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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


जब रात को सब लो खा-पी कर लेटे, तो नवाब साहब ने दोनों बंगालियों को बुलाया और बोले - खुदा ने आप दोनों साहबों को बहुत बचाया, वरना शेरनी खा जाती।

बोस - हम डरता नहीं थ, हम शाला ईश फील का बान को मारना चाहता था कि हम ईश देश का आदमी नहीं है। इस माफिक हमारे को डराने सकता और हाथी को बोदजाती से हिलाने माँगें। जब तो हम लोग बड़ा गुस्सा हुआ कि अरे सब लोग का हाथी हिलने नहीं माँगता, तुम क्यों हिलने माँगता है। और हमसे बोला कि बाबू शाब, अब तो मरेगा। हाथी का पाँव फिसलेगी और तुम मर जायँगे। हम बोला - अरे, जो हाथी की पाँव फिसल जायगी तो तुम शाले का शाला कहाँ बच जायगा? तुम भी तो हमारा एक साथ मरेगा।

नवाब - अच्छा, जो कुछ हुआ सो हुआ। अब यह बतलाइए कि कल शिकार खेलने जाइएगा या नहीं?

बोस - जायगा जो जरूर करके, मगर फील का बान बोदजाती करेगा, तो हम आपका बुराई छपवा देगा। हमारे हाथी पर बेगम शाब बैठे तो हम चला जायगा।

सुरैया - बेगम साहब तो तुझ ऐसों को अपना साया तक न छूने दें। पहले मुँह तो बनवा!

बोस - अब हमारे को डर पास नहीं आते, हम खूब समझ गया कि जान जानेवाला नहीं है।

नवाब - अच्छा जाइए, कल आइएगा।

जब नवाब और सुरैया बेगम अकेले रह गए तो नवाब ने कहा - देखो सुरैया बेगम, इस जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। अभी कल की बात है कि शाहजादा हुमायूँ फर के निकाह की तैयारियाँ हो रही थीं और आज उनकी कब्र बन रही है। इसलिए इनसान को चाहिए कि जिंदगी के दिन हँसी-खुशी से काट दे। यहाँ तो सिर्फ यही ख्वाहिश है कि हम हों और तुम हो। मुझे किसी से मतलब न सरोकार। अगर तुम साथ रहो तो खुदा गवाह है, बादशाही की हकीकत न समझूँ। अगर यकीन न आए तो आजमा लो।

बेगम - आप साफ-साफ अपना मंशा बतलाइए। मैं आपकी बात कुछ नहीं समझी।

नवाब - साफ-साफ कहते हुए डर मालूम होता है।

बेगम - नहीं, यह क्या बात है, आप कहें तो।

नवाब - (दबी जबान से) निकाह!

बेगम - सुनिए, मुझे निकाह में कोई उज्र नहीं। आप अव्वल तो कमसिन, दूसरे रईसजादे, तीसरे खूबसूरत, फिर मुझे निकाह में क्या उज्र हो सकता है। लेकिन रफ्ता-रफ्ता अर्ज करूँगी कि किस सबब से मुझे मंजूर नहीं।

नवाब - हाय-हाय! तुमने यह क्या सितम ढाया?

बेगम - मैं मजबूर हूँ, इसकी वजह फिर बयान करूँगी?

नवाब - अगर मंजूर नहीं तो हमें कत्ल कर डालो। बस छुट्टी हुई। अब जिंदगी और मौत तुम्हारे हाथ है।

दूसरे दिन नवाब साहब सो ही रहे थे कि खिदमतगार ने आ कर कहा - हुजूर, और सब लोग बड़ी देर से तैयार हैं, देर हो रही है।

नवाब साहब ने शिकारी लिबास पहना और सुरैया बेगम के साथ हाथी पर सवार हो कर चले।

बेगम - वह बाबू आज कहाँ हैं? मारे डर के न आते होंगे!

बोस - हम तो आज शुबु से ही साथ-साथ हैगा। अब हमारे को कुछ खोफ लगती नहीं।

बेगम - बाबू, तुम्हारे को हाथी तो नहीं हिलती?

घोष - ना, आज हाथी नहीं हिलती। कल का बात कल के साथ गया।

हाथी चले। थोड़ी दूर जाने पर लोगों ने इत्तला दी कि शेर यहाँ से आध मील पर है और बहुत बड़ा शेर है। नवाब साहब ने खुश हो कर कहा - हाथियों को दौड़ा दो। बाबुओं के फीलबान ने जो हाथी तेज किया, तो बेास बाबू मुँह के बल जमीन पर आ रहे।

घोष - अरे शाला, जमीन पर गिरा दिया!

