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कहानी

एक समानांतर कहानी
रमेश बक्षी


नानी के मुँह कहानी, मन में आए और लौट रहे ज्वार-भाटे के समानांतर आकर ठहर गई है। झक-सफेद कपड़े वाले नेताजी ने असम-हैंडलूम के मेजपोष पर ग्वालियर क्रॉकरी के नीले प्याले जमा दिए हैं। मैंने शक्कर डालने को हाथ बढ़ाया तो नेताजी ने मना कर दिया है। वे स्वयं मेरी लिए कॉफी बना रहे हैं। जैसे ही इंस्टंट कॉफी का चम्मच गरम पानी से मिलते ही सुगंध देकर प्याले में भँवर-सा घूमने लगा है कि मुझे चाँदी से सफेद चमकीले बालों वाली नानी ही सामने बैठी दिखने लगी है।

हम दो-तीन भाई-बहन गोधूली से नानी को घेर लेते। सहन में सतरंगे पट्टों वाली सतरंजी बिछली रहती और एक कोने में बैठी नानी की गोद में हम सबके सिर जा पहुँचते। नानी हम पर झुककर कहानी शुरू कर देती, एक की एक ही कहानी, पर रोज झाँझ सुनते न हम अघाते, न ही नानी कहते थकती। कहानी भी ऐसी थी कि न तब खत्म होती लगती है। कहानी यूँ शुरू होती -

'एक था शेखचिल्ली। बड़ा लालची था। किसी ने उसे बतला दिया कि जो ढोल होते हैं ढमाक्-ढम-ढम ढमाक् ढम-ढम बजने वाले, उन्हें फोड़कर अगर देखों तो उनमें पाओगे सोने-चाँदी की गिन्नी-अषरफियाँ और हीरे-जवाहरात।... उसने खरीदा ढोल। बड़े ऊँचे थे उसके बोल। बड़ा भारी था उसका मोल। पर न थी उसमें गिन्नी-अशर्फी, न थे रुपए गोल-गोल। ढोल को जब फोड़ा तो अंदर से निकी पोल।' ओर नानी की यह राग-भरी कहानी सुनते-सुनते सो जाते क्योंकि हम जब-जब पूछते फिर क्या हुआ नानी? तो नानी कहती, 'उसने फिर दूसरा ढोल खरीदा, फिर तीसरा, फिर चौथा... फिर पाँचवाँ।'

और शेखचिल्ली अब भी ढोल खरीदता जा रहा है और ढोल में से पोल और पोल और पोल निकलती ही जा रही है।

'अब क्यों परेशान हैं आप?' झक् सफेद कपड़े पहने नेताजी मुझ से पूछ रहे हैं।

'नही तो, परेशान नहीं हूँ।' मैं प्याले से एक घूँट पीकर कहता हूँ। सच ही मेरी परेशानी दूर हो गई है। दो दिन-रातों मैं ठीक से साँसें भी न ले सका था पर अब तो सब ठीक हो गया, सारी आफत रफा-दफा हो चुकी है।

'ये दस रुपए आप रख लीजिए, शायद जरूरत पड़ जाए, और काम शुरू कर दीजिए। मुझे आप पर पूरा विश्‍वास है।'

'मैं कल शाम आऊँगा तो रुपए तभी ले लूँगा और मेरे बस चलते जो कुछ बन सकता है उसके लिए जान हाजिर है।'

मैंने 'ना' कर दिया पर नेताजी मेरे लिए फिर कॉफी बनाने लगे। जैसे ही इंस्टंट कॉफी का चम्मच गरम पानी से मिलते ही सुगंध देकर प्याले में भँवर-सा घूमने लगा है कि मुझे कल की दोपहर की याद हो आई है।

