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कहानी

यह आम रास्ता नहीं है
मिथिलेश प्रियदर्शी


एक जूते चमकाने वाले आदमी का ध्यान बरबस आपके पैरों की ओर चला जाता है, नाई की नजरें आपके बाल-दाढ़ी को टोहती रहती हैं और सुनार को आपके शरीर की सूनी जगहें तुरंत सूझ जाती हैं। पेशे का मसला ठहरा। लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है, क्योंकि मैं किसी भी नजरिए से पेशेवर नहीं हूँ। मगर मैं बेरिहाइश हूँ, इसलिए कुछ-कुछ ऐसा ही हो रहा है। आस-पास का सारा माहौल गुम हो गया है। आँखें बस लोगों के घरों पर जमी है। एक अदद बसेरे की तलाश में।

खोल कर कहूँ तो हाल यह है कि इन दिनों मैं कई बार की तरह एक बार फिर भीषण रूप से बेघरपने का शिकार हूँ। सड़क पर आया नहीं हूँ, मगर अगले दस दिनों में यदि कोई कमरा नहीं मिला तो शर्तिया आ जाऊँगा। शहर में कदम रखने के बाद, पिछले दो महीने से जो छत नसीब थी, उस पर काफी दबाव है। किसी चेतावनी से कतई कम नहीं, तीन तारीखें मिल गई हैं और जाया भी हो गई है। सिर पर लटकते कटार की तरह चौथी सामने है। अब यहाँ से कुछ भी अनहोनी या खतरनाक हो सकता है। शहर नया है, लोग नए हैं, पुलिस नई है, गुंडे नए हैं। गड़बड़ी हुई तो बहुत गड़बड़ी हो जाएगी। इसलिए किसी भी हालत में एक कमरा चाहिए बस।

बस इसलिए, सड़क चलते बड़ी हसरत से लोगों के मकानों के आगे 'टु लेट' लिखे तख्ते खोजता फिरता रहता हूँ। चलता हूँ आगे, पर देखता हूँ बाएँ-दाएँ। इस काम में मेरी तल्लीनता इस कदर गहराती जा रही है कि अंधाधुंधी में टकराने, गालियाँ सुनने, ठोकर खाने या कभी-कभी गिर कर चोटिल होने के मौकों की संभावनाएँ खासी बढ़ आई हैं। सोचिए कि पागलों पर भौंकने वाले लगभग पागल हो चुके कुत्ते वीरानी दोपहरों में मुझे यूँ भटकते, लोगों के घरों में बाहर से झाँकते देख भौंकते-भौंकते हलाकान हो हलक की प्यास बुझाने चुपचाप दूसरी गलियों की ओर चल देते हैं।

खड़े-खड़े बारूद को जला देने वाली गर्मी, अनवरत थकाऊ भटकाव और तय तारीख को कमरा खाली कर देने की धमकी ने मुझे बदहवास सा कर दिया है। हर सुबह कहीं काम पर जाने की तरह कमरे की तलाश में निकलता हूँ। रोज-रोज नए प्रयोग करता हूँ। अच्छी तरह से साफ और इस्त्री किए हुए कडक कपड़े पहनता हूँ। बाल-दाढ़ी और जूतों की स्थिति ठीक करता हूँ। गंभीर और मामूली रूप से ही सही पर संभ्रात दिखने की हरसंभव कोशिश करता हूँ। लाख परेशान और टूटे हुए होने के बावजूद चेहरे की मुद्रा, बातों और चाल को सलीके से साध कर अपने व्यक्तित्व को वजनी और खुशनुमा बनाए रखता हूँ। इन तैयारियों के साथ घूमते-घूमते शहर खत्म हो जाता है पर कमरा हाथ नहीं आता। दिनभर में तकरीबन चार-पाँच दर्जन घरों में झाँकता हूँ। हर घर में संभावनाओं की रोशनी तलाशता हूँ। घर के बाहर किसी को न पाने पर फाटक खटखटाता हूँ, बिजली की घंटियाँ बजाता हूँ। अपनी असहायता छिपाता हुआ घर के मालिक को देखकर सभ्यता से मुसकराता हूँ, नमस्ते कहता हूँ और उनसे बात करने लायक आत्मविश्वास जुटाता हूँ। और अंततः बात न बनने पर थके हुए निराश शब्दों के साथ औपचारिकता में कि माफ कीजिएगा मैंने आपका बेशकीमती वक्त जाया किया, घर मालिक को शुक्रिया के साथ एक बार फिर से अभिवादन करता हूँ और अगले घर की ओर बढ जाता हूँ। इस जानलेवा गर्मी में यह सब अत्यंत हताशाजनक है।

छोटे और बिल्कुल छोटे घर, एक से ज्यादा तल्ले वाले घर, काँच की खिड़कियों और रंगीन खूबसूरत पर्दे और गाड़ियों वाले घर, झक्क और नामालूम से रंग से पुते चमकदार घर, नारियल या अशोक के पेड़ों या फूलों से घिरे हरे-भरे घर, कुत्ते से सावधान की हिदायत देते अहंकारी घर, आजादी के आसपास वाले बहुत पुराने और धीमे खंडहर में तब्दील होते नक्काशीदार घर, शहर ऐसे और कई किस्मों से पटा हुआ है। मेरी निगाहों से कुछ भी अछूता नहीं रहा है। इकलौते बेटे की तरह दुलार कर रखे गए किसी बड़े और कई कमरों वाले सुंदर घर को देखकर लगता है इस घर में एक कमरा तो मुझे दिया ही जा सकता है। आखिर इतने सारे कमरे हैं और रहने वाले तीन, चार या पाँच या ज्यादा से ज्यादा छः। मगर नहीं। लोग साफ इनकार कर देते हैं। वे ठाठपसंद हैं।

प्रारंभिक तलाश में मैं घरों के आगे 'टु लेट' या 'कमरा किराए पर देना है' जैसे बोर्ड ढूँढ़ा करता था। कहीं ऐसा लिखा हुआ पाकर झूम जाता था। पर इस मामले में लोगों की लापरवाहियों ने मेरा दिल काफी दुखाया। कई घरों में जहाँ ऐसी तख्तियाँ लटककर बेघरों को आमंत्रित कर रही थी, मैं खुश हो वहाँ गया, पर ज्यादातर मालिकों ने मुझसे भी ज्यादा खुश होते हुए कहा कि बोर्ड तो बहुत पुराना है। किराएदार तो कब से रह रहे हैं। ऐसे संवाद सुनकर खुशनसीब किराएदार बाहर निकल आते थे और इतराहट भरी विजयी मुस्कान छोडते हुए मेरी ओर सहानुभूति से ताकते थे। मन में रंज उठता। उनसे बड़ी ईर्ष्या होती। इसलिए अब मैं तख्तियों की परवाह नहीं करता हूँ। हर घर पर दस्तक देता हूँ। हालाँकि यह बहुत पीड़ादायी है, क्योंकि इससे थकान और निराशाओं की मात्रा बढती जाती है। पर इस तरीके में मुझे एक उम्मीद भी दिखती है। उटक्कर किसी घर मालिक से पूछूँ कि कमरा चाहिए और वह अचानक इस प्रस्ताव पर द्वंद्व या भ्रम में पड़कर सोचने लग जाए तो? तो शायद संभव है कि वह मुझे पत्नी से पूछकर अगले दिन जवाब देने की बात कहे। और शायद अगले दिन वह तैयार हो जाए। इस तरीके में सटीकता की कमी तो जरूर है पर संभावनाएँ बेहिसाब हैं। अलबत्ता मेरे अनुभव बड़े बदमजगी वाले रहे। दिमागी तौर पर अनगढ़ और बदशऊर मालिकों से बातचीत करना बहुत मुश्किल होता है। वे सामने वाले को महज खानाबदोश समझते हैं। बेघरों के लिए उनके पास हिकारत का स्थायी भाव रहता है। उनके बड़े घरों को देखकर यदि आप उनसे यह पूछने गए कि कमरा खाली है क्या, तो वे आपको एक्सरे वाली नजरों से घूरेंगे और लगभग झिडकते हुए उल्टा सवाल करेंगे कि बाहर कहीं ऐसा लिखा हुआ है क्या? आप लाजवाब। ऐसे घरों में घुसने के लिए जो साहस आप बड़ी कठिनाई से जुटाते हैं, उनके ऐसे जवाब से सब एक झटके में बिला जाता है। और चमड़ी के नीचे दबा पसीना भल-भल निकलने लगता है। सही में बहुत बुरा लगता है। सामने वाले का मुँह तोड़ देने या उसका घर नाबूद कर देने का मन करता है। घर उसका है। मर्जी उसकी है। ठीक है, पर प्रेम से दो बोल बोलने में क्या जाता है।

वैसे एक अनजान आदमी का बेसमय दस्तक देने को शहरों में लोग अपनी निजता में खलल समझते हैं। भिखारियों, याचकों या सेल्समैनों पर शहर वालों का दिमाग दिन-रात गरम ही रहता है। इसलिए मैं यहाँ उन सबसे माफी माँग ले रहा हूँ, जिनकी अनछुई सुबहें, आरामतलब दुपहरें और शानदार शामें मेरी अपनी परेशानी की वजह से खाक हुई हैं।

'दुनिया जालिम है, नजर बौर है। सोचो कुछ, होता कुछ और है।'

कालेज की जिंदगी में मेरा एक अभिन्न दोस्त जब मुसीबत में होता तो कोफ्त में गालियाँ बकने की बजाय इसी वाक्य को दुहराता-तिहराता रहता।