फीलबान - चुप-चुप, गुल न मचाइए, मैं हाथी रोके लेता हूँ।

घोष - गुल न मचाएँ तो फिर क्या मचाएँ?

फीलबान - वह देखिए, बाबू साहब उठ बैठे, चोट नहीं आई।

घोष - महाशाई, लागे ने तो?

बोस - बड़ी बोद लोग।

घोष - अपना समाचार बोलो।

बोस - अपना समाचार की बोलबो बाबा!

मिस्टर बोस झाड़-पोंछ कर उठे और महावत को हजारों गालियाँ दीं।

बोस - महाशाई, तुम ईश को मारो, मारो ईश दुष्ट को।

घोष - ओ शाला, तुम्हारा शिर पर बाल नहीं, हम पट्टे पकड़ कर तुमको मार डालने माँगता।

फीलबान हँस दिया। इस पर बोस आगे हो गए, और कई ढेले चलाए, मगर कोई ढेला फीलबान तक न पहुँच सका। फीलबान ने कहा - हुजूर, अब हाथी पर बैठ लें तो हम नवाब साहब के हाथियों से मिला दें। बोस बोले - हम डरपोक आदमी नहीं है। हम महाराजा बड़ौदा के यहाँ किसिम-किसिम का जानवर देख चुका है।

घोष - अब बातें कब तक करेगा। आके बैठ जा।

फीलबान - हुजूर, कुरान की कसम खा कर कहता हूँ, मेरा कुसूर नहीं। आप कभी हाथी पर सवार तो हुए नहीं। हौदे पर लटक कर बैठे हुए थे। हाथी जो हिला तो आप भद से गिर पड़े।

बोस - हमारा दिल में आई कि तुम्हारा कान नोच डाले। हम कभी हाथी पर नहीं चढ़ा? तुम बोलता है। तुम्हारा बाप के सामने हम हाथी पर चढ़ा था। तुम क्या जानेगा।

जब शेर थोड़ी दूर पर रह गया और नवाब साहब ने देखा कि बाबूवाला हाथी नहीं है तो डरे कि न जाने उन बेचारों की क्या हालत होगी। हुक्म दिया कि सब हाथी रोक लिए जायँ और धरतीधमक को दौड़ा कर ले जाओ। देखो, उन बेचारों पर क्या तबाही आई!

धरतीधमक रवाना हुआ और कोई दस-बारह मिनट में बाबू साहबों का हाथी दूर से नजर आया। जब हाथी करीब आया तो नवाब ने पूछा - बाबू साहब, खैरियत तो है? हाथी कहाँ रह गया था? बाबू साहबों ने कुछ जवाब न दिया; मगर फीलवान बोला - हुजूर, यह दोनों बाबू लोग आपस में लड़ते थे, इसी से देर हो गई।

अब बोस बाबू से न रहा गया। बिगड़ कर बोले - ओ शाला, तुम हमारे मुँह पर झूठ बोलता है। तुम शाला बिला कहे हाथी को दौड़ा दिए, हम तो गाफिल पड़ा था।

इतने में आदमियों ने इत्तला दी कि शेर समने की झील के किनारे लेटा हुआ है। लोग बंदूकें सँभाल-सँभाल कर आगे बढ़े तो देखा, एक बनैला सुअर ऊँची-ऊँची घास में छिपा बैठा है। सबकी सलाह हुई कि चारों तरफ से खाली निशाने लगाए जायँ ताकि घबरा कर निकले, मगर नवाब साहब के दिल में ठन गई कि हम इस पतावर में हाथी जरूर ले जायँगे। सुरैया बेगम अब तक तो सैर देखती थीं मगर पतावर में जाना बहुत अखरा। बोलीं - नवाब, तुम्हारे सिर की कसम, अब हम न जायँगे। पतावर तलवार की धार से भी ज्यादा तेज होती है। हमें किसी और हाथी पर बिठा दो।

