूम में? आप ही बतलाइये कि कोई पति-पत्नी कभी किसी को बेडरूम में घुसने भी देते हैं...।'

'वो!' मैं कहने ही वाला था कि उस चित्र को बेडरूम में लगाने को दोष मेरा नहीं है, वह वहाँ उसके कहने से मैंने लगाया था मैंने।' बोलना सहसा मैंने रोक लिया क्योंकि यह लगा कि यदि यह मुझे उसके बेड पर बैठा हुआ देख लेता तब तो जान ही ले लेता।

'आप परेशान न होइये, न ही आपको परेशान करने के लिए यह कहा गया...।' मैं तो आपके सामने एक बात रखना चाह रहा हूँ।

'लेकिन यह तो मुझे समझ में आ ही रहा है कि आप डिस्टर्ब हुए है।'

'मुझे खुशी है कि आप मेरी परेशानी को समझ पाये है। वैसे कोई नहीं समझ पाता है। रुपया पैसा ही सब कुछ नहीं है आदमी को किसी और चीज की भी जरूरत होती है।'

'लेकिन आपका घर तो खासा सुंदर है, साथ ही इतनी सुंदर पत्नी।'

उसने एक घूँट लिया और बोला - 'हाँ यह सभी कहते हैं। कई लोगों से मैं यह सुन चुका हूँ कि मेरी पत्नी की आँखें बड़ी सुंदर हैं।'

'जी, यही मैं भी कहना चाहता था कि उनकी आँखों में जादू है।'

'तो क्या इस जादू ने ही आपको भी मारा है...।'

'मैं आपका मतलब नहीं समझा।' मैं प्याला हाथ में लेकर उसकी तरफ देखता रहा गया। उसकी मूँछवाली तितली जरा देर को काँपने लगी थी। उसने क्रोध से आखिरी घूँट भरा और हँस दिया-'मुझे इसी बात का संदेह था...।'

मैं चुप उसके सामने बैठा रहा। मेरे प्याले में कॉफी थी लेकिन मैं उसे पी नहीं पा रहा था। सहसा यह लगा कि कोई गलत वाक्य मैंने बोल दिया है।

'देखिये!' आपके मन में परेशानी आ गई है और यह परेशानी आना स्वाभाविक है। आप अविवाहित है सो जान नहीं सकते इस बात को, लेकिन किसी को कैसा लगता होगा कि उसकी ही पत्नी अपने पति पर ध्यान नहीं देती और उसके पति को यह अहसास बारहा होता है वह इस घर के बोझ को ढोने वाला बैल है।' उसके सिगरेट जला ली। मुझसे नहीं कहा कि सिगरेट ले लूँ लेकिन सिगरेट जलाकर डिबिया मेरी ओर खिसका दी। उसे चुप देखकर मैं चौंक गया। कहीं कोई ऐसी बात नहीं हुई थी उस औरत से मिलने में कि जिस कारण मैं अपराध महसूस करता क्योंकि यह स्पष्ट था कि वह विवाहित है और मेरी प्रशंसा कर सकती है। जैसे क्वाँरी लड़की से मिलते समय उसे छू लेने या उसे छीन लेने की तबीयत होती है वैसी कोई तबीयत उस औरत के लिए नहीं हुई थी। वह आँख वाली घटना जिस दिन हुई उस रात मैं सो ही नहीं पाया था क्योंकि बार-बार दो मछलियाँ सामने आ जाती थीं। मैंने अपने-आपसे कहा भी था कि उस औरत के प्रति अगर कोई और विचार मन में आया तो तुम बेहद नीच आदमी साबित हो जाओगे। यह मैं अपने-आपकी साक्षी से कह सकता हूँ कि उसी रात मैंने एक केनवास पर काँटे में फँसी हुई दो मछलियाँ बनाना शुरू किया, लेकिन मैं उसकी आँखों के माध्यम से अपने मन के अंदर की तड़प बनाना चाहता था। यह शुद्ध सात्विक भावना थी। शायद इसका पति उस चित्र को देखे तो कह देगा कि उतर आये अपनी औकात पर... यह सब सोचते मैं कॉफी का आखिरी घूँट पीते हुए यह निर्णय ले पाया कि इसके मन के भ्रम दूर कर दूँगा मैं।

'मैं नहीं जानता कि आपका विवाहित जीवन कैसा है।'...

