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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पहला भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 24. बारिस्टर तो बने - लेकिन आगे क्या ? पीछे     आगे

मैं जिस काम के लिए - बारिस्टर बनने - विलायत गया था, उसका मैंने क्या किया, इसकी चर्चा मैंने अब तक छोड़ रखी थी। अब उसके बारे में कुछ लिखने का समय आ गया है।

बारिस्टर बनने के लिए दो बातों की जरूरत थी। एक थी 'टर्म पूरी करना' अर्थात सत्र में उपस्थित रहना। वर्ष में चार सत्र होते थे। ऐसे बारह सत्रों में हाजिर रहना था। दूसरी चीज थी, कानून की परीक्षा देना। सत्रों में उपस्थिति का मतलब था, 'दावतें खाना'; यानि हर एक सत्र में लगभग चौबीस दावतें होती थीं, उनमें से छह में सम्मिलित होना। दावतों में भोजन करना ही चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं था, परंतु निश्चित समय पर उपस्थिति रहकर भोज की समाप्ति तक वहाँ बैठे रहना जरूरी था। आम तौर पर तो सब खाते-पीते ही थे। खाने में अच्छी-अच्छी चीजें होती थीं और पीने के लिए बढ़िया मानी जानेवाली शराब। अलबत्ता, उसके दाम चुकाने होते थे। यह रकम ढाई से साढ़े तीन शिलिंग होती थी; अर्थात दो-तीन रुपए का खर्च हुआ। वहाँ यह कीमत बहुत कम मानी जाती थी, क्योंकि बाहर के होटल में ऐसा भोजन करनेवालों को लगभग इतने पैसे तो शराब के ही लग जाते थे। खाने की अपेक्षा शराब पीनेवाले का खर्च अधिक होता है। हिंदुस्तान में हम को (यदि हम 'सभ्य' न हुए तो) इस पर आश्चर्य हो सकता है। मुझे तो विलायत जाने पर यह सब जानकर बहुत आघात पहुँचा था। और मेरी समझ में नहीं आता था कि शराब पीने के पीछे इतना पैसा बरबाद करने की हिम्मत लोग कैसे करते हैं। बाद में समझना सीखा! इन दावतों में मैं शुरू के दिनों में कुछ भी न खाता था, क्योंकि मेरे काम की चीजों मे वहाँ सिर्फ रोटी, उबले आलू और गोभी होती थी। शुरू में तो ये रुचे नहीं, इससे खाए नहीं। बाद में जब उनमें स्वाद अनुभव किया तो तो दूसरी चीजें भी प्राप्त करने की शक्ति मुझ में आ गई।

विद्यार्थियों के लिए एक प्रकार के भोजन की और 'बेंचरों' (विद्या मंदिर के बड़ों) के लिए अलग से अमीरी भोजन की व्यवस्था रहती थी। मेरे साथ एक पारसी विद्यार्थी थे। वे भी अन्नाहारी बन गए थे। हम दोनों ने अन्नाहार के प्रचार के लिए 'बेंचरों' के भोजन में से अन्नाहारी के खाने लायक चीजों की माँग की। इससे हमें 'बेंचरों' की मेज पर परसे फल वगैरा और दूसरे शाक सब्जियाँ मिलने लगीं।

शराब तो मेरे काम की नहीं थी। चार आदमियों के बीच दो बोतलें मिलती थीं। इसलिए अनेक चौकड़ियों में मेरी माँग रहती थी। मैं पीता नहीं था, इसलिए बाकी तीन को दो बोतल जो 'उड़ाने' को मिल जाती थी! इसके अलावा, इन सत्रों में 'महारात्रि' (ग्रैंड नाइट) होती थी। उस दिन 'पोर्ट' और 'शेरी' के अलावा 'शेंपेन' शराब भी मिलती थी। 'शेंपेन' की लज्जत कुछ और ही मानी जाती है। इसलिए इस 'महारात्रि' के दिन मेरी कीमत बढ़ जाती थी और उस रात हाजिर रहने का न्योता भी मुझे मिलता।

इस खान-पान से बारिस्टरी मे क्या वृद्धि हो सकती है, इसे मैं न तब समझ सका न बाद में। एक समय ऐसा अवश्य था कि जब इन भोजों मे थोड़े ही विद्यार्थी सम्मिलित होते थे और उनके तथा 'बेंचरों' के बीच वार्तालाप होता और भाषण भी होते थे। इससे उन्हें व्यवहार-ज्ञान प्राप्त हो सकता था। वे अच्छी हो चाहे बुरी, पर एक प्रकार की सभ्यता सीखते थे और भाषण करने की शक्ति बढ़ाते थे। मेरे समय में तो यह सब असंभव ही था। बेंचर तो दूर, एक तरफ, अस्पृश्य बनकर बैठे रहते थे। इस पुरानी प्रथा का बाद में कोई मतलब नहीं रह गया। फिर भी प्राचीनता के प्रेमी - धीमे - इंग्लैंड में वह बनी रही।