एक दोपहर जब गलियाँ लगभग वीरान पड़ी थी, और मैं पूर्ववत भटक रहा था, एक घर के बाहर कूलर में पानी भरती हुई लड़की दिखाई दी। मैं उस घर के सामने खड़ा हो उस लड़की से पूछने लगा कि इधर आस-पास किसी खाली कमरे की जानकारी उसे है क्या? उसने नहीं के लिए सिर हिला दिया और अपना काम करने लगी। मैं खड़ा रहा और पाइप से डाले जा रहे जीवनदायनी पानी को निहारता रहा। मैंने अपने होठों पर जीभ फिराई, वे पपड़ीनुमा थीं। 'एक ग्लास पानी मिल जाता तो प्यास मिट जाती'। फाटक के बहुत दूर से ही मैंने झिझकते हुए कह दिया। वह पाइप समेटकर झटपट अंदर चली गई। मैं पानी के इंतजार में था। उस दरवाजे से जिधर से लड़की गई थी, लड़की नहीं, उसकी जगह एक आदमी अपना पाजामा ठीक करते हुए निकला। उसने अपनी आँखों में रौब लाते हुए मुझसे कहा, 'क्या काम है?' मैं सँभल गया और एक पल के लिए सोच में पड़ गया कि इस आदमी से पानी के लिए कहूँ या कमरे के लिए। मैंने कमरे की बात कह दी। वह मुझे अविश्वास और सख्त नाराजगी के साथ घूरा और बिना कुछ कहे वापस अंदर चला गया। फिर लौटकर नहीं आया।

दुनिया को जालिम बताने वाला मेरा दोस्त ठीक था।

और एक दिन और ऐसा ही

यह पुलिस लाइन के पीछे का इलाका था, जहाँ मैं तीन दिनों से गलियाँ छान रहा था। कमरे से निकलने के बाद मैं पुलिस मुख्यालय परिसर के सामने के उपाहार गृह में पोहे खाता और चाय पीता। फिर तनिक स्फूर्ति पा अपने काम के लिए चल पड़ता। इतनी सुबह उपाहार गृह में चंद आम जनों के अलावे बाकी पुलिस वाले ही होते। ज्यादा भीड़-भाड नहीं होती। पोहा और चाय गरम और लजीज होते। पुलिस और सेना के लोग जहाँ दाना-पानी लेते हैं, वहाँ चीजें गुणवत्ता के मामले में अपेक्षाकृत ठीक होती हैं। चौथे दिन उपाहार गृह से निकल ही रहा था कि मेरे सामने एक आदमी अचानक आकर खड़ा हो गया और पूछने लगा कि मनोहर टाकिज कहाँ है। अब उसको ठीक-ठीक कैसे बताता कि कहाँ है। शहर आते ही एक फिल्म उस टाकिज में देखा तो था, पर गली-मोहल्ले का नाम मालूम नहीं था, सो बगल वाली पान गुमटी की ओर इशारा करके कह दिया, वहाँ पता चल जाएगा। उसके मुँह में पान था। उसने थूका पिच्च। मैं अपनी धुन में आगे बढ़ गया। कि कौंधा, बाबा रे, इस अजनबी शहर में यह चेहरा जान-पहचान का लगता है। पिच्च और लाल मुँह... हौ बेटा इसको तो उसी दिन देखा था, मनोहर टाकिज में घुसने से पहले। मूँगफली के ठेले के पास खड़ा था। ऐसे ही थूके जा रहा था। उमड़ते-घुमड़ते मेरे याद्दाश्त ने तुरंत साथ दिया था। और उस समय का पूरा प्रसंग भी मुझे याद आ गया था। पान की पीक से इधर-उधर गंदगी फैलाते देख तब मेरे मन में एक बात ये आई थी कि ऐसे ही लोगों से निजात पाने के लिए कई लोग दीवारों या थूके या पेशाब किए जाने की जगहों पर देवी-देवताओं की डिजाइन वाले टाइल्स सेट करवा लेते हैं कि ले अब थूक के या मूत के दिखा। और देखिए कि इसी बात के सहारे ये आदमी याद आ गया था। उस आदमी ने मुझसे जानबूझकर उसी सिनेमा हाल के बारे में पूछा था, जहाँ उसने मुझे देख रखा था। और मुझे पक्का भरोसा है, उसके सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाने पर मैं उसकी नजरों में पर्याप्त रूप से संदिग्ध हो गया होऊँगा। क्योंकि उस दिन के बाद एक-दो और रोज मैंने इस आदमी को अपने आस-पास पाया। वह बदगुमानी में मेरा पीछा करता रहा, जैसे इस बात का मुझे कोई होश ही न हो।

थोड़ा तजुर्बा और होशियारी हो न, तो ये नमूने आसानी से पहचान में आ जाते हैं। ये अपने आप को ज्यादा काबिल का तोहफा समझते हैं, पर अत्यधिक लाचार और बेदम होते हैं। सौ चालाकी बरतने की कोशिशों के बावजूद भी चीन्ह लिए जाते हैं और तब इनपर बहुत ज्यादा दया आती है। ये दुनिया को अपने चश्में से देखने के चक्कर में विवेक छोड़कर ड्यूटी बजाते हैं। किसी को कुछ भी मान लेते हैं और पीछे लग जाते हैं। मुझे ही लीजिए, मैं इस नई जगह में कोई एक ठौर ढूँढ़ने में लगा हूँ, बहुत परेशान हूँ, और न जाने क्या समझ कर ये हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए। अब इन्हें कौन समझाए कि मैं केवल और केवल इस नए शहर में एक बेरोजगार और बेरिहाइश आदमी से ज्यादा कुछ भी नहीं हो पाया हूँ। और जहाँ तक मेरे चेहरे पर फैली थकी, हाँफती लाचारी और बदहवासी, जो शायद गुप्तचरी नजरों में मुझे संदेहास्पद बनाए दे रही है, का सवाल है, भागदौड़ के इस हालात में यह बहुत स्वाभाविक है।

मेरे द्वारा किए गए वायदे की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जाती है, अपार थके होने के बाद भी रात की नींद उथली महसूस होती है। करवट बदलते हुए लगता है, अभी बिस्तर छोड़ कमरे की तलाश में निकल पड़ूँ। अविकसित नींद के पारभासी सपनों में कमरे की जद्दोजहद ही तारी रहती है। उपेक्षा, नफरत, निराशा, संदेह, बहाना और दुत्कार ड्रामाई अंदाज में भयानक कहानियों में तब्दील हो जाते हैं। ये मुझे डराते हैं, बहकाते हैं। मैं नींद में ही बड़बड़ाता हूँ और चीख-चीख कर हाथ हिलाते हुए किसी नेता की तरह आँय-बाँय-साँय बोलने लगता हूँ। मैं कहता हूँ, अरे लोगों, मेरा दुख बढ़ती तारीखों के साथ बढ़ता जा रहा है। मैं असीम परेशान हूँ। आपलोगों से न्याय की फरियाद करता हूँ। न्याय आपके यहाँ नहीं है तो फिर कहाँ है। मैं सिनेमा घरों, बस स्थानक और रेलवे स्टेशन के बाहर खड़ा हो लोगों का इंतजार करता हूँ कि वो निकलें तो कमरे की बाबत पूछूँ। मैं लाल बत्ती पर वाहनों से ठँसी सड़क पर दौड़-दौड़कर लोगों से कमरे की बाबत पूछ्ता हूँ। पहले से ही थके-झल्लाए लोग गुस्से में मुझे लात मारने पर ऊतारू हो जाते हैं। कमरे की तलाश शायद मेरी जान की दुश्मन साबित होगी। घबराकर मैं नींद और सपने में ही वसीयत तैयार करने लग जाता हूँ। भारी तनाव और दवाब के बीच राह चलते यदि इन दिनों सड़क दुर्घटना में मेरी मौत हो गई, जोकि मेरी घबराहट और बदहवासी की वजह से बहुत हद तक संभव भी है, क्योंकि पिछले पाँच दिनों में मैं तीन दफे रपटे जाने से बाल-बाल बच चुका हूँ, तो मैं अग्रिम घोषणा किए दे रहा हूँ और इसे पूर्णतया वैध माना जाए कि चालक को किन्हीं भी आपत्तिजनक स्थितियों में पाए जाने के बाद भी दुर्घटना के लिए संपूर्ण जिम्मेदारी अंततः मेरी ही होगी। और यदि मैं घायल होकर रह गया और किसी प्रकार के बयान देने की स्थिति में नहीं रहा, जैसे कि कोमा में या आँख, कान, हाथ जाने की स्थिति में, तो मेरे इसी बयान को तब के लिए सुरक्षित मान लिया जाए। एक जरूरी बात यह भी कि पुलिस या उस सीआईडी वाले को या औरों को मेरा यह कुबूलनामा संदिग्ध प्रतीत हो सकता है, इसलिए मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मुझे नुकसान पहुँचने पर मेरे कई दुश्मनों के सक्रिय होने के बावजूद इसमें उन नक्कारों की कोई भूमिका नहीं है। ये बातें मैं बिना किसी अस्त्र-शस्त्र या अन्य किसी तरह के दवाब में स्वीकार कर रहा हूँ। विवाद की किसी परिस्थिति में न्याय क्षेत्र नागपुर होगा।

दिन में भागदैड, बेचैनी और कुंठा और रात में हौलनाक और ताज्जुबखेज ख्वाब। हद है।

पाँच बेटियों का एक खिलौना

असल में मुझे ज्यादा दिक्कत इसलिए भी हो रही है कि मैं जिस समय में हूँ, वह पहले से ज्यादा बिगड़ैल और जटिल हो गया है और इसमें विश्वास का भयानक टोटा पड़ गया है। नहीं तो किराए के कमरे में जिंदगी गुजारने का लंबा अनुभव है। जन्मा भी किराए के कमरे में ही हूँ। मेरे परिवार को कुछ नहीं तो चालिस साल से ऊपर हो गए हैं बिना घर के जीते हुए। पर मेरी इतनी जिल्लत किसी ने नहीं झेली है।