'वह मैं खुद बतलाये देता हूँ। मुझे आप पहले यह आश्वासन दीजिये कि मैं जो भी कहूँ समस्या को सुलझाने के लिए कह रहा हूँ, इसीलिए आप बुरा नहीं मानेंगे। आप कलाकार हैं और कहीं भी आपको चोट में पहुँचाना नहीं चाहता।'

'उसकी आप चिंता मत कीजिये। आप खुलकर बोलियो। मुझे तो दुख है कि मेरे कारण आप लोगों के जीवन में तनाव पैदा हुआ।'

'तनाव तो पहले से ही था।' नाक से धुँआ छोड़ा तो उसकी मूँछों वाली तितली हिलने लगी-'शादी को कोई दो बरस हुए हैं और यह आप देख चुके हैं कि वह कला की बड़ी शौकीन है। मैं उसकी तुलना में रूखा आदमी हूँ। आपकी प्रदर्शनी मैंने देखी होती तो केवल प्रशंसा करके रह जाता, आपको घर नहीं बुलाता, उसकी मैं जरूरत भी नहीं समझता और अगर आपकी जगह मैं होता तो किसी के बुलाने के घर जाता भी नहीं।'...

'लेकिन उन्होंने खुश होकर मुझे बुलाया था...।'

उसने सिगरेट झाड़ते मेरे हाथ लिए - 'आप वादा कर चुके हैं कि मेरी बात का बुरा नहीं मानेंगे। मैं अपनी बात कह रहा था। आपकी ओर से सोचूँ तो आपने ठीक ही किया है। भई कोई औरत किसी को बुलाये और तारीफ करे और उसकी आँखें भी सुंदर हों तो आदमी सिर के बल जाएगा।'

'इसको मैं आपका दोष नहीं मानता।'

वह रुक गया। वेटर आया तो उसने एक कॉफी के लिए और कह दिया। फिर इत्मीनान से बोला - 'अब दो साल की सुनिये?' सच कहूँ मैं भी एक औरत की आँखों पर ही मरा था। यह बात शायद उसे भी नहीं मालूम है लेकिन शादी में कोई परेशानी नहीं हुई। इसके माँ-बाप ने सोचा कि लड़का पैसे वाला है और शायद वह भी समझदार है कि उसने हाँ कह दिया। जो लगा मुझे वह यह कि इसका पहले किसी से प्रेम था। पति-पत्नी के सारे धर्म निबाहते हुए भी जिसे प्रेम कहते हैं वह हम लोगों क बीच से गायब था। मान लेता हूँ कि मेरी गलत-फहमी रही हो। शायद उसका स्वभाव ही शांत बन रहने का हो लेकिन यह बात कन्फर्म भी हुई है कि वह हमेशा उस अपने बीते हुए प्रेमी को खोजती रही है।

वह चुप हो गया। मुझे यह लगा कि वह कुछ मुझसे चाह रहा है। उसकी आँखों में उदासी तैर आई। ऐसा लगने लगा जेसे वह मूलतः उदास आदमी है और उसकी उदासी का कारण उसकी पत्नी ही है।

'यह आपका व्यक्तिगत मामला है और मैं व्यक्तिगत मामले के बारे में कुछ कह भी कैसे सकता हूँ। लेकिन मेरा जितना भी आपकी पत्नी से थोड़ा-सा परिचय है उसके आधार पर यह कह सकता हूँ कि वे आपका बहुत सम्मान करती हैं।'

'यही तो रोना है जनाब, सम्मान पति का करती हैं, प्यार किसी और से।'...

