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कहानी

कोई उजली शुरुआत
जयशंकर


इधर आपका ख्याल मेरे मन से जाता ही नहीं है। मैं आपके और सिर्फ आपके करीब रहना चाहता हूँ और आप कहीं भी नहीं है। आपको गुजरे हुए तीन महीने होने को आ रहे हैं। आप सर्दियों की एक रात में चले चले गए। माँ अपने कमरे में थी और मैं अपने कमरे में। सुबह उठने पर हमने जाना कि आप रात की किसी घड़ी में अपने आखिरी प्रवास पर निकल गए। इस यात्रा के पहले भी आपने किसी को कष्ट नहीं पहुँचाया। बहुत पहले जिस तरह बाहर जाने के लिए आप अपना ट्रंक और होल्डाल खुद तैयार कर लिया करते थे, अपने कपड़ों को इस्त्री किया करते थे, यात्रा के लिए किताबों को चुनते-रखते थे, उसी तरह उस रात भी मच्छरदानी आपने ही लगाई, बाथरूम की बत्ती बुझाई और गेट पर ताला लगाया था।

कितनी-कितनी बातें हैं जिन्हें आपसे कहना चाहता रहा था। आपके सामने बोलने के लिए एक वाक्य भी नहीं बना पाता था। आप कितना सँभल-सँभलकर बोलते रहे थे। आपके सामने कुछ भी गैर जरूरी, अर्थहीन कहना ठीक नहीं जान पड़ता था। आप खुद, अध्यापक होने के बावजूद सही बात के लिए उचित शब्द के लिए बोलते-बोलते रुक जाते थे। आपने अपना पैंसठ बरसों का जीवन किताबों के बीच, अंग्रेजी विज्ञान और गणित के साथ बिताया और ये तीनों ही विषय ऐसे रहे जिनमें मेरी कभी-भी दिलचस्पी नहीं बनी। मैं इन्हीं विषयों में कमजोर बना रहा। इन विषयों में मेरी असफलताएँ ही मेरी असफलताओं और आपकी निराशाओं का कारण बनती रही।

मैं, जयु, आपका इकलौता लड़का अपनी उम्र के पैंतीसवे बरस में भी आपकी पीड़ा और शर्म का कारण बना रहा। न मैं ठीक से पढ़ पाया और न ही मैंने किसी नौकरी से खुद को जोड़ा। आपकी मामूली पेंशन और सेवानिवृत्त होने के बाद भी आपका ट्यूशन लेना, हमारे परिवार का संबल बना रहा। आप अपना मकान नहीं बना सके। आप इलाज के लिए सरकारी डिसपेन्सरी में जाते रहे। आखिरी-आखिरी तक आप सब्जी-भाजी के लिए पैदल ही बाजार तक जाते रहे। आपके पास अपनी साईकिल तक नहीं रही। जिस ट्रांजिस्टर पर आप न्यूज सुनते रहे उसे आपकी एक छात्रा ने मेट्रिक में मेरिट में आने पर आपको उपहार में दिया था। आपने जो भी थोड़ा बहुत अपने ऊपर खर्च किया वह किताबों पर रहा, डिक्शनरियों और इनसायक्लोपिडिया पर रहा।

मुझे याद आता है। बहुत पहले मैं कुछ नशे की हालत में, देर रात में घर लौटता रहा था। आप मेज पर किताब रखे हुए बैठे रहते। टेबल लैंप की रोशनी में मैं खिड़की से आपको देखा करता। माँ दरवाजा खोलना नहीं चाहती थी। पर मैं दरवाजे पर दस्तकें देता और आप दरवाजा खोल देते। आपके मुँह से एक शब्द भी नाराजगी का नहीं निकलता। आप किसी पेड़ या पक्षी की प्रजाति के बारे में, किसी शब्द की उत्पत्ति के विषय में या नक्षत्रमंडल में घट रही किसी घटना को लेकर कुछ कहने लगते। फिर आप अपनी किताब पर लौटते और मैं रसोईघर में, जहाँ मेरा खाना रखा होता। आप अपनी बीमारी के दिनों में भी थी, सरकारी डिस्पेन्सरी की लंबी कतार में खड़े हुए, पंक्ति तोड़कर सामने आ रहे लोगों से कुछ भी नहीं कहा करते थे। मैं पड़ोस की बेंच पर बैठा हुआ कुढ़ता रहता और मैं कुछ कहता तो आप मना करने लगते। मैं लौटकर माँ को बताता। माँ भी आपके भोलेपन पर नाराज होती। गाइड्स लिख-लिखकर बहुत ज्यादा पैसा कमाने वाले दूसरे अध्यापकों का जिक्र करती। आपके कम ही छात्रों को ट्यूशन देने, उन पर इतना-इतना वक्त गँवाने ओैर इस तरह आपकी आर्थिक तंगी के लिए आपको ही जिम्मेवार बताने का सिलसिला शुरू करती। आप शांत बने रहते। अपनी मेज पर काँच के नीचे दवाइयों की परची रख रहे होते या पलंग पर लेटकर, अपनी आँखों में ड्राप डाल रहे होते। मैंने शायद ही कभी आपको अपने आपको बचाते हुए, अपने पक्ष में कुछ बोलते हुए सुना था।

