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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


बड़ी बेगम का बाग परीखाना बना हुआ है। चारों बहनें रविशों में अठखेलियाँ करती हैं। नाजो-अदा से तौल-तौल कर कदम धरती हैं। अब्बासी फूल तोड़-तोड़ कर झोलियाँ भर रही है। इतने में सिपहआरा ने शोखी के साथ गुलाब का फूल तोड़ कर गेतीआरा की तरफ फेंका। गेतीआरा ने उछाला तो सिपहआरा की जुल्फ को छूता हुआ नीचे गिरा। हुस्नआरा ने कई फूल तोड़े और जहाँनारा बेगम से गेंद खेलने लगीं। जिस वक्त गेंद फेंकने के लिए हाथ उठाती थीं, सितम ढाती थीं। वह कमर का लचकाना और गेसू का बिखरना, प्यारे-प्यारे हाथों की लोच और मुसकिरा-मुसकिरा कर निशाने बाजी करना अजब लुत्फ दिखाता था।

अब्बासी - माशा-अल्लाह, हुजूर किस सफाई के साथ फेंकती हैं!

सिपहआरा - बस अब्बासी, अब बहुत खुशामद की न लो। क्या जहाँनारा बहन सफाई से नहीं फेंकतीं? बाजी जरी झपटती ज्यादा हैं। मगर हमसे न जीत पाएँगी। देख लेना।

अब्बासी - जिस सफाई से हुस्नआरा बेगम गेंद खेलती हैं, उस सफाई से जहाँनारा बेगम का हाथ नहीं जाता।

सिपहआरा - मेरे हाथ से भला फूल गिर सकता है! क्या मजाल!

इतने में जहाँनारा बेगम ने फूल को नोच डाला और उफ कह कर बोलीं - अल्लाह जानता है, हम तो थक गए।

सिपहआरा - ऐ वाह, बस इतने में ही थक गईं? हमसे कहिए, शाम तक खेला करें।

अब सुनिए कि एक दोस्त ने मिरजा हुमायूँ फर को जा कर इत्तिला दी कि इस वक्त बाग में परियाँ इधर से उधर दौड़ रही हैं। इस वक्त की कैफियत देखने काबिल है। शाहजादे ने यह खबर सुनी तो बोले - भई, खुशखबरी तो सुनाई, मगर कोई तदबीर तो बताओ। जरा आँखें ही सेंक लें। हाँ, हीरा माली को बुलाओ। जरा देखें।

हीरा ने आ कर सलाम किया।

शाहजादा - भई, इस वक्त किसी हिकमत से अपने बाग की सैर कराओ।

हीरा - खुदावंद, इस वक्त तो माफ करों, सब वहीं हैं।

शाहजादा - उल्लू ही रहे, अरे मियाँ, वहाँ सन्नाटा होता तो जा कर क्या करते! सुना है, चारों परियाँ वहीं हैं! बाग परिस्तान हो गया होगा! हीरा, ले चल, तुझे अपने नारायन की कसम! जो माँगे, फौरन दूँ।

हीरा - हुजूर ही का नमक खाता हूँ या किसी और का? मगर इस वक्त मौका नहीं है।

शाहजादा - अच्छा, एक शेर लिख दूँ, वहाँ पहुँचा दो।

यह कह कर शाहजादा ने यह शेर लिखा -
छकाया तूने आलम को साकी जामे-गुलगूँ से,
हमें भी कोई एक सागर, हम भी हैं उम्मेदवारों में।

हीरा यह रुक्का ले कर चला। शाहजादे ने समझा दिया कि सिपहआरा को चुपके से दे देना। हीरा गया तो देखा कि अब्बासी और बूढ़ी महरी में तकरार हो रही है। सुबह के वक्त अब्बासी हुस्नआरा के लिए कुम्हारिन के यहाँ से दो झँझरियाँ लाई थी। दाम एक आना बताया। बड़ी बेगम ने जो यह झँझरियाँ देखीं तो महरी को हुक्म दिया कि हमारे वास्ते भी लाओ। महरी वैसी ही झँझरियाँ दो आने की लाई। इस वक्त अब्बासी डींग मारने लगी कि मैं जितनी सस्ती चीज लाती हूँ, कोई दूसरा भला ला तो दे। महरी और अब्बासी में पुरानी चश्मक थी। बोली - हाँ भई, तुम क्यों न सस्ती चीज लाओ! अभी कमसिन हो न?

अब्बासी - तुम भी तो किसी जमाने में जवान थीं। बाजार भर को लूट लाई होगी। मेरे मुँह न लगना।

महरी - होश की दवा कर छोकरी! बहुत बढ़-बढ़ कर बातें न बना मुई! जमाने भर की अवारा! और सुनो?

