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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


एक पुरानी, मगर उजाड़ बस्ती में कुछ दिनों से दो औरतों ने रहना शुरू किया है। एक का नाम फिरोजा है, दूसरी का फारखुंदा। इस गाँव में कोई डेढ़ हजार घर आबाद होंगे, मगर उन सब में दो ठाकुरों के मकान आलीशान थे। फिरोजा का मकान छोटा था, मगर बहुत खुशनुमा। वह जवान औरत थी, कपड़ेलत्ते भी साफ-सुथरे पहनती थी, लेकिन उसकी बातचीत से उदासी पाई जाती थी। फरखुंदा इतनी हसीन तो न थी, मगर खुशमिजाज थी। गाँववालों को हैरत थी कि यह दोनों औरतें इस गाँव में कैसे आ गईं और कोई मर्द भी साथ नहीं! उनके बारे में लोग तरह-तरह की बातें किया करते थे। गाँव की सिर्फ दो औरतें उनके पास जाती थीं, एक तंबोलिन, दूसरी बेलदारिन। यार लोग टोह में थे कि यहाँ का कुछ भेद खुले, मगर कुछ पता न चलता था। तंबोलिन और बेलदारिन से पूछते थे तो वह भी आँय-बाँय-साँय उड़ा देती थीं।

एक दिन उस गाँव में एक कांस्टेबिल आ निकला। आते ही एक बनिये से शक्कर माँगी। उसने कहा - शक्कर नहीं गुड़ है। कांस्टेबिल ने आव देखा न ताव, गाली दे बैठा। बनिये ने कहा - जबान पर लगाम दो। गाली न जबान से निकालो। इतना सुनना था कि कांस्टेबिल ने बढ़ कर दो घूसे लगाए और दुकान की चीजें फेक-फाँक दीं। सामने वाला दुकानदार मारे डर के शक्कर ले आया, तब हजरत ने कहा - काली मिर्च लाओ। वह बेचारा काली मिर्च भी लाया। तब आपने दो लोटे शरबत की पिए और कुएँ की जगत पर लेट कर एक लाला जी को पुकारा - ओ लाला, सराफी पीछे करना; पहले एक चादर तो दे जाओ। लाला बोले - हमारे पास और कोई बिछौना नहीं है, बस एक बिस्तरा है। कांस्टेबिल उठ कर दुकान पर गया। चादर उठा ली और कुएँ की जगत पर बिछा कर लेटा। लाला बेचारे मुँह ताकने लगे। अभी हजरत सो रहे थे कि एक औरत पानी भरने आई। आपने पाँव की आहट जो पाई तो चौंक उठे और गुल मचा कर बोले - अलग हट, चली वहाँ से घड़ा सिर पर लिए पानी भरने!

सूझता नहीं, कौन लेटा है, कौन बैठा है? इस पर एक आदमी ने कहा, वाह! तुम तो कुएँ के मालिक बन बैठे! अब तुम्हारे मारे कोई पानी न भरे? दूसरा बोला - सराफ की दुकान से चादर लाए, मुफ्त में शक्कर ली और डपट रहे हैं।

एक ठाकुर सहब टट्टू पर सवार चले जाते थे। इन लोगों की बातें सुन कर बोले - साहब को एक अर्जी दे दो, बस सारी शेखी किरकिरी हो जाय।

कांस्टेबिल ने ललकारा - रोक ले टट्टू। हम चालान करेंगे।

ठाकुर - क्यों रोक लें, हम अपनी राह जा रहे हैं, तुमसे मतलब?

