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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पहला भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी


कोई यह न माने कि नाच आदि के मेरे प्रयोग उस समय की मेरी स्वच्छंदता के सूचक है। पाठकों ने देखा होगा कि उनमें कुछ समझदारी थी। मोह के इस समय में भी मैं एक हद तक सावधान था। पाई-पाई का हिसाब रखता था। खर्च का अंदाज रखता था। मैंने हर महीने पंद्रह पौंड से अधिक खर्च न करने का निश्चिय किया था। मोटर में आने-जाने का अथवा डाक का खर्च भी हमेशा लिखता था। और सोने से पहले हमेशा अपनी रोकड़ मिला लेता था। यह आदत अंत तक बनी रही। और मैं जानता हूँ कि इससे सार्वजनिक जीवन में मेरे हाथो लाखों रुपयों का जो उलट-फेर हुआ है, उसमें मैं उचित किफायतशारी से काम ले सका हूँ। और आगे मेरी देख-रेख में जितने भी आंदोलन चले, उनमें मैंने कभी कर्ज नहीं किया, बल्कि हर एक में कुछ न कुछ बचत ही रही। यदि हर एक नवयुवक उसे मिलनेवाले थोड़े रुपयों का भी हिसाब खबरदारी के साथ रखेगा, तो उसका लाभ वह भी उसी तरह अनुभव करेगा, जिस तरह भविष्य में मैंने और जनता ने किया।

अपनी रहन-सहन पर मेरा कुछ अंकुश था, इस कारण मैं देख सका कि मुझे कितना खर्च करना चाहिए। अब मैंने खर्च आधा कर डालने का निश्चय किया। हिसाब जाँचने से पता चला कि गाड़ी-भाड़े का मेरा खर्च काफी होता था। फिर कुटुंब में रहने से हर हफ्ते कुछ खर्च तो होता ही था। किसी दिन कुटुंब के लोगो को बाहर भोजन के लिए ले जाने का शिष्टाचार बरतना जरूरी था। कभी उनके साथ दावत में जाना पड़ता, तो गाड़ी-भाड़े का खर्च लग ही जाता था। कोई लड़की साथ हो तो उसका खर्च चुकाना जरूरी हो जाता था। जब बाहर जाता, तो खाने के लिए घर न पहुँच पाता। वहाँ तो पैसे पहले से ही चुकाए रहते और बाहर खाने के पैसा और चुकाने पड़ते। मैंने देखा कि इस तरह के खर्चों से बचा जा सकता है। महज शरम की वजह से होनेवाले खर्चों से बचने की बात भी समझ में आई।

अब तक मैं कुटुंबों मे रहता था। उसके बदले अपना ही कमरा लेकर, और यह भी तय किया कि काम के अनुसार और अनुभव प्राप्त करने के लिए अलग-अलग मुहल्लों में घर बदलता रहूँगा। घर मैंने ऐसी जगह पसंद किए कि जहाँ से काम की जगह पर आधे घंटे में पैदल पहुँचा जा सके और गाड़ी-भाड़ा बचे। इससे पहले जहाँ जाना होता वहाँ का गाड़ी-भाड़ा हमेशा चुकाना पड़ता और घूमने के लिए अलग से समय निकालना पड़ता था। अब काम पर जाते हुए ही घूमने की व्यवस्था जम गई, और इस कारण मैं रोज आठ-दस मील घूम लेता था। खासकर इस एक आदत के कारण मैं विलायत में शायद ही कभी बीमार पड़ा होऊँगा। मेरा शरीर काफी कस गया। कुटुंब में रहना छोड़कर मैंने दो कमरे किराए पर लिए। एक सोने के लिए और दूसरा बैठक के रूप में। यह फेरफार की दूसरी मंजिल कहीं जा सकती है। तीसरा फेरफार अभी होना शेष था।

