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संस्मरण

बुडुआ
स्वप्निल श्रीवास्तव


कुआँ ठीक मेरे घर के सामने था। उसके चारों ओर जगत बनी हुई थी। जिस पर लोग यदा-कदा बैठे रहते थे और गाँव गढ़ी की बातें करते थे। वह हमारे गाँव का सूचना केंद्र था। उसके पास एक चबूतरा था, जहाँ लोग नहाते थे और कपड़े धोते थे। कुएँ पर ढेकुल चलती थी। ढेकुल चलाना बहुत कठिन काम था। हजारों बार उठना बैठना पड़ता था। एक तरह से यह पानी को दुहने जैसा काम था। लोग ढेकुली से खेत सींचते थे। मैं बहुत छोटा था गगरा (जलपात्र) नहीं उठा पाता था। जब पिता या दादा गगरे से नहाते थे तो मैं उनकी पीठ के पीछे छिप जाता था। गगरे से पानी गिरने की आवाज मुझे बहुत अच्छी लगती थी।

गाँव में इस कुएँ के अलावा दो कुएँ और थे लेकिन उनकी जगत नहीं बनी थी इसलिए बरसात का गंदा पानी इसमें आकर जमा हो जाता था। वह पीने के लायक नहीं होता था। इसलिए गाँव के लोग इस कुएँ पर ज्यादा निर्भर रहते थे। गाँव की औरतें खूब सज-धज कर आती थी। अक्सर वे लाल पीली साड़ियाँ पहनती थी। उनके पाँवों में घुँघुरू की रुनझुन बजती थी और समय संगीतमय हो जाता था। जब वे कुएँ से पानी लेकर लौटती थी, उनके देह की लय और लोच देखने लायक होती थी, जैसे वे किसी नृत्य समारोह से लौट रही हों। नई-नई बहुरिया बहुत अच्छी लगती थी। शोहदे उनसे हँसी मजाक करते थे। लोग कौव्वे की तरह इन औरतों को छिपकर देखते रहते थे। बूढ़े भी कम पाजी नहीं थे। वे भी चुपके-चुपके नैनसुख लेते रहते थे। जब वे हमारी आँखों से ओझल हो जाती थीं, एक उदासी छा जाती थी।

कुएँ के ऊपर एक धरन रखी रहती थी जिस पर पाँव रख कर उबहन (रस्सी) से पानी निकाला जाता था। कुएँ के पानी को साफ करने के लिए उसमें मछलियाँ और कछुए डाले जाते थे। धीरे-धीरे वे बड़े होने लगते थे। उनका वजन कई किलो हो जाता था। वे पानी के देवता थे। वे कुएँ में अठखेलियाँ करते थे। कुएँ के पानी को हिलाकर रख देते थे। हम कुएँ के चारों ओर बैठकर इस खेल का मजा लेते रहते। कभी-कभी तो कुएँ में गिरते-गिरते बच जाते थे।

जब कुएँ में गाद जमा हो जाती थी, गाँव के लोग मिलकर सफाई करते थे। सबसे पहले कुएँ के पानी को कई दिनों तक सुखाते थे फिर कुएँ में उतरते थे और गाद निकालते थे। इस काम में बहुत मेहनत लगती थी। वे बहुत चहल-पहल भरे दिन थे। जो लोग काम करते थे उन्हें भोज दिया जाता था। लोग खूब मुँह बोरकर खाते थे और लंबी डकार लेते थे। फिर शैतान की तरह काम पर लग जाते थे। वे उत्सव के न भूलने वाले दिन थे। अब वे दिन कहाँ। अब वे लोग कहाँ? कुएँ के पानी की सफाई के लिए लाल रंग की दवा डाली जाती थी। यह कुआँ नहीं हमारे बचपन की गतिविधियों का केंद्र था।

घर में पानी जमा करने के लिए मिट्टी के बड़े-बड़े घड़े होते थे, जिसमें पानी भरा जाता था। महरा सुबह-शाम उसमें पानी भरते थे। जिससे रसोई का काम होता था। औरतें उस पानी से नहाती भी थीं। महरा के कंधे पर पानी ढोते-ढोते गूमड़ निकल आया था। वे जाति के कहार थे। कभी-कभी डोली ढोते। कहार डोली ढोते समय गाते थे और औरतों के साथ मुराही (मजाक) करते थे। वे बहुत बड़े मुरहा थे। उनकी मुराही मशहूर थी। इस कला में उन्हें कोई नहीं हरा पाता था... उनकी मेहरारू को हम बड़की माई कहते थे। मैं उनके कंधे पर बंदर की तरह बैठकर उनके घर चला जाता था। वे मुझे सोहारी (पूड़ी) और गुलगुला खिलाती थीं। जब उन्हें देखता तो कहता - बड़की, माई, चल आपणें घर। यह मेरा ताकिया कलाम था। हमारे और महरा के बीच पारिवारिक रिश्ते थे।

