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उपन्यास

आजाद-कथा
भाग दो

रतननाथ सरशार

अनुवाद - प्रेमचंद


सुरैया बेगम मियाँ आजाद की जुदाई में बहुत देर तक रोया कीं, कभी दारोगा पर झल्लाईं, कभी अब्बासी पर बिगड़ीं, फिर सोचतीं कि अलारक्खी के नाम से नाहक बुलवाया, बड़ी भूल हो गई; कभी खयाल करतीं की वादे के सच्चे हैं। कल शाम को जरूर आएँगे, हजार काम छोड़के आएँगे। रात भींग गई थी, महरियाँ सो रही थीं, महलदार ऊँघता था, शहर-भर में सन्नाटा था; मगर सुरैया बेगम की नींद मियाँ आजाद ने हराम कर दी थी -

भरे आते हैं आँसू आँख में ऐ यार क्या बाइस,
निकलते हें सदफ से गौहरे शहवार क्या बाइस?

सारी रात परेशानी में गुजरी, दिल बेकरार था, किसी पहलू चैन नहीं आता था, सोचतीं कि अगर मियाँ आजाद वादे पर न आए तो कहाँ ढूँढ़ूँगी, बूढ़े दारोगा पर दिल ही दिल में झल्लाती थीं कि पता तक नहीं पूछा। मगर आजाद तो पक्का वादा कर गए थे, लौट कर जरूर मिलेंगे, फिर ऐसे बेदर्द कैसे हो गए कि हमारा नाम भी सुना और परवा न की। यह सोचते-सोचते उन्होंने यह गजल गानी शुरू की -

न दिल को चौन मर कर भी हवाए यार में आए;
तड़प कर खुल्द से फिर कूचए दिलदार में आए।
अजब राहत मिली, कुछ दीन-दुनिया की नहीं परवा;
जुनूँ के साया में पहुँचे बड़ी सरकार में आए।
एवज जब एक दिल के लाख दिल हों मेरे पहलू में;
तड़पने का मजा तब फुरकते दिलदार में आए।
नहीं परवा, हमारा सिर जो कट जाए तो कट जाए,
थके बाजू न कातिल का न बल तलवार में आए।
दमे-आखिर वह पोछे अश्क 'सफदर' अपने दामन से;
इलाही रहम इतना तो मिजाजे यार में आए।
सुरैया बेगम को सारी रात जागते गुजरी।
सबेरे दारोगा ने आ कर सलाम किया।

बेगम - आज का इकरार है न?

दारोगा - हाँ हुजूर, खुदा मुझे सुर्खरू करे। अलारक्खी का नाम सुन कर तो वे बेखुद हो गए। क्या अर्ज करूँ हुजूर!

बेगम - अभी जाइए और चारों तरफ तलाश कीजिए।

दारोगा - हुजूर, जरा सबेरा तो हो ले, दो-चार आदमियों से मिलूँ, पूछूँ-वूछूँ, तब तो मतलब निकले। यों उटक्करलैस किस मुहल्ले में जाऊँ और किससे पूछूँ?

अब्बासी - हुजूर, मुझे हुक्म हो तो मैं भी तलाश करूँ। मगर भारी सा जोड़ा लूँगी।

बेगम - जोड़ा? अल्लाह जानता है, सिर से पाँव तक जेवर से लदी होगी।

बी अब्बासी बन-ठन कर चलीं और उधर दारोगा जी मियाने पर लद कर रवाना हुए। अब्बासी तो खुश-खुश जाती थी और यह मुँह बनाए सोच रहे थे कि जाऊँ तो कहाँ जाऊँ? अब्बासी लहँगा फड़काती हुई चली जाती थी कि राह में एक नवाब साहब की एक महरी मिली। दोनों में घुल-घुल कर बातें होने लगीं।

अब्बासी - कहो बहन खुश तो हो?

बन्नू - हाँ बहन, अल्लाह का फजल है। कहाँ चलीं?

अब्बासी - कुछ न पूछो बहन, एक साहब का पता पूछती फिरती हूँ।

बन्नू - कौन हैं, मैं भी सुनूँ।

अब्बासी - यह तो नहीं जानती, पर नाम है मियाँ आजाद। खासे घबरू जवान हैं।

बन्नू - अरे, उन्हें मैं खूब जानती हूँ। इसी शहर में रहनेवाले हैं। मगर हैं बड़े नटखट, सामने ही तो रहते हैं। कहीं रीझी तो नहीं हो? है तो जवान ऐसा ही।

अब्बासी - ऐ, हटो भी? यह दिल्लगी हमें नहीं भाती।

बन्नू - लो, यह मकान आ गया। इसी में रहते हैं! 'जोरू न जाँता, अल्लाह मियाँ से नाता।'

बन्नू तो अपनी राह गई, अब्बासी एक गली में हो कर एक बुढ़िया के मकान पर पहुँची। बुढ़िया ने पूछा - अब किस सरकार में हो जी!

अब्बासी - सुरैया बेगम के यहाँ।

बुढ़िया - और उनके मियाँ का क्या नाम है?

अब्बासी - जो तजवीज करो।

बुढ़िया - तो क्वाँरी हैं या बेवा! कोई जान-पहचान मुलाकाती है या कोई नहीं है?

अब्बासी - एक बूढ़ी सी औरत कभी-कभी आया करती हैं। और तो हमने किसी को आते-जाते नहीं देखा।

बुढ़िया - कोई देवजाद भी आता-जाता है?

अब्बासी - क्या मजाल! चिड़िया तक तो पर नहीं मार सकती? इतने दिनों में सिर्फ कल तमाशा देखने गई थीं।

बुढ़िया - ऐ लो, और सुनो। तमाशा देखने जाती है और फिर कहती हो कि ऐसी-वैसी नहीं हैं? अच्छा, हम टोह लगा लेंगी।

अब्बासी - उन्होंने तो कसम खाई है कि शादी ही न करूँगी, और अगर करूँगी भी तो एक खूबसूरत जवान के साथ जो आपका पड़ोसी है। मियाँ आजाद नाम है।

बुढ़िया - अरे, यह कितनी बड़ी बात है! गो मैं वहाँ बहुत कम आती-जाती हूँ, पर वह मुझे खूब जानते हैं! बिल्कुल घर का सा वास्ता है। तुम बैठो, मैं अभी आदमी भेजती हूँ।

वह कह कर बुढ़िया ने एक औरत को बुला कर कहा - छोटे मिरजा के पास जाओ और कहो कि आपको बुलाती हें। या तो हमको बुलाइए या खुद आइए।

इस औरत का नाम मुबारक कदम था। उसने जा कर मिरजा आजाद को बुढ़िया का पैगाम सुनाया - हुजूर, वह खबर सुनाऊँ कि आप भी फड़क जायँ। मगर इनाम देने का वादा कीजिए।

आजाद - नहीं, अगर मालामाल न कर दें।

मुबारक - उछल पड़िएगा।

आजाद - क्या कोई रकम मिलने वाली है?

मुबारक - अजी, वह रकम मिले कि नवाब हो जाओ। एक बेगम साहबा ने पैगाम भेजा है। बस, आप मेरी बुढ़िया के मकान तक चले चलिए।

आजाद - उनको यहीं न बुला लाओ।

मुबारक - मैं बैठी हूँ, आप बुलवा लीजिए।

थोड़ी देर में बुढ़िया एक डोली पर सवार आ पहुँची और बोली - क्या इरादे हैं? कब चलिएगा?

आजाद - पहले कुछ बातें तो बताओ। हसीन है न?

बुढ़िया - अजी, हुस्न तो वह है कि चाँद भी मात हो जाय, और दौलत का तो कोई ठिकाना नहीं; तो कब चलने का इरादा है?

आजाद - पहले खूब पक्का-पोढ़ा कर लो, तो मुझे ले चलो। ऐसा न हो कि वहाँ चल कर झेंपना पड़े।


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