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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


आजाद बंबई से चले तो सबसे पहले जीनत और अख्तर से मुलाकात करने की याद आई। उस कस्बे में पहुँचे तो एक जगह मियाँ खोजी की याद आ गई। आप ही आप हँसने लगे। इत्तिफाक से एक गाड़ी पर कुछ सवारियाँ चली जाती थीं। उनमें से एक ने हँस कर कहा - वाह रे भलेमानस, क्या दिमाग पर गरमी चढ़ गई है क्या आजाद रंगीन मिजाज आदमी तो थे ही। आहिस्ता से बोले - जब ऐसी-ऐसी प्यारी सूरतें नजर आएँ तो आदमी के होश-हवास क्योंकर ठिकाने रहें। इस पर वह नाजनीन तिनक कर बोली - अरे, यह तो देखने को ही दीवाना मालूम होते थे, अपने मतलब के बड़े पक्के निकले। क्यों मियाँ, यह क्या सूरत बनाई है, आधा तीतर और आधा बटेर? खुदा ने तुमको वह चेहरा-मोहरा दिया है कि लाख दो लाख में एक हो। अगर इस शक्ल-सूरत पर जो लंबे-लंबे बाल हों, बालों में सोलह रुपए वाला तेल पड़ा हो, बारीक शरबती का अँगरखा हो, जालीलोट के कुरते से गोरे-गोरे डंड नजर आएँ, चुस्त घुटन्ना हो, पैरों में एक अशर्फी का टाटबाफी बूट हो, अँगरखे पर कामदानी की सदरी हो, सिर से पैर तक इत्र में बसे हो, मुसाइबों की टोली साथ हो, खिदमतगारों के हाथ में काबुकें और बटेरें हों और इस ठाट के साथ चौक में निकलो, तो अँगुलियाँ उठें कि वह रईस जा रहा है! तब लोग कहें कि इस सज-धज, नख-सिख, कल्ले-ठल्ले का गभरू जवान देखने में नहीं आया। यह सब छोड़ पट्टे कतरवाके लंडूरे हो गए, ऐ वाह री आपकी अक्ल!

आजाद - जरा मैं तो जानूँ कि किसकी जबान से यह बातें सुन रहा हूँ। इनसान हम भी हैं, फिर इनसान से क्या परदा?

नाजनीन - अच्छा, तो आप भी इनसान होने का दम भरते हैं। मेढकी भी चली मदारों को।

आजाद - खैर साहब, इनसान न सही।

नाजनीन - (परदा हटा कर) ऐ साहब लीजिए, बस अब तो चार आँखें हुई, अब कलेजे में ठंडक पहुँची?

आजाद ने देखा तो सोचने लगे कि यह सूरत तो कहीं देखी हे और अब खयाल आता है कि आवाज भी कहीं सुनी है। मगर इस वक्त याद नहीं आता कि कहाँ देखा था।

नाजनीन - पहचाना? भला आप क्यों पहचानने लगे! रुतबा पा कर कौन किसे पहचानता है?

आजाद - इतना तो याद आता है कि कहीं देखा है, पर यह खयाल नहीं कि कहाँ देखा है।

नाजनीन - अच्छा, एक पता देते हैं, अब भी न समझो तो खुदा तुमसे समझे। याद है, किसने यह गजल गाई थी...?

कोई मुझ सा दीवाना पैदा न होगा,
हुआ भी तो फिर ऐसा रुसवा न होगा।
न देखा हो जिसने कहे उसके आगे,
हमें लंतरानी सुनाना न होगा।

आजाद - अब समझ गया! जहूरन, वहाँ की खैर-आफियत बयान करो। उन्हीं दोनों बहनों से मिलने के लिए बंबई से चला आ रहा हूँ।

जहूरन - सब खुदा का फजल है। दोनों बहनें आराम से हैं, अख्तर के मियाँ तो उनका जेवर खा-पी कर भाग गए, अब उन्होंने दूसरी शादी कर ली है। जीनत बेगम खुश हैं।

आजाद - तो अब हम उनके मैके जायँ या ससुराल?

जहूरन - ससुराल न जाइए, मैके में चलिए और वहाँ से किसी महरी के जबानी पैगाम भेजिए। हमने तो हुजूर को देखते ही पहचान लिया।

आजाद - हमको इन दोनों बहनों का हाल बहुत दिनों से नहीं मालूम हुआ।

जहूरन - यह तो हुजूर, आप ही का कुसूर है; कभी आपने एक पुरजा तक न भेजा। जिस दिन जीनत बेगम के मियाँ ने उनसे कहा कि लो, आजाद वापस आते हैं तो मारे खुशी के खिल उठीं। तो अब आना हो तो आइए, शाम होती है।

थोड़ी देर में आजाद जीनत बेगम के मकान पर जा पहुँचे। जहूरन ने जा कर उनकी चाची से आजाद के आने की इत्तला की। उसने आजाद को फौरन बुला लिया।

आजाद - बंदगी अर्ज करता हूँ। आप तो इतने ही दिनों में बूढ़ी हो गईं।

चाची - बेटा, अब हमारे जवानी के दिन थोड़े ही हैं। तुम तो खैर आफियत के साथ आए? आँखें तुम्हें देखने को तरस गईं।

आजाद - जी हाँ, मैं खैरियत से आ गया। दोनों साहबजादियों को बुलवाइए। सुना, जीनत की भी शादी हो गई है।

चाची - हाँ, अब तो दोनों बहनें आराम से हैं। अख्तरी का पहला मियाँ तो बिलकुल नालायक निकला। जेवर गहना-पाता, सब बेच कर खा गया और खुदा जाने, किधर निकल गया। अब दूसरी शादी हुई है। डाक्टर हैं। साठ तनख्वाह है और ऊपर से कोई चार रुपया रोज मिलता है। जीनत के मियाँ स्कूल में पढ़ाते हैं। दो सौ की तलब है। तुम्हारे चाचाजान तो मुझे छोड़ कर चल दिए।

इधर महरी ने जा कर दोनों बहनों को आजाद के आने की खबर दी। जीनत ने अपनी आया को साथ लिया और मैके की तरफ चली। घर के अंदर कदम रखते ही आजाद से हाथ मिला कर बोली - वाह रे बेमुरव्वतों के बादशाह! क्यों साहब, जब से गए, एक पुरजा तक भेजने की कसम खा ली?

