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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पहला भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 13. आखिर विलायत पहुँचा पीछे     आगे

जहाज में मुझे समुद्र का जरा भी कष्ट नहीं हुआ। पर जैसे-जैसे दिन बीतते जाते, वैसे-वैसे मैं अधिक परेशान होता जाता था। 'स्टुअर्ड' के साथ बातचीत करने में भी शरमाता था। अंग्रेजी में बात करने की मुझे आदत ही न थी। मजमुदार को छोड़कर दूसरे सब मुसाफिर अंग्रेज थे। मैं उनके साथ बोल न पाता था। वे मुझसे बोलने का प्रयत्न करते, तो मैं समझ न पाता, और समझ लेता तो जवाब क्या देना सो सूझता न था। बोलने से पहले हरएक वाक्य को जमाना पड़ता था। काँटे-चम्मच से खाना आता न था, और किस पदार्थ में मांस है, यह पूछने की हिम्मत नहीं होती थी। इसलिए मैं खाने की मेज पर तो कभी गया ही नहीं। अपनी कोठरी में ही खाता था। अपने साथ खास करके जो मिठाई वगैरा लाया था, उन्हीं से काम चलाया। मजमुदार को तो कोई संकोच न था। वे सबके साथ घुलमिल गए थे। डेक पर भी आजादी से जाते थे। मैं सारे दिन कोठरी में बैठा रहता था। कभी-कभार, जब डेक पर थोड़े लोग होते, तो कुछ देर वहाँ जाकर बैठ लेता था। मजमुदार मुझे समझाते कि सब के साथ घुलो-मिलो आजादी से बातचीत करो; वे मुझसे यह भी कहते कि वकील की जीभ खूब चलनी चाहिए। वकील के नाते वे अपने अनुभव सुनाते और कहते कि अंग्रेजी हमारी भाषा नहीं है, उसमें गलतियाँ तो होगी ही, फिर भी खुलकर बोलते रहना चाहिए। पर मैं अपनी भीरुता छोड़ न पाता था।

मुझ पर दया करके एक भले अंग्रेज ने मुझसे बातचीत शुरू की। वे उमर में बड़े थे। मैं क्या खाता हूँ, कौन हूँ, कहाँ जा रहा हूँ, किसी से बातचीत क्यों नहीं करता, आदि प्रश्न वे पूछते रहते। उन्होंने मुझे खाने की मेज पर जाने की सलाह दी। मांस न खाने के मेरे आग्रह की बात सुनकर वे हँसे और मुझ पर तरस खाकर बोले, 'यहाँ तो (पोर्टसईद पहुँचने से पहले तक) ठीक है, पर बिस्के की खाड़ी में पहुँचने पर तुम अपना विचार बदल लोगे। इंग्लैंड में तो इतनी ठंड पड़ती है कि मांस खाए बिना चलता ही नहीं।'

मैंने कहा, 'मैंने सुना है कि वहाँ लोग मांसाहार के बिना रह सकते है।'

वे बोले, 'इसे गलत समझो। अपने परिचितों में मैं ऐसे किसी आदमी को नहीं जानता, जो मांस न खाता हो। सुनो, मैं शराब पीता हूँ, पर तुम्हें पीने के लिए नहीं कह सकता। लेकिन मैं समझता हूँ कि तुम्हें मांस को खाना ही चाहिए।'

मैंने कहा, 'इस सलाह के लिए मैं आपका आभार मानता हूँ, पर मांस न खाने के लिए मैं अपनी माताजी से वचनबद्ध हूँ। इस कारण मैं मांस नहीं खा सकता। अगर उसके बिना काम न चला तो मैं वापस हिंदुस्तान चला जाऊँगा, पर मांस तो कभी न खाऊँगा।'

बिस्के की खाड़ी आई। वहाँ भी मुझे न तो मांस की जरूरत मालूम हूई और न मदिरा की। मुझसे कहा गया कि मैं मांस न खाने के प्रमाण पत्र इकट्ठा कर लूँ। इसलिए इन अंग्रेज मित्र से मैंने प्रमाण पत्र माँगा। उन्होंने खुशी-खुशी दे दिया। कुछ समय तक मैं उसे धन की तरह सँभाले रहा। बाद में मुझे पता चला कि प्रमाण-पत्र तो मांस खाते हुए भी प्राप्त किए जा सकते है। इसलिए उनके बारे में मेरा मोह नष्ट हो गया। अगर मेरी बात पर भरोसा नहीं है तो ऐसे मामले में प्रमाण-पत्र दिखा कर मुझे क्या लाभ हो सकता है?