नवाब ने दो शिकारियों को अपने हाथी पर बिठा लिया और सुरैया बेगम को दूसरे हाथी पर बिठा दिया। एक और हाथी उनके साथ-साथ उनकी हिफाजत के लिए छोड़ दिया गया। तब नवाब साहब पतावर में पहुँचे। जब सुअर ने देखा कि दुश्मन चला आ रहा है तो उठा और भाग खड़ा हुआ। नवाब साहब ने गोली चलाई। फिर और शिकारियों ने भी बंदूकें सर कीं! सुअर तड़प कर झील की तरफ झपटा। इतने में तीसरे गोली आई। लोगों ने समझा कि अब काम तमाम हो गया। नवाब साहब को शौक चर्राया कि उसे अपने हाथ से कत्ल करें। हाथी से उतर कर तलवार म्यान से निकाली और साथियों को झील के किनारे इधर-उधर हटा दिया कि सुअर समझे, सब चल दिए हैं। जब सुअर ने देखा कि मैदान खाली है तो आहिस्ता-आहिस्ता झील से निकला। नवाब साहब घात में थे ही, ताक कर ऐसा हाथ दिया कि बनैला बोल गया। लोगों ने चारों तरफ से वाह-वाह का शोर मचाना शुरू किया।

एक - हुजूर, यह करामात है।

दूसरा - सुभान अल्लाह, क्या तुला हुआ हाथ लगाया कि बोला तक नहीं।

तीसरा - तलवार के धनी ऐसे ही होते हैं। एक ही हाथ में चौरंग कर दिया । क्या हाथ पड़ा है, वाह!

चौथा - धूम पड़ गई, धूम पड़ गई। क्या कमाल है, एक ही वार में ठंडा हो गया!

नवाब - अरे भाई देखते हो! बरसों शिकार की नौबत नहीं आती, मगर लड़कपन से शिकार खेला है। वह बात कहाँ जा सकती है। जरा किसी सूरत से बेगम साहब को यहाँ लाते और उनको दिखाते कि हमने कैसा शिकार किया है!

बेगम साहब का हाथी आया तो बनैले को देख कर डर गईं। अल्लाह जानता है, तुम लोगों को जान की जरा भी परवा नहीं। और जो फिर पड़ता तो कैसी ठहरती।

नवाब - तारीफ न की, कितनी जवाँमर्दी से अकेले आदमी ने शिकार किया। लाश तो देखो, कहाँ से कहाँ तक है!

एक मुसाहब - हुजूर ने वह काम किया जो सारी दुनियाँ में किसी से नहीं हो सकता। दस-पाँच आदमी मिल कर तो जिसे चाहे मार लें; मगर एक आदमी का तलवार ले कर बनैले से भिड़ना जरा मुश्किल है।

बेगम - ऐ है, तुम अकेले शिकार करने गए थे! कसम खुदा की, बड़े ढीठ हो। मेरे तो रोएँ खड़े हुए जाते हैं।

नवाब - अब तो हमारी बहादुरी का यकीन आया कि अब भी नहीं!

यहाँ से फिर शिकार के लिए रवाना हुए। बनैले का शिकार तो घाते में था। झील के करीब पहुँचे, तो हाथी जोर-जोर से जमीन पर पाँव पटकने लगा।

फीलबान - शेर यहाँ से बीस कदम पर है। बस यही समझिए कि अब निकला, अब निकला। काशीसिंह, हाथी पर आ जाओ। दिलाराम से भी कहो, बहुत आगे न बढ़े।

काशीसिंह - हुँह, सहर के मनई, नेवला देखे डर जायँ, हमका राह देखावत हैं। वह सेर तो हम सवा सेर!

नवाब - यह उजडुपन अच्छा नहीं। काशीसिंह, आ जाओ। दिलाराम, तुम भी किसी और हाथी पर चले जाओ। मानो कहना।

दिलाराम - हुजूर, चार बरस की उमिर से बाघ मारत चला आवत हाँ, खा जाई, ससुर खा जाय।

बेगम - ऐ है, बड़े ढीठ हैं। नवाब, तुम अपना हाथी सब हाथियों के बीच में रखो। हमारे कलेजे की धड़कन को तो देखो।

अब सुनिए कि इत्तफाक से एक शिकारी ने शेर देख लिया। एक दरख्त के नीचे चित सो रहा था? उन्होंने किसी से न कुछ कहा, न सुना, बंदूक दाग ही तो दी। गोली पीठ पर पड़ी। शेर आग हो गया और गरजता हुआ लपका, तो खलबली मच गई। आते ही काशीसिंह को एक थप्पड़ दिया, दूसरा थप्पड़ देने को ही था कि काशीसिंह सँभला और तलवार लगाई। तलवार हाथ पर पड़ी। तलवार खाते ही हाथी की तरफ झपटा, और नवाब साहब के हाथी के दोनों कान पकड़ लिए। हाथी ने ठोकर दी तो शेर 5-6 कदम पर गिरा। इधर हाथी, उधर शेर, दोनों गरजे। बाबू साहबों ने दोहाई देनी शुरू की।