हाँ दोपहर थी, गरमी की दोपहर। मैं सोया था। बाबूजी ऑफिस गए थे, अम्मा मंदिर गई थी। मैं बड़ी बेचैनी महसूस किए था कि पड़ौसी-बच्चों के हल्ले से नींद टूट गई थी, छाती के उत्तर-पश्चिम में तेज धड़कन हो रही थी उठने को था कि पड़ोसिन की लड़की कमरे में आई, वह आया करती है, पर हम दोनों छत से सिर लगने की उम्र के हैं सो कभी बात न हुई। मुझे जाने क्या हुआ कि पास पड़ी चद्दर सिर तक ढँक ली और चद्दर की बारीकी में से उसे देखने लगा-सादे से कपड़े पहने थी। बिलकुल यूँ ही-सी लड़की है पर उसे देखकर भी बेचैनी बढ़ गई। वह मेरी अम्मा को ढँढूने आई थी। इधर-उधर पुकारती रही फिर मेरी तरफ देख बोली, 'अरे, अम्मा तो सोयी हैं।' मेरी बेचैनी बढ़ गई। उसने एकदम मेरे सिर से चद्ददर खींच ली। मैंने चद्ददर के खिंचते ही हाथ बढ़ा उसे पकड़ लिया। जीवन में पहली बार बेचैनी महसूस करते समय किसी के उम्र पाए हाथ को छुआ था। उसने हाथ से छूटने की ऐसी कोशिश की कि कहीं सच ही छूट न जाएँ। मैंने उसे अपने करीब खींच लिया था। वह मेरे हाथ से अपना हाथ छुड़ाती वैसी ही लगी जैसे फुरसत के सयम रूमाल में गठान लगाती लगती है। मैंने कहा था, 'हाथ मैं खुद ही छोड़ दूँगा, पहले एक बात बताओ।' उसने बात सुनने से मनाहीं कर दी और मेरे हाथ को अँगूठे के पास दाँत से काट लिया। मैंने सीनाजोरी करते कहा, 'मेरा हाथ क्यों चूमा?' उसका चेहरा तमतमा गया। मैंने उसकी ओर देखा तो मुसकरा दी वह। जैसे लाल में नीला रंग मिलाते समय एकदम जामुनी रंग झलक उठता है, वैसे ही तमतमाहट और मुस्कान के मिलने से जामुनिया प्यार उसके छोटे-से चेहरे पर चमक उठा।...कि जैसे एकदम बादल गरजे और बिजली गिरी। चाची, यानी उस यूँ ही-सी लड़की की माँ, दरवाजे पर खड़ी थीं और मुझे काटो तो खून की जगह ठंडा पानी। वह लड़की जान छोड़ भागी और मैंने बोलने की कोशिश की तो जबान हकलाने लगी।

'ठहरो तो सही, आने दो बाबू जी को। तुम्हें ठीक करा देती हूँ। बड़े सीधे बनते हो। होश गायब न करबा दूँ तो तुम्हारी चाची नहीं।'

मैं उठा और चल दिया। तूफान का आना, नाव का डगमगाना, धरती का डोलना, कप-बशियों का फूटना, सब-कुछ एक साथ दिल के एक ही कोने में महसूस किए जा रहा था। चाची बाबूजी से कहेंगी, अम्मा से कहेंगी, मंदिर में कथा सुनने वाली औरत से कहेंगी, और सबसे कह देंगी। मैं तेज-तेज कदमों से चलने लगा। बाबूजी कैसे-कैसे भाषण देंगे, अम्मा मेरे पतन पर कैसे-कैसे विलाप करेंगी और चाची मेरे कुनबे को किस-किस तरह बखानेंगी, इसकी कल्पना से भी मुझे कँपकँपी छूट आई। एक बार जी चाहा कि जाकर चाची के पैरों गिर पड़ूँ, कहूँ, 'अब कभी न होगा ऐसा। इस बार क्षमा कर दो।' एक मन यह भी कह रहा था कि मंदिर में जाकर, अपने दोनों कान पकड़ भगवान को साक्षी कर शपथ ले लूँ कि मैं गूँगा-अंध-लँगड़ा हो जाऊँ जो किसी लड़की की ओर देखूँ भी! मेरे लिए दो से पाँच के तीन घंटे भारी हो रहे थे। अम्मा और बाबूजी मंदिर और ऑफिस से यही कोई पाँच बजे के आसपास लौटा करते हैं। पाँच बजने की कल्पना से मैं फिर डरा और तेज-तेज चलने लगा।

'इतनी जल्दी कहाँ?' जिसने पूछा, वह था शहर का सिटी-रिपोर्टर। बोला, 'साथ आओ यार, चाय पीएँगे।' मुझसे चाय भी न पी गई। बार-बार चाची की सूरत याद आए जा रही थी। चाचाजी मंदिर के पुजारी हैं, उनके घर में हवा भी धर्म की चलती है और उन्हीं की लड़की का मैंने हाथ पकड़ लिया है। पंडितजी मेरी ओर देखकर अगर 'फू' भी कर देंगे तो मैं जलकर भस्म हो जाऊँगा और भस्म होने के साथ ही किसी यमकुंडाग्नि नरक में जा पड़ूँगा।

सिटी-रिपोर्टर ने ऐसी सहानुभूति दिखाई कि बीस बरस का मैं भर-आँसू उसके सामने सिसक उठा। अब मैंने बताया, 'मंदिर वाले पंडितजी की लड़की है वह और उन्हीं की बीवी (यानी चाचीजी) ने मेरी साँसें हराज कर रखी हैं। पाँच बजते ही मेरा कोर्ट-मार्शल हो जाएगा।'

