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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


मियाँ आजाद कासकों के साथ साइबेरिया चले जा रहे थे। कई दिन के बाद वह डैन्यूब नदी के किनारे जा पहुँचे। वहाँ उनकी तबीयत इतनी खुश हुई कि हरी-हरी दूब पर लेट गए और बड़ी हसरत से यह गजल पढ़ने लगे -

रख दिया सिर को तेगे कातिल पर,
हम गिरे भी तो जाके मंजिल पर।
आँख जब बिसमिलों में ऊँची हो,
सिर गिरे कटके पाय कातिल पर।
एक दम भी तड़प से चैन नहीं,
देख लो हाथ रखके तुम दिल पर।

यह गजल पढ़ते-पढ़ते उन्हें हुस्नआरा की याद आ गई और आँखों से आँसू गिरने लगे। कासक लोगों ने समझाया कि भई, अब वे बातें भूल जाओ, अब यह समझो कि तुम वह आजाद ही नहीं हो। आजाद खिल-खिला कर हँसे और ऐसा मालूम हुआ कि वह आपे में नहीं हैं। कासकों ने घबरा कर उनको सँभाला और समझाने लगे कि यह वक्त सब्र से काम लेने का है। अगर होश-हवास ठीक रहे तो शायद किसी तदबीर से वापस जा सको वरना खुदा ही हाफिज हे। साइबेरिया से कितने ही कैदी भाग आते हैं, मगर तुम तो अभी से हिम्मत हारे देते हो।

इतने में वह जहाज जिस पर सवार हो कर आजाद को डैन्यूब के पार जाना था, तैयार हो गया। तब तो आजाद की आँखों से आँसुओं का ऐसा तार बँधा कि कासकों के भी रूमाल तर हो गए। जिस वक्त जहाज पर सवार हुए दिल काबू में न रहा। रो-रो कर कहने लगे - हुस्नआरा, अब आजाद का पता न मिलेगा। आजाद अब दूसरी दुनिया में हैं, अब ख्वाब में इस आजाद की सूरत न देखोगी जिसे तुमने रूम भेजा।

यह कहते-कहते आजाद बेहोश हो गए। कासकों ने उनको इत्र सुँघाया और खूब पानी के छींटे दिए तब जा कर कहीं उनकी आँखें खुलीं। इतने में जहाज उस पर पहुँच गया तो आजाद ने रूम की तरफ मुँह करके कहा - आज सब झगड़ा खत्म हो गया। अब आजाद की कब्र साइबेरिया में बनेगी और कोई उस पर रोने वाला न होगा।

कासकों ने शाम को एक बाग में पड़ाव डाला और रात भर वहीं आराम किया। लेकिन जब सुबह को कूच की तैयारियाँ होने लगीं तो आजाद का पता न था। चारों तरफ हुल्लड़ मच गया, इधर-उधर सवार छूटे, पर आजाद का पता न पाया। वह बेचारे एक नई मुसीबत में फँस गए थे।

सबेरे मियाँ आजाद की आँख जो खुली तो अपने को अजब हालत में पाया। जोर की प्यास लगी हुई थी, तालू सूखा जाता था, आँखें भारी, तबीयत सुस्त, जिस चीज पर नजर डालते थे, धुंधली दिखाई देती थी। हाँ, इतना अलबत्ता मालूम हो रहा था कि उनका सिर किसी के जानू पर है। मारे प्यास के ओठ सूख गए थे, गो आँखें खोलते थे, मगर बात करने की ताकत न थी। इशारे से पानी माँगा और जब पेट भर पानी पी चुके तो होश आया। क्या देखते हैं कि एक हसीन औरत सामने बैठी हुई है। औरत क्या, हूर थी। आजाद ने कहा, खुदा के वास्ते बताओ कि तुम कौन हो? हमें कैसे यहाँ फाँस लाई, मेरी तो कुछ समझ ही में नहीं आता, कासक कहाँ हैं? डैन्यूब कहाँ है? मैं यहाँ क्यों छोड़ दिया गया? क्या साइबेरिया इसी मुकाम का नाम है? हसीना ने आँखों से इशारे से कहा - सब्र करो, सब कुछ मालूम हो जायगा। आप तुर्की हैं या फ्रांसीसी?

आजाद - मैं हिंदी हूँ। क्या यह आप ही का मकान है?