'वैसे मैं क्या कहूँ?' मैं दोनों हाथों को परेशानी से मसलता हुआ बोला था - 'अगर वैसा कुछ रहा भी होगा तो वह तो बीत गया। अब उसको लेकर परेशान क्यों होते हैं।'

'परेशान नहीं हो रहा हूँ!' उसने आगे झुककर मेरे कंधे छू लिए - 'शादी के बाद और शादी से पहले भी मेरे मन में तो यह बात भी कि उस खूबसूरत आँखोंवाली को मुझे प्राप्त करना है। उसे प्राप्त करना मेरे लिए महत्वपूर्ण था। मैं तो यह भी कह सकता हूँ कि अगर वह किसी की पत्नी भी होती तो भी मैं उसे छीन लाता लेकिन उसे लाकर भी यह हालत है जैसे उससे मीलों दूर रहता हूँ मैं। वह मुझसे बिलकुल प्यार नहीं करती। मैं तो कहता हूँ कि अगर प्यार था भी तो वह भावना थी और भावना चली गई लेकिन उसके साथ तो उसके प्रेमी का प्रेत लगा हुआ है। उसने कभी नहीं कहा कि वह किसी और व्यक्ति की तलाश कर रही है लेकिन मुझे हमेशा यह लगता रहा है कि वह उसकी खोज करती रही है।'

'देखिये अगर ऐसी बात है ही तो क्यों नहीं आप उससे सीधे-सीधे बात कर लेते हैं।'

'बात से कुछ नहीं होगा।' वह हँस देती है कि वह व्यक्ति आप ही हैं। उसने रूमाल निकाल कर गरदन से पसीना पोंछ लिया।

मैंने कुछ समझने की कोशिश की। जो मुझे लगा वह यह कि हो न हो इसे हमेशा पत्नी पर संदेह बना रहता है और इसकी बीमारी है शक! बहुत ही सधे हुए शब्दों में मैंने बात शुरू की - मैं आपसे उम्र में बहुत छोटा हूँ और औरतों के बारे में मेरा ज्ञान शून्य के बराबर है। मैं तो यही समझता हूँ प्यार या शादी के संबंध कभी टूटते नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि आपको व्यर्थ की संदेह हो रहा हो?'

'जी!' उसने जोर से साँस छोड़ी - 'आपकी इस बात से कोई और बात कन्फर्म हो रही है। मैं सोच ही रहा था कि इस तरह का वाक्य आप कितनी देर में बोलेंगे। मैं यह भी जानता हूँ आप पत्नी में दोष ढूँढने की बजाय मुझ में दोष ढूँढेंगे। आप इस मेरे दिमाग का सायकोलाजिकल डिफेक्ट भी कहेंगे और यह भी जानता हूँ कि आप किसी मनोविद् से मिलने की सलाह भी देंगे।'

'आयाम सारी!' मैं तो एक साधारण आदमी के ज्ञान से बात कर रहा था - 'मुझे आश्चर्य था कि वह मेरे मन की बात जान कैसे गया। वाकई वह ठीक-ठीक वही वाक्य बोला था जो मैं बोलने जा रहा था।'

'दो साल में यह तीन बार हो चुका है।' वह ताजी आई कॉफी में चीनी घोलने लगा। पिछले दिनों बीबी को फ्रेंच सीखने की धुन सवार हुई थी। यह एक प्रोफेसर को ले आई। पढ़ाई क्या हुई है कि मेरे सिर पर हथौड़े चलने लगे। वह करने लगा इसकी आँख की तारीफ। एक महीने बाद ये हालत हो गई कि यह फ्रेंच में उससे कुछ कहे और मैं उल्लुओं की तरह सुनूँ। मैंने यह तक देखा कि दोनों घुल-मिलकर हँसते। मुझे यह साफ लगा कि तह फ्रेंच सीखना एक बहाना है और मेरी पत्नी मुझे बेवकूफ बना रही है। वह निश्चित ही उसका प्रेमी रहा होगा क्योंकि उसके लिए हमेशा कॉफी बनाती रहती। वह ब्लैक कॉफी पीता था। यह भी कहना चाहता हूँ कि उस प्रोफेसर के कारण श्रमती जी बहुत प्रसन्न रहने लगीं। आखिर मेरे सहन करने की भी हद होती है। एक दिन आज क तरह ही मैंने प्रोफेसर को रास्ते में पकड़ा और यहीं ले आया। जरा देर मैंने बात की और उसकी घिग्घी बँध गई। मैंने यहीं उसका हिसाब कर दिया और कह दिया कि अब कभी मेरी तरफ मुँह मत कीजिये। वह था भी कायर आदमी।

'यह तो आप जानें लेकिन अगर वही आदमी वह था तो फिर उन्हें बहुत क्रोध आया होगा।'