मुझे आश्चर्य मिलता है और तसल्ली भी कि हमारे अभावों के बीच, अपनी बीमारी और माँ की आक्रामकता के बावजूद, आप शांत, जिम्मेवार, गंभीर और सहनशील ही बने रहे। उम्र के साथ-साथ आपकी सहनशीलता बढ़ती ही गई। आप चुनौतियों को झेलते रहे, आप तकलीफों से लड़ते रहे। और एक मैं था। जीवन की हर चुनौति से भागता हुआ। थकता और हारता हुआ। मैं आपका पुत्र न बन सका। आपका बड़प्पन हमेशा ही मुझे अपने छोटेपन की याद दिलाता रहा।

उस वक्त आप गाँव के एक स्कूल में पढ़ा रहे थे। वहीं आपने किसी से संस्कृत सीखना शुरू किया था। वहीं आपकी बागवानी में दिलचस्पी जागी और आप बाग-बगीचों के लिए जरूरी मेहनत में डूबने लगे। आपके कमजोर फेफड़ों से वह सब सहा नहीं गया। आप जनवरी में घर लौट आए। घर में आपके लिए न गरम बिस्तर था और न ही आपके गरम कपड़े। मैं बारह बरस का रहा होंगा। एक दिन मुझे बस और बैलगाड़ी से आपके गाँव जाना पड़ा। आपके बिस्तर और कपड़ों को लाने के लिए। गाँव के आपके उस कमरे में, खड़े हुए पहली बार मेरी आँखें आपके बारे में सोचते हुए डबडबाई थीं। आप कितना सह सकते थे। आप कितना ज्यादा संघर्ष कर सकते थे। शायद केरोसिन खत्म हो गया था और मैंने आपके कमरे के एक हिस्से में ईंटों से बने चूल्हे के नीचे अधजली लकड़ियाँ और राख और चूल्हे के ऊपर खिचड़ी से भरी देगची देखी थी। मैं उस बनजारे चूल्हे को कभी नहीं भूल सकूँगा।

उस वक्त ही मैंने पहली बार विदर्भ के किसी गाँव को, उसमें रह रहे लोगों के जीवन को पहली बार देखा था। यह उन्नीस सौ बहत्तर के आसपास के दिन थे और तब आज की तरह किसानों की आत्महत्याओं की खबरों का लंबा सिलसिला शुरू नहीं हुआ था। गाँव से लौटने के बाद से मैंने अपनी पढ़ाई पर खूब-खूब ध्यान देने, अपने लिए कमजोर विषयों पर अपनी पकड़ मजबूत करने, घर के छोटे-छोटे कामों में मदद करने का बेहतर प्रयत्न किया था। ये वे दिन रहे जब आपने मुझे महाभारत और रामायण की कहानियाँ सुनाना शुरू किया था और मेरे साथ-साथ माँ भी उन कहानियों को सुनने के लिए आपके कमरे में आती रही थी। फिर आप गाँव लौट गए। परीक्षाएँ करीब थीं। आपके जाते ही एक तरह के अकेलेपन ने मुझे घेर लिया। और मैं फिर अपनी पढ़ाई से दूर होता चला गया। पर यही वह वक्त भी रहा जब मैंने मिशनरी के एक प्रेस में बुक-बाइंडिंग के काम से कुछ पैसे कमाए थे। अम्मा और आपके लिए चादरे, तौलिये और रूमाल खरीदे थे। आपने ये चीजें स्वीकार तो कर ली थी लेकिन प्रेस में काम न करने, पढ़ाई पर ही ध्यान देने का आग्रह भी किया था। इन सब को घटे हुए भी बाइस-तेईस साल हो गए। इन बरसों में क्या-क्या नहीं हुआ। इन बरसों में आपने कितनी-कितनी मुसीबतों का सामना किया। बीमार होते रहे। अस्पताल में महीनों गुजारते रहे। आपके नौकरी से रिटायर होने का वक्त आ गया। मैं बेरोजगार ही बना रहा। मैं अपना परिवार न बसा सका। और इस तरह आधे-अधूरे कामों और टूटते-बिखरते सपनों के साथ हमारा परिवार अपनी जिंदगी जीता चला गया।

