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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पहला भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 22. नारायण हेमचंद्र पीछे     आगे

इन्ही दिनों स्व. नारायण हेमचंद्र विलायत आए थे। लेखक के रूप में मैंने उनका नाम सुन रखा था। मैं उनसे नेशनल इंडियन एसोसियेशन की मिस मैनिंग के घर मिला। मिस मैनिंग जानती थीं कि मैं सब के साथ हिलमिल नहीं पाता। जब मैं उनके घर जाता, तो मुँह बंद करके बैठा रहती। कोई बुलवाता तभी बोलता।

उन्होंने नारायण हेमचंद्र से मेरी पहचान कराई। नारायण हेमचंद्र अंग्रेजी नहीं जानते थे। उनकी पोशाक अजीब थी। बेडौल पतलून पहले हुए थे। ऊपर सिकुड़नोंवाला, गले पर मैला, बादामी रंग का कोट था। नेकटाई या कॉलर नहीं थे। कोट पारसी तर्ज का, पर बेढंगा था। सिर पर ऊन की गुँथी हुई झल्लेदार टोपी थी। उन्होंने लंबी दाढ़ी बढ़ा रखी थी।

कद इकहरा और ठिंगना कहा जा सकता था। मुँह पर चेचक के दाग थे। चेहरा गोल। नाक न नुकीली न चपटी। दाढी पर उनका हाथ फिरता रहता। सारे सजे-धजे लोगों के बीच नारायण हेमचंद्र विचित्र लगते थे और सबसे अलग पड़ जाते थे।

'मैंने आपका नाम बहुत सुना है। कुछ लेख भी पढ़े हैं। क्या आप मेरे घर पधारेंगे?'

नारायण हेमचंद्र की आवाज कुछ मोटी थी। उन्होंने मुस्कराते हुए जवाब दिया, 'आप कहाँ रहते है?'

'स्टोर स्ट्रीट में'

'तब तो हम पड़ोसी है। मुझे अंग्रेजी सीखनी है। आप मुझे सिखाएँगे?'

मैंने उत्तर दिया, 'अगर मैं आपकी कुछ मदद कर सकूँ, तो मुझे खुशी होगी। मैं अपनी शक्ति भर प्रयत्न अवश्य करूँगा। आप कहें तो आपके स्थान पर आ जाया करूँ।'

'नहीं, नहीं, मैं ही आपके घर आऊँगा। मेरे पास पाठमाला है। उसे भी लेता आऊँगा।'

हमने समय निश्चित किया। हमारे बीच मजबूत स्नेह-गाँठ बँध गई।

नारायण हेमचंद्र को व्याकरण बिलकुल नहीं आता था। वे 'घोड़ा' को क्रियापद बना देते और 'दौड़ना' को संज्ञा। ऐसे मनोरंजक उदाहरण तो मुझे कई याद हैं। पर नारायण हेमचंद्र तो मुझे घोटकर पी जानेवालों में थे। व्याकरण के मेरे साधारण ज्ञान से मुग्ध होनेवाले नहीं थे। व्याकरण न जानने की उन्हें कोई शरम ही नहीं थी।

'तुम्हारी तरह मैं किसी स्कूल में नहीं पढ़ा हूँ। अपने विचार प्रकट करने के लिए मुझे व्याकरण की आवश्यकता मालूम नहीं होती। बोलो, तुम बंगला जानते है? मैं बंगाल में घूमा हूँ। महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर की पुस्तकों के अनुवाद गुजराती जनता को मैंने दिए है। मैं गुजराती जनता को कई भाषाओं के अनुवाद देना चाहता हूँ। अनुवाद करते समय मैं शब्दार्थ से नहीं चिपकता, भावार्थ दे कर संतोष मान लेता हूँ। मेरे बाद दूसरे भले ही अधिक देते रहें। मैं बिना व्याकरण के भी मराठी जानता हूँ, हिंदी जानता हूँ, और अब अंग्रेजी भी जानने लगा हूँ। मुझे तो शब्दभंडार चाहिए। तुम यह न समझो कि अकेली अंग्रेजी से मुझे संतोष हो जाएगा। मुझे फ्रांस जाना है और फ्रेंच भी सीख लेनी है। मैं जानता हूँ कि फ्रेंच साहित्य विशाल है। संभव हुआ तो मैं जर्मनी भी जाऊँगा और जर्मन सीख लूँगा।'

नारायण हेमचंद्र की वाग्धारा इस प्रकार चलती ही रही। भाषाएँ सीखने और यात्रा करने की उनके लोभ की कोई सीमा न थी।

'तब आप अमेरिका तो जरूर ही जाएँगे?'

'जरूर। उस नई दुनिया को देखे बिना मैं बापस कैसे लौट सकता हूँ।'

'पर आपके पास इतने पैसे कहाँ है?'