दुख-सुख सहते हुए यात्रा समाप्त करके हम साउदेंप्टन बंदरगाह पर पहुँचे। मुझे याद है कि उस दिन शनिवार था। जहाज पर मैं काली पोशाक पहनता था। मित्रों ने मेरे लिए सफेद फलालैन के कोट-पतलून भी बनवा दिए थे। उन्हें मैंने विलायत में उतरते समय पहनने का विचार कर रखा था, यह समझकर कि सफेद कपड़े अधिक अच्छे लगेंगे! मैं फलालैन का सूट पहनकर उतरा। मैंने वहाँ इस पोशाक में एक अपने को ही देखा। मेरी पेटियाँ और उनकी चाबियाँ तो ग्रिंडले कंपनी के एजेंट ले गए थे। सबकी तरह मुझे भी करना चाहिए, यह सोच कर मैंने तो अपनी चाबियाँ भी दे दी थी।

मेरे पास चार सिफारशी पत्र थे : डॉक्टर प्राणजीवन मेहता के नाम, दलपतराम शुक्ल के नाम, प्रिंस रणजीतसिंह के नाम और दादाभाई नौरोजी का नाम। मैंने साउदेंप्टन से डॉक्टर मेहता को एक तार भेजा था। जहाज में किसी ने सलाह दी थी कि विक्टोरिया होटल में ठहरना चाहिए। इस कारण मजमुदार और मैं उस होटल में पहुँचे। मैं अपनी सफेद पोशाक की शरम से गड़ा जा रहा था। तिस पर होटल में पहुँचने पर पता चला कि अगले दिन रविवार होने से ग्रिंडले के यहाँ से सामान नहीं आएगा। इससे मैं परेशान हुआ।

सात-आठ बजे डॉक्टर मेहता आए। उन्होंने प्रेमभरा विनोद किया। मैंने अनजाने रेशमी रोओंवाली उनकी टोपी देखने के खयाल से उठाई और उस पर उलटा हाथ फेरा। इससे टोपी के रोएँ खड़े हो गए। डॉक्टर मेहता ने देखा, मुझे तुरंत ही रोका। पर अपराध तो हो चुका था। उनके रोकने का नतीजा तो यही निकल सकता था कि दुबारा वैसा अपराध न हो।

समझिए कि यहीं से यूरोप के रीति-रिवाजों के संबंध में मेरी शिक्षा का श्रीगणेश हुआ। डॉक्टर मेहता हँसते-हँसते बहुत-सी बातें समझाते जाते थे। किसी की चीज छूनी नहीं चाहिए, किसी से जान-पहचान होने पर जो प्रश्न हिंदुस्तान में यों ही पूछे जा सकते है, वे यहाँ नहीं पूछे जा सकते, बातें करते समय ऊँची आवाज से नहीं बोल सकते, हिंदुस्तान में अंग्रेजो से बात करते समय 'सर' कहने का जो रिवाज है, वह यहाँ अनावश्यक है, 'सर' तो नौकर अपने मालिक से अथवा बड़े अफसर से कहता है। फिर उन्होंने होटल में रहने के खर्च की भी चर्चा की और सुझाया कि किसी निजी कुटुंब में रहने की जरूरत पड़ेगी। इस विषय में अधिक विचार सोमवार पर छोड़ा गया। कई सलाहें देकर डॉक्टर मेहता बिदा हुए।

होटल में आकर हम दोनों को यही लगा कि यहाँ कहाँ आ फँसे। होटल महँगा भी था। माल्टा से एक सिंधी यात्री जहाज पर सवार हुए थे। मजमुदार उनसे अच्छे से घुलमिल गए थे। ये सिंधी यात्री लंदन के अच्छे जानकार थे। उन्होंने हमारे लिए दो कमरे किराए पर लेने की जिम्मेदारी उठाई। हम सहमत हुए और सोमवार को जैसे ही सामान मिला, बिल चुका कर उक्त सिंधी सज्जन द्वारा ठीक किए कमरों में हमने प्रवेश किया।

मुझे याद है कि मेरे हिस्से का होटल का बिल लगभग तीन पौंड का हुआ था। मैं तो चकित ही रह गया। तीन पौंड देने पर भी भूखा रहा। होटल की कोई चीज रुचती नहीं थी, दूसरी ली, पर दाम तो दोनों के चुकाने चाहिए। यह कहना ठीक होगा कि अभी तो मेरा काम बंबई से लाए हुए पाथेय से ही चल रहा था।

इस कमरे में भी मैं परेशान रहा। देश की याद खूब आती थी। माताजी का प्रेम मूर्तिमान होता था। रात पड़ती और मैं रोना शुरू करता। घर की अनेक स्मृतियों की चढ़ाई के कारण नींद तो आ ही कैसे सकती थी? इस दुख की चर्चा किसी से की भी नहीं जा सकती थी, करने से लाभ भी क्या था? मैं स्वयं नहीं जानता था कि किस उपाय से मुझे आश्वासन मिलेगा।

यहाँ के लोग विचित्र, रहन-सहन निचित्र, घर भी विचित्र, घरों में रहने का ढंग भी विचित्र! क्या कहने और क्या करने से यहाँ शिष्टाचार के नियमों का उल्लंघन होगा, इसकी जानकारी भी मुझे बहुत कम थी। तिस पर खाने-पीने की परहेज, और खाने योग्य आहार सूखा तथा नीरस लगता था। इस कारण मेरी दशा सरौते के बीच सुपारी जैसी हो गई। विलायत में रहना मुझे अच्छा नहीं लगता था और देश भी लौटा नहीं जा सकता था। विलायत पहुँच जाने पर तो तीन साल वहाँ पूरे करने का मेरा आग्रह था।


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