इस तरह आधा खर्च बचा। लेकिन समय का क्या हो? मैं जानता था कि बारिस्टरी की परीक्षा के लिए बहुत पढ़ना जरूरी नहीं है, इसलिए मुझे बेफिकरी थी। पर मेरी कच्ची अंग्रेजी मुझे दुख देती थी। लेली साहब के शब्द 'तुम बी.ए. हो जाओ, फिर आना' मुझे चुभते थे। मैंने सोचा मुझे बारिस्टर बनने के अलावा कुछ और भी पढ़ना चाहिए। ऑक्सफर्ड केंब्रिज की पढ़ाई का पता लगाया। कई मित्रों से मिला। मैंने देखा कि वहाँ जाने से खर्च बहुत बढ़ जाएगा और पढ़ाई लंबी चलेगी। मैं तीन साल से अधिक रह नहीं सकता था। किसी मित्र ने कहा, 'अगर तुम्हें कोई कठिन परीक्षा ही देनी हो, तो लंदन की मैट्रिक्युलेशन पास कर लो। उसमे मेहनत काफी करनी पड़ेगी और साधारण ज्ञान बढ़ेगा। खर्च बिलकुल नहीं बढ़ेगा।' मुझे यह सुझाव अच्छा लगा। पर परीक्षा के विषय देख कर मैं चौंका। लेटिन और दूसरी एक भाषा अनिवार्य थी। लेटिन कैसे सीखी जाय? पर मित्र ने सुझाया, 'वकील के लिए लेटिन बहुत उपयोगी है। लेटिन जाननेवाले के लिए कानूनी किताबें समझना आसान हो जाता है, और रोमन लॉ की परीक्षा में एक प्रश्नपत्र केवल लेटिन भाषा में ही होता है। इसके सिवा लेटिन जानने से अंग्रेजी भाषा पर प्रभुत्व बढ़ता है।' इन सब दलीलों का मुझ पर असर हुआ। मैंने सोचा, मुश्किल हो चाहे न हो, पर लेटिन तो सीख ही लेनी है। फ्रेंच की शुरू की हुई पढ़ाई को पूरा करना है। इसलिए निश्चय किया कि दूसरी भाषा फ्रेंच हो। मैट्रिक्युलेशन का एक प्राईवेट वर्ग चलता था। हर छठे महीने परीक्षा होती थी। मेरे पास मुश्किल से पाँच महीने का समय था। यह काम मेरे बूते के बाहर था। परिणाम यह हुआ कि सभ्य बनने की जगह मैं अत्यंत उद्यमी विद्यार्थी बन गया। समय-पत्रक बनाया। एक-एक मिनट का उपयोग किया। पर मेरी बुद्धि या समरण-शक्ति ऐसी नहीं थी कि दूसरे विषयों के अतिरिक्त लेटिन और फ्रेंच की तैयारी कर सकूँ। परीक्षा में बैठा। लेटिन में फेल हुआ, पर हिम्मत नहीं हारा। लेटिन में रुचि हो गई थी। मैंने सोचा कि दूसरी बार परीक्षा में बैठने से फ्रेंच अधिक अच्छी हो जाएगी और विज्ञान मे नया विषय ले लूँगा। प्रयोगों के अभाव में रसायनशास्त्र मुझे रुचता ही न था। यद्यपि अब देखता हूँ कि उसमें खूब रस आना चाहिए था। देश में तो यह विषय सीखा ही था, इसलिए लंदन की मैट्रिक के लिए भी पहली बार इसी को पसंद किया था। इस बार 'प्रकाश और उष्णता' का विषय लिया। यह विषय आसान माना जाता था। मुझे भी आसान प्रतीत हुआ।

पुनः परीक्षा देने की तैयारी के साथ ही रहन-सहन में अधिक सादगी लाने का प्रयत्न शुरू किया। मैंने अनुभव किया कि अभी मेरे कुटुंब की गरीबी के अनुरूप मेरा जीवन सादा नहीं बना है। भाई की तंगी के और उनकी उदारता के विचारों ने मुझे व्याकुल बना दिया। जो लोग हर महीने 15 पौंड या 8 पौंड खर्च करते थे, उन्हें तो छात्रवृत्ति मिलती थी। मैं देखता था कि मुझसे भी अधिक सादगी से रहनेवाले लोग हैं। मैं ऐसे गरीब विद्यार्थियों के संपर्क में ठीक-ठीक आया था। एक विद्यार्थी लंदन की गरीब बस्ती में हफ्ते के दो शिलिंग देकर एक कोठरी मे रहता था, और लोकार्ट की कोको की सस्ती दुकान में दो पेनी का कोको और रोटी खाकर गुजारा करता था। उससे स्पर्धा करने की तो मेरी शक्ति नहीं थी, पर अनुभव किया कि मैं एक कमरे में रह सकता हूँ और आधी रसोई अपने हाथ से भी बना सकता हूँ। इस प्रकार मैं हर पर महीने चार या पाँच पौंड में अपना निर्वाह कर सकता हूँ। सादे रहन-सहन पर पुस्तकें भी पढ़ चुका था। दो कमरे छोड़ दिए और हफ्ते के आठ शिलिंग पर एक कमरा किराए पर लिया। एक अँगीठी खरीदी और सुबह का भोजन हाथ से बनाना शुरू किया।

इसमें मुश्किल से बीस मिनट खर्च होते थे। ओटमील की लपसी बनाने और कोको ले लिए पानी उबालने में कितना समय लगता? दोपहर का भोजन बाहर कर लेता और शाम को फिर कोको बनाकर रोटी के साथ खा लेता। इस तरह मैं एक से सवा शिलिंग के अंदर रोज के अपने भोजन की व्यवस्था करना सीख गया। यह मेरा अधिक से अधिक पढ़ाई का समय था। जीवन सादा बन जाने से समय अधिक बचा। दूसरी बार परीक्षा में बैठा और पास हुआ।

पर पाठक यह न माने कि सादगी से मेरा जीवन नीरस बना होगा। उलटे, इन फेरफारों के कारण मेरी आंतरिक और बाह्य स्थिति के बीच एकता पैदा हूई, कौटुंबिक स्थिति के साथ मेरी रहन-सहन का मेल बैठा, जीवन अधिक सारमय बना और मेरे आत्मानंद का पार न रहा।


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