'मुझे पैसों से क्या मतलब? मुझे कौन तुम्हारी तरह टीमटाम से रहना है? मेरा खाना कितना है और पहनना कितना है? पुस्तकों से मुझे जो थोड़ा मिलता है और मित्र जो थोड़ा देते है, वह सब काफी हो जाता है। मैं तो सब कहीं तीसरे दर्जें में ही जाता हूँ। अमरीका डेक में जाऊँगा।'

नारायण हेमचंद्र की सादगी तो उनकी अपनी ही चीज थी। उनकी निखालिसता भी वैसी ही थी। अभिमान उन्हें छू तक नहीं गया था। लेकिन लेखक के रूप में अपनी शक्ति पर उन्हें आवश्यकता से अधिक विश्वास था।

हम रोज मिला करते थे। हममें विचार और आचार की पर्याप्त समानता थी। दोनों अन्नाहारी थे। दुपहर का भोजन अकसर साथ ही करते थे। यह मेरा वह समय था, जब मैं हफ्ते के सत्रह शिलिंग में अपना निर्वाह करता था और हाथ से भोजन बनाता था। कभी मैं उनके मुकाम पर जाता, तो किसी दिन वे मेरे घर आते थे। मैं अग्रेजी ढंग की रसोई बनाता था। उन्हें देशी ढंग के बिना संतोष ही न होता। दाल तो होनी ही चाहिए। मैं गाजर वगैरा का झोल (सूप) बनाता तो इसके लिए वे मुझ पर तरस खाते। वे कहीं से मूँग खोजकर ले आए थे। एक दिन मेरे लिए मूँग पकाकर लाए और मैंने उन्हें बड़े चाव से खाया। फिर तो लेन-देन का हमारा यह व्यवहार बढ़ा। मैं अपने बनाए पदार्थ उन्हें चखाता और वे अपनी चीजें मुझे चखाते।

उन दिनों कार्डिनल मैनिंग का नाम सबकी जबान पर था। डक के मजदूरों की हड़ताल थी। जॉन बर्न्स और कार्डिनल मैनिंग के प्रयत्न से हड़ताल जल्दी ही खुल गई। कार्डिनल मैनिंग की सादगी के बारे में डिजरायेली ने जो लिखा था, सो मैंने नारायण हेमचंद्र को सुनाया।

'तब तो मुझे इन साधु पुरुष से मिलना चाहिए।'

'वे बहुत बड़े आदमी है। आप कैसे मिलेंगे?'

'जैसे मैं बतलाता हूँ। तुम मेरे नाम से उन्हें पत्र लिखो। परिचय दो कि मैं लेखक हूँ और उनके परोपकार के कार्य का अभिनंदन करने के लिए स्वयं उनसे मिलना चाहता हूँ। यह भी लिखो कि मुझे अंग्रेजी बोलना नहीं आता, इसलिए मुझे तुम को दुभाषिए के रूप में ले जाना होगा।'

मैंने इस तरह का पत्र लिखा। दो-तीन दिन बाद कार्डिनल मैनिंग का जवाब एक कार्ड में आया। उन्होंने मिलने का समय दिया था।

हम दोनों गए। मैंने प्रथा के अनुसार मुलाकाती पोशाक पहन ली थी। पर नारायण हेमचंद्र तो जैसे रहते थे वैसे ही रहे। वही कोट और वही पतलून। मैंने मजाक किया। मेरी बात को उन्होंने हँसकर उड़ा दिया और बोले, 'तुम सभ्य लोग सब डरपोक हो। महापुरुष किसी की पोशाक नहीं देखते। वे तो उसका दिल परखते हैं।'

हमने कार्डिनल के महल में प्रवेश किया। घर महल ही था। हमारे बैठते ही एक बहुत दुबले-पतले, बूढे, ऊँचे पुरुष ने प्रवेश किया। हम दोनों के साथ हाथ मिलाए। नारायण हेमचंद्र का स्वागत किया।

'मैं आपका समय नहीं लूँगा। मैंने आपके बारे में सुना था। हड़ताल में आपने जो काम किया, उसके लिए आपका उपकार मानना चाहता हूँ। संसार के साधु पुरुषों के दर्शन करना मेरा नियम है, इस कारण मैंने आपको इतना कष्ट दिया।' नारायण हेमचंद्र ने मुझसे कहा कि मैं इस वाक्यो का उल्था कर दूँ।

'आपके आने से मुझे खुशी हुई है। आशा है, यहाँ आप सुखपूर्वक रहेंगे और यहाँ के लोगों का परिचय प्राप्त करेंगे। ईश्वर आपका कल्याण करे।' यह कह कर कार्डिनल खड़े हो गए।

एक बार नारायण हेमचंद्र मेरे यहाँ धोती कुर्ता पहनकर आए। भली घर-मालकिन ने दरवाजा खोला और उन्हें देख कर डर गई। मेरे पास आकर (पाठकों को याद होगा कि मैं अपने घर बदलता ही रहता था। इसलिए यह मालकिन नारायण हेमचंद्र को नहीं जानती थी।) बोली, 'कोई पागल सा आदमी तुमसे मिलना चाहता है।' मैं दरवाजे पर गया तो नारायण हेमचंद्र को खड़ा पाया। मैं दंग यह गया। पर उनके मुँह पर तो सदा की हँसी के सिवा और कुछ न था।

'क्या लड़को ने आपको तंग नहीं किया?'

जवाब में वे बोले, 'मेरे पीछे दौड़ते रहे। मैंने कुछ ध्यान नहीं दिया, इसलिए वे चुप हो गए।'

नारायण हेमचंद्र कुछ महीने विलायत रहकर पेरिस गए। वहाँ फ्रेंच का अध्ययन शुरू किया और फ्रेंच पुस्तकों का अनुवाद करने लगे। उनके अनुवाद को जाँचने लायक फ्रेंच मैं जानता था, इसलिए उन्होंने उसे देख जाने को कहा। मैंने देखा कि वह अनुवाद नहीं था, केवल भावार्थ था।

आखिर उन्होंने अमेरिका जाने का अपना निश्चय पूरा किया। बड़ी मुश्किल से डेक का या तीसरे दर्जे का टिकट पा सके थे। अमेरिका में धोती-कुर्ता पहनकर निकलने के कारण 'असभ्य पोशाक पहनने' के अपराध में वे पकड़ लिए गए थे। मुझे याद पड़ता है कि बाद में वे छूट गए थे।


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