हमारे घर को बखरी कहा जाता था वह दो खंड का मकान था। दो खंड के मकान का मतलब जिसमें दो आँगन हो। एक बहुत बडा ओसारा (बरामदा) था, जिसमें गाँव की बारातें अक्सर रुका करती थीं। इस ओसारे में हल जुआठे हेंगा और खेती से संबंधित सामान रखे रहते थे। वहाँ पर गगरा लोटा और डोरी स्थायी रूप से रहता था, जिससे राहगीरों को पानी पिलाया जा सके। दादा मौनी (पात्र) में गुड़ भी रखते थे। हमारे दरवाजे से कोई भूखा प्यासा नहीं जाता था। कुछ राहगीर रास्ता भूल जाते थे। वे हमारे दरवाजे पर रुकते थे उन्हें खाना खिलाया जाता था। अगर खुद खाना बनाना चाहे तो उन्हें सीधा (खाना बनाने की सामग्री) दे दिया जाता था।

कुएँ से पानी निकालते समय गगरा बाल्टी लोटा गिर जाता था उसके लिए बुडुआ को बुलाया जाता था। वह जब आता था। दरवाजे पर भीड़ लग जाती थी। हम उसे छिप-छिप कर देखते थे। वह हमारी तरह का आदमी था। देह गठी हुई जैसे रस्सी बुनी हुई हो रंग साँवला, कान में लुर्की (रिंग) पहने हुआ था। उसके दाँत में सोना मढ़ा हुआ था जो हँसते समय चमकता था। हमारे जवार में जब किसी के दाँत में खोडर हो जाता था तो उसमें सोना भरवा देते थे। बुडुआ कुएँ के जगत पर शान से बैठा रहता था। औरतें उसे छिप कर देखती थी। बच्चों के लिए वह कौतुक बना हुआ था... लोगों के चेहरे पर खुशी का भाव था क्योंकि कुएँ में डूबी हुई चीजें उन्हें मिलने वाली थी। खोई हुई चीजों को पाने का सुख वही जान सकता है, जिसकी कोई चीज खोई हो। बाकी लोगों के लिए खोना एक क्रिया भर है। बस खेल शुरू होने में थोड़ी देर थी उसने दोनों कान में रुई का फाहा लगाया और झम्म से कुएँ में कूद पड़ा और पानी में गुम हो गया। कुएँ में रस्सी लटका दी जाती थी। वह बारी-बारी से खोई हुए चीजों को रस्सी में बाँध देता था, दूसरी रस्सी से अपने को सँभाले रहता था। जिसकी चीजें मिल जाती थीं, उसके चेहरे पर खुशी देखने लायक होती थी। गाँव के लोग उसे पैसे-रुपए की जगह सीधा देते थे। जिससे कम से कम एक माह तक परिवार का खर्चा चल जाता था। वह सबसे साहब बंदगी करता और दूसरे गाँव की तरफ रवाना हो जाता था। वह हम लोगों का नायक था।

कुछ दिनों बाद नल संस्कृति का उदय हुआ। जगह-जगह नल गड़ने लगे। कुएँ से पानी लेना कम हो गया। परिंदों की तरह चहकती हुई औरतें घर में ही रुक गईं। यह शोहदों के लिए सबसे बड़ा आघात था। बूढ़े भी कम परेशान नहीं थे। वे कुछ कहते तो जगहँसाई होती सो वे मन मार कर बैठे हुए थे। मेरे घर के आँगन में नल गड़ गया था। कुएँ से रिश्ता कम होता गया लेकिन नहाने और कपड़ा धोने के लिए उसकी उपयोगिता बनी हुई थी। पहले की तरह चहल-पहल नहीं थी। कुएँ में अँधेरा भरता जा रहा था। कोई उधर झाँकने नहीं जाता था। उसमें रहने वाली मछलियाँ और कछुए मरते जा रहे थे। उनका शव पानी के ऊपर तैर रहा था। कुएँ के लिए बुडुए की भूमिका खत्म हो गई थी। वह बूढ़ा हो चला था। उसने अपने बेटे को कमाने के लिए शहर भेज दिया था। वह भी कुएँ की तरह अकेला हो गया था। हद तो तब हो गई जब एक दिन कुएँ में नवयुवती की लाश पाई गई। यह कुएँ के इतिहास में सबसे बड़ा हादसा था। बहुत दिनों बाद बहुत सारे लोग कुएँ पर जमा हुए। जमा होने की वजह बहुत बुरी थी। किसी ने कुएँ के दर्द को नहीं समझा। कुएँ का पानी सड़ रहा था। ढेकुल इतिहास के बाहर हो चुकी थी। जगह-जगह ट्युबेल की बोरिंग हो रही थी। इस घटना के बाद पुलिस आई कुएँ का मुआइना किया गया। लोगों से पूछताछ की गई। पुलिस ने गाँव वालों को ताकीद की कि अगर इस तरह की कोई घटना हुई तो उसकी जिम्मेदारी गाँववालों की होगी। जब भी गाँव जाता हूँ कुएँ के अंदर अपने बीते हुए समय को चेहरा देखता हूँ और उन दिनों को याद करता हूँ जिसने मुझे मनुष्य बनाया है। जीवन की इस पाठशाला के बहुत पाठ याद हैं। उन लोगों का चेहरा मेरे चेहरे में शामिल है। यही मेरा हासिल है।


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