सिटी-रिपोर्टर हँसा, 'चुटकी बजाते ही सब ठीक कर दूँगा। उस परिवार को मैं भी खूब जानता हूँ। जाओ तुम घर और उस चाची से कहना, दो साल पहले की फूलडोल एकादशी याद है, मंदिर में तुम अकेली थी और परिक्रमा वाले एक आदमी ने तुम्हारी तरफ देखा था।' वह बोला, 'बस इतना ही काफी है। इतने में तो उसका चेहरा काला पड़ जाएगा। कुछ और पूछे तो धौंम देते हुए कहना, 'बता दूँ सब बातें, कह दूँ पंडितजी से जाकर?' 'बन गया इतने में तो काम तुम्हारा।'

मरता क्या न करता? मैंने रिपोर्टर के बताए वाक्य ठीक से रट लिए और उसे यह कहकर कि 'अभी आता हूँ' अपने घर आया। चाची छत पर थीं। मुझे देखते ही आग उगलने लगीं, 'तेरा बाप तारीफ करते नहीं थकता, पर तेरी इज्जत मिट्टी में न मिलवा दूँ तो मेरा भी नाम नहीं।'

मैंने सधी जबान से कहा, 'चाचीजी, दो साल पहले की फूलडोल एकादशी याद है?'

'क्या बकता है रे?'

'और उस दिन मंदिर में आप अकेली थीं?'

'तो क्या हुआ?'

'ओर परिक्रमा वाले एक आदमी ने तुम्हारी तरफ देखा था?'

'पर...पर...पर तुझे?' चाची हकलाने लगीं।

'और फिर...।'

'चुप रह रहे!' चाची की साँसें तेज हो गई थीं। सच ही उनका चेहरा स्याह हो गया।

'सारी बातें सुना दूँ कि क्या-क्या हुआ था?' चाची चुप हो गई और पसीना पोंछने लगीं।

'मैं आज शाम को ये बातें पंडितजी से कहने वाला हूँ।' मैंने वाक्य पूरा कर चाची की आँखों को सीधे देखा।

'नहीं बेटा...नहीं।'

मैं खुश था। फिजूल ही परेशान हो रहा था। इनके धर्म में कि-त-नी बड़ी पोल है! खुश-तबीयत फिर होटल में पहुँचा। पूछा रिपोर्टर ने, 'कहो गुरू?' मैंने दाहिने हाथ की उँगलियों से 'ह्वी' बना दी। थोड़ी देर बाद रिपोर्टर बोला, 'कल सुबह मुझे सौका एक नोट चाहिए। मैं नौ बजे इसी होटल में मिलूँगा।'

'सौ?' मैं फिर परेशान हो गया। सौ रुपए कहाँ से पाऊँगा? मैं कुछ कहूँ इसके पहले ही वह उठा और चल दिया। साइकिल पर बैठता हुआ बोला, 'रुपए आ ही जाने चाहिएँ, नहीं तो...'

वह तो चला गया पर मैं आफत में पड़ गया। बार-बार याद आता, 'नहीं तो...' नहीं तो अखबार में छपवा देगा या...या... पर मैं सौ रुपए कहाँ से ला सकता हूँ? रिटायर होने आए पर बाबूजी अब भी एल.डी.सी. है। महीने के आखिरी दिन हैं, घर में सौ क्या दस भी नहीं हैं। फिर?

मुझे मुश्किल में प्रिंस याद आया। कॉलेज में साथ पढ़ता है तीन कारें है उसके पास। किसी रियासत का राजा होता, होता तो। रुपया पानी की तरह बहता है उसके घर। एक बार गेदरिंग में अपनी बहन को कॉलेज ले गया था, देर रात हो गई तो वह अपनी कार में हमें घर छोड़ गया था। मैं चला। उसके बँगले पर पहुँचा। बड़े प्यार से मिला। बोला, 'बोलो भाई, क्या खातिर करूँ? मैं खुद ही तुम्हारे घर का पता पूछ रहा था। अच्छा हुआ कि तुम ही गए।'

मैंने हिचकते हुए कहा, 'सौ रुपए की जरूरत है?'