बोस - अरे, हमारा नानी मर गया। अरे, बाबा, हम तो काल ही से रोता था कि हम नहीं जायगा।

घोष - ओ भाई, तुम शेर को रोक लेगा जल्दी से।

बोस - हम नीचे होता तो जरूर करके रोक लेता।

दो हाथी तो शेर की गरज सुन कर भागे; मगर बाबू का हाथी डटा खड़ा था। इस पर बोस ने रो कर कहा - ओ शाला हमारा हाथी, अरे तुम किस माफिक भागता नहीं! तुम्हारा भाई भो जाता है, तुम क्यों खड़ा है?

शेर ने झपट कर नवाब साहब के हाथी के मस्तक पर एक हाथ दिया तो गोश्त खिंच आया। नवाब साहब के हाथ-पाँव फूल गए। एक शिकारी जो उनके पीछे बैठा था, नीचे गिर पड़ा। शेर ने फिर थप्पड़ दिया। इतने में एक चौकीदार ने गोली चलाई। गोली सिर तोड़ कर बाहर निकल गई और शेर गिर पड़ा, मगर नवाब साहब ऐसे बदहवास थे कि अब तक गोली न चलाई। लोग समझे, शेर मर गया। दो आदमी नजदीक गए और देख कर बोले, हुजूर, अब इसमें जान नहीं है, मर गया। नवाब साहब हाथी से उतरने ही को थे कि शेर गरज कर उठा और एक चौकीदार को छाप बैठा। चारों तरफ हुल्लड़ मच गया। कोई बंदूक छतियाता है, कोई ललकारता है। कोई कहता है - तलवार ले कर दस-बारह आदमी पहुँच जाओ, अब शेर नहीं उठ सकता।

नवाब - क्या कोई गोली नहीं लगा सकता?

एक - हुजूर, शेर के साथ आदमी की भी जान जायगी।

नवाब - तुम तो अपनी बड़ी तारीफ करते थे। अब वह निशानेबाजी कहाँ गई? लगाओ गोली।

गोली पीठ को छूती हुई निकल गई। शिकारी ने एक और गोली लगाई तो शेर का काम तमाम हो गया। मगर यह गोली इस उस्तादी से चलाई थी कि चौकीदार पर आँच न आने पाई। सब लोगों ने तारीफ की। शेर ऊपर था और चौकीदार नीचे। सात आदमी तलवार ले कर झपटे और शेर पर वार करने लगे। जब खूब यकीन हो गया कि शेर मर गया तो लाश को हटाया। देख कि चौकीदार मर रहा है।

नवाब - गजब हो गया यारो, हा! अफसोस।

बेगम - हाथी यहाँ से हटा ले चलो। कहते थे कि शिकार को न चलो। तुमने मेरा कहा न माना।

नवाब - फीलबान, हाथी बिठा दे, हम उतरेंगे।

बेगम - उतरने का नाम भी न लेना। हम न जाने देंगे।

नवाब - बेगम, तुम तो हमको बिलकुल डरपोक ही बनाया चाहती हो। हमारा आदमी मर रहा है, मुझे दूसरे से तमाशा देखना मुनासिब नहीं।

बेगम ने नवाब के गले में हाथ डाल कर कहा - अच्छी बात है, जाइए, अब या तो हम-तुम दोनों गिरेंगे या यहीं रहेंगे।

नवाब दिल में बहुत खुश हुए कि बेगम को मुझसे इतनी मुहब्बत है। आदमियों से कहा - जरा देखो, उसमें कुछ जान बाकी है? आदमियों ने कहा - हुजूर, इतना बड़ा शेर, इतनी देर तक छापे बैठा रहा। बेचारा घुट-घुट के कभी मर गया होगा!

बेगम - अब फिर तो कभी शिकार को न आओगे? एक आदमी की जान मुफ्त में ली?

नवाब - हमने क्यों जान ली, जो हमीं को शेर मार डालता!

बेगम - क्या मनहूस बातें जबान से निकालते हो, जब देखो, अपने को कोसा करते हो।

खेमे में पहुँच कर नवाब साहब ने वापसी की तैयारियाँ कीं और रातों-रात घर पहुँच गए।


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