बेहद कच्ची उम्र में ही मुझे किराएदार हो जाना था। मैट्रिक पास करने के बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए मैं पास के ही शहर में भेज दिया गया था। कमरे के नाम पर एक छोटी जगह मिली थी। एक बिस्तर, एक टेबल-कुर्सी लगाने भर की जगह। डेढ़ सौ रुपए महीना। पहले उसमें एक हलवाई रहता था। जिसे बहुत पीटा गया था और घसीट कर निकाल दिया गया था। उसने मकान मालिक की बड़ी बेटी को छेड़ा था। मकान मालिक एक बड़ी मिठाई की दुकान का भी मालिक था, जहाँ हलवाई को काम करने के लिए रखा गया था। हलवाई ने बहुत गलत किया था।

सेठ की पाँच बेटियाँ थीं। सोलह साल से शुरू होकर दो-दो साल के अंतराल से छब्बीस बरस तक की। शुरू के एक-दो महीने मैं डरा-लजाया रहा। कमरे में ही घुसा रहता। किसी से कोई बोलचाल नहीं करता। कालेज जाता, बाजार जाता, बाकी समय कमरे में ही बंद रहता। बिजली चली जाती, कमरा गर्मी और उमस से भर जाता तब भी कमरे से बाहर नहीं निकलता। सोचता, कमरे के भीतर ही पेशाब-पैखाने की जगह होनी चाहिए थी। बार-बार पेशाब करने बाहर जाने से बचने के लिए कोई छेद या छोटी नाली होती तो अच्छा होता। मैंने नहाने के लिए भी ऐसे समय को चुना था, जब सब सो रहे होते।

फिर एक दिन पाँचों अचानक चिल्लाने लगीं। कुएँ के पास काला बूढ़ा करैत था। घर में केवल मालकिन थी। वह भी डर के मारे फलाँ को बुलाओ.. चिलाँ को बुलाओ कर रही थी। मैं सकुचाते हुए निकला और खिलवाड़ी करते हुए साँप का माथा चूर दिया। उसे डंडे पर झुलाते हुए मैं शर्मा-शर्मा कर मुस्कराने लगा। डर से बाहर निकलकर पाँचों लड़कियाँ भी हँसने लगी थीं। उनकी आँखों में मेरे साहस के लिए अल्हड़ तारीफ थी। मुझे अच्छा लगा। दूसरे दिन चौथे नंबर की लड़की ने मुझे अमरूद खाने को दिया, कच्चा ही सही पर उसमें नमक लगा हुआ था। मुझे फिर अच्छा लगा। शाम को मैं बाजार जा रहा था तो उसने मुझे पैसे दिए और अंडे लेते आने के लिए कहा। मैं खुश हो गया। वह मुझसे अगले रोज भी अंडे मँगवाई। वह अपने बालों और चेहरे में अंडे की जर्दी मलती थी। उसकी देखा-देखी बड़ी बेटी ने भी कहा। फिर सबने मुझसे यही फरमाइश की। वे पाँचों एक दूसरे से होड़ करती थी। मुझे लगा, मुझे सब मानती हैं।

एक दिन सबसे छोटी, जो मेरी हमउम्र थी, कहने लगी, मधुमक्खी के काटने से उसका हाथ सूज गया है और वह नहाने के लिए पानी नहीं भर पा रही है। वह यह कहने पहली बार मेरे कमरे के दरवाजे तक आई थी। मैंने देखा उसका हाथ सचमुच सूजा हुआ था। मैं दयालु हो उठा और उत्साह में कुएँ पर रखे ड्रम को आधा भर दिया। फिर तो ये सिलसिला ही बन गया। बाकी चारों भी अलग-अलग बहानों से मुझसे पानी भरवाने लगी। वे दुलार करती, दुकान के बचे बासी समोसे, कचौरियाँ खिलातीं। और फिर अपने काम निकालती। कोई कहता चाकलेट ला दो, कोई कहता पैड ला दो, किसी के लिए चाट बनवाकर लाना पड़ता। बड़ी और तीसरे नंबर वाली उपन्यास पढ़ती थी। वह मुझसे भाड़े पर मोटा वाला उपन्यास मँगवाती। उन्हें पहुँचाने मुझे ही जाना पड़ता। उन्हीं के चक्कर में मुझे भी इसकी लत लग गई थी। चौथे नंबर वाली का एक प्रेमी था। एक दोपहर मैंने नीचे अपने शौचालय के पास उन्हें चुमाचाटी करते देख लिया था। अगले रोज उसने और उसके प्रेमी ने मुझे सौ रुपए दिए थे कि किसी को कुछ नहीं बताऊँ। इसी चक्कर में चार-पाँच मर्तबा मैंने उनकी चिट्ठियाँ भी इधर-उधर की थी। मैं शहर में नया था। मेरी आँखें नहीं खुली थी। मैं सबसे डरता था। इसलिए किसी को मना नहीं कर पाया। हालाँकि दिल से केवल छोटी वाली का काम करने में मेरा मन लगता था।

इसी बीच एक दिन पिताजी मिलने आ गए। लड़कियों को फर्क नहीं पड़ा। वे किसी तरह का कोई परहेज नहीं बरतीं। पिताजी के सामने पानी भरने के लिए आवाज लगाईं, लौटाने के लिए उपन्यास दिया, फरमाइश की लिस्ट थमाई। ये सब देखकर पिताजी का माथा ठनका। वे रुक गए। लड़कियाँ बाज नहीं आईं। चौथे वाली मुझे जबर्दस्ती चिट्ठी दे आने के लिए कहने लगी। जब मैं नहीं माना, तो वह मेरी जेब में चिट्ठी डालकर भाग गई। पिताजी यही सब तमाशे देखने के लिए रुके थे। उन्होंने मुझे रंगे हाथ पकड़ लिया, और फिर उन्हीं लड़कियों के सामने जो मारा, जो मारा कि नाक-मुँह से खून निकाल दिया।

कुछ समय बाद उसी शहर में मुझे अपने मौसेरे भाई के साथ रख दिया गया। फिर से एक नया कमरा। नया माहौल। उस घर में एक दिन कार्यक्रम हुआ। काफी लोग आए। एक लड़की जो तीन दिन पहले से आई हुई थी, कार्यक्रम वाले दिन, रात में छत पर उसने मुझे गुलाब का लाल फूल दिया। कहा, मालूम है न, लाल गुलाब क्यों दिया जाता है? मैंने उस समय हाँ में सिर हिला दिया मगर अगले रोज कपड़े और किताब बैग में भरकर पहली गाडी पकड़कर घर आ गया। पाँच बेटियों वाले घर में बतौर किराएदार रहते हुए मैंने सीखा था कि मकान मालिक के यहाँ की लड़कियों-औरतों से पर्याप्त दूरी बरतनी होती है, नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होता है।

और तब से अब तक दर्जनों बार कमरे बदलते हुए कुछ न कुछ सीखता ही रहा। कई अनगढ़ों से पाला पड़ा। पर सबसे बचकर आड़े-तिरछे निकलता गया। पैसे में देर-कुबेर, भाड़ा बढ़ाने, पानी की किल्लत, बिजली के लिए हुज्जत, अतिथियों से परेशानी, साफ-सफाई, बेमतलब की टोका-टोकी जैसे कई मसले हैं, जिस पर रार होना अटल होता है। कुछ गलती इधर से रहती है, कुछ उधर से। मकान मालिकों की दिक्कत ये है कि वे अपनी रोटी खाना भी चाहते हैं, बचाना भी। समय से पैसे मिलते रहें और घर का दोहन भी न हो। पता भी न चलने पाए कि इसी छत के नीचे कुछ अजनबी भी रहते हैं। ऐसा कहाँ होता है। हालाँकि यह जरूर है कि भाड़े के कमरे में रहना थोड़ा शऊर माँगता है। पर चापलूसी की हद तक तो नहीं न।

हर शहर के मिजाज में फर्क होता है। वहाँ के लोगों की तासीर में फर्क होता है। इस नए शहर में, जहाँ मैं कमरे के लिए दर-दर भटक रहा हूँ, कई अजीबोगरीब मालिक मिले। इनसे बात करते हुए हर पल लगता रहा कि मेरी रहने की समस्या अब बस दूर हो जाने वाली है। पर ये सब के सब बड़े बुझौव्वल साबित हुए। इन्होंने एक दिन दौड़ाया, दो दिन दौड़ाया मगर हासिल ठेंगा नहीं हुआ।

शहर में पैर रखने के बाद से और अभी तक जहाँ हूँ, वहाँ का मालिक मेरे लिए सबसे बड़ा बुझौव्वल बना हुआ है।

एक काला गैंडा जो दिनभर झूलता है झूला

वह काली, तगडी चमड़ी वाला गैंडानुमा आदमी है। उसकी आँखें वनैली और खूँख्वार हैं। आवाज में पत्थरों की सख्ती और मेढकों का टर्रापन है। गोश्त का एक जानदार पुतला। मेरा मकान मालिक, जिसने मुझे चेतावनी भरी मोहलत बख्शी है।

बजरंगी राय, रिटायर्ड एस.आई. किसी दूसरे आदमी की नहीं, मकान मालिक की ही बात कर रहा हूँ। इस आदमी के घर में मैं पिछले तीन महीने से हूँ। दूसरे महीने के ग्यारहवें रोज इस आदमी ने मुझे टोका था, कमरा खाली कर दो, मेरे परिवार आने वाले हैं। मैं हड़बड़ाकर पूछा था, कब। दो दिन में। दो दिन में? पहले मुझे कहीं और कमरा देखना पड़ेगा। ढूँढ़ लो एक हफ्ते के अंदर। उसने ये बातें आसमान में देखते हुए कही थी। मैं अवाक उसका चेहरा जो देख रहा था। बस उसी रोज से मेरा चैन छिन गया। कहाँ मैं रोजगार खोजने में लगा था, अब अपनी ऊर्जा कमरे के पीछे लगानी थी।

जब मैं शहर आया था और ठौर ढूँढ़ रहा था, पहले दिन ही एक घंटे की कसरत में यह मकान दिख गया था, जिसके दरवाजे पर चाक से लिखा था, रूम भाड़े पर उपलब्ध है। यही बजरंगी राय था उस रोज। घर कहाँ है? रायगढ़। क्या करते हो? जाब देख रहा हूँ। फैमिली है न? मेरा जवाब सुनने की बजाय वह फोन सुनने चला गया था। लौटकर फिर नहीं पूछा। महीने की पहली तारीख को पैसा हाथ में देना होगा। हाँ-हाँ।

दस दिन बाद।

कमरा छोडने के लिए कहा था, क्यों नहीं किया?