आपकी पिछली गर्मियाँ भी, आपके जीवन की आखिरी गर्मियाँ भी अस्पताल में ही बीती। मैं साइकिल से सुबह-शाम आपके वार्ड में आता रहा। वार्ड की अपनी पलंग पर लेटे हुए आप कुछ न कुछ पढ़ते रहते। एक दुपहर आप अपनी कमीज के फटे हिस्से को ठीक कर रहे थे।

'माँ ठीक कर देगी' मैंने टोका था

'मैं सीखना चाह रहा हूँ... आपने कहा था... बहुत-बहुत पहले, मेरे बचपन के दिनों में, आप घर के कपड़ों को इस्त्री किया करते थे। जूते-चप्पलों को पालिश किया करते थे। कभी-कभार मैंने आपको आँगन में पेड़-पौधों को लगाने की कोशिश करते हुए भी देखा था।

'आपने पड़ोस में पेड़ के होने की बात ही कुछ और है' आप कहा करते थे।

'पहले घर तो अपना हो' माँ उलाहना देती।

'घर तो घर है, चाहे अपना हो या किराये का... पेड़ किसी का नहीं होता।'

'आपसे कौन जीत सकता है' माँ चिढ़ाने लगती।

और आप? आपको किसी से भी कोई भी शिकायत नही रहती। आप जितना मिलता, जो भी मिलता उससे अपने आपको सहजता से सँवारते रहते।

'आपके फादर कुछ अलग ही हैं' वह साँवली नर्स कहती।

'क्या उनसे कोई भूल हो गई' मैं पूछता।

'मुझसे भूल हो गई।'

'कैसी भूल?'

'वे इतने बड़े इनसान हैं... इसे मैं इतने दिनों के बाद जान रही हूँ।'

उसी साँवली, उड़िया भाषी नर्स ने मुझमें दिलचस्पी लेनी शुरू की थी। वह अपने शहर में अपनी बिटिया के साथ रह रही थी। शायद तलाकशुदा थी या विधवा। यह जान सकूँ वहाँ तक हम पहुँच नहीं पाए थे। मेरे पैंतीस बरस की उम्र में भी बेरोजगार होने की बात ने उसे निराश किया होगा। मुझे अस्पताल की बेंच पर किताबें पढ़ते हुए देखती रही थी और सोचती रही थी कि मैं भी आपकी तरह अध्यापन करता हूँ। वहीं अस्पताली बेंच पर मैंने कुछ कविताएँ भी लिखी थी और पहले उस नर्स को और बाद में आपको पढ़कर सुनाई थी।

'तुमको इनको बार-बार लिखना चाहिए' आपने कहा था।

'एक ही कविता को' मैं चौंका था।

'शायद कविता बड़ी मेहनत माँगती है।'

'कैसी मेहनत?'

'घर में कुछ किताबें कविताओं की भी हैं...

