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कविता

मेरे लोग
गजानन माधव मुक्तिबोध


जिंदगी की कोख में जनमा
नया इस्पात
दिल के खून में रँगकर।

तुम्हारे शब्द मेरे शब्द
मानव-देह धारण कर
असंख्यक स्त्री-पुरुष-बालक
बने, जग में, भटकते हैं,
कहीं जनमे
नए इस्पात को पाने।
झुलसते जा रहे हैं आग में।
या मुँद रहे हैं धूल-धक्कड़ में।
किसी की खोज है उनको,
किसी नेतृत्व की।

पीली धुमैली पसलियों के पंजरवाली
उदासी से पुती गाएँ
भयानक तड़फड़ाती ठठरियों की
आत्मवश स्थितप्रज्ञ कपिलाएँ
उपेक्षित काल-पीड़ित सत्य के समुदाय
या गो-यूथ
लेकर वे
घुसे ही जा रहे हैं
ब्राशिए के बस्टवाली उन दुकानों के पास
काफे की निकटवर्ती सड़क पर,
चमचमाती खूबसूरत शान के नायलान भभ्भड़ में।

दुतरफा पेड़वाली रम्य किंग्जवे में
कि एलगिन रोड नुक्कड़ पर
खरोंचे-मारते-सी घिस-रहे-सी
सौ खुरों की खरखराती शब्द-गति
सुनकर
खड़े ही रह गए हैं लोग।
उनमें सैकड़ों विस्मित,
कई निस्तब्ध।
कुछ भयभीत, जाने क्यों
समूचे दृश्य से मुँह मोड़ यह कहते -
'हटाओ ध्यान, हमसे वास्ता क्या है?
कि वे दुःस्वप्न-आकृतियाँ
असद् है, घोर मिथ्या हैं!!'
दलिद्दर के शनिश्चर का
भयानक प्रॉपगैंडा है!!
खुरों के खरखराते खुरचते पद-शब्द-स्वर-समुदाय
सुनकर,
दौड़कर उन ओटलों पर,
द्वार-देहली, गैलरी पर,
खिड़कियों में या छतों पर
जो इकट्ठा हैं
गिरस्तिन मौन माँ-बहनें
सड़क पर देखती हैं
भाव-मंथर, काल-पीड़ित ठठरियों की श्याम गो-यात्रा
उदासी से रँगे गंभीर मुरझाए हुए प्यारे
गऊ-चेहरे।
निरखकर
पिघल उठता मन!!
रुलाई गुप्त कमरे में हृदय के उमड़ती-सी है।
नहीं आए सत्य जो शिक्षित
सुसंस्कृत बुद्धिमानों दृष्टिमानों के
उन्हें वे हैं कि मन-ही-मन
सहज पहचान लेतीं!!
मग्न होकर ध्यान करती हैं कि
अपने बालकों को छातियों से और चिपकातीं।
भोले भाव की करुणा बहुत ही क्रांतिकारी सिद्ध होती है।

उपेक्षित काल पीड़ित सत्य के समुदाय
लेकर साथ
मेरे लोग
असंख्य स्त्री-पुरुष-बालक भटकते हैं
किसी की खोज है उनको।
अटकना चाहते हैं द्वार-देहली पर किसी के किंतु
मीलों दूरियों के डैश खिंचते हैं
अँधेरी खाइयों के मुँह बगासी जोर से लेकर
यूँ ही बस देख
अनपहचानती आँखों -
खुले रहते।

गंदी बस्तियों के पास नाले पार
बरगद है
उसी के श्याम तल में वे
रँभाती हैं कई गायें।
कि पत्थर-ईंट के चूल्हे सुलगते हैं।
फुदकते हैं वहीं दो-चार
बिखरे बालवाले बालकों के श्याम गंदे तन
व लोहे की बनी स्त्री-पुरुष आकृतियाँ
दलिद्दर के भयानक देवता के भव्य चेहरे वे
चमकते धूप में!!
मुझको है भयानक ग्लानि
           निज के श्वेत वस्त्रों पर
स्वयं की शील-शिक्षा सत्य-दीक्षा के
                    विरोधी अस्त्र-शस्त्रों पर
कि नगरों के सुसंस्कृत सौम्य चेहरों से
उचटता मन
उतारूँ आवरण -
           यह साफ गहरा दूधिया कुरता
           व चूने की सफेदी में चिलकते-से सभी कपड़े निकालूँगा।
किसी ने दूर से मुझको पुकारा है।

गंदी बस्तियों के पास, नाले पार
गुमटी एक,
जिसके तंग कमरे में
जरा-सा पुस्तकालय वाचनालय है।
पहुँचता हूँ। अचानक ग्रंथ
कोई खोलता ही हूँ कि
पृ्ष्ठों के हृदय में से
उभरते काँपते हैं वायलिन के स्वर
सहज गुंजारती झनकार
गहरे स्नेह-सी।
मीठी सघन विस्तृत भरमाती गूँज
जिसकी सांद्र ध्वनि में से
सुकोमल रश्मियों के पुंज!!
तेजोद्भास
मन खुलता, स्वयं की ग्रंथियाँ खुलतीं!!

कि इतने में फटी-सी अन्य पुस्तक
खोलता-सा हूँ कि
पृष्ठों के जिगर में से
भयानक डाँट
कोई भव्य विश्वात्मक तड़ित आघात
सहसा बोध होता है
उभरता क्रोध निःस्वात्मक
सहज तनकर गरजता
जिंदगी की कोख में जनमा
नया इस्पात
दिल के खून में रँगकर!!
तुम्हारे स्वर कहाँ हैं,
                  ओ!!

 


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हिंदी समय में गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