पिछले तीन दिनों से इस अजगर से मुठभेड़ की हर संभावना को टालता रहा था। आज वो खुद मेरे सामने था। मैंने अपने को पिछले पैरों पे पाया। हल्की घिघियाहट निकली, बहुत दौड़ा पर कमरा कहीं मिला नहीं। पर कुछ जगह बात हुई है, मिल जाएगा। बारह-चौदह दिनों में कुछ जगहों पर कमरे खाली होने वाले हैं।

देखो, जल्दी देखो। कमरा खाली करो जल्दी। मुझे ऊपर काम लगवाना है।

काम लगवाना है, पर पहले तो परिवार आने वाला था। झूठा, बदमाश। पुलिस विभाग ऐसे ही झूठे-बदमाशों से मिलकर बनता है। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा कि अचानक ऐसा क्या हो गया जो उसने कमरा खाली कर देने की बात कही और वो भी इतनी जल्दी। पैसे महीने की पहली तारीख को क्या, दो महीने का एकमुश्त दे दिया। किसी तरह का हल्ला, किच-किच नहीं। बोलता कम हूँ। कोई अंधाधुंध गेस्टिंग भी नहीं है। शहर नया है, दोस्त नहीं है, दुश्मन नहीं है। बिजली का मीटर अलग है, शौचालय अलग है। दीवारों पर खूँटियों के लिए हथौड़े नहीं चलाया। फिर। फिर क्या हुआ। मेरी तकसीर क्या है?

सुबह एक बुढ़िया बिना नागा छाछ देने आती है। मैं उसे अदरक की चाय पिलाता हूँ और पाँच मिनट ही सही, उससे जरूर बतियाता हूँ। वह कह रही थी, इस घर में रहने वाले हरेक किराएदार को मैंने छाछ दिया है। उससे छाछ लेने की शुरुआत इसी बात पर हुई थी। मैं क्यों इस अच्छे सिलसिले को तोड़ूँ। मैंने अपनी परेशानी बताई तो कहने लगी, बाकी किराएदार तो खुद ही छोड़ के चले जाते हैं। कोई चार महीने में, कोई दस महीने में, पर साल भर से ज्यादा कोई टिकता नहीं है। तीन साल से यही चल रहा है। ये पहली बार है कि दरोगाजी किसी को खुद ही निकाल रहे हैं। क्या हुआ, कोई बात हो गई है?

यही तो मालूम नहीं है कि क्या बात हुई है। लेकिन बाकी लोग क्यों खुद छोड़ देते हैं?

किसी से चर्चा नहीं नहीं करना। बहुत गंदा आदमी है ये। उसका कमरा और इधर किराएदार का सोने वाला कमरा, दोनों कमरों के बीच जो किवाड़ है, उस की झिर्री से वह किराएदार की एक-एक गतिविधि देखता रहता है। ये बात इस कमरे में रहने वाली दो औरतों ने मुझसे कही। ऐसी बात पता चलने पर कौन टिकेगा? दरोगाजी की औरत और बच्चे उसकी सारी गंदी करतूतें जानते हैं, पर कुछ बोलते नहीं, क्योंकि बोलने पर वह उन्हें सरिए से पिटता है। पुलिस में था, इसलिए बाहर वाला कोई उलझना नहीं चाहता। कहीं चर्चा मत करना यह सब। लगता है तुम अकेले रहते हो, इसलिए तुमको निकाल रहा है।

मैं भक्क रह गया था।

दो हफ्ते बाद।

कब तक बहाने बनाते रहोगे? खाली कर रहे हो कि नहीं? वह मुझसे सीधे रूबरू था, मेरे ही कमरे में। मुझे पुलिसिया धमकी की बू आई। मैं थोड़ा सहम गया। मैं अपनी मजबूरी गाना चाहता था, लेकिन उसके तेवर देख कहा, मैं कुछ सामान ले जाकर नए कमरे में रख चुका हूँ। बयाना भी दे दिया है। पर पहले से जो आदमी उसमें रह रहा है, उसकी भाभी को बच्चा होने वाला है, सो वे लोग गाँव से चार-पाँच दिनों के लिए यहाँ आ गए हैं, बच्चा होने के बाद चले जाएँगे। दस दिन में वो कमरा खाली हो जाएगा। हड़बड़ी में बोला गया एक प्रभावी झूठ।

दस नहीं, बारह दिन, पर फिर बारह दिन तो बारह दिन। उसके बाद कोई सुनवाई नहीं होगी। आगे समझना तुम।

हौ बेटा, ये तो चेतावनी मार गया।

अब तक मैं समझ गया था कि वह गंभीरता से ऐसा चाहता है। नए-नए वायदों और आश्वासनों से उसे तसल्ली नहीं होने वाली है। जिंदगी के इन पलों में पहली बार महसूस हुआ कि मेरे भीतर भी एक खासा बेगैरत जीव घर किए था। नहीं तो मजाल है कि आज तक कोई उँगली रखा हो कि भाई साहब आप मेरे इतने के लेनदार हैं या आपने मेरे साथ धोखाधड़ी कर दिया। यहाँ यह पतित गैंडा मेरा लगातार अपमान कर रहा था और मैं लाचारगी में उसे झेले जा रहा था। आखिर गुस्से में जाता तो कहाँ जाता। उस उज्जड सनकी से बकझक करने में डर भी लगता था। कहीं सामान न फेंकना चालू कर दे। दो हाथ जमा ही दे तो। कौन सटेगा?

मेरे कमरे से थोड़ा हटकर ही उसका झूला लगा था। वह काला गैंडा दिनभर झूला झूलता रहता था। मुझे कमरे से आता-जाता देखता, तो मेरी ओर ही अपने थोबड़े को फिक्स कर देता। अपनी चेतावनी की याद दिलाने के लिए आँखें गड़ाकर आँखों से ही तगादा मारने लगता। ऐसा करते हुए लगता, एकदम किसी फिल्मी गुंडे की नकल मार रहा है। जालिम ने जीना मुहाल कर रखा था। शहर में काला गैंडा एक मात्र जालिम नहीं था। कई और थे, पर उनका अलग हिसाब था। यदि भूलवश किसी तरह से मुझे इनके घर में जगह मिल भी जाती तो जो हश्र काले गैंडे के घर वाला ही होता।

दिमाग से चिपक कर रह जाने वाले कुछ ऐसे ही घर और उसके मालिक, जहाँ आशा और अवसाद दोनों मिले।

रानी कुटी

शहर के किस हिस्से में यह जगह थी, मुझे मालूम नहीं। एक अनजान गली से गुजरते हुए 'टु लेट' की तख्ती पर नजर गई थी और मैं यह उम्मीद करने लगा था कि शायद यहाँ बात बन जाए। चारदीवारी से लगने वाले गेट पर नक्काशीदार अक्षरों में लिखा था 'रानी कुटी'। फिर मालिक का नाम और उसके नीचे उसका पेशा। घर का मालिक एक शिक्षक था। मँझोले बच्चों को पढ़ाता था। मैंने दस्तक दिया तो एक बुजुर्ग महिला निकली। उसने मुझपर गौर जमाते हुए दस्तक देने का कारण पूछा और बिना कुछ सुने कह गई, घर में कोई नहीं है, मैं शाम को आऊँ।

शाम को शिक्षक मिल गए। वे कूलर की नम हवा में तौलिया लपेटे चाय सुड़क रहे थे। उन्होंने घर कहाँ है और क्या करता हूँ पूछा। उन्होंने चाय के लिए नहीं पूछा। आराम से अपनी चाय खत्म की और मौसम पर बात करने लगे। मौसम पर बोल लेने के बाद अचानक कमरा दिखाने के लिए उठे और कहा पीछे आ जाओ। कमरा हवादार था और किराया आसान।

मैं अंदर से खुश था और मास्टर के चेहरे पर नजरें गड़ाए हुए था कि कोई साकारात्मक संकेत पा सकूँ। वे पिछले किराएदारों की कारस्तानियाँ सुना रहे थे। इसी बहाने वे एक तरह से ताकीद कर रहे थे कि मुझे क्या-क्या करना चाहिए और क्या-क्या नहीं। मसलन, वे बता रहे थे कि इसके पहले वाले लोग बहुत तेज आवाज में टीवी चलाते थे।

'मेरे पास टीवी नहीं है'। मैंने खुश होकर आश्वस्त किया।

वे रात को कभी ग्यारह बजे आते, कभी बारह बजा देते।

'मैं तो सर, खा-पीकर नौ बजे सो जाने वाला आदमी हूँ।'

वे हमेशा नाइट शो ही जाते।

'हिंदी फिल्में देखना मुझे समय की बर्बादी लगती है। मैं केवल नाटक देखता हूँ और इस शहर में नाटक होता नहीं है।'

उन लोगों के पास बहुत आदमी आते थे। कमरा हमेशा भरा रहता था। कोई न कोई हमेशा रहता था।

'मैं बहुत शांत और एकांतपसंद आदमी हूँ। भीड़भाड़ से मुझे बहुत दिक्कत होती है। और ऐसे भी इस नए शहर में मेरा है ही कौन? रहने लगूँगा तो आपलोग अपने लगने लगेंगे।'

अच्छा एक और बात थी, वे शराब बहुत पीते थे। बहुत ज्यादा। तुम पीते हो क्या?