तुम उन्हें पढ़ सकते हो।'

मुझे कौन सा कवि होना था? पर आपकी हिदायत को अनसुना भी नहीं करना था।

मुझे अस्पताली दुपहरों का खालीपन सताता था। अस्पताल के सामने ही सिनेमाघर था और एक दो बार मैंने वहीं फूहड़ किस्म की, अत्यंत अश्लील फिल्में भी देखी थीं। वहाँ कुछ दुपहरें उस नर्स से बतियाते हुए, भुवनेश्वर के उसके जीवन के बारे में सुनते हुए भी बीती थी। जानना चाहो तो हर आदमी का जीवन कितना दिलचस्प होता है और कितना कठिन भी। उड़ीसा की वह लड़की किसी बड़ी प्राइवेट कंपनी की नौकरी की लालच में हमारे शहर आई थी। किसी ने उसे छला था। कुछ महीनों तक उससे अपना दिल बहलाता रहा था। बाद में वह लड़की नर्स बन गई। मैं उसकी लड़की के पिता के बारे में कभी नहीं जान सका। जान पाता तो क्या उस नर्स और उसकी बिटिया की जिंदगी के किसी त्रासद आयाम को देख नहीं लेता था?

बाबा! मैं आपको ही कहाँ जान सका? अब आप नहीं रहे है तब आप पर मन इतना ज्यादा लौटता रहा है, इतना ज्यादा ठहरता रहा है। मैं आपके जीवन की मामूली से मामूली घटना को भी पढ़ना-समझना चाह रहा हूँ। मुझे आपकी चाल याद आती है और आपके हँसने की आवाज भी सुनाई देती है। मुझे आपका मेज के करीब पढ़ते हुए बैठे रहना याद आता है और अपने छात्रों को घर की दीवार पर टँगे ब्लैक-बोर्ड पर कुछ समझाना। आपको याद किए जाने का सिलसिला कुछ इतना गहराया है कि आपकी मृत्यु के पहले के दो घंटे, उस वक्त की आपकी बैचेनी, उस वक्त की आपकी खामोशी मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रही है। क्या आप जान गए थे कि कार्तिक की अमावस्या की वह रात आपकी आखिरी रात है? क्यों उस दुपहर में आप माँ को भीष्म पितामह के अस्थि विसर्जन के वक्त में गंगा के विषाद के बारे में बता रहे थे? उसी शाम आपने मुझे पास बुलाकर मेरी कमीज की खुली बटनों को अपने हाथ से लगाया था।

मैं वहीं हूँ जहाँ आप रह रहे थे। यहाँ नहीं रहूँगा तब शायद आपको छोड़ने की, आपसे अलग होने की शुरुआत कर सकूँगा। यहाँ कितना कुछ है जो आपकी याद दिलाता चला जाता है। सिर्फ आपकी देह नहीं है किंतु आपका सब कुछ है। आपका सब कुछ कितना ज्यादा-ज्यादा है। मैं फलों की किसी गुमठी पर लटके हुए अनार देखता हूँ और आपको अनार का रस पीते हुए पाता हूँ। कहीं किसी तार पर किसी के कपड़े और चादरें सूखती रहती है और मुझे आपका अपने बिस्तर की सलवटों को ठीक करते रहना याद आता है। माँ साथ में नहीं होती, इस तरह हताश और हताहत नहीं रहती तो मैं कुछ दिनों के लिए उस मकान, उस मुहल्ले और उस शहर से निजात पा लेता जहाँ आप रहते आए थे। दूसरा शहर, दूसरा परिवेश, शायद मुझे आपसे कुछ दूर भी ले जाता। माँ सिर्फ उदास ही नहीं, बीमार भी रहने लगी है।

आपका जाना हम दोनों को जीवन में कितनी-कितनी खाली जगहें, कितनी ज्यादा चुप्पियाँ, कितना सारा अवसाद छोड़ गया है। आप थे तो घर में जिंदगी की एक तरह पहचानी-सी धुन बजती रहती। एक तरह का जीवन का पैटर्न खड़ा रहता। घटनाएँ एक निश्चित, तयशुदा वक्त पर घटती रहतीं। सुबह-सुबह देगची में दूध उबलता। आप हमारे नहाने के लिए पानी की बड़ी सी देगची को चूल्हे पर चढ़ाते। नौ बजे के आसपास आपके छात्र आ जाते। दोपहर में आप अपने ट्रांजिस्टर पर न्यूज सुनते। शाम का आपका वक्त अखबार पढ़ने को होता और इस तरह, घर अपनी निरंतरता में खड़ा रहता, बना रहता। अब माँ बीमार है और मैं कभी भी अपने रुटीन में समय का पाबंद नहीं रहा हूँ। इससे घर का अपना स्वभाव टूटा है। घर की अपनी दिनचर्या लड़खड़ाई है।

