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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


कैदखाने से छूटने के बाद मियाँ आजाद को रिसाले में एक ओहदा मिल गया। मगर अब मुश्किल यह पड़ी कि आजाद के पास रुपए न थे। दस हजार रुपए के बगैर तैयारी मुश्किल। अजनबी आदमी, पराया मुल्क, इतने रुपयों का इंतजाम करना आसान न था। इस फिक्र में मियाँ आजाद कई दिन तक गोते खाते रहे। आखिर यही सोचा कि यहाँ कोई नौकरी कर लें और रुपए जमा हो जाने के बाद फौज में जायँ। मन मारे बैठे थे कि मीडा आ कर कुर्सी पर बैठ गई। जिस तपाक के साथ आजाद रोज पेश आया करते थे, उसका आज पता न था! चकरा कर बोली - उदास क्यों हो! मैं तो तुम्हें मुबारकबाद देने आई थी। यह उल्टी बात कैसी?

आजाद - कुछ नहीं। उदास तो नहीं हूँ।

मीडा - जरा आईने में सूरत तो देखिए।

आजाद - हाँ मीडा, शायद कुछ उदास हूँ। मैंने तुमसे अपने दिल की कोई बात कभी नहीं छिपाई। मुझे ओहदा तो मिल गया, मगर यहाँ टका पास नहीं। कुछ समझ में नहीं आता क्या करूँ?

मीडा - बस, इसीलिए आप इतने उदास हैं! यह तो कोई बड़ी बात नहीं। तुम इसकी कोई फिक्र न करो।

यह कह कर मीडा चली गई और थोड़ी देर बाद उसके आदमी ने आ कर एक लिफाफा आजाद के हाथ में रख दिय। आजाद ने लिफाफा खोला, तो उछल पड़े। इस्तंबोल-बैंक के नाम बीस हजार का चेक था। आजाद रुपए पा कर खुश तो हुए, मगर यह अफसोस जरूर हुआ कि मीडा ने अपने दिल में न जाने क्या समझा होगा। उसी वक्त बैंक गए, रुपए लिए और सब सामान ठीक करके दूसरे दिन फौज में दाखिल हो गए।

दोपहर के वक्त घड़घड़ाहट की आवाज आई। खोजी ने सुना, तो बोले - यह आवाज कैसी है भई? हम समझ गए। भूचाल आने वाला है। इतने में किसी ने कहा - फौज जा रही है। खोजी कोठे पर चढ़ गए। देखा, फौज सामने आ रही है। यह घड़घड़ाहट तोपखाने की थी। जरा देर में आजाद पर नजर पड़ी। घोड़े की बाग उउठाए, रान जमाए चले जाते थे। खोजी ने पुकारा - मियाँ आजाद! अेर मियाँ, इधर, उधर! वाह, सुनते ही नहीं। फौज में क्या हो गए, मिजाज ही नहीं मिलते। हम भी पलटन में रह चुके हैं, रिसालदार थे, पर यह न था कि किसी की बात न सुनें।

सारे शहर में एक मेला सा लगा हुआ था, कोठे फटे पड़ते थे। औरतें अपने शौहरों को लड़ाई पर जाते देखती थीं और उन पर फूलों की बौछार करती थीं। माँएँ अपने बेटों के लिए खुदा से दुआ कर रही थीं।

फौज तो मैदान को गई और मियाँ खोजी मिस मीडा से मिलने चले। मीडा की एक सहेली का नाम था मिस रोज। मीडा खोजी को देखते ही बोली - लीजिए, मैंने आपकी शादी मिस रोजी से ठीक कर दी। अब कल बरात ले कर आइए।

खोजी - खुदा आपको इस नेकी का बदला दे। मैं तो वजीर-जंग को भी नवेद दूँगा।

मीडा - अजी, सुलतान को भी बुलाइए।

खोजी - तो फिर बंदोबस्त कीजिए। शादी के लिए नाच सबसे ज्यादा जरूरी हैं। अगर तबले पर थाप न पड़ी, महफिल न जमी, तो शादी ही क्या?

मीडा - मगर यहाँ तो आदमी का नाच मना है। कहीं कोई औरत नाचे, तो गजब हो ही जाय।

खोजी - अच्छा, फिर किसी सबील से नाच का नाम तो हो जाय।

मीडा - इसकी तदबीर यों कीजिए कि किसी बंदर नचानेवाले को बुला लीजिए। खर्च भी कम और लुत्फ भी ज्यादा। तीन बंदरवाले काफी होंगे।

खोजी - तीन तो मनहूस हैं। पाँच हो जायँ तो अच्छा!