'सौ? फकत सौ? सौ क्या हजार ले जाओ। पर जरूरत क्या पड़ गई?' उसने बड़े प्यार से पूछा।

'यार, वो सामाजिक कार्यकर्ता उर्फ सिटी-रिपोटँरजी जो हैं न, उन्हें देने हैं। मेरा एक मामला उन्होंने सुलझा दिया तो उसी की कीमत चुकानी है और वह भी कल सवेरे नौ बजे ही।'

'अरे तुम भी उसे रुपए देने लगे, उसकी नब्ज तो मेरे हाथ में है।' यह कहते हुए प्रिंस ने एक पैड उठाया और कुछ लिखा, फिर बोला, 'यह दिखा देना उसको।'

मैंने प्रिंस को कृतज्ञता से नमस्कार किया और सुबह नौ बजे होटल पहुँचा। रिपोर्टर चाय पी रहा था। बोला, 'लाए?'

'यह लो।'

वह पत्र पढ़ते-पढ़ते काँप गया। मैंने वह पत्र पहले ही पढ़ लिया था। 'धर्म अनाथलय' के पैड पर लिखा था, 'प्रिस पत्रकार महोदय, एक वर्ष पहले जो बच्चा हमें रेलवे ब्रिज पर मिला, वह हमारे अनाथलय में है। तफ्तीष से मालूम हुआ है कि आप उसके पिता हैं। उसकी माँ का भी पता लग गया है, पर उससे आपके क्या संबंध हैं, यह हम मौखिक रूप से बताएँ। कहिये?' नीचे प्रिंस के दस्तखत थे।

'मुझे रूपयों की जरूरत नहीं है।' इतना कह सिटी-रिपोर्टर चला गया।

'मैं दौड़ा-दौड़ा प्रिंस के पास गया। उसने प्यार से बिठाया, कॉफी पिलवाई, फिर एक निमंत्रण-पत्र देता हुआ बोला, 'शाम को बहन को भेज देना। मेरी बहन की सालगिरह है।' मैंने निमंत्रण-पत्र ले लिया।

चला तो प्रिंस बोला, ''जरूर-जरूर भेज देना। ऐसा न हो कि...।'

क्या मतलब? मेरी आत्मा तक तिलमिला गई। प्रिंस है तो अपने घर का होगा। जो हुआ कि लौट जाऊँ और प्रिंस को दो-चार चाँटे जमा दूँ, पर चुप रह गया। यह तो कहता था कि इसकी कोई बहन नहीं है, और...? मेरा खून जलने लगा पर इसका मुँह बंद कैसे करूँगा? मुझे सारी रात नींद नहीं आई। घर पर बाबूजी ने एक काम बताया कि नेताजी से मिल लूँ। वे कुछ काम दे देंगे।

फुरसत में था तो उनके घर चला गया। वे बड़े प्यार से मिले। झक सफेद कपड़ों वाले उनके व्यक्तित्व ने बहुत प्रभावित किया मुझे। बात निकली तो मैं बोला, 'शहर में बड़ी चार-सौ-बीसी चल रही है नेताजी! गांधी रोड पर एक प्रिंस रहता है, उसका घर तो अय्याशी का अड्डा है।'

नेताजी ने हाँ-में-हाँ मिलाते हुए कहा, 'हाँ। मैंने तो यहाँ तक सुना है कि साल में दर्जनेक बार अपनी बहन की सालगिरह का जष्न मनाया करता है और अपने दोस्तों की बहनों को...' नेताजी ने वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया।

उनकी बात सुन मैं तमतमा गया। जी चाहा कि कहीं से रिवाल्वर मिल जाए तो खून कर डालूँ प्रिंस का।

मैं कुछ नहीं बोला। बोले नेता ही, 'पर उसकी नब्ज मेरे हाथ में है। उसने इनकम टैक्स में ढेरों रुपया खाया है। मेरी तो इच्छा है कि एंटी-करप्शन वालों की उसका कच्चा चिट्ठा थमा दूँ।'

'तो मैं आज यही बात उसे कहूँगा। अच्छा हुआ यह बता दिया आपने नहीं तो उसके एक एहसान की कीमत चुकाने के बदले मैं उसका खून ही कर डालता। नेताजी, मैं हमेशा आपका एहसान मानूँगा।' मैं श्रद्धा से झुककर बोला।

'अरे ऐसी भी क्या बात है। पर मेरा एक छोटा-सा काम कर देना।'

'बताइए।'

'फिर बताऊँगा, पहले प्रिंस से मिल आओ।'

मैं चला। शाम का समय था। प्रिस इंतजार कर रहा था। जी हुआ कि जाते ही जोर का चाँटा रसीद करूँ।

पूछा उसने, 'नहीं लाए?'

