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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पहला भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 25. मेरी परेशानी पीछे    

बारिस्टर कहलाना आसान मालूम हुआ, पर बारिस्टरी करना मुश्किल लगा। कानून पढ़े, पर वकालत करना न सीखा। कानून मे मैंने कई धर्म-सिद्धांत पढ़े, जो अच्छे लगे। पर यह समझ में न आया कि इस पेशे में उनका उपयोग कैसे किया जा सकेगा। 'अपनी संपत्ति का उपयोग तुम इस तरह करो कि जिससे दूसरे की संपत्ति को हानि न पहुँचे' यह एक धर्म-वचन है। पर मैं यह न समझ सका कि मुवक्किल के मामले में इसका उपयोग कैसे किया जा सकता था। जिन मुकदमों में इस सिद्धांत का उपयोग हुआ था, उन्हें मैं पढ़ गया। पर उससे मुझे इस सिद्धांत का उपयोग करने की युक्ति मालूम न हुई।

इसके अलावा, पढ़े हुए कानूनों में हिंदुस्तान के कानून का तो नाम तक न था। मैं यह जान ही न पाया कि हिंदू शास्त्र और इस्लामी कानून कैसे हैं। न मैंने अर्जी-दावा तैयार करना सीखा। मैं बहुत परेशान हुआ। फीरोजशाह मेहता का नाम मैंने सुना था। वे अदालतों में सिंह की तरह गर्जना करते थे। विलायत में उन्होंने यह कला कैसे सीखी होगी? उनके जितनी होशियारी तो इस जीवन मे आ नहीं सकती। पर एक वकील के नाते आजीविका प्राप्त करने की शक्ति पाने के विषय में भी मेरे मन मे बड़ी शंका उत्पन्न हो गई।

यह उलझन उसी समय से चल रही थी, जब मैं कानून का अध्ययन करने लगा था। मैंने अपनी कठिनाइयाँ एक-दो मित्रों के सामने रखी। उन्होंने सुझाया कि मैं नौरोजी की सलाह लूँ। यह तो मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि दादा भाई के नाम एक पत्र मेरे पास था। उस पत्र का उपयोग मैंने देर से किया। ऐसे महान पुरुष से मिलने जाने का मुझे क्या अधिकार था? कहीं उनका भाषण होता, तो मैं सुनने जाता और एक कोने में बैठकर आँख और कान को तृप्त करके लौट आता। विद्यार्थियों से संपर्क रखने के लिए उन्होंने एक मंडली की भी स्थापना की थी। मैं उसमे जाता रहता था। विद्यार्थियों के प्रति दादाभाई की चिंता देखकर और उनके प्रति विद्यार्थियों का आदर देखकर मुझे आनंद होता था। आखिर मैंने उन्हें अपने पास का सिफारिशी पत्र देने की हिम्मत की। मैं उनसे मिला। उन्होंने मुझसे कहा, 'तुम मुझसे मिलना चाहो और कोई सलाह लेना चाहो तो जरूर मिलना।' पर मैंने उन्हें कभी कोई कष्ट नहीं दिया। किसी भारी कठिनाई के सिवा उनका समय लेना मुझे पाप जान पड़ा। इसलिए उक्त मित्र की सलाह मान कर दादाभाई के सम्मुख अपनी कठिनाइयाँ रखने की मेरी हिम्मत न पड़ी।

उन्हीं मित्र ने या किसी और ने मुझे सुझाया कि मैं मि. फ्रेडरिक पिंकट से मिलूँ। मि. पिंकट कंजर्वेटिव (अनुदार) दल के थे। पर हिंदुस्तानियों के प्रति उनका प्रेम निर्मल और निःस्वार्थ था। कई विद्यार्थी उनसे सलाह लेते थे। अतएव उन्हें पत्र लिखकर मैंने मिलने का समय माँगा। उन्होंने समय दिया। मैं उनसे मिला। इस मुलाकात को मैं कