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कविता

थोड़ा साथ, थोड़ा हट कर
सुशांत सुप्रिय


ओ प्रिये
अपनी निजता में भी
मैं होता हूँ
तुम्हारे थोड़ा साथ
और थोड़ा तुम से हट कर

जैसे ढलते सूरज की इस वेला में
खड़ी है मेरी परछाईं
थोड़ी मेरे साथ
और थोड़ी मुझ से हट कर

जैसे अपनी आकाशगंगा में
है हमारी पृथ्वी
थोड़ी अपने सूर्य के साथ
और थोड़ी उससे हट कर

हाँ प्रिये
कभी-कभी
मैं होता हूँ तुम्हारे थोड़ा साथ
और थोड़ा तुम से हट कर
जैसे स्वर्ग से निष्कासन
के बाद आदम था
थोड़ा हव्वा के साथ
और थोड़ा उससे हट कर

 


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