हसीना - नहीं, मेरा मकान पोलेंड में है, मगर मुझे यह जगह बहुत पसंद है। आइए, आपको मकान की सैर कराऊँ।

आजाद ने देखा कि पहाड़ की एक ऊँची चोटी पर कीमती पत्थरों की एक कोठी बनी है। पहाड़ ढालू था और उस पर हरी-हरी घास लहरा रही थी। एक मील के फासिले पर एक पुराना गिरजा का सुनहला मीनार चमक रहा था। उत्तर की तरफ डेन्यूब नदी अजब शान से लहरें मारती थी! किश्तियाँ दरिया में आती हैं। रूस की फौजें दरिया के पार जाती हैं। मेढा हवा से उछल रहा है। कोठी के अंदर गए तो देखा कि पहाड़ को काट कर दीवारें बनी हैं। उसकी सजावट देख कर उनकी आँखें खुल गईं। छत पर गए तो ऐसा मालूम हुआ कि आसमान पर जा पहुँचे। चारों तरफ पहाड़ों की ऊँची-ऊँची चोटियाँ हरी-हरी दूब से लहरा रही थीं। कुदरत का यह तमाशा देख कर आजाद मस्त हो गए और यह शेर उनकी जबान से निकला -

लगी है मेंह की झड़ी, बाग में चलो झूल,
कि झूलने का मजा भी इसी बहार में है।
यह कौन फूटके रोया कि दर्द की आवाज,
रची हुई जो पहाड़ों के आबशार में है।

हसीना - मुझे यह जगह बहुत पसंद है। मैंने जिंदगी भर यहीं रहने का इरादा किया है, अगर आप भी यहीं रहते तो बड़े मजे से जिंदगी कटती!

आजाद - यह आपकी मिहरबानी है! मैं तो लड़ाई खत्म हो जाने के बाद अगर छूट सका तो वतन चला जाऊँगा।

हसीना - इस खयाल में न रहिएगा, अब इसी को अपना वतन समझिए।

आजाद - मेरा यहाँ रहना कई जानों का गाहक हो जायगा। जिस खातून ने मुझे लड़ाई में शरीक होने के लिए यहाँ भेजा है, वह मेरे इंतजार में रो-रो कर जान दे देगी।

हसीना - आपकी रिहाई अब किसी तरह मुमकिन नहीं। अगर आपको अपनी जान की मुहब्बत है तो वतन का खयाल छोड़ दीजिए, वरना सारी जिंदगी साइबेरिया में काटनी पड़ेगी।

आजाद - इसका कोई गम नहीं, मगर कौल जान के साथ है।

हसीना - मैं फिर समझाए देती हूँ। आप पछताएँगे।

आजाद - आपको अख्तियार है।

यह सुनते ही उस औरत ने आजाद को फिर कैदखाने में भेजवा दिया।

अब मियाँ खोजी का हाल सुनिए। रूसियों ने उन्हें दीवाना समझ कर जब छोड़ दिया तो आप तुर्कों की फौज में पहुँच कर दून की लेने लगे। हमने यों रूसियों से मुकाबिला किया और यों नीचा दिखाया। एक रूसी पहलवान से मेरी कुश्ती भी हो गई, बहुत बफर रहा था। मुझसे न रहा गया। लँगोट कसा और खुदा का नाम ले कर ताल ठोंक के अखाड़े में उतर पड़ा, वह भी दाँव-पेंच में बक था और हाथ-पाँव ऐसे कि क्या कहूँ। मेरे हाथ-पाँव से भी बड़े।

एक सिपाही - ऐं,अजी हम न मानेंगे आपके हाथ-पाँव से ही हाथ-पाँव तो देव के भी न होंगे!

खोजी - बस, ज्यों ही उसने हाथ बढ़ाया, मैंने हाथ बाँध लिया। फिर जो जोर करता हूँ तो हाथ खट से अलग!

सिपाही - अरे, हाथ ही तोड़ डाले। बेचारे को कहीं का न रखा!

खोजी - बस, फिर दूसरा आया, मैंने गरदन पकड़ी और अंटी दी, धम से गिरा। तीसरा आया, चपत जमाई और धर दबाया। चौथा आया, अड़ंगा मारा और धम से गिरा दिया। पाँचवाँ आया और मैंने मारे करौलियों के कचूमर निकाल लिया।

सिपाही - आपने बुरा किया। ताकतवर लोग कमजोरों पर रहम किया करते हैं।

खोजी - तब कई सवार तोपें लिए हुए आए; मगर मैंने सबको पटका। आखिर कोई सत्तर आदमी मिल कर मुझ पर टूट पड़े तब जाके कहीं मैं गिरफ्तार हुआ।

सिपाही - बस, सत्तर ही! सत्तर आदमियों को तो आप पीस कर धर देते। कम से कम कोई दो सौ तो जरूर होंगे!