ठाकुर - तो जुल्मी कहाँ है? हम ऐसे-वैसे ठाकुर नहीं है, हमसे बहुत रोब न जमाना।

इतने में दो-एक आदमियों ने आकर दोनों को समझाया, भाई, जवान, छोड़ दो, इज्जतदार आदमी हैं। इस गाँव के ठाकुर हैं, उनको बेइज्जत न करो।

इधर ठाकुर को समझाया कि रुपया-अधेली ले-दे कर अलग करो, कहाँ की झंझट लगाई है। मुफ्त में चालान कर देगा तो गाँव भर में हँसी होगी। कुछ यह समझे, कुछ वह समझे। अठन्नी निकाल कर कांस्टेबिल की नजर की, तब जा कर पीछा छूटा।

अब तो गाँव मे और भी धाक बँध गई। पनभरनियाँ मारे डर के पानी भरने न आईं, यह इधर-उधर ललकारने लगे। गल्ले की चंद गाड़ियाँ सामने से गुजरीं। आपने ललकारा, रोक ले गाड़ी। क्यों बे पटरी से नहीं जाता, सड़क तो साहब लोगों के लिए है। एक गाड़ीवान ने कहा - अच्छा साहब, पटरी पर किए देते हैं। आपने उठ कर एक तमाचा लगा दिया और बोले, और सुनो, एक तो जुर्म करें, दूसरे टर्रायँ। सब के सब दंग हो गए कि टर्राया कौन, उस बेचारे ने तो इनके हुक्म की तामील की थी। हलवाई से कहा - हमको सेर भर पूरी तौल दो। वह भी काँप रहा था कि देखें, कब शामत आती है, कहा, अभी लाया। तब आप बोले कि आलू की तरकारी है? वह बोला - आलू तो हमारे पास नहीं है, मगर उस खेत से खुदवा लाओ तो सब मामला ठीक हो जाय। कहने भर की देर थी। आप जा कर किसान से बोले - अरे, एक आध सेर आलू खोद दे। उसकी शामत जो आई तो बोला - साहब, चार आने सेर होई, चाहे लेव चाहे न लेव। समझ लो। आपने कहा, अच्छा भाई लाओ, मगर बड़े-बड़े हों।

किसान आलू लाया। तरकारी बनी, जब आप चलने लगे तो किसान ने पैसे माँगे। इसके जवाब में आपने उस गरीब को पीटना शुरू किया।

किसान - सेर भर आलू लिहिस पैसा न दिहिस, और ऊपर से मारत है।

मुराइन - और अलई के पलवा बकत है, राम करै, देवी-भवानी खा जायँ।

लोगों ने किसान को समझाया कि सरकारी आदमी के मुँह क्यों लगते हो। जो कुछ हुआ सो हुआ, अब इन्हें दो सेर आलू ला दो। किसान आलू खोद लाया। आपने उसे रूमाल में बाँधा और 8 पैसे निकाल कर हलवाई को देने लगे।

हलवाई - यह भी रहने दो, पान खा लेना।

कांस्टेबिल - खुशी तुम्हारी। आलू तो हमारे ही थे।

हलवाई - बस, अब सब आप ही का है।

कांस्टेबिल ने खा-पी कर लंबी तानी तो दो घंटे तक सोया किए। जब उठे तो पसीने में तर थे। एक गँवार को बुला कर कहा - पंखा झल। वह बेचारा पंखा झलने लगा। जब आप गाफिल हुए तो उसने इनकी लुटिया और लकड़ी उठाई और चलता धंधा किया। यह उनके भी उस्ताद निकले।

जमादार की आँख खुली तो पंखा झलने वाले का कहीं पता ही नहीं। इधर-उधर देखा तो लुटिया गायब। लाठी नदारद। लोगों से पूछा, धमकाया, डराया, मगर किसी ने न सुना। और बताए कौन? सब के सब तो जले बैठे थे। तब आपने चौकीदारों को बुलाया और धमकाने लगे। फिर सबों को ले कर गाँव के ठाकुर के पास गए और कहा - इसी दम दौड़ आएगी। गाँव-भर फूँक दिया जायगा, नहीं तो अपने आदमियों से पता लगवाओ।

ठाकुर - ले अब हम कस-कस उपाव करी। चोर का कहाँ ढूँढ़ी?