'तो क्या मैं उसके क्रोध की परवाह करता हूँ। जो हो आखिर है वह मेरी जोरू। मैं उसे अगर जरूरत पड़ी तो भरे रास्ते चोटी पकड़कर घसीटूँगा।'

काफी का प्याला तो मैंन उठा लिया लेकिन यह लग गया कि यह आदमी पूरा केस है और इसकी गिरफ्त से बच निकलना ही ठीक है। मैं कुछ बोला नहीं, चुप बुत बना रहा तो वही बोला - 'एक लेखक साहब फँस गये थे। पता नहीं किसी परचे में उनकी कहानी छपी थी और इसने उन्हें पत्र लिख दिया था। वे पत्र लिखते गये और एक दिन दिल्ली आ गये। वे रोज आते हे और अपनी एक-न-एक किताब मेरी बीबी को समर्पित कर जाते। यह उनका भी खासा स्वागत करती थीं यहाँ तम कि उनके लिए पान मँगवाकर रखे जाते रहे।'

'तो क्या उस पर भी आपको शक था?' वह जब कॉफी का घूँट मुँह में भर-कर उसे निगल रह था, मैं धीरे से बोल दिया।

'ये लेखक सब कमीने होते हैं। दूसरों की बहन-बेटियों की तरफ ये अगर न देखें तो खाना हजम नहीं होता इनका।' वह गुस्से में बोल रहा था।

'आपके अनुभव हैं ये लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता।'

'तो आप क्या सोचते हैं?'

उसने कुछ इस ढंग से प्याला नीचे रखा कि मुझे गुस्सा हो आया। चाहता क्या है यह आखिर मुझसे। अगर इसकी बीवी को शौक है इस - उससे प्यार करने का तो मैं क्या कर सकता हूँ। अगर इसने मुझसे कुछ कहा तो मैं सहन नहीं करूँगा। इस गुस्से से मुझमें खासा जोश आ गया... मैंने कॅफी समाप्त की और सोचा कि अब इस पर सीधे-सीधे वार करूँगा।

'देखिये! मुझे वैसे कुछ नहीं कहना। आपने अभी दो किस्से सुनाये और आपकी बात यह स्पष्ट लग गया है कि आप मुझे भी उस प्रोफेसर और लेखक की तरह ही रास्ते से हटाना चाहते हैं।

'यह आप क्या बोल रहे हैं।'

'जो भी बोल रहा हूँ वह साफ-साफ बोल रहा हूँ कि आपकी पत्नी में मेरी कोई रुचि नहीं। अगर आप दोनों में से किसी एक तारीफ करनी हो तो मैं आपकी पत्नी का प्रशंसक हूँ। वे निश्चित ही कला और साहित्य की समझ रखती है और यह जानती हैं कि कलाकार का सम्मान कैसे किया जाता है। मैं इसे अपना सौभाग्य समझता हूँ कि उनसे मेरी पहचान हुई। लेकिन आपके मन में मेरे प्रति संदेह है और मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण आप लोगों का सुखी जीवन बिखरे। मैं पति-पत्नी के बीच में कभी नहीं आना चाहता। कह दीजिए घर जाकर अपनी पत्नी से कि उस चित्रकार को भी रास्ते से हटा दिया है मैंने यह कहते ही मैं उठकर खड़ हो गया। अपने आपसे मुझे संतोष हुआ कि मैंने दोष का सारा टेबिल उसी के ऊपर उलटा दिया था। लेकिन मेरे वाक्यों से वह हतप्रभ हो गया। एक ही क्षण में वह उठा और कंध पर दोनों हाथ दबाकर मुझे बैठाने लगा। 'पहले आप नीचे बैठिये।'

'मैं नहीं बैठूँगा।'

'नहीं आपको बैठना होगा। मैं इस अंत को बर्दाश्त नहीं कर सकता।'

'क्या नहीं बर्दाश्त कर सकते हैं। आपने मुझ पर शक किया है। मैं चाहता तो इज्जत हतक का मुकदमा कर देता आप पर और कुछ नहीं आप जैसे साधारण आदमी के द्वारा इस तरह अपमानित होकर मैं आपको पीट भी सकता हूँ। मैं कोई कायर नहीं हूँ और अपराधी भी नहीं हूँ। शर्म आनी चाहिए आपको कि अपनी पत्नी के बारे में जिस-तिससे पब्लिक प्लेसेस में इस तरह की मूर्खतापूर्ण बातें करते रहते हैं आप।'

मेरे इस वाक्स से वह कंपकंपा उठा - 'मुझे आप क्षमा कर दीजिए। मेरी गलती हुई है। इसीलिए मैंने आपसे पहले ही कहा था कि आप मुझ पर नाराज मत होइये।'...