खोजी - झूठ न बोलूँगा, मुझे सबों ने रखा बड़ी इज्जत के साथ। रात भर तो में वहीं रहा, सबेरा होते ही करौली ले कर ललकारा कि आ जाओ जिसको आना हो, बंदा चलता है। बस कोई दो करोड़ रूसी निकल पड़े - लेना-लेना! अरे मैंने कहा कि किसका लेना और किसका देना, आ जा जिसे आना हो। खुदा की कसम जो किसी ने चूँ भी की हो। सब के सब डर गए।

तुर्क समझ गए कि निरा जाँगलू हैं। खोजी ने यही समझा कि मैंने इन सबों को उल्लू बनाया। दिन भर तो पिनक लेते रहे, शाम के वक्त हवा खाने निकले। इत्तिफाक से राह में एक गधा मिल गया। आप फौरन गधे पर सवार हुए और टिक-टिक करते चले। थोड़ी ही दूर गए थे कि एक आदमी ने ललकारा - रोक ले गधा, कहाँ लिए जाता है?

खोजी - हट जा सामने से।

जवान - उतर गधे से। उतरता है या मैं दूँ खाने भर को?

खोजी - तू नहीं छोड़ेगा, निकालूँ करौली फिर?

आखिर, उस जवान ने खोजी को गधे से ढकेल दिया, तब आप चोर-चोर का गुल मचाने लगे। यह गुल सुन कर दो-चार आदमी आ गए और खोजी को चपतें जमाने लगे।

खोजी - तुम लोगों की कजा आई है, मैं धुनके रख दूँगा।

जवान - चुपके से घर की राह लो, ऐसा न हो, तुम्हें तुम्हारी खोपड़ी सुहलानी पड़े।

इत्तिफाक से एक तुर्की सवार का उस तरफ से गुजर हुआ। खोजी ने चिल्ला कर कहा - दोहाई है सरकार की! यह डाकू मारे डालते हैं।

सवार ने खोजी को देख कर पूछा - तुम यहाँ कहाँ?

खोजी - ये लोग मुझे तुर्की का दोस्त समझ कर मारे डालते हें।

सवार ने उन आदमियों को डाँटा और अपने साथ चलने का हुक्म दिया। खोजी शेर हो गए। एक के कान पकड़े और कहा, आगे चल। दूसरे पर चपत जमाई और कहा, पीछे चल।

इस तरह खोजी ने इन बेचारों की बुरी गत बनाई, मगर पड़ाव पर पहुँच कर उन्हें छोड़वा दिया।

जब सब लोग खा कर लेटे तो खोजी ने फिर डींग मारनी शुरू की। एक बार मैं दरिया नहाने गया तो बीचोबीच में जा कर ऐसा गोता लगाया कि तीन दिन पानी से बाहर न हुआ।

एक सिपाही - तब तो आप यों कहिए कि आप गोताखोरों के उस्ताद हैं। कल जरा हमें भी गोता ले कर दिखाइए।

खोजी - हाँ-हाँ, जब कहो।

सिपाही - अच्छा तो कल की रही।

खोजी ने समझा, यह सब रोब में आ जायँगे। मगर वे एक छटे गुर्गे। दूसरे दिन उन सबों ने खोजी को साथ लिया और दरिया नहाने को चले। पड़ाव से दरिया साफ नजर आता था। खोजी के बदन के रोंगटे खड़े हो गए। भागने ही को थे कि एक आदमी ने रोक लिया और दो तुर्कों ने उनके कपड़े उतार लिए। खोजी की यह कैफियत थी कि कलेजा थरथर काँप रहा था, मगर जबान से बात न निकलती थी। जब उन्होंने देखा कि अब गला न छूटेगा तो मिन्नतें करने लगे - भाइयो, मेरी जान के क्यों दुश्मन हुए हो? अरे यारो, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ, तुम्हारे सबब से इतनी जहमत उठाई, कैद हुआ और अब तुम लोग हँसी-हँसी में मुझे डुबो देना चाहते हो। गरज खोजी बहुत गिड़गिड़ाए, मगर तुर्कों ने एक न मानी। खोजी मिन्नतें करते-करते थक गए तो कोसने लगे - खुदा तुमसे समझे! यहाँ कोई अफसर भी नहीं है। न हुई करौली, नहीं इस वक्त जीता चुनवा देता। खुदा करे, तुम्हारे ऊपर बिजली गिरे। सब के सब कपड़े उतार लिए, गोया उनके बाप का माल था। अच्छा गीदी, अगर जीता बचा तो समझ लूँगा। मगर दिल्लगीबाजों ने इतने गोते दिए कि वे बेदम हो गए और एक गोता खा कर डूब गए।


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