जमादार - हम नहीं जानता। ठाकुर हो कर के एक चोर का पता नहीं लगा सकता।

ठाकुर - तुमहू तो पुलिस के नौकर हो। ढूँढ़ निकालो।

ठाकुर साहब से लोगों ने कहा - यह सिपाही बड़ा शैतान है। आप साहब को लिख भेजिए कि हमारी रिआया को सताता है। बस, यह मौकूफ हो जाय। ठाकुर बोले - हम सरकारी आदमियों से बतबढ़ाव नहीं करते। कांस्टेबिल को तीन रुपए दे कर दरवाजे से टाला।

जमादार साहब यहाँ से खुश-खुश चले तो एक घोसी की लड़की से छेड़छाड़ करने लगे। उसने जा कर अपने बाप से कह दिया। वह पहलवान था, लँगोट बाँध कर आया और जमादार साहब को पटक कर खूब पीटा।

बहुत से आदमी खड़े तमाशा देख रहे थे। जमादार ने चूँ तक न की, चुपके से झाड-पोंछ कर उठ खड़े हुए और गाँव की दूसरी तरफ चले। इत्तिफाक से फीरोजा अपनी छत पर खड़ी बाल सुलझा रही थी। जमादार की नजर पड़ी तो हैरत हुई। बोले - अरे, यह किसका मकान है? कोई है इसमें?

पड़ोसी - इस मकान में एक बेगम रहती हैं। इस वक्त कोई मर्द नहीं है।

जमादार - तू कौन है? बता इसमें कौन रहता है? और मकान किसका है?

पड़ोसी - मकान तो एक अहीर का है, गुल इसमें एक बेगम टिकी हैं।

जमादार - कहो, दरवाजे पर आवें। बुला लाओ।

पड़ोसी - वाह, वाह परदेवाली हैं। दरवाजे पर न आएगी।

जमादार - क्या! परदा कैसा? बुलाता है कि घुस जाऊँ घर में? परदा लिए फिरता है!

फीरोजा के होश उड़ गए। फरखुंदा से बोली - अब गजब हो गया। भाग के यहाँ आई थी, मगर यहाँ भी वही बला सिर पा आई।

फरखुंदा - इसको कहाँ से खबर हुई?

फीरोजा - क्या बताऊँ? इस वक्त कौन इससे सवाल-जवाब करेगा?

फरखुंदा - देखिए, पड़ोसिन को बुलाती हूँ। शायद वह काम आएँ।

दरवाजा खुलने में देर हुई तो कांस्टेबिल ने दरवाजे पर लात मारी और कहा - खोल दो दरवाजा, हम दौड़ लाए हैं। मुहल्लेवालों ने कहा - भई, तुम्हारे पास न सम्मन, न सफीना। फिर किसके हुक्म से दरवाजा खुलवाते हो? ऐसा भी कहीं हुआ है। इन बेचारियों का जुर्म तो बताओ!

जमादार - जुर्म चलके साहब से पूछो जिनके भेजे हम आए हैं। सम्मन सफीना दीवानी के मजकूरी लाते हैं। हम पुलिस के आदमी हैं।

दूसरे आदमी ने आगे बढ़ कर कहा - सुनो भई जवान, तुम इस वक्त बड़ा भारी जुल्म कर रहे हो। भला इस तरह कोई काहे को रहने पाएगा।

जमादार ने अकड़ कर कहा - तुम कौन हो? अपना नाम बताओ। तुम सरकारी आदमी को अपना काम करने से रोकते हो। हम रपट बोलेंगे।

यह सुन कर वह हजरत चकराए और चुपके लंबे हुए। तब जमादार ने गुल मचा कर कहा, मुखबिरों ने हमें खबर दी है कि तुम्हारे लड़का होने वाला है। हमको हुक्म है कि दरवाजे पर पहरा दें।

पड़ोसिन ने जो यह बात सुनी तो दाँतो-तले अँगुली दबाई - ऐ है, यह गजब खुदा का, हमें आज तक मालूम ही न हुआ, हम भी सोचते थे कि यह जवान-जहान औरत शहर से भाग कर गाँव में क्यों आई! यह मालूम ही न था कि यहाँ कुछ और गुल खिलनेवाला है।

इतने में फरखुंदा ने कोठे पर जा कर पड़ोसिन से कहा - हरी अपने मियाँ से कहो कि इस सिपाही से कुल हाल पूछें - माजरा क्या है?