अब्बासी - देखिए हुजूर, यह लाम काफ जबान से निकालती हैं। और मैं हुजूर का लिहाज करती हूँ। जब देखो, ताने के सिवा बात ही नहीं करतीं।

महरी - मुँह पकड़ कर झुलस देती मुरदार का!

अब्बासी - मुँह झुलस अपने होतों-सोतों का।

महरी - हुजूर, अब हम नौकरी छोड़ देंगे। हमसे ये बातें न सुनी जायँगी।

अब्बासी - ऐं, तुम तो बेचारी नन्हीं हो। हमीं गरदन मारने के काबिल हैं! सच है, और क्या!

सिपहआरा - सारा कुसूर महरी का है। यही रोज लड़ा करती हैं अब्बासी से।

महरी - ऐ हुजूर, पीच पीं हजार गेमत पाई! जो मैं ही झगड़ालू हूँ तो बिस्मिल्लाह, हुजूर लौंडी को आजाद कर दें। कोई बात न चीत, आप ही गालीगुफ्ते पर आमादा हो गई।

जहाँनारा - 'लड़ेंगे जोगी-जोगी और जायगी खप्पड़ों के माथे।' अम्माँजान सुन लेंगी तो हम सबकी खबर लेंगी।

अब्बासी - हुजूर इनसाफ से कहें। पहल किसी तरफ से हुई।

जहाँनारा - पहल तो महरी ने की। इसके क्या मानी कि तुम जवान हो इससे सस्ती चीज मिल जाती है। जिसको गाली दोगी, वह बुरा मानेगी ही।

हुस्नआरा - महरी, तुम्हें यह सूझी क्या? जवानी का क्या जिक्र था भला!

अब्बासी - हुजूर, मेरा कसूर हो तो जो चोर की सजा वह मेरी सजा।

महरी - मेरे अल्लाह, औरत क्या, बिस की गाँठ है।

अब्बासी - जो चाहो सो कह लो, मैं एक बात का भी जवाब न दूँगी।

महरी - इधर की उधर और उधर की इधर लगाया करती है। मैं तो इसकी नसनस से वाकिफ हूँ!

अब्बासी - और मैं तो तेरी कब्र तक से वाकिफ हूँ!

महरी - एक को छोड़ा, दूसरे को बैठी, उसको खाया, अब किसी और को चट करेगी। और बातें करती है!

सत्तर... के बाद कुछ कहने ही को थी कि अब्बासी ने सैकड़ों गालियाँ सुनाईं। ऐसी जामे से बाहर हुई कि दुपट्टा एक तरफ और खुद दूसरी तरफ। हीरा माली ने बढ़ कर दुपट्टा दिया तो कहा - चल हट, और सुनो! इस मुए बूढ़े की बातें! इस पर कहकहा पड़ा। शोर सुनते ही बड़ी बेगम साहब लाठी टेकती हुई आ पहुँची, मगर यह सब चुहल में मस्त थीं। किसी को खबर भी न हुई।

बड़ी बेगम - यह क्या शोहदापन मचा था? बड़े शर्म की बात है। आखिर कुछ कहो तो? यह क्या धमाचौकड़ी मची थी? क्यों महरी, यह क्या शोर मचा था?

महरी - ऐ हुजूर, बात मुँह से निकली और अब्बासी ने टेंटुआ लिया। और क्या बताऊँ।

बड़ी बेगम - क्यों अब्बासी, सच-सच बताओ! खबरदार!

अब्बासी - (रो कर) हुजूर!

बड़ी बेगम - अब टेसुए पीछे बहाना, पहले हमारी बात का जवाब दो।

अब्बासी, हुजूर, जहाँनारा बेगम से पूछ लें, हमें आवारा कहा, बेसवा कहा, कोसा, गालियाँ दी, जो जबान पर आया। कह डाला। और हुजूर, इन आँखों की ही कसम खाती हूँ, जो मैंने एक बात का भी जवाब दिया हो। चुप सुना की।

बड़ी बेगम - जहाँनारा, क्या बात हुई थी? बताओ साफ-साफ।

जहाँनारा - अम्माँजान, अब्बासी ने कहा कि हम दो झँझरियाँ एक आने को लाए और महरी ने दो आने दिए, इसी बात पर तकरार हो गई।

बड़ी बेगम - क्यों महरी, इसके क्या माने? क्या जवानों को बाजार वाले मुफ्त उठा देते हैं? बाल सफेद हो गए, मगर अभी तक अवारापन की बू नहीं गई। हमने तुमको मौकूफ किया, महरी! आज ही निकल जाओ।

इतने में मौका पा कर हीरा ने सिपहआरा को शाहजादे का खत दिया। सिपहआरा ने पढ़ कर यह जवाब लिखा - भई, तुम तो गजब के जल्दबाज हो। शादी-ब्याह भी निगोड़ा मुँह का नेवाला है! तुम्हारी तरफ से पैगाम तो आता ही नहीं।

हीरा खत ले कर चल दिया।


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