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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


कोठे पर चौका बिछा है और एक नाजुक पलंग पर सुरैया बेगम सादी और हलकी पोशाक पहने आराम से लेटी हैं। अभी हम्माम से आई हैं। कपड़े इत्र में बसे हुए हैं। इधर-उधर फूलों के हार और गजरे रखे हैं, ठंडी-ठंडी हवा चल रही है। मगर तब भी महरी पंखा लिए खड़ी है। इतने में एक महरी ने आ कर कहा - दारोगा जी हुजूर से कुछ अर्ज करना चाहते हैं। बेगम साहब ने कहा - अब इस वक्त कौन उठे। कहो, सुबह को आएँ। महरी बोली - हुजूर कहते हैं, बड़ा जरूरी काम है। हुक्म हुआ कि दो औरतें चादर ताने रहें और दारोगा साहब चादर के उस पार बैठें। दारोगा साहब ने आ कर कहा - हुजूर, अल्लाह ने बड़ी खैर की। खुदा को कुछ अच्छा ही करना मंजूर था। ऐसे बुरे फँसे थे कि क्या कहें!

बेगम - अरे, तो कुछ कहोगे भी?

दारोगा - हुजूर, बदन के रोएँ खड़े होते हैं।

इस पर अब्बासी ने कहा - दारोगा जी, घास तो नहीं खा गए हो! दूसरी महरी बोली - हुजूर, सठिया गए हैं। तीसरी ने कहा - बौखलाए हुए आए हैं। दारोगा साहब बहुत झल्लाए। बोले - क्या कदर होती है, वाह! हमारी सरकार तो कुछ बोलती ही नहीं और महरियाँ सिर चढ़ी जाती हैं। हुजूर इतना भी नहीं कहतीं कि बूढ़ा आदमी है। उससे न बोलो।

बेगम - तुम तो सचमुच दीवाने हो गए हो। कहना है, वह कहते क्यों नहीं?

दारोगा - हुजूर, दीवाना समझें या गधा बनाएँ, गुलाम आज काँप रहा हैं। वह जो आजाद है, जो यहाँ कई बार आए भी थे, वह बड़े मक्कार, शाही चोर, नामी डकैत, परले सिरे के बगड़ेबाज, काले जुआरी, धावत शराबी, जमाने भर के बदमाश, छटे हुए गुर्गे, एक ही शरीर और बदजात आदमी हैं। तूती का पिंजड़ा ले कर वही औरत के भेस में आया था। आज सुना, किसी नवाब के यहाँ भी गए थे। वह आजाद जिनके धोखे में आप हैं, वह तो रूम गए हैं। इनका उनका मुकाबिला क्या! वह आलिम-फाजिल, यह बेईमान-बदमाश। यह भी उसने गलत कहा कि हुस्नआरा बेगम का ब्याह हो गया।

बेगम - दारोगा, बात तो तुम पते की कहते हो, मगर ये बातें तुमसे बताईं किसने?

दारोगा - हुजूर, वह चंडूबाज जो आजाद मिरजा के साथ आया था। उसी ने मुझसे बयान किया।

बेगम - ऐ है, अल्लाह ने बहुत बचाया।

महरी - और बातें कैसी चिकनी-चुपड़ी करता था?

दारोगा साहब चले गए तो बेगम ने चंडूबाज को बुलाया। महरियों ने परदा करना चाहा तो बेगम ने कहा - जाने भी दो। बूढ़े खूसट से परदा क्या?

चंडूबाज - हुजूर, कुछ ऊपर सौ बरस का सिन है।

बेगम - हाँ, आजाद मिरजा का तो हाल कहो।

चंडूबाज - उसके काटे का मंतर ही नहीं।

बेगम - तुमसे कहाँ मुलाकात हुई?

चंडूबाज - एक दिन रास्ते में मिल गए।

बेगम - वह तो कैद में थे! भागे क्योंकर?

चंडूबाज - हुजूर, यह न पूछिए, तीन-तीन पहरे थे। मगर खुदा जाने, किस जादू-मंतर से तीनों को ढेर कर दिया और भाग निकला।

बेगम - अल्लाह बचाए ऐसे मूजी से।

चंडूबाज - हुजूर, मुझे भी खूब सब्जबाग दिखाया।

महरी - अल्लाह जानता है, मैं उसकी आँखों से ताड़ गई थी कि बड़ा नटखट है।

चंडूबाज - हुजूर, यह कहना तो भूल ही गया था कि कैद से भाग कर थानेदार के मकान पर गया और उसे भी कत्ल कर दिया।

बेगम - सब आदमियों में से निकल भागा?

महरी - आदमी है कि जिन्नात?