मैं बैठ गया लेकिन गुस्से की थरथराहट गई नहीं। मैंने उसकी तरफ देखना भी ठीक नहीं समझा।

'मुझे दुख है कि आपको कष्ट पहुँचा।'

'खैर मैं अब कभी आपके घर नहीं जाऊँगा। साथ ही यह भी कहना चाहता हूँ कि घर कोई लठैत नौकर रख लीजिये जो उनकी रक्षा किया करे।'

'आप गुस्से में हैं और मैं आपको बोलने से मना नहीं करूँगा। लेकिन घर जरूर आइये, एकदम अगर आपने आना बंद कर दिया तो मेरी मुश्किल हो जाएगी।'

'इसमें मुश्किल की क्या बात है।'

'मुश्किल तो है ही। वह यह समझेगी कि आपको मैंने आने से मना कर दिया और प्रतिक्रिया यह होगी उस पर कि वह खुद आपको ढूँढने आपके घर पहुँच जाएगी। उससे तो और भी टेंशन पैदा होगा।'

'आखिर आप चाहते क्या है?' मैंने मेज पर मुक्का माकर कहा - 'यह तो स्पष्ट है कि आपको यह लगा है कि मैं उसका प्रेमी हूँ।'...

'आपने मुझे गलत समझा।' वह बहुत धीरे बोला - 'मुझे शक केवल इस बात का है कि उसका वह प्रेमी कोई है जरूर और मैं उसे ढूँढ लेना चाहता हूँ। होता है कि वह प्रेंमी भी इतना सजग हो सकता है कि पति-पत्नी के बीच में न आना चाहे। आप नहीं जानते हैं अगर वह प्रेमी मिल जाये तो मैं क्या करता।'

मैंने उसकी तरफ गौर से देखा - ''उसके चेहरे पर अजीब सा जंगलीभाव मैंने देखा। नाक के ऊपर की तितली उसके चेहरे को और भी कठोर बनाये दे रही थी। उसकी आँखों में गुलाबी डोरे भी थे। मुझे उस पर दया भी आई कि अपनी पसंद की लड़की से शादी की तो खुद ही नींद हराम कर ली। इसे हर आदमी की शक्ल उसके भूतपूर्व प्रेमी जैसी लगती है और यह उसका खून करने पर उतारू है।'...

'मेरी यह खोज रुकेगी नहीं। मैं अपनी कोशिश भर यह चाहूँगा कि जैसे भी हो उसका पता चले। आप कल्पना नहीं कर सकते हैं कि वह हमेशा खिड़की से बाहर देखा करती है। आप पर मेरा सन्देह अधिक पक्का इसलिए भी हुआ कि आप स्वभाव से अक्खड़ लगे हैं।'

'लेकिन मैं वह व्यक्ति नहीं हूँ। आपका यह रंग-ढंग देखकर अगर कभी असली आदमी सामने भी आया तो भाग खड़ा होगा।'

'इसमें भागने की क्या बात है। वह कह सकता है मुझसे कि मैं आपकी पत्नी का पहला प्रेमी हूँ।'

मैं हल्के से हँस दिया। उस समय वह व्यक्ति बहुत भोला लग रहा था। कहा मैंने - 'यानी वह मौत खुद बुलाये। वैसे क्या सोचते हैं आप उस पर बार कर बैठेंगे छूरे-चाकू से या उसे किसी मुकदमे में फैसा देंगे?'