पड़ोसिन कुछ सोच कर बोली - भई, हम इस मामले में दखल न देंगे। ओह, तुम्हारी बेगम ने तो अच्छा जाल फैलाया था, हमारे मियाँ को मालूम हो जाय कि यह ऐसी हैं तो मुहल्ले से खड़े-खड़े निकलवा दें।

इतने में पड़ोसिन के मियाँ भी आए। फरखुंदा उनसे बोली, खाँ साहब, जरी इस सिपाही को समझाइए, यह हमारे बड़ी मुसीबत का वक्त है।

खाँ साहब - कुछ न कुछ तो उसे देना ही पड़ेगा।

फरखुंदा - अच्छा, आप फैसला करा दें। जो माँगे वह हमसे इसी दम ले।

खाँ साहब - इन पाजियों ने नाक में दम कर दिया है और इस तरफ की रिआया ऐसी बोदी है कि कुछ न पूछो। सरकार ने इन पियादों को इंतजाम के लिए रखा है और यह लोग जमीन पर पाँव नहीं रखते। सरकार को मालूम हो जाय तो खड़े-खड़े निकाल दिए जायँ।

पड़ोसिन - पहले बेगम से यह तो पूछो कि शहर से यहाँ आ कर क्यों रही हैं? कोई न कोई वजह तो होगी।

फरखुंदा ने दो रुपए दिए और कहा, जा कर यह दे दीजिए। शायद मान जाय। खाँ साहब ने रुपए दिए तो सिपाही बिगड़ कर बोला - यह रुपया कैसा? हम रिश्वत नहीं लेते!

खाँ साहब - सुनो मियाँ, जो हमसे टर्राओगे, तो हम ठीक कर देंगे। टके का पियादा, मिजाज ही नहीं मिलता।

सिपाही - मियाँ, क्यों शामतें आई हैं, हम पुलिस के लोग हैं, जिस वक्त चाहें, तुम जैसों को जलील कर दें। बतलाओ तुम्हारी गुजर-बसर कैसे होती है? बचा, किसी भले घर की औरत भगा लाए हो और ऊपर से टर्राते हो!

खाँ साहब - यह धमकियाँ दूसरों को देना। यहाँ तुम जैसे को अँगुलियों पर नचाते हैं।

सिपाही ने देखा कि यह आदमी कड़ा है तो आगे बढ़ा। एक नानबाई की दुकान पर बैठ कर मजे का पुलाव उड़ाया और सड़क पर जा कर एक गाड़ी पकड़ी। गाड़ीवान की लड़की बीमार थी। बेचारा गिड़गिड़ाने लगा, मगर सिपाही ने एक न मानी। इस पर एक बाबू जी बोल उठे - बड़े बेरहम आदमी हो जी! छोड़ क्यों नहीं देते?

सिपाही - कप्तान साहब ने मँगवाया है, छोड़ कैसे दूँ? यह इसी तरह के बहाने किया करते हैं, जमाने भर के झूठे!

आखिर गाड़ीवान ने सात पैसे और एक कद्दू दे कर गला छुड़ाया। तब आपने एक चबूतरे पर बिस्तर जमाया और चौकीदार से हुक्का भरवा कर पीने लगे। जब जरा अँधेरा हुआ, तो चौकीदार ने आ कर कहा - हवलदार साहब, बड़ा अच्छा शिकार चला जात है। एक महाजन की मेहरिया बैलगाड़ी पर बैठी चली जात है। गहनन से लदी है।

सिपाही - यहाँ से कितनी दूर है?

चौकीदार - कुछ दूर नाहिन, घड़ी भर में पहुँच जैहों। बस एक गाड़ीवान है और एक छोकरा। तीसर कोऊ नहीं।

सिपाही - तब तो मार लिया है। आज किसी भले आदमी का मुँह देखा है। हमारे साथ कौन-कौन चलेगा?

चौकीदार - आदमी सब ठीक हैं, कहैं भर की देर है। हुक्म होय तो हम जाके सब ठीक करी।

सिपाही - हाँ-हाँ और क्या?