अब्बासी - हुजूर, हमें आज डर मालूम होता है। ऐसा न हो, हमारे यहाँ भी चोरी करे।

चंडूबाज रुख्सत हो कर गए तो सुरैया बेगम सो गईं। महरियाँ भी लेटीं, मगर अब्बासी की आँखों में नींद न थी। मारे खौफ के इतनी हिम्मत भी न बाकी रही कि उठ कर पानी तो पीती। प्यास से तालू में काँटे पड़े थे। मगर दबकी पड़ी थी। उसी वक्त हवा के झोंकों से एक कागज उड़ कर उसकी चारपाई के करीब खड़खड़ाया तो दम निकल गया!

सिपाही ने आवाज दी - 'सोनेवाले जागते रहो।' और यह काँप उठी। डर था, कोई चिमट न जाए। लाशें आँखों-तले फिरती थीं। इतने में बारह का गजर ठनाठन बजा। तब अब्बासी ने अपने दिल में कहा, अरे, अभी बारह ही बजे। हम समझे थे, सवेरा हो गया। एकाएक कोई विहाग की धुन में गाने लगा -

सिपहिया जागत रहियो,
इस नगरी के दस दरवाजे निकस गया कोई और।
सिपहिया जागत रहियो।

अब्बासी सुनते-सुरते सो गई; मगर थोड़ी देर में ठनाके की आवाज आई तो जाग उठी। आदमी की आहट मालूम हुई। हाथ-पाँव काँपने लगे। इतने में बेगम साहब ने पुकारा - अब्बासी, पानी पिला। अब्बासी ने पानी पिलाया और बोली - हुजूर, अब कभी लाशों-वाशों का जिक्र न कीजिएगा। मेरा तो अजब हाल था। सारी रात आँखों में ही कट गई।

बेगम - ऐसा भी डर किस काम का, दिन को शेर, रात को भेड़।

बेगम साहब सोने को ही थीं कि एक आदमी ने फिर गाना शुरू किया।

बेगम - अच्छी आवाज है।

अब्बासी - पहले भी गा रहा था।

महरी - ऐं, यह वकील हैं!

कुछ देर तक तीनों बातें करते-करते सो गईं! सवेरे मुँह-अँधेरे महरी उठी तो देखा कि बड़े कमरे का ताला टूटा पड़ा है। दो संदूक टूटे-फूटे एक तरफ रखे हुए हैं और असबाब सब तितर-बितर। गुल मचा कर कहा - अरे! लुट गई, हाय लोगों, लुट गई! घर में कुहराम मच गया। दारोगा साहब दौड़ पड़े। अरे, यह क्या गजब हो गया। बेगम की भी नींद खुली। यह हालत देखी तो हाथ मल कर कहा - लुट गई! यह शोरगुल सुन कर पड़ोसिनें गुल मचाती हुई कोठे पर आईं और बोलीं - बहन, यह बमचख कैसा है! क्या हुआ? खैरियत तो है!

बेगम - बहन, मैं तो मर मिटी।

पड़ोसिन - क्या चोरी हो गई? दो बजे तक तो मैं आप लोगों की बातें सुनती रही। यह चोरी किस वक्त हुई?

अब्बासी - बहन, क्या कहूँ, हाय!

पड़ोसिन - देखिए तो अच्छी तरह। क्या-क्या ले गया, क्या-क्या छोड़ गया?

बेगम - बहन किसके होश ठिकाने हैं।

अब्बासी - मुझ जलम जली को पहले ही खटका हुआ था। कान खड़े हो गए फिर कुछ सुनाई न दिया। मैंने कुछ खयाल न किया।

दारोगा - हुजूर, यह किसी शैतान का काम हैं। पाऊँ तो खा ही डालूँ।

महरी - जिस हाथ से संदूक तोड़े, वह कट कर गिर पड़े। जिस पाँव से आया उसमें कीड़े पड़ें। मरेगा बिलख-बिलख कर।

अब्बासी - अल्लाह करे, अठवारे ही में खटिया मचमचाती निकले।

महरी - मगर अब्बासी, तुम भी एक ही कलजिमी हो। वही हुआ।

सुरैया बेगम ने असबाब की जाँच की तो आधे से ज्यादा गायब पाया। रो कर बोलीं - लोगों, मैं कहीं की न रही। हाय मेरे अब्बा, दौड़ो। तुम्हारी लाड़िली बेटी आज लुट गई। हाय मेरी अम्माँजान! सुरैया बेगम अब फकीरिन हो गई।

पड़ोसिन - बहन, जरा दिल को ढारस दो। रोने से और हलाकान होगी।

बेगम - किस्मत ही पलट गई। हाय!