'अब आप मेरा अपमान कर रहे हैं। मैं तो सोच भी नहीं सकता कि किसी का खून किया भी जा सकता है।'

'क्यों नहीं किया जा सकता। आपके पास कारण साफ हैं कि आपकी पत्नी पर वह नजर डाले है।'

'मैं आपको बोलने नहीं दूँगा। सच मानिये! मैं इस तनाव से मुक्त होना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी के मन में कोई और व्यक्ति है। हम लोग साथ खाते हैं, उठते-बैठते हैं, प्यार करते हैं और सभी कुछ होता है लेकिन यह स्‍पष्‍ट है कि मैं उस पर थोपा हुआ आदमी हूँ। वह किसी दूसरे व्यक्ति में जितनी रुचि लेती है उससे आधी रुचि भी मुझमें नहीं लेती। हम लोग अपने बेडरूम में भी दो दुश्मनों की तरह सोते हैं और जब तब छापामारों की तरह एक-दूसरे पर हमला करते रहते हैं। मेरे गुस्से से आपको कोई हमदर्दी न हो लेकिन मेरी समस्या के प्रति जरूर होगी। मेरा सुख-चैन सब कुछ हराम है। मुझे हमेशा यह लगता रहता है कि मेरी पत्नी की आँखों में कोई और है।... यह भ्रम होता है तो मैं अपनी गलती भी मान लेता लेकिन यह सच है। अपने आपसे लड़ते हुए ही मैंने सोचा है कि किसी भी तरह उसे खोज लेना चाहिए।'

मैं उसके इस वाक्य से परेशान हुआ और यह लगा भी क्षण भर को कि जिसे हम चाहें और जिसके लिए कुछ उठा न रखें उसे सहन करना बड़ा मुश्किल ही होता होगा जो हमसे प्यार भी न कर पाये। मैं धीरे से बोला - 'लेकिन उस व्यक्ति को खोजकर और उसका खून करके आप नई उलझनों में फँस जाएँगे।'...

'किसने कहा कि मैं उसका खून करना चाहता हूँ। उसका प्रेमी आकर केवल कह दे मुझसे कि मैं ही वह आदमी हूँ।' वह बिल चुकाता बोला - 'मैं उसका सम्मान करूँगा और कह दूँगा कि तुम्हारी प्रेमिका मेरे पास है, तुम उससे अब शादी कर लो। मैं भी उसे ढोना नहीं चाहता कि उधर उसकी जिंदगी हराम इधर मैं चैन से न रह पाऊँ।' मुझे आश्चर्य हुआ कि यह जल्लाद आदमी ऐसी बात सोच भी सकता है।...

'आप बहुत अच्छे आदमी हैं। शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो आपकी तरह सोचता हो। पहले मैं यही समझा था कि आपको वहम की बीमारी है।'

'खैर देर से सही, आप मुझे समझे तो...।' वह रुँआसा होकर बोला-'मैं गलत हो सकता हूँ लेकिन बुरा कभी नहीं रहा।'

'मुझे आश्चर्य है कि आप जैसे पति को पाकर वे क्यों किसी और का ध्यान करती है।' वह उठते हुए बोला-'क्या यही बात आप उसे समझा सकेंगे ऐज ए फैण्ड। मैं आपका एहसान मानूँगा। देखिये आप इंकार नहीं करेंगे।'

'मैं कोशिश करूँगा।'

'कोशिश की क्या बात है आप कल दुपहर में आइये। उस समय मैं ऑफिस में रहूँगा। अगर आपकी बात उसने मान ली तो शाम को वह बदली हुई पत्नी होगी।'

मैं कुछ बोला नहीं, चुपचाप उसकी गाड़ी तक गया और बोला-'मैं यहाँ से चला जाऊँगा, मुझे बस मिल ही जाएगी।'

'लेकिन पहले वादा कीजिये। विश्वास मानिये बाद में कभी उसका असली प्रेमी सामने आ गया तो भी मैं रास्ते से हट जाऊँगा।'

'कैसी बातें करते हैं आप?' मैंने उससे जोर से हाथ मिलाया और बोला-'तो ठीक है मैं कल दुपहर आपके घर जाऊँगा।'

उसने कार स्टार्ट कर ली। सिर बाहर निकालकर मुझसे ओ.के. कह और चला गया। मैं घर लौटते रास्ते भर मन ही मन रिहर्सल करता रहा कि कल उसके घर जाकर मुझे जो वाक्य बोलना है वह निर्भय होकर बोलूँगा, परिणाम फिर चाहे जो हो।...


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हिंदी समय में रमेश बक्षी की रचनाएँ