अब सुनिए कि महाजन की गाड़ी बारह बजे रात को एक बाग की तरफ से गुजरी जा रही थी कि एकाएक छः सात आदमी उस पर टूट पड़े। गाड़ीवान को एक डंडा मारा। कहार को भी मार के गिरा दिया। औरत के जेवर उतार लिए और चोर-चोर का शोर मचाने लगे। गाँव में शोर मच गया कि डाका पड़ गया। कांस्टेबिल ने जा कर थाने में इत्तला की। थानेदार ने चौकीदर से पूछा, तुम्हारा किस पर शक है। चौकीदार ने कई आदमियों का नाम लिखाया और फिरोजा के पड़ोसी खाँ साहब भी उन्हीं में थे। दूसरे दिन उसी सिपाही ने खाँ साहब के दरवाजे पर पहुँच कर पुकारा। खाँ साहब ने बाहर आ कर सिपाही को देखा तो मूँछों पर ताव दे कर बोले, क्या है साहब, क्या हुक्म है? सिपाही- चलिए, वहाँ बरगद के तले तहकीकात हो रही है! दारोगा जी बुलाते हैं।

खाँ - कैसी तहकीकात? कुछ सुने तो!

सिपाही - मालूम हो जायगी! चलिए तो सही।

खाँ - सुनो जी, हम पठान हैं। जब तक चुप हैं तब तक चुप हैं। जिस दम गुस्सा आया, फिर या तुम न होगे या हम न होंगे। कहाँ चलें, कहाँ?

सिपाही - मुझे आपसे कोई दुश्मनी तो है नहीं, मगर दारोगा जी के हुक्म से मजबूर हूँ।

चौकीदार - लोधे को बुलाया है, घोसी को और तुमको।

खाँ - ऐं, वह तो सब डाकू हैं।

सिपाही - और आप बड़े साहु हैं! बड़ी शेखी।

खाँ - क्यों अपनी जान के दुश्मन हुए हो?

सिपाही - अब चलिएगा या वारंट आए।

खाँ साहब घर में कपड़े पहनने गए तो बीवी ने कहा, कैसे पठान हो? मुए प्यादे की क्या हकीकत है कि दरवाजे पर खोटी-खरी कहे। भला देखूँ तो निगोड़ा तुम्हें वह क्योंकर ले जाता है। यह कह कर वह दरवाजे पर आ कर बोली, क्यों रे, तू इन्हें कहाँ लिए जाता है? बता, किस बात की तहकीकात होगी? क्या तेरा बाप कतल किया करता है?

सिपाही - आप खाँ साहब को भेज दें। अजी खाँ साहब, आइएगा या वारंट आए?

बीवी - वारंट ले जा अपने होतों-सोतों के यहाँ।

सिपाही - यह औरत तो बड़ी कल्ला-दराज हें।

बीवी - मेरे मुँह लगेगा तो मुँह पकड़के झुलस दूँगी। वारंट अपने बाप-दादा के नाम ले जा!

इतने में खाँ साहब ढाटा बाँध कर बाहर निकले और बोले - ले तुझे दाएँ हाथ खाना हराम है जो न ले चले।

सिपाही - बस, बहुत बढ़-बढ़ कर बातें न कीजिए, चुपके से मेरे साथ चलिए।

खाँ साहब अकड़ते हुए चले तो सिपाही ने फिरोजा के दरवाजे पर खड़े हो कर कहा, इन्हें तो लिए जाते हैं, अब तुम्हारी बारी भी आएगी।

खाँ साहब बरगद के नीचे पहुँचे तो देखा, गाँव भर के बदमाश जमा हैं। और दारोगा जी चारपाई पर बैठे हुक्का पी रहे हैं। बोले, क्यों जनाब, हमें क्यों बुलाया?

दारोगा - आज गाँव भर के बदमाशों की दावत है।

खाँ साहब ने डंडे को तौल कर कहा, तो फिर दो एक बदमाशों की हम भी खबर लेंगे।

दारोगा - बहुत गरमाइए नहीं, चौकीदारों ने हमसे जो कहा वह हमने किया।

खाँ - और जो चौकीदार आपको कुएँ में कूद पड़ने की सलाह दे?

दारोगा - तो हम कूद पड़ें?

खाँ - तो हमारी निस्बत आखिर क्या जुर्म लगाया गया है?