पड़ोसिन - ऐ! कोई हाथ पकड़ लो। फिर फोड़े डालती हैं। बहन, बहन। खुदा के वास्ते सुनो तो! देखो, सब माल मिला जाता है। घबराओ नहीं।

इतने में एक महरी ने गुल मचा कर कहा - हुजूर, यह जोड़ी कड़े की पड़ी है।

अब्बासी - भागते भूत की लँगोटी ही सही।

लोगों ने सलाह दी कि थानेदार को बुलाया जाय, मगर सुरैया बेगम तो थानेदार से डरी हुई थी; नाम सुनते ही काँप उठीं और बोलीं - बहन, माल चाहे यह भी जाता रहे, मगर थाने वालों को मैं अपनी डयोढ़ी न लाँघने दूँगी। दारोगा जी ने आँख ऊपर उठाई तो देखा, छत कटी हुई है। समझ गए कि चोर छत काट कर आया था। एकाएक कई कांस्टेबिल बाहर आ पहुँचे। कब वारदात हुई? दौ दफे तो हम पुकार गए। भीतर-बाहर से बराबर आवाज आई। फिर यह चोरी कब हुई? दारोगा जी ने कहा - हमको इस टाँय-आँय से कुछ वास्ता नहीं है जी? आए वहाँ से रोब जमाने! टके का आदमी और हमसे जबान मिलाता है। पड़े-पड़े सोते रहे और इस वक्त तहकीकात करने चले हैं? साठ हजार का माल गया। कुछ खबर भी है!

कांस्टेबिलों ने जब सुना कि साठ हजार की चोरी हुई तो होश उड़ गए। आपस में यों बातें करने लगे -

एक - साठ हजार! पचास और दुई साठ? काहे?

दूसरा - पचास दुई साठ नहीं; पचास और दस साठ!

तीसरा - अजी खुदा-खुदा करो। साठ हजार। क्या निरे जवाहिरात ही थे? ऐसे कहाँ के सेठ हैं!

दारोगा - समझा जायगा, देखो तो सही? तुम सबकी साजिश है।

एक - दारोगा, तरकीब तो अच्छी की! शाबास!

दूसरा - बेगम सहब के यहाँ चोरी हुई तो बला से। तुम्हारी तो हाड़ियाँ चढ़ गईं। कुछ हमारा भी हिस्सा है?

इतने में थानेदार साहब आ पहुँचे और कहा, हम मौका देखेंगे। परदा कराया गया। थानेदार साहब अंदर गए तो बोले - अक्खाह, इतना बड़ा मकान है! तो क्यों न चोरी हो?

दारोगा - क्या? मकान इतना बड़ा देखा और आदमी रहते हैं सो नहीं देखते!

थानेदार - रात को यहाँ कौन सोया था?

दारोगा - अब्बासी, सबके नाम लिखवा दो।

थानेदार - बोलो अब्बासी महरी, रात को किस वक्त सोई थीं तुम?

अब्बासी - हुजूर, कोई ग्यारह बज आँखें लगीं।

थानेदार - एक-एक बोटी फड़कती है। साहब के सामने इतना न चमकना।

अब्बासी - यह बातें मैं नहीं समझती। चमकना-मटकना बाजारी औरतें जानें। हम हमेशा बेगमों में रहा किए हैं। यह इशारे किसी और से कीजिए। बहुत थानेदारी के बल पर न रहिएगा। देखा कि औरतें ही औरतें घर में हैं तो पेट से पाँव निकाले।

थानेदार - तुम तो जामे से बाहर हुई जाती हो।

बेगम साहब कमरे में खड़ी काँप रही थीं। ऐसा न हो, कहीं मुझे देख ले। थानेदार ने अब्बासी से फिर कहा - अपना बयान लिखवाओ।

अब्बासी - हम चारपाई पर सो रहे थे कि एक बार आँख खुली। हमने सुराही से पानी उँड़ेला और बेगम साहब को पिलाया।

थानेदार - जो चाहो, लिखवा दो। तुम पर दरोगहलफी का जुर्म नहीं लग सकता।

अब्बासी - क्या ईमान छोड़ना है? जो ठीक-ठाक है वह क्यों छिपाएँ?

अब्बासी ने अँगुलियाँ मटका-मटका कर थानेदार को इतनी खरी-खोटी सुनाईं कि थानेदार साहब की शेखी किरकिरी हो गई। दारोगा साहब से बोले - आपको किसी पर शक हो तो बयान कीजिए। बे-भेदिए के चोरी नहीं हो सकती। दारोगा ने कहा - हमें किसी पर शक नहीं। थानेदार ने देखा कि यहाँ रंग न जमेगा तो चुपके से रुखसत हुए।


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