खैर, दूसरे दिन खोजी बरात सजा कर मीडा के मकान की ओर चले। आगे निशान का खच्चर था, पीछे रीछ और बंदर। दस पाँच लड़के मशालें लिए खोजी के चारों तरफ चले जाते थे; और खोजी टट्टू पर सवार, गेरुए रंग की पोशाक पहने सियाह पगड़ी बाँधे, अकड़े बैठे थे। टट्टू इतना मरियल था कि खोजी बार-बार उछलते थे, एड़-पर-एड़ लगाते थे, मगर वह दो कदम आगे जाता था तो चार कदम पीछे। एकाएक टट्टू बैठ गया। इस पर लड़कों ने उसे डंडे मारना शुरू किया। खोजी बिगड़ कर बोले - ओ मसखरो, तुम सब हँसते क्या हो! जल्द कोई तदबीर बताओ, वर्ना मारे करौलियों के बौला दूँगा।

साईस - हुजूर, मैं इस घोड़े की आदत खूब जानता हूँ। यहि बगैर चाबुक खाए उठने वाला नहीं।

खोजी - तू मसलहत करता है कि किसी तदबीर से टट्टू को मनाता है?

साईस - आप उतर पड़िए।

खोजी - उतर पड़े तो साईस ने टट्टू को मार-मार कर उठाया। खोजी फिर सवार होने चले। एक पैर रकाब पर रख कर दूसरा उठाया ही था कि टट्टू चलने लगा। खोजी अरा-रा करके धम से जमीन पर आ रहे। पगड़ी यह गिरी, करौली वह गिरी। डिबिया एक तरफ, टट्टू एक तरफ। साईस ने कहा - उठिए, उठिए। घोड़े से गिरना शहसवारों ही का काम है। जिसे घोड़ा नसीब नहीं, वह क्या गिरेगा?

खोजी - खैरियत यह हुई कि मैं घोड़े पर न गिरा, वर्ना मेरे बोझ से उसका काम ही तमाम हो जाता।

खोजी ने फिर सिर पर पगड़ी रखी, करौली कमर से लगाई और एक लड़के से पूछा - यहाँ आईना तो कहीं नहीं मिलेगा? फिर से पोशाक सजी है, जरा मुँह तो देख लेते।

लड़का - आईना तो नहीं है, कहिए पानी ले आऊँ। उसी में मुँह देख लीजिए। यह कह कर वह एक हाँड़ी में पानी लाया। खोजी पिनक में तो थे ही, हाँड़ी जो उठाई तो सारा पानी ऊपर आ रहा। बिगड़ कर हाँड़ी पटक दी। फिर आगे बढ़े। मगर दो-चार कदम चल कर याद आया कि मिस रोज का मकान तो मालूम ही नहीं; बरात जायगी कहाँ? बोले - यारो, गजब हो गया! जुलूस रोक लो। कोई मकान जानता है?

साईस - कौन मकान?

खोजी - वही जी जहाँ चलना है।

साईस - मुझे क्या मालूम? जिधर कहिए चलूँ।

खोजी - तुम लोग अजीब घामड़ हो। बरात चली और दुलहिन के घर का पता तक न पूछा।

साईस - नाम तो बताइए? किसी से पूछ लिया जाय।

खोजी - अरे भई, मुझे उनका नाम न लेना चाहिए। अटकल से चलो उसी तरफ।

साईस - अरे, कुछ नाम तो बताइए।

खोजी - कोहकाफ की परी कह दो। पूरा नाम हम न लेंगे।

एक तरफ कई आदमी बैठे हुए थे। साईस ने पूछा - यहाँ कोई परी रहती है?

एक आदमी ने कहा - मुझे और तो नहीं मालूम, मगर शहर-बाहर पूरब की तरफ जो एक तालाब है, वहाँ पार साल जो एक फकीर टिके थे, उनके पास एक परी थी।

खोजी - लो, चल न गया पता! उसी तालाब की तरफ चले चलो।

अब सुनिए। उस तालाब पर एक रईस की कोठी थी। उसकी बीवी मर गई थी। घर में मातम हो रहा था। दरवाजे पर जो यह शोर-गुल मचा, तो उसने अपने नौकरों से पूछा - यह कैसा गुल है? बाहर निकल कर खूब पीटो बदमाशों को! दो-तीन आदमी डंडे ले-ले कर फाटक से निकले।

खोजी - वाह रे आप के यहाँ का इंतजाम! कब से बरात खड़ी, और दरवाजे पर रोशनी तक नदारद!

एक आदमी - तू कौन है बे? क्या रात को बंदर नचाने आया है?

खोजी - जबान सँभाल। जा कर अपने मालिक से कह, बरात आ गई है।

आदमियों ने बरात को पीटना शुरू किया। खोजी पर एक चपत पड़ी, तो पगड़ी गिर पड़ी। दूसरे ने टट्टू पर डंडे जमाए।

खोजी - भई, ऐसी दिल्लगी न करो। कुछ कंबख्ती तो नहीं आई तुम सबकी?

बंदर वालों पर जब मार पड़ी तो वे सब भागे। लड़के भी चिराग फेंक फाँक कर भागे। टट्टू ने भी एक तरफ की राह ली। बेचारे खोजी अकेले पिट-पिटा कर होटल की तरफ चले।


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