यह आखिरी सवाल था मास्टर का। वह मुझसे जैसे-जैसे आश्वस्त होता जा रहा था, थोड़ा खुलता जा रहा था और साथ में मुझे भी खोले जा रहा था। मैं यहीं गच्चा खा गया। और फिर सब कुछ खत्म हो गया।

'अब झूठ क्या बोलूँ आपको। आपसे इतनी बातचीत हो गई है, कुछ छिपाना ठीक नहीं लगता। मैं पीता हूँ। पर किसी पियक्कड़ की तरह नहीं। कभी-कभार किसी मौके पर। सोचिए कि पिछली बार नवंबर में मैं अपने ममेरे भाई की शादी में थोड़ा ड्रिंक लिया था। मतलब नौ महीने पहले। अब अगर आप इसको भी पीने में जोड़ते हैं, तो झूठ नहीं कहूँगा कि मैं नहीं पीता हूँ।'

मास्टर अजीब भाव-भंगिमा में हौले-हौले हँस रहा था। थोड़ा ठहरकर कहने लगा, 'नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था। ऐसे ही। उतना तो हमलोग भी पीते हैं। और इतना कौन नहीं पीता। आदमी के खाने-पीने पर कोई रोक है क्या?'

'और इसमें देखने वाली बात तो ये है सर कि कौन कैसे पीता है और पीकर क्या करता है। कोई पीकर गाली-गलौज और हंगामा करता है तो कोई पीने के बाद कविता लिखता है। अब मुझे ही लीजिये। मैं अगर कभी ले भी लिया तो सीधे बिस्तर पकड़कर सो जाता हूँ। भला इससे किसी को क्या समस्या हो सकती है?'

मेरी बात खत्म होते ही सामने पर्दे की ओट में एक आकृति अचानक डोलने लगी। वह शायद उसकी पत्नी थी। वह अंदर से कुछ इशारा कर रही थी। वह कुछ कहना चाह रही थी। मैंने देखा, मास्टर के दिखावे वाली हँसी पर बेचैनी के भाव साफ आने-जाने लगे थे। वह मेरी ओर एक झूठी मुस्कराहट उछाल कर कहा, एक मिनट। और अंदर चला गया। एक अनहोनी की आशंका से मैं परेशान हो गया।

मास्टर न के बराबर समय में लौट आया था। थोड़ा झिझकते हुए उसने कहा, 'असल में हमने कमरा पढ़ने वाली लड़कियों को देने के लिए रखा है। लैडिज रहती है तो ठीक रहता है। नहीं तो दिक्कत होती है। एक बेटी भी है हमारी।'

मुझे लगा मैं फट पड़ूँगा, यही कहना था तो उतनी देर से क्यों बैठा कर रखा। झूठमूठ का मगजमारी हो गया। मगर मैंने कहा, एक बार आंटी से बात करनी है। वह पर्दे के पीछे ही थी, झट से निकल आई। उसकी गोद में दो साल के आसपास की एक बच्ची थी।

'वाह, यही प्यारी बेटी है? इसके साथ तो मैं घंटों खेल सकता हूँ। मेरे घर में मेरी भतीजी इतनी ही छोटी है। मुझे बच्चों को खिलाने का शौक भी है और अनुभव भी।' उसकी पत्नी ने मेरी बात पर सीधे मुँह बिचका दिया, 'नहीं, हमलोग लड़कियों को ही रखेंगे।'

बात खत्म हो गई थी, मैं ठगा सा खड़ा रह गया था। मुझे उन वाहियात पति-पत्नी पर इतना क्षोभ हुआ कि लगा उनका मुँह नोच लूँ। बहानेबाज औरत। सबसे ज्यादा मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था। क्या जरूरत थी ज्यादा बकबक करने की। होशियार गिनाने की। अरे उसने पूछा, शराब पीते हो, नहीं पीता हूँ, एक लाइन में बात खत्म। अब पिछले साल पीया था, पिकनिक पर पीया था, पीकर सो जाता हूँ, आखिर इन बातों का मतलब क्या था वहाँ?

सच का मोल = कुछ नहीं।

अगले दो-तीन दिन, जब-जब मुझे उस कमरे की बात याद आई, मैं गहरे अफसोस और दुख से भर गया। मैं अपनी बेवकूफी पर खुद को माफ नहीं कर पा रहा था।

भारती निवास

दिन भर में गली का पाँच चक्कर हो चुका था। मेहँदी और करी पत्ते वाली झाड़ियों से घिरे भारती निवास में ताला लगा था। पड़ोसियों से जानकारी मिली कि घर के लोग शहर से बाहर नहीं गए हैं। शायद शाम तक लौट आएँ।

शाम हो आई थी। मैं पाँचवी मर्तबा देखने आया, ताला अब तक नहीं खुला था। मैं चिंतित हो उठा। फाटक से लटक रहा कार्डबोर्ड देख दिल बैठा जा रहा था। सुबह कार्डबोर्ड पर जैसे ही नजर गई थी, 'टू लेट फार स्टूडेंट', देह में रोमांच हो आया था। घर बंद देख मैं घूम-फिरकर आजू-बाजू ही डोलता रहा। लोग आएँ तो बात करूँ। पर यहाँ तो शाम हो आई थी, घर अब भी बंद था। मुसीबत यह नहीं थी कि लोग कब आएँगे। मेरा ध्यान तो कार्डबोर्ड पर अटका था। मेरे जैसा ही कोई बेघर घूमते-घामते यदि इसे देख लिया तो मुश्किल हो सकती है। शायद घर का ताला खुलते ही मुझसे पहले वो पहुँच जाए। निगरानी की इसी चक्कर में दिन बर्बाद हो गया था। मैं कमरा देखने कहीं और नहीं जा पाया था।

और बिजली यकबयक गुल हो गई। अचानक अँधेरे को पाकर मेरे दिमाग में एक शैतानी सूझी। मैंने डरते-डरते कार्डबोर्ड उतार लिया और उसे मोड़कर थैले में डाल तेजी से कमरे की ओर चल पड़ा। मैं खुश और आश्वस्त था कि अब मैदान में केवल मैं रहूँगा।

सुबह मोर्निंग वाक के बहाने एक दफा उधर से लौट आया था, लोग अब तक नहीं आए थे। दोपहर में भी यही हाल रहा। पर शाम में देखा तो घर में रोशनी थी। मैं अंदर चला गया।

'जी आपके यहाँ किराए से कमरा मिलेगा क्या?'

'नहीं, कौन भेजा है यहाँ?'

'नहीं किसी ने नहीं, मैं खुद ढूँढ़ता हुआ आया हूँ।'

'हमने कहीं इश्तहार दिया है क्या, जो देखकर चले आए।'

वह सख्त चेहरे और झबरे मूँछों वाला एक रोबीला आदमी था। उसके अप्रत्याशित और बेहद आक्रामक रवैए से मैं सकपका गया। एक मन किया, डटकर कुछ जबाव दूँ। फिर कार्डबोर्ड वाली बात मुँह पर आते-आते रह गई कि कल मैंने गेट पर लिखा हुआ देखा था, 'कमरा खाली है'। और कहीं वो बोल दिया, दिखाओ कहाँ लिखा हुआ है, तो? सनकबाज जान पड़ता है। मैंने माफी कहा और वापस चला आया। दिमाग भन्ना रहा था कि आखिर माजरा क्या है। खुद ही लिखकर टाँगते हैं, कमरा खाली है और जाओ तो दुत्कारते हैं।

अगली सुबह मुझे लगा, एक बार और जाकर देखना चाहिए। यदि वही सनकी पागल आदमी दिखा तब तो कोई बात नहीं करनी है, लेकिन अगर कोई दूसरा दिख गया तो एक बार कोशिश की जा सकती है। शायद बात बन जाए।

मैं उस घर के अगल-बगल एक बार फिर से मँडराने लगा था। असल में ऐसा करते हुए मैं खुद को भीतर जाने के लिए तैयार कर रहा था। एक महिला को पौधों में पानी डालते देखकर मैं फाटक के करीब चला गया। 'आंटी कमरा खाली है क्या?' वह पहले तो ठिठकी, फिर एक अस्पष्ट सा नाम पुकारी। अंदर से जो लड़की आई, उससे महिला ने कहा, 'बेटा इनको कमरा दिखा दो।'

'और प्रमोद भ्या? मम्मी देखो वो फिर से चिल्लाने लगेंगे'।

'उसको जाने दो। तुम पहले इनको कमरा दिखाओ।'

प्रमोद चिल्लाएगा? कौन प्रमोद। कहीं कल वाला वही आदमी तो नहीं है, जिससे मेरी मुठभेड़ हुई थी? मैं मन ही मन आशंकाओं में पड़ने लगा था। डरते-डरते आधे-अधूरे मन से कमरा देखा। एक कमरा। किचेन, लैट्रीन-बाथरूम। सब ओर टाइल्स जड़ा हुआ। रिहाइश भरपूर पाश था। किराया भी ज्यादा होगा। अभी सीढ़ियाँ उतरा ही था कि फाटक से अंदर घुसते हुए उस आदमी की नजर मुझ पर पड़ गई। वह मुझे देखते ही ताव में आ गया। समझ गया कि मैं ऊपर कमरा देखने गया था।

'कल तुम्हें इज्जत से मेरी बात समझ में नहीं आई जो आज बेइज्जत होने चले आए। घर को सराय समझ रखे हो। अब एक मिनट में निकल लो यहाँ से?'

