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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


आजाद तो साइबेरिया की तरफ रवाना हुए, इधर खोजी ने दरख्त पर बैठे-बैठे अफीम की डिबिया निकाली। वहाँ पानी कहाँ? एक आदमी दरख्त के नीचे बैठा था। आपने उससे कहा - भाईजान, जरा पानी पिला दो। उसने ऊपर देखा, तो एक बौना बैठा हुआ है। बोला - तुम कौन हो? दिल्लगी यह हुई कि वह फ्रांसीसी था। खोजी उर्दू में बात करते थे, वह फ्रांसीसी में जवाब देता था।

खोजी - अफीम घोलेंगे मियाँ! जरा सा पानी दे डालो भाई!

फ्रांसीसी - वाह, क्या सूरत है! पहाड़ पर न जा कर बैठो?

खोजी - भई वाह रे हिंदोस्तान! वल्लाह, इस फसल में सबीलों पर पानी मिलता है, केवड़े का बसा हुआ। हिंदू पौसरे बैठाते हैं और तुम जरा पानी भी नहीं देते।

फ्रांसीसी - कहीं ऊपर से गिर न पड़ना।

खोजी - (इशारे से) अरे मियाँ पानी-पानी!

फ्रांसीसी - हम तुम्हारी बात नहीं समझते।

खोजी - उतरना पड़ा हमें! अबे, ओ गीदी, जरा सा पानी क्यों नहीं दे जाता? क्या पाँवो में मेहँदी गिर जायगी?

फ्रांसीसी ने जब अब भी पानी न दिया तो खोजी ऊपर से पत्ते तोड़-तोड़ फेंकने लगे। फ्रांसीसी झल्ला कर बोला - बचा, क्यों शामतें आई हैं। ऊपर आ कर इतने घूँसे लगाऊँगा कि सारी शरारत निकल जायगी। खोजी ने ऊपर से एक शाख तोड़ कर फेंकी। फ्रांसीसी ने इतने ढेले मारे कि खोजी की खोपड़ी जानती होगी। इतने में एक तुर्क आ निकला। उसने समझा-बुझा कर खोजी को नीचे उतारा। खोजी ने अफीम घोली, चुस्की लगाई और फिर दरख्त पर जा कर एक मोटी शाख से टिक कर पिनक लेने लगे। अब सुनिए कि तुर्कों और रूसियों में इस वक्त खूब गोले चल रहे थे। तुर्कों ने जान तोड़ कर मुकाबिला किया, मगर फ्रांसीसी तोपखाने ने उनके छक्के छुड़ा दिए और उनका सरदार आसफ पाशा गोली खा कर गिर पड़ा। तुर्क तो हार कर भाग निकले। रूसियों की एक पलटन ने इस मैदान में पड़ाव डाला। खोजी पिनक से चौंक कर यह तमाशा देख रहे थे कि एक रूसी जवान की नजर उन पर पड़ी। बोला-कौन? तुम कौन हो? अभी उतर आओ।

खोजी ने सोचा, ऐसा न हो कि फिर ढेले पड़ने लगें। गीचे उतर आए। अभी जमीन पर पाँव भी न रखा था कि एक रूसी ने इनको गोद में उठा कर फेंका तो धम से जमीन पर गिर गए।

खोजी - ओ गीदी, खुदा तुमसे और तुम्हारे बाप से समझे!

एक रूसी - भई, यह पागल है कोई।

दूसरा - इसको फौज के साथ रखो। खूब दिल्लगी रहेगी।

रूसियों ने कई तुर्क सिपाहियों को कैद कर लिया था। खोजी भी उन्हीं के साथ रख दिए गए। तुर्कों को देख कर उन्हें जरा तसकीन हुई। एक तुर्क बोला - तुम तो आजाद के साथ आए थे न? तुम उनके कौन हो?

खोजी - मेरा लड़का है जी, तुम नौकर बनाते हो।

तुर्क - ऐं, आप आजाद पाशा के बाप हैं!

खोजी - हाँ, हाँ, तो इसमें ताज्जुब की कौन बात है। मैंने ही तो आजाद को मार-मार कर लड़ना सिखाया।

तुर्कों ने खोजी को आजाद का बाप समझ कर फौजी कायदे से सलाम किया। तब खोजी रोने लगे - अरे यारो, कहीं से तो हमें लड़के की सूरत दिखा दो। क्या तुमको इसी दिन के लिए पाल-पोस कर इतना बड़ा किया था? अब तुम्हारी माँ को क्या सूरत दिखाऊँगा?

तुर्क - आप ज्यादा बेचैन न हो। आजाद जरूर छूटेंगे।

खोजी - भई, मेरी इतनी इज्जत न करो। नहीं तो रूसियों को शक हो जायगा कि यह आजाद पाशा के बाप हैं। तब बहुत तंग करेंगे।

तुर्क - खुदा ने चाहा हो अफसर लोग आपको जरूर छोड़ देंगे।

खोजी - जैसी मौला की मरजी!


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