'आ रहे हैं।' मैंने कहा।

''क्या मतलब?' वह चौंका।

'तुमने इनकम-टैक्स में जितना रुपया खाया है और जो कुछ कर रहे हो उसका हिसाब देना होगा। ए.सी. (एंटी करप्शन डिपार्टमेंट) को खबर कर दी गई है।' मैंने पुरतैश में कही थी अपनी बात।

प्रिंस परेशान हो गया, 'नहीं, ऐसा मत करो।' तुम्हें जितना रुपया चाहिए ले जाओ।

'मुझे नहीं चाहिए रुपया।'

'तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ मैं, ऐसा मत करो।' इतना कहते-कहते वह मेरे पैरों पर झुक गया।

'आज तो तेरी बहन की सालगिरह है न?' मैंने दाँत पीसकर कहा, 'कान पकड़ बदतमीज।' उसने कान पकड़ लिए। मैंने एक लात मारी और चल दिया। बार-बार थूक देने को जी मितला रहा था।

लौटकर नेताजी के घर आया। मैंने बहुत-बहुत धन्यावाद दिया। वे बोले, 'भाई मेरा एक ये काम है।' उन्होंने एक कागज मुझे पकड़ा दिया। लिखा था, 'मैं जनसंधी हूँ पर इस संस्था से अब घृणा करता हूँ और नेताजी को वोट देने की सिफारिश कर रहा हूँ।' वे बोले, 'यहाँ दस्तखत कर दो।'

'पर नेताजी, मैं तो एक विद्यार्थी ही हूँ'- मैं परेशान होकर बोला, 'और जो जनसंधी नेता यहाँ से चुनाव में खड़े हुए हैं, मेरे मामा हैं-इस पर अगर दस्तखत कर दूँ तो...।'

'इसीलिए तो...।' वे टोपी ठीक करने लगे।

'यह मैं कैसे कर सकता हूँ, इस से तो हमारे परिवार में झगड़ा हो जाएगा...

'मैंने प्रिंस के खिलाफ इतनी बड़ी बात आपको बतला दी और मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकते।' नेताजी अनमने हो गए, फिर उठते हुए बोले, 'खैर, सोच लीजिए, कल सुबह आइएगा।'

मैं चला। मेरे मन में सारी दुनियादारी के प्रति घृणा-ही-घृणा भर गई थी। चला तो चप्पल की बद्धी टूट गई। चमार को दो चप्पल और मन के तूफान को रोकने की कोशिश करने लगा। बद्धी में कील ठोकता वह पास बैठे अपने दोस्त से बोला, 'नेताजी परीसान करत हेगा तो परीसान का होत हो? केह दो चुनाव में हरा देवेंगे, ठीक तो जइ हैं। बाकी जेइ कल अपने पास हती और हैगी।'

बात सुन मेरी आँखों में चमक आ गई, मैं लौट गया उनकी कोठी पर और बोला, 'अगर उस कागज पर दस्तखत करवाने का फोर्स किया तो मैं चुनाव में आपको हरवा दूंगा। माइनरिटी के सार वोट मेरी मुठ्ठी में हैं।'

नेताजी तने हुए थे सो सीधे हुए और झुक गए चेहरे पर सौम्य मुसकान लाकर बोले, 'हमारी जीत तुम-जैसे नौजवानों के ही हाथ में है।' संक्षिप्त भाषण के बाद कॉफी मँगवाई गई। झक् सफेद कपड़े वाले नेताजी ने अपने हैंडलूम के मेज पोष पर ग्वालियर क्रॉकरी ने नीले प्याले जमा दिए। मैंने शक्कर डालने को हाथ बढ़ाया, तो नेताजी ने मना कर दिया। वे स्वंय मेरे लिए कॉफी बनाने लगे। एक प्याला, फिर दूसरा प्याला...।

नानी के मुँह कहानी सुनते हुए हम हँसते-हँसते लोट-पोट हो जाते थे। मुझे नानी की आवाज साफ सुनाई दे रही है... उसने खरीदा ढोल... (कौन-सा ढोल, धर्म का? समाज का? पूँजी का? राजनीति का?) बड़े ऊँचे ये उसके बोल... (किसके बोल, चाची के? पत्रकार के? प्रिंस के? नेताजी के?) पत्रकार की नैतिकता का? (प्रिंस की शान का? नेताजी के व्यक्तित्व का?) ...पर न थी उसमें गिन्नी-अशर्फी, न थे रुपए गोल-गोल। ढोल को जब फोड़ा...।

'कॉफी और लोगे?' नेताजी पूछ रहे हैं।

'नहीं।' मैं इनकार कर देता हूँ और सोचता हूँ कि बचपन में जिस कहानी को सुनकर हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाते थे, आज उसी कहानी से हँसी क्यों नहीं आ रही है? क्या इसलिए कि मैं खुद शेखचिल्ली बन गया हूँ?


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