कानून की पढ़ाई सरल थी। बारिस्टर मजाक में 'डिनर' (भोज के) बारिस्टर ही कहलाते थे। सब जानते थे कि परीक्षा का मूल्य नहीं के बराबर है। मेरे समय में दो परीक्षाएँ होती थी, रोमन लॉ और इंग्लैंड के कानून की। दो भागों में दी जानेवाली इस परीक्षा की पुस्तकें निर्धारित थी। पर उन्हें शायद ही कोई पढ़ता था। रोमन लॉ पर लिखे संक्षिप्त नोट मिलते थे। उन्हें पंद्रह दिन में पढ़कर पास होनेवालों को मैंने देखा था। यही चीज इंग्लैंड के कानून के बारे में भी थी। उस पर लिखे नोटों को दो-तीन महीनों में पढ़कर तैयार होनेवाले विद्यार्थी भी मैंने देखे थे। परीक्षा के प्रश्न सरल, परीक्षक उदार। रोमन लॉ मे पंचानवे से निन्यानवे प्रतिशत तक लोग उत्तीर्ण होते थे और अंतिम परीक्षा में पचहत्तर प्रतिशत या उससे भी अधिक। इस कारण अनुत्तीर्ण होने का डर बहुत कम रहता था। फिर परीक्षा वर्ष में एक बार नहीं चार बार होती थी। ऐसी सुविधावाली परीक्षा किसी के लिए बोझरूप हो ही नहीं सकती थी।

पर मैंने उसे बोझ बना लिया। मुझे लगा कि मूल पुस्तकें पढ़ ही जानी चाहिए। न पढ़ने में मुझे धोखेबाजी लगी। इसलिए मैंने मूल पुस्तकें खरीदने पर काफी खर्च किया। मैंने रोमन लॉ को लेटिन में पढ़ डालने का निश्चय किया। विलायत की मैट्रिक्युलेशन की परीक्षा में मैंने लेटिन सीखी थी, यह पढ़ाई व्यर्थ नहीं गई। दक्षिण अफ्रीका में रोमन-डच लॉ (कानून) प्रमाणभूत माना जाता है। उसे समझने में जस्टिनियन का अध्ययन मेरे लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

इंग्लैड के कानून का अध्ययन मैं नौ महीनों में काफी मेहनत के बाद समाप्त कर सका, क्योंकि ब्रूम के 'कॉमन लॉ' नामक बड़े परंतु दिलचस्प ग्रंथ का अध्ययन करने में ही काफी समय लग गया। स्नेल की 'इक्विटी' को रसपूर्वक पढ़ा, पर उसे समझने में मेरा दम निकल गया। व्हाइट और ट्यूडर के प्रमुख मुकदमों में से जो पढ़ने योग्य थे, उन्हें पढ़ने में मुझे मजा आया और ज्ञान प्राप्त हुआ। विलियम्स और एडवर्डज की स्थावर संपत्ति विषयक पुस्तक मैं रसपूर्वक पढ़ सका था। विलियम्स की पुस्तक तो मुझे उपन्यास सी लगी। उसे पढ़ते समय जी जरा भी नहीं ऊबा। कानून की पुस्तकों में इतनी रुचि के साथ हिंदुस्तान आने के बाद मैंने मेइन का 'हिंदू लॉ' पढ़ा था। पर हिंदुस्तान के कानून की बात यहाँ नहीं करूँगा।

परीक्षाएँ पास करके मैं 10 जून 1891 के दिन बारिस्टर कहलाया। 11 जून को ढाई शिलिंग देकर इंग्लैड के हाईकोर्ट में अपना नाम दर्ज कराया और 12 जून को हिंदुस्तान के लिए रवाना हुआ।

पर मेरी निराशा और मेरे भय की कोई सीमा न थी। मैंने अनुभव किया कि कानून तो मैं निश्चय ही पढ़ चुका हूँ, पर ऐसी कोई भी चीज मैंने सीखी नहीं है जिससे मैं वकालत कर सकूँ।

मेरी इस व्यथा के वर्णन के लिए स्वतंत्र प्रकरण आवश्यक है।


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