'घर की चीजें निश्चित जगहों पर रहनी चाहिए' आप कहते आए थे। आप मेरी कमीजों को कुसिर्यों और दरवाजों से हटाकर, अलगनी में टाँगते रहे थे। माँ अखबार को कहीं भी छोड़ देती और आप पुराने अखबारों को एक जगह पर रखने का प्रयत्न करते रहते। आपके कमरे में आ रही चिट्ठियों को रखने का एक जूट का बैग टँगा रहता। बीच-बीच में आप उस बैग से गैर जरूरी पत्रों, बिलों आदि को फाड़कर आग में झोंकते रहे थे। आप व्यवस्था, तरतीब और सुरुचि के इतने आदि बने रहे और मैं कभी भी चीजों को ढंग से रखने, उनको सँभालने-सँवारने का अभ्यस्त नहीं रहा। कोई तो ऐसी बात मुझमें होती कि मैं कहीं से भी आपका पुत्र होने का हक हासिल कर पाता। जिन दुपहरों में मैं कविताएँ लिख रहा था, उस साँवली नर्स से संवाद बना रहा था, उन दुपहरों में यह भी मेरे साथ रहता रहा था कि कविताएँ ठीकठाक बन पाती है, बाबा को अच्छी लगती है तो यह सब मुझे आपके करीब ले जाएगा। मुझे आपसे जुड़ने का अवकाश प्रदान करेगा। मुझे कुछ ऊपर उठने, अपने से बाहर जाने का अवसर दे सकेगा। पर वहाँ भी मेरे दुर्भाग्य ने मेरा दामन नहीं छोड़ा। मैं ठीकठाक कविताएँ नहीं लिख पाया। आपने कितना ठीक कहा था कि एक भी अच्छी और सच्ची कविता लिखना उतनी सरल बात नहीं है जितना मैं समझता रहा था। कविता का अपना जीवन था और वह उसे कवि के जीवन से सींचना-सँवारना चाहती थी। तभी मैंने आपकी किताबों में से निराला और रवींद्रनाथ ठाकुर की कविताएँ भी पढ़ी थी। निराला को आप पसंद करते रहे होंगे।

आपकी रैक में निराला की किताबें पुरानी पीली पड़ चुकी थी। उन पर हाशिये पर आपके फाउंटन पेन से लिखे हुए शब्द थे। अब किसी दिन आपको याद करने के इन दिनों में से किसी एक दिन, मैं निराला की उन किताबों को दुबारा पढ़ने की शुरुआत करूँगा। एक नई शुरुआत। आपको भी पढ़ने की एक दूसरी तरह की शुरुआत। कोई ऐसी शुरुआत, जिसे आप मेरे भीतर देखना चाहते रहे थे। जिसकी आप प्रतीक्षा करते रहे थे। बाबा। अब मैं जरूर ही, सचमुच में ऐसी किसी शुरुआत से अपने आपको पूरी तरह जोड़ना चाहूँगा। यही मेरे लिए जरूरी रहेगा। शायद इसी तरह मैं अपने आपको पा सकूँगा। कितना अजीब है कि आप अपनी आखिरी साँस तक मेरे पिता होने का प्रयत्न करते रहे और मैंने कभी भी आपका पुत्र होने की जरा-सी भी कोशिश नहीं की।

अब हमने आपकी उस तस्वीर को पहले कमरे में टाँग दिया है जिसमें आप बादाम के पेड़ के नीचे, खड़े हुए हैं। माँ बताती है कि यह तस्वीर गर्मियों के दिनों की है। इन गर्मियों में ही आपने अध्यापन शुरू किया था और पहली बार एक मकान किराये से लिया था। अपनी कमाई से पहला किराया चुकाने, अपने पैसों से सिलिंग फैन खरीदने से आप खुश हो रहे थे और आपके एक मित्र ने यह तस्वीर खींची थी। शायद आपकी यही एक तस्वीर हमारे पास है। पर वैसी कितनी ही तस्वीरें हैं आपकी हमारे भीतर। ऐसी हर तस्वीर में आप कितने जीवंत हैं। कितनी ज्यादा निष्ठा और जिज्ञासा से भरे हुए। कितना-कितना जीवन और कितनी सारी चुनौतियाँ लिए हुए।