आजाद - यह तो न कहोगी कि सबसे पहले तुम्हारे दरवाजे पर आया। यह तो फरमाइए कि यह पोशाक कब से अख्तियार की?

जीनत - जब से शादी हुई। उन्हें अंगरेजी पोशाक बहुत पसंद है।

आजाद - जीनत, खुदा गवाह है कि इस वक्त जामे में फूला नहीं समाता। एक तो तुमको देखा और दूसरे यह खुशखबरी सुनी कि तुम्हारे मियाँ पढ़े-लिखे आदमी हैं और तुम्हें प्यार करते हैं। मियाँ-बीवी में मुहब्बत न हो तो जिंदगी का लुत्फ ही क्या।

इतने में अख्तरी भी आ गई और आते ही कहा - मुबारक!

आजाद - आपको बड़ी तकलीफ हुई, मुआफ करना।

अख्तर - मैंने तो सुना था कि तुमने वहाँ किसी साइसिन से शादी कर ली।

आजाद - और तुम्हें इसका यकीन भी आ गया?

अख्तर - यकीन क्यों न आता। मर्दों के लिए यह कोई नई बात थोड़ी ही हैं। जब लोग एक छोड़, चार-चार शादियाँ करते हैं तो यकीन क्यों न आता।

आजाद - वह पाजी है जो एक के सिवा दूसरी का खयाल भी दिल में लाए।

जीनत - ऐसे मियाँ-बीवी का क्या कहना, मगर यहाँ तो वही पाजी नजर आते हैं जो बीवी के होते भी उसकी परवा नहीं करते।

आजाद - अगर बीवी समझदार हो तो मियाँ कभी उसके काबू से बाहर न हो।

अख्तर - यह तो हम मान चुके। खुदा न करे कि किसी भलेमानस का पाला शोहदे मियाँ से पड़े।

जीनत - जिसके मिजाज में पाजीपन हो उससे बीवी की कभी न पटेगी। मियाँ सुबह से जायँ तो रात के एक बजे घर में आएँ और वह भी किसी रोज आए, किसी रोज न आए। बीवी बेचारी बैठी उनकी राह देख रही है। बाज तो ऐसे बेरहम होते हैं कि बात हुई और बीवी को मार बैठे।

आजाद - यह तो धुनिया जुलाहों की बातें हैं।

जीनत - नहीं जनाब, जो लोग शरीफ कहलाते हैं उनमें भी ऐसे मर्दों की कमी नहीं है।

अख्तर - ऐ चूल्हे में जायँ ऐसे मर्द, जभी तो बेचारियाँ कुएँ में कूद पड़ती हैं, जहर खाके सो रहती हैं।

जीनत - मुझे खूब याद है कि एक औरत अपने मियाँ को जरा सी बात पर हाथ फैला-फैला कोस रही थी कि कोई दुश्मन को भी न कोसेगा।

आजाद - जहाँ ऐसे मर्द हैं वहाँ ऐसी औरतें भी हैं।

अख्तर - ऐसी बीवी का मुँह लेके झुलस दे।

जीनत - मेरे तो बदन के रोएँ खडे हो गए।

आजाद - मेरी तो समझ ही में नहीं आता कि ऐसे मियाँ और बीवी में मेलजोल कैसे हो जाता है।

इस तरह बातें करते-करते यूरोपियन लेडियों की बात चल पड़ी। जीनत और अख्तर ने हिंदोस्तानी औरतों की तरफदारी की और आजाद ने यूरोपियन लेडियों की।

आजाद - जो आराम यूरोप की औरतों को हासिल है वह यहाँ की औरतों को कहाँ नसीब। धूप में अगर मियाँ-बीवी साथ चलते हों तो मियाँ छतरी लगाएगा।

अख्तर - यहाँ भी महाजनों को देखो। औरतें दस-दस हजार का जेवर पहन कर निकलती हैं और मियाँ लँगोटा लगाए दुकान पर मक्खियाँ मारा करते हैं।

आजाद - यहाँ की औरतों को तालीम से चिढ़ है।

जीनत - इसका इलजाम भी मर्दों ही की गरदन पर है। वह खुद औरतों को पढ़ाते डरते हैं कि कहीं ये उनकी बराबरी न करने लगें।

आजाद - हमारे मकान के पास एक महाजन रहते थे। मैं लड़कपन में उनके घर खेलने जाया करता था। जैसे ही मियाँ बाहर से आता, बीवी चारपाई से उतर कर जमीन पर बैठ जाती। अगर तुमसे कोई कहे कि मियाँ के सामने घूँघट करके जाओ तो मंजूर करो या नहीं?

अख्तर - वाह, यहाँ तो घर में कैद न रहा जाय, घूँघट कैसा!

आजाद - यूरोपियन लेडियों को घर के इंतजाम का जो सलीका होता है, वह हमारी औरतों को कहाँ?

जीनत - हिंदोस्तानी औरतों में जितनी वफा होती है वह यूरोपियन लेडियों में तलाश करने से भी न मिलेगी। यहाँ एक के पीछे सती तो जाती हैं, वहाँ मर्द के मरते ही दूसरी शादी कर लेती हैं।


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