'तुम सुबह-सुबह हल्ला मत करो। मछली बाजार नहीं है ये। इसमें और लोग भी रहते हैं। इस आदमी को हमलोग बुलाए हैं कमरा दिखाने के लिए।' एक बुजुर्ग आदमी अंदर के कमरे से निकल आए थे। मामला गरम हो रहा था। मैं डरकर गेट की ओर खड़ा हो गया था।

'मैं कह चुका हूँ कि अब यहाँ कोई भाड़ेदार नहीं रहेगा। और ज्यादा तमाशा लगाने की जरूरत नहीं है।'

'तुम क्यों बोल रहे हो? दो दिन में चले जाओगे। रहना तो हमें अकेले पड़ता है। इसी बहाने दवा-दारू का खर्च निकल आता है। फिर दिक्कत क्या है तुमको?' उसकी माँ कह रही थी।

'मैं कुछ नहीं जानता। अब यहाँ भाड़ेदार नहीं रहेगा बस। ओए, तू खड़ा-खड़ा क्या सुन रहा है बे। जबान की भाषा नहीं समझता क्या, दूसरे तरीके से समझाऊँ?' वह मेरी ओर झपट पड़ा जैसे। वह बैल की तरह था। मैं गेट से बाहर हो गया।

आस-पड़ोस के लोग हो-हल्ला सुन इधर ही आँख-कान गड़ाए हुए थे। मुझे घर से निकलते देख बाहर खड़े एक-दो लोगों ने पूछा, क्या हुआ। मैंने घटना सुनाई तो वे कहने लगे, 'ये तो इनका पुराना धंधा है। बूढ़ा चाहता है, किराएदार रहे, कुछ पैसे आ जाते हैं। बेटा बाहर नौकरी करता है, इनकी सुध लेता नहीं है। और साल में कभी आता भी है तो किराएदार देखकर भड़क जाता है।'

'क्यों?'

'बदमाश टाइप का है। जैसा खुद है, दूसरों को भी समझता है। एक जवान बहन है, उस पर पहरा डाल कर रखता है। उसको लगता है किराएदार रहेगा तो कुछ उल्टा-पल्टा जरूर होगा। चार महीने से एक बैंक क्लर्क रह रहा था, बहुत भला लड़का था, लेकिन जब ये घर आया और पूरे परिवार को उससे घुला-मिला देखा तो खूब गाली-गलौज करने लगा। और देर रात उसके कमरे में घुसकर उसको जबर्दस्त मारा। थाना-पुलिस सब हुआ। लेकिन ये सुधरता कहाँ है। कुछ किया क्या तुम्हारे साथ?

'नहीं, आँय-बाँय बोल रहा था। झपटने जैसा किया था केवल।'

मैं अपने अपमान से बहुत दुखी था। सारा हाल जानने के बाद मुझे अब वो लड़की याद आ रही थी। उसने कितनी इज्जत से कमरे के बारे में सब कुछ बताया था। सच में दुखी दिखती थी।

मैं चलने को हुआ, फिर मुडकर उनसे पूछा, 'और इधर कहीं कमरा मिलेगा क्या।'

'वैसे कमरे तो नहीं हैं, पर एक सलाह है। अब इधर अगल-बगल कमरा लेने के फिराक में मत पड़ो। दुबारा उसके घर जाकर तुम उसकी उसकी नजर में चढ़ गए हो। यदि फिर देख लिया, तो सही में समझेगा कोई बात है। असल में वो एक खतरनाक आदमी है। शहर के गुंडों के साथ उठना-बैठना है उसका। बेकार में टेंशन लेना है।'

मुझे वो मासूम लड़की फिर याद आ गई। गुंडों की बात सुनकर मुझे ताव आ गया, 'गुंडाराज है क्या कि कोई किसी पर चढ़ जएगा? आप कमरा बताइए, खाली मिलेगा तब क्यों नहीं रहूँगा। देखूँगा कि कौन क्या कर लेता है मेरा।' मैं चल दिया और गुस्से में मुझे रास्ते भर फिर वही लड़की याद आती रही।

डर समझें, गुस्सा या फिर हताशा पर मैंने फिर उस मोहल्ले की ओर कभी रुख नहीं किया।

गुरु पितृ कृपा

कमरा ऊपर था। वहाँ के लिए सीढ़ियाँ जाती थी। बिल्कुल पतली, एक सामान्य आदमी के समा सकने लायक। और खतरनाक तरीके से खड़ी भी। इतनी असुविधाजनक सीढ़ियाँ बनाने के पीछे मालिक और कारीगर का शायद यही तर्क रहा होगा कि किराएदारों के लिए है, चलेगा।

मैं घर की मालकिन के पीछे था, सँभलकर सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ। दरवाजे के आसपास मकड़ियों के ढेर सारे अदृश्य जाले थे। इनके बारे में मालकिन को पता था, पर मैं फँस गया। चेहरे से जाले बुरी तरह उलझ गए। कमरा काफी समय से बंद मालूम होता था।

मालकिन ने एक-एक कर चारों खिड़कियाँ खोल दी। अब शाम की बहुत सारी धूप और हवा कमरे में थी। एक लंबा सा हाल। चटाइयाँ बिछाकर तकरीबन दस आदमियों के आराम से रुकने भर की जगह। अकेले के लिए इतना बड़ा कमरा। आशंका हुई, किराया भी भरपूर होगा।

'कमरा देख लीजिए, अभी वो हैं नहीं। बात करने के लिए सुबह आना पड़ेगा।'

एकबारगी तो सब कुछ ठीक लगा। पर रात में ख्याल आया, पानी और शौचालय के बारे में पूछना भूल गया था। खैर अब सुबह में।

घर का मालिक बहुत कम बोलने वाला आदमी लगता था। उसने मुझसे नाम-ठिकाना कुछ नहीं पूछा। छत पर खड़ा सुबह देखता रहा, इंतजार में कि मैं कुछ बोलूँगा।

'किराया क्या देना होगा मुझे?'

'अठारह सौ रुपए'।

'और पानी-बिजली?'

'दोनों हमारी तरफ है'।

'और लैट्रीन-बाथरूम?'

'नहाने-धोने के लिए कोने में जो थोड़ी घेरी हुई जगह है, उसको उपयोग में लाया जा सकता है। नंबर वन की जगह इधर है। इधर कमरे के पीछे, छत से। नीचे मोहल्ले का कूड़ा जमा होता है, इसलिए कोई दिक्कत नहीं है। पानी गिराने की भी झंझट नहीं है। बस लैट्रीन के लिए नीचे जाना होगा। मैं दिखा देता हूँ।'

'क्या आप रात को भी लैट्रीन जाते हैं?'

'कह नहीं सकता, क्यों?'

'और सुबह छः बजे से पहले जाने की आदत नहीं है न?'

'आदत तो नहीं है, पर हमेशा यही स्थिति रहे, कह नहीं सकता, मगर क्यों?'

'नहीं आपातकाल की बात ठीक है, जैसे पेट खराब हो जाने पर। लेकिन सामान्य दिनों में लैट्रीन की टाइमिंग रात में होने से समस्या होगी। हमलोग रात दस बजे के बाद दरवाजा बंद कर लेते हैं। और लैट्रीन जाने के लिए रास्ता हमारे घर के भीतर से होकर जाता है।'

'यह बड़ा पेचीदा मामला है। ऐसी बातों के लिए आश्वस्त करना मेरे लिए कठिन होगा। आप शौचालय ऊपर क्यों नहीं बनाते?'

'जल्दी ही काम लगाना है। पैसे की स्थिति अभी ढीली चल रही है। इसके पहले जो किराएदार इसमें रहते थे, यहाँ के हालात के अनुसार वो बहुत अभ्यस्त हो गए थे। जब तक वो रहे, न हमें परेशानी हुई, और न कभी उन्हें। वैसे भी लैट्रीन आदत और अभ्यास का मसला है। आप जिस समय जाने की आदत डालिएगा, उसी समय आएगी। कोई दिन में तीन बार जाता है, कोई चौबीस घंटे में केवल एक बार। आदत पर निर्भर करता है।'

'मान लीजिए, मैं आदत डाल लूँगा, कभी मेरे परिवार आएँगे तो? मुश्किल तो होनी ही है।'

'तय कर लीजिए आराम से। कल सूचित कर दिजिएगा। और भी कई लोग देख कर गए हैं।'

अहा, यहाँ भी लाइन लंबी है। नर्क में भी धक्कमपेल। खैर, अब काला गैंडा सामान फेंकना चाहेगा तो कहूँगा, इतनी जोर से फेंके कि यहाँ आकर गिरे, कमरा लगभग मिल ही गया है। अपने लैट्रीन को मैं सँभाल लूँगा। लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था, इस अपाहिज कमरे को पाकर मैं खुश होऊँ या और ज्यादा निराश।

रात भर अपनी लैट्रीन से जुडी समस्याओं, अच्छाइयों-बुराइयों पर मंथन करता रहा, फिर सुबह जाकर कमरे के लिए मना कर दिया। मना करते वक्त मन को बहुत संतोष हो रहा था कि निर्णय लेने का मौका कभी मेरे हिस्से भी आया।