बाबा! कभी मुझे बताना कि ऐसा क्यों होता है, ऐसा क्यों होता रहा है कि हमें आदमी की परख, आदमी की पहचान उसके न रहने पर ही क्यों होती है? हम क्यों नहीं किसी को उसके जीवित रहते ही समझ पाते हैं? मुझे पूरी उम्मीद है कि मेरा यह सवाल आप तक पहुँचेगा। मेरे सवाल ही नहीं, मेरी प्रार्थनाएँ भी आप तक पहुँचेगी। मैं आपके लिए प्रार्थना करना चाहूँगा। मैं आपके लिए कुछ न कुछ करना चाहूँगा। कुछ ऐसा, जो मुझे आपका पुत्र कहलाने का हौंसला दे सके। मैं भावुक नहीं हो रहा हूँ। न ही यह आपके न होने के बाद के अकेलेपन का प्रलाप है। इसे आपके अश्रय, असफल बेटे का एकालाप भी न समझे। यह सब कुछ, ऐसा सब कुछ में बहुत पहले से सोचता रहा था।

आपको हमारे इलाके की मेसोनिक लॉज की बरसों पुरानी, लाल दीवारों की इमारत की याद होगी। उसके आँगन में शीशम के पेड़ थे। शाम के अँधेरे में भी वहाँ कोई जाता नहीं था। शायद उसे लोग प्रेत का इलाका समझा करते थे। वहाँ के जंगली एकांत में मैं अपनी शामें बिताया करता था। मैं अपने बारे में, मेरे अपने परिवार और परिवेश से रिश्तों के बारे में सोचता रहता था। मैं खुद को अपने पास-पड़ोस से कटा हुआ पाता था और यह बात भी मुझे पराजय के पीले प्रदेश में ले जाती थी। इन दिनों में ही माँ का घर में आने वाले ग्रामीण, बूढ़े और गरीब लोगो से संवाद, उनके जीवन को जानने के माँ के प्रयत्न, माँ का गाँव से अपनी चीजों को बेचने के लिए आने वाले लोगों की तकलीफों को सुनना, मुझे एक तरह की नई दुनिया देता रहा था।

'इनकी कौन सुनता है' माँ कहती।

'सुनने से क्या हो जाता है' मैं कहता।

'इन्हें लगता तो है कि किसी की इनके जीवन में दिलचस्पी है... इससे इन लोगों को तसल्ली भी मिलती होगी।'

यह ठीक जान पड़ता था। आप बारकरी संप्रदाय के बूढ़े बैरागी का पूरा भजन सुनते थे। उसे ठीकठाक पैसा भीख में देते थे। माँ गाँव से मसाला बेचने के लिए आते बूढ़े और सब्जी और मछली ले आने वाली औरतों को सुनती थी। अपने परिवेश से आप दोनों ही कहीं न कहीं जुड़े रहते। लोगों से मिलते रहते। बाहर के लोग आप दोनों से मिलने के लिए आते थे। मैं ही था कि जिससे मिलने कभी भी, कोई भी नहीं आता था। मेरे कभी भी दोस्त नहीं बन सके। लाइब्रेरी हो या बार, मैं अपनी मेज पर अकेले ही पहुँचता रहा। शायद इसीलिए भी उस साँवली नर्स के साथ बातचीत की वे दुपहरें मेरे लिए इतनी अच्छी दुपहरें बनी थी।

अब मैं अपने आप से बाहर निकलना चाह रहा हूँ। अपनी ही कैद से खुद को मुक्त करने की लालसा लिए हूँ। शायद इससे मैं कोई नई शुरुआत कर सकूँ। कोई ऐसी उजली शुरुआत जो मुझे आप तक ले जाएगी। आपकी अनुपस्थिति के अहसास से मुक्त करेगी। बाबा। मैं कोशिश करूँगा। मुझे विश्वास है कि मेरी इन कोशिशों में मुझे आपका साथ मिलेगा। आपका साथ जिसका मैं स्वप्न देखता रहा या और स्वप्न देखता रहूँगा। आपका साथ मेरी शुरुआत को उथली शुरुआत नहीं होने देगा। आपके सानिध्य में मैं अपनी एक उजली शुरुआत कर सकूँगा। शुरुआत, जो उम्मीदें देती हैं और इस तरह जिंदगी और जीने के लिए जरूरी निष्ठा, जीवन के लिए जरूरी जिजीविषा।


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