दारोगा - कल रात को तुम कहाँ थे?

खाँ - अपने घर पर, और कहाँ।

चौकीदार - हुजूर, बखरी में नाहीं रहे और एक मनई इनका वही बाग के भीतर देखिस रहा।

खाँ साहब ने चौकीदार को एक चाँटा दिया, सुअर, अबे हम चोर हैं? रात को हम घर पर न थे?

दारोगा जी ने कहा, क्यों जी, हमारे सामने यह मार-पीट! तुम भी पठान हो और हम भी पठान हैं। अगर अबकी हाथ उठाया तो तुम्हारी खैरियत नहीं।

इतने में एक अंगरेज घोड़े पर सवार उधर से आ निकला। यह जमघट देख कर दारोगा से बोला, क्या बात है? दारोगा ने कहा, गरीब परवर, एक मुकदमे की तहकीकात करने आए हैं। इस पठान की निस्बत एक चोरी का शक है, मगर यह तहकीकात नहीं करने देता। चौकीदार को कई मरतबा पीट चुका है। चौकीदार ने कहा, दोहाई है साहब की! दोहाई है, मारे डारत है।

साहब ने कहा - वेल, चालान करो। हमारी गवाही लिखवा दो, हमारा नाम मेजर कास है।

लीजिए, चोरी और डाका तो दूर रहा, एक नया जुर्म साबित हो गया।

अब दारोगा जी ने गवाहों के बयान लिखने शुरू किए। पहले एक तंबोलिन आई। भड़कीला लहँगा पहने हुए, माँग-चोटी से लैस, मुँह में गिलौरी दबी हुई, हाथ में पान के बीड़े, आ कर दरोगा जी को बीड़े दे कर खड़ी हो गई।

दारोगा - तुमने खाँ साहब को रात के वक्त कहाँ देखा था?

तंबोलिन - उस पूरे के पास। इनके साथ तीन-चार आदमी और थे। सब लट्ठ बंद। एक आदमी ने कहा, छीन लो सास से, मैं बोली कि बोटियाँ नोच लूँगी, मैं कोई गँवारिन नहीं हूँ। खाँ साहब ने मुझसे कहा, तंबोलिन, कहो फतह है।

खाँ - अरी तंबोलिन!

तंबोलिन - जरा अरी तरी न करना मुझसे, मैं कोई चमारिन नहीं हूँ।

खाँ - तुमने हमको चोरों के साथ देखा था?

तंबोलिन - देखा ही था क्या कुछ अंधे हैं, चोर तो तुम हो ही।

खाँ - खुदा इस झूठ की सजा देगा।

तंबोलिन - इसका हाल तो जब मालूम होगा, तब बड़े घर में चक्की पीसोगे।

खाँ - और वहाँ गीत गाने के लिए तुमको बुला लेंगे।

दूसरे गवाह ने बयान किया, मैं रात को ग्यारह बजे इस पूरे की तरफ जाता था तो खाँ साहब मुझे मिले थे।

खाँ - कसम खुदा की, कोई आदमी मेरी ही शक्ल का रहा होगा।

दारोगा - आपने ठीक कहा।

काले खाँ - जब पठान होके ऐसी हरकतें करने लगे तो इस गाँव का खुदा ही मालिक है। कौन कह सकता है कि यह सफेद-पोश आदमी डाका डालेगा।

खाँ - खुदा की कसम, जी चाहता है सिर पीट लूँ, मगर खैर, हम भी इसका मजा चखा देंगे।

दारोगा - पहले अपने घर की तलाशी तो करवाइए, मजा पीछे चखवाइएगा।

यह कह कर दारोगा जी खाँ साहब के घर पहुँचे और कहा, जल्दी परदा करो, हम तालाशी लेंगे। खाँ साहब की बीवी ने सैकड़ों गालियाँ दीं, मगर मजबूर हो कर परदा किया। तलाशी होने लगी। दो बालियाँ निकलीं, एक जुगुनू और एक छपका! खाँ साहब की बीवी हक्का-बक्का हो कर रह गई, यह जेवर यहाँ कहाँ से आए? या खुदा, अब हमारी आबरू तेरे ही हाथ है!


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