मेहेर प्रसाद (आदमी नहीं, आवास का नाम)

'आ सकते हैं, आप जूते पहनकर आ सकते हैं, जूता बाहर छोड़ने पर रिच उसे नोचने लगता है। अभी वह सो रहा है। इसलिए आप पर भौंका भी नहीं।' तब तक मैं अपना बिना फीते वाला जूता उतारकर अंदर आ चुका था। वे वापस मुड़े, मेरा जूता उठाया और उसे अंदर रखकर दरवाजा सटा दिया। सामने सोफे की ओर मुझे बैठने का इशारा कर उन्होंने अपनी पत्नी को पानी लाने के लिए आवाज दे दी।

मैं आभार से दबा जा रहा था। उन्होंने मेरा जूता उठाया था, वो भी अपने हाथ से। मैं कह नहीं सकता कि मेरे भीतर इस बात से कितनी उथल-पुथल मच गई थी। मैं तुरंत अनुगृहीत हो जाने वाला आदमी हूँ। हर समय, हर किसी से अनुगृहीत होता रहता हूँ। आप मुझे 'आप' बोल देंगे, थोड़ा सम्मान बरत देंगे, मैं परेशान हो जाऊँगा। वाचमैन, बेयरा अभिवादन कर देगा, सर बुलाएगा, मैं असहज होकर अनुगृहीत हो जाऊँगा। फिर तो ये चीजें मुझे इतनी मथने लगती हैं कि मैं बेचैन हो सोचने लगता हूँ कि मैं अदना इन लोगों के लिए क्या कर सकता हूँ।

यहाँ वकील साहब ने अपने हाथ से मेरा जूता उठाकर मुझे सचमुच बहुत असहज कर दिया था। एक तरह से मैं मोहा सा गया था। कितने सरल और सहज आदमी हैं। मैं भीतर से पुलक रहा था। एक बार कमरा मिल जाए, इनसे तो मेरी गजब पटेगी।

'आपको किनसे पता चला कमरे के बारे में?' ओह, कितना मीठा बोलते हैं। उनके तवज्जह से मैं गले से आँखों तक भावुक हो आने को हो रहा था। 'मोड़ पर जो प्याऊ है, वहीं एक आदमी ने बताया कि बाईं ओर तीसरी गली का पहला मकान वकील साहब का है, एक बार वहाँ पूछ लूँ।' 'नरेश होगा, वो हमेशा वहीं रहता है। उसी ने कमरे में सफेदी की है। आप कमरा देख लिजिए। इसके पहले इसमें मेरे मित्र का लड़का रहता था। अचानक उसको एक्वेरियम की दुकान का भूत सवार हुआ और पढ़ाई छोडकर घर चला गया कि दिल्ली में एक बड़ा शाप खोलूँगा। पढ़ने में बहुत तेज था। डेढ़ साल यहाँ रहा। उसके जाने के बाद हमने कमरे को दुरुस्त करने के लिए नरेश को लगा दिया। अब चकाचक है। हवा, पानी, बिजली, शौचालय सब एवन। आपको कोई परेशानी नहीं होगी।'

सुनकर लगा, दिल का सारा दर्द बिलख कर बाहर आ जाएगा। पिछले छः दिन से बहुत ज्यादा परेशान हूँ सर। कमरा खोजते-खोजते बेदम हो गया हूँ। आपसे मिलकर, कमरा देखकर अब थोड़ा इत्मीनान लग रहा है।

'यहाँ रहना चाहूँ तो कब से रह सकता हूँ सर? अच्छा, और किराया कितना रखा है सर?'

'पैसे का क्या है, दिल मिलना चाहिए। ये सबसे जरूरी चीज है। और कब से आने की क्या बात है, आप अपनी सुविधा से जब आना चाहें। आज तो आज, कल तो कल। मुझे कोई दिक्कत नहीं है। वैसे सोलह सौ रुपया किराया हमने तय किया है। बिजली-पानी सब इसी में है।'

बहुत ज्यादा था। लेकिन ऐसा आदमी कहाँ मिलता है, वो भी मकान मालिक। इतना तो घूम कर देख लिया। उसने मेरा जूता उठाया। सही बात है कि दिल मिलना महत्वपूर्ण है। वैसे दो-तीन सौ कम हो जाता तो मुझे बहुत सहूलियत हो जाती। मगर उनसे ये कहना ठीक नहीं है। कहीं बहुत हल्का आदमी समझ लिया तो?

'हाँ सर, आदमी के व्यवहार-विचार से बढ़कर कुछ नहीं है। आदमी जब एक छत के नीचे रहने लगता है तो बाहरी कहाँ रह जाता है। फिर तो सुख-दुख सब में अपने आप हिस्सेदारी बन जाती है। पहले जहाँ मैं था, जब मकान मालकिन को लड़की हुई तो देखने-भालने वाला कोई नहीं था। जब तक बच्ची की नानी और उनके पति आते, बच्ची का पेशाब-पैखाना सब मैंने ही किया।'

वकील साहब की पत्नी पीछे कुर्सी पर बैठ मुझे बहुत गौर से देख रही थी। मेरी बात सुनकर बहुत महीन मुस्कराई। 'आप मांस-मछली तो नहीं खाते हैं न?' उन्होंने पहली बार हस्तक्षेप किया।

ये कहाँ फँसा दी, शराब वाली बात की तरह। और मैंने झट से झूठ मार दिया, 'नहीं।' जबकि मैं यहाँ कह सकता था कि खाता तो हूँ, पर आप लोगों को यदि इस पर ऐतराज है, तो कमरे में नहीं बनाऊँगा। खाना होगा तो होटल में खा लूँगा। लेकिन रिस्क लेने की क्या जरूरत थी। एक बार कमरा मिल जाए, फिर बाद का बाद में देखा जाएगा। मुझे अपनी हाजिरजवाबी पर खुशी हो रही थी। रानी कुटी वाली गलती मैंने यहाँ नहीं दोहराई थी।

इस दौरान वकील साहब कुछ सोचते हुए लग रहे थे। बोले, ' कौन आदमी कैसा है, ये तुरंत नहीं पता चलता। समय लगता है। आज से करीब सात साल पहले की एकदम सच्ची घटना सुना रहा हूँ। ज्यादा दूर की नहीं, इसी लाइन में मेरे घर के बाद एक घर छोड़कर जो दूसरा घर है वहीं की है। उसमें लक्शनु चार साल किराएदार रहा। अपनी पूरी जिंदगी में उसके जैसा ऐक्टिव आदमी मैंने कभी नहीं देखा। वह किराएदार तो सोनी जी का था, पर मोहल्ले का हर घर उसका ठिया जैसे था। सुबह-शाम बच्चों को पढ़ने के लिए जमा करना, उनके साथ घूमना-खेलना उसका सबसे प्यारा काम था। उस समय उसी की वजह से पूरे मोहल्ले के एक भी बच्चे को पैसा देकर बाहर ट्यूशन नहीं लगवाना पड़ा था। बच्चे तो बच्चे, लक्शनु बुजुर्गों के लिए भी समय काटने का सबसे बढ़िया जरिया था। उनके लिए वह दिल्ली, पटना से तरह-तरह की किताबें लाता। खाली-पीली बैठे सभी रिटायर्ड बूढ़े दिन-रात कुछ न कुछ पढ़ते रहते थे। उनके जिम्मे का बहुत सारा काम लक्शनु करता था। बिजली का बिल, फोन का बिल, डाकखाने का काम, बाजार का काम ऐसे कई कामों के लिए वह हमेशा हाजिर रहता था। किसी का गेहूँ पिसवाकर लाना हुआ, किचेन में सब्जी जल रही है, साँप निकल आया है, किसी को जल्दी अस्पताल लेकर जाना है, घर में कोई नहीं है, कोई बात नहीं, लक्शनु तो है ही। अ्द्भुत ऊर्जा थी उसके पास। उसने एम.ए. तक की पढ़ाई की थी। मेरे साथ वो कोर्ट-कचहरी, राजनीति सब बतियाता था। तीस-बतीस साल का होगा, लेकिन हमेशा उसके भीतर एक बच्चा बैठा रहता था। मोहल्ले में कभी किसी ने उसे परेशान नहीं देखा। मोहल्ले के घरों को छोड़िए, लगभग सभी घरों के नाते-रिश्तेदारों को वह बढ़िया से पहचानता था। वे लोग भी उसको जानते थे, उसकी तारीफ करते थे। पर एक दिन सबको झटका लग गया। मोहल्ले में तीन गाड़ियाँ पुलिस आई थी। उस समय लक्शनु सोनी जी के साथ पौधे लगा रहा था। पुलिस पूरे घर को घेर ली। और वैसे ही, मिट्टी सने हाथ ही उसको पकड़कर ले गई। उसका कमरा सील कर दिया गया। मालूम वो कौन था, आंध्रप्रदेश का एक बहुत बड़ा नक्सलवादी था। विश्वास नहीं कीजिएगा, जब उसे गाड़ी में बिठाया जा रहा था, पूरे मोहल्ले वाले रो रहे थे। अरे मेरी मिसेज भी रो रही थी। अब बताइए, लक्शनु को देखकर कोई कह सकता था कि वो ऐसे काम भी करता होगा।'

'समझ रहा हूँ सर। 'मैंने गंभीरता से सहमति जताई।

'मुझे कभी-कभी अजीब लगता था, जब वो सुबह से ही रोटियाँ बनाने में लग जाता। पचास-साठ रोटियाँ बनाता। एक बार मैंने पूछा भी था कि इतनी रोटियों का क्या करते हो लक्शनु, तो उसने हँसकर कहा था, घर से बहुत सारे लोग अस्पताल आए हुए हैं, उन्हीं के लिए ले जाना पड़ता है। अब समझ में आता है, वो रोटियाँ कहाँ ले जाता होगा। अभी वो हैदराबाद की जेल में है। मोहल्ले की ही एक लड़की हैदराबाद देना बैंक में है। वह हर साल उसको एक बार राखी बांधने जरूर जाती है। प्रेम वाली बात है। अगर वो नक्सलवादी नहीं होता, तो ऐसा हीरा आदमी होता कि क्या बताऊँ।'

'ये लोग ऐसे ही होते हैं सर। मैं जानता हूँ न!'

'एक बार मैं बाहरगाँव गया हुआ था। मिसेज अकेली थी। मेरे ससुराल से खबर आई कि मेरे बड़े साले की तबीयत बहुत गंभीर हो गई है। मिसेज हड़बड़ा गई। जाने के लिए रोने लगी। पर अकेली कैसे क्या करती? तब पता है, लक्शनु ने मेरी मिसेज को मायके पहुँचाया था। और चौबीस घंटे में जब सब कुछ नियंत्रण में आ गया था, वह मिसेज को वापस भी ले आया था।'

'बहुत नेकी होती है इनके भीतर। बहुत मिलनसार होते हैं ये। मैंने तो करीब से देखा है न सर।'

'उसके रहते मोहल्ले में दो शादियाँ हुईं। शादी में वो बिल्कुल मजदूर बन जाता था। बाकी लोग नए कपड़ों में घूम रहे हैं, और वो अपने रोज के कपड़ों मे ही मजदूरों के साथ मगन है। न खाने की धुन, न सोने की।'

'मेरा खूब जाना-समझा हुआ है ये सब सर। जितने आत्मीय और मददगार ये लोग होते हैं, शायद ही दूसरे क्षेत्र के लोग हों। अब बात चली है तो आपको बता रहा हूँ, मेरा घर ऐसी जगह पर है, जहाँ अस्सी प्रतिशत लोग इसी क्षेत्र में हैं। दुनिया उनके बारे में जो भी कहती-समझती रहे, उनका विचार-व्यवहार तो हमलोग ही जानते हैं। उनके मधुर और सहृदयी स्वभाव के बारे में क्या कहूँ, जिनके बारे में आप बता रहे हैं, बस हू-ब-हू वैसे ही समझ लिजिए। कभी ले चलूँगा, आपको अपने घर तरफ।'

'कहाँ घर हुआ आपका?'

'रायगढ के पास।'

'सोनी जी ठीक कहते हैं, किसी के माथे पर कहाँ लिखा होता है कि कौन आदमी कैसा है। उस घटना के बाद उन्होंने अपने घर के बाहर एक बोर्ड टाँग दिया, किराए के कमरे के लिए पूछ्ताछ न करें।'

'जब उसे पकड़कर ले जा रहे थे, कोई बोलने नहीं आया सर? मोहल्ले वालों को सामने आना चाहिए था।'

इसके बाद वकील साहब ने कुछ नहीं कहा। कहानी के बाद माहौल बहुत गंभीर हो आया था। सब खामोश थे। मैं कुछ देर यूँ ही बैठा रहा, सामने रखी ग्लास का पानी पीया। फिर उठते हुए बोला, 'सर मैं शाम को आता हूँ। कमरे को थोड़ा झाड़-पोछ लूँगा।'

'शाम में मैं नहीं रहूँगा। अपना नंबर दे दीजिए, मैं आपसे बात कर लूँगा।'

'जी।'

उस रोज शाम में अपने कमरे में घुसते वक्त झूला झूलते काले गैंडे को मैंने बड़े आत्मविश्वास से देखा। उससे इत्मीनान से नजरें मिलाई और चिढ़ाने के अंदाज में मस्ती में गुनगुना दिया। रात को बड़ी सुकून के साथ गहरी नींद आई। सपने में एक दयालु सज्जन दिखे। वे कोई और नहीं, वकील साहब थे। सुबह मन और शरीर बहुत हल्का लग रहा था। मैं नए कमरे पर जाने की तैयारियों में लग गया। आठ बजे के करीब नए नंबर के साथ मोबाइल बजा। वकील साहब थे।

'कल आपसे कमरे को लेकर बात हुई थी। उसमें नया डेवलपमेंट यह है कि वो लड़का, जो इसमें पहले रहता था, मेरे मित्र का बेटा, वह वापस रहने के लिए आ रहा है। घरवालों ने उसको एक्वेरियम के बिजनेस के लिए पैसा देने से मना कर दिया है, इसलिए वह फिर से पढ़ाई शुरू करना चाह रहा है। गाँव-घर की बात है, सबको लेकर चलना पड़ता है। अब हम कमरा देने की स्थिति में नहीं हैं।'

टूँ-टूँ-टूँ-टूँ- फोन कट गया। शायद वकील साहब झूठ बोल रहे थे। पर क्यों? ऐसा क्या हो गया रात भर में? कि सही में वो लड़का रहने के लिए आ रहा था। भाड़ में जाएँ सब।

वकील के नकार के बाद मेरा मन इस शहर और यहाँ के गलीज मकान मालिकों के लिए खट्टा हो गया था। मैं इतना गहरे टूटा था कि कोई उसकी इंतहा नहीं है। मुझे छोटे शहरों के वे दिन याद आने लगे, जब मैं और नेसार, मेरा अजीज, दिन भर इसी तरह घूम-घूम कर कमरे की तलाश करते थे। पर लंबी मशक्कतों के बाद भी हमें कोई कमरा नसीब नहीं होता था। मकान वाले नाम पूछते, साथ में रहने की बात पूछते और फिर बेहयाई से इनकार कर देते। तब अंत में हारकर हमें अकेले-अकेले, अलग-अलग मोहल्ले में रहना पड़ा था। पर यहाँ, इस बड़े शहर में तो ऐसा नहीं था, फिर क्या हो गया था?

आवेश में मैं मिजाज से खूनी हो आने को हो रहा था।

मियाद खतम, भागो, जान बचाओ

वायदे और चेतावनी वाला दसवाँ दिन।

दस दिन कैसे गुजरा, दो ही लोग जानते हैं। एक मैं और एक मेरा जूता। जूता मर जाएगा, पर उफ्फ नहीं करेगा। पर मैं बोलूँगा। दर्ज करूँगा, शहर बहुत बेदर्द और बदतमीज निकला। अच्छा हुआ, कम तबाही हुई। सस्ते में छूटा। वरना जितना घर के लिए बौखना पड़ा, आगे रोजगार के लिए भी भटकना पड़ता। पैसे देने पर भी जो रहने के लिए ठौर नहीं दे सकता, वह खाने के लिए रोटी क्या देगा। जिस शहर का मिजाज आसमान छू रहा हो, वह स्वागतगान क्यों गाएगा। ऊपर के चार घर, जिन्हें मैंने अलग-अलग समयों में अपने रिहाइश के रूप में देखा, ये मुझे बहुत दर्द दिए। वह भी बिना मेरी खता-कसूर के। बड़ाई तो उनकी है, जिन्होंने एक लाइन में कहा, कमरा नहीं देना है। न झूठ बोले, न बहाने किए।

इस मामले में काले गैंडे ने मेरे साथ भारी फरेब किया। मुझे गली का कुत्ता बना दिया। वह दो दिन और इंतजार करेगा। और फिर कहा नहीं जा सकता, मेरे साथ किस तरह से पेश आएगा। पुलिस के दिमाग का कोई ठिकाना नहीं है, कब क्या कर दे। अगर डील-डौल में मैं भी गैंडे सरीखा होता, तो काले गैंडे की आज खैर नहीं थी। मैं उसे मल्ल युद्ध में पटककर उसकी थूथन बबूल के काँटों से रगड़ देता।

दसवें दिन की सुबह जागने के बाद मैंने चाय पी और किवाड़ की उन झिर्रियों को मूँदने में लग गया, जिससे काला गैंडा किराएदार की निजी जिंदगी में दाखिल होता था। हालाँकि मैं यह करता हुआ लगातार सोच रहा था कि वह गैंडा इन छेदों को फिर से बहाल कर लेगा।

इस काले गैंडे से बदला निकालने का क्या तरीका हो सकता है। कमरे में पैखाना करता जाऊँ? उल्टियाँ कर दूँ? अपनी सारी फटी चड्ढियाँ यहीं बिखेर जाऊँ? कमरे की दीवारों पर काला गैंडा होश में आओ और साथ ही कई गालियाँ लिख दूँ? भूले-भटके आने वाले किराएदारों को खतरे से आगाह करने के लिए एक-दो गुप्त जगहें चुनकर वहाँ संदेश छोड जाऊँ,' प्रेम करें आप, मजे ले किवाड़ के पार का गैंडा'।

पर बदले के मैं किसी भी तरीके पर अमल नहीं कर पाया। फितरत नहीं है यह सब अपनी।

हाँ यह जरूर है कि आलस में मैंने आते वक्त बाथरूम में खड़े-खड़े पेशाब किया और पानी भी नहीं गिराया। काले गैंडे की नाक की क्षमताएँ यदि बढ़ी हुई हों तो वह इसे मेरी भारी बदमाशी कहेगा और झूले पर झूलता हुआ गीत की तरह गालियाँ गाएगा।

हालाँकि तब तक मैं यह शहर छोड़ चुका होऊँगा और उसकी गालियाँ जाया होती रहेंगी।

मुझे भारती निवास की वह मासूम लड़की फिर से याद आ रही है। उसने मुझे गजब की इज्जत बख्शी थी। दिल नहीं मानता कि वह इस दिलहीन शहर की हो सकती है।


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हिंदी समय में मिथिलेश प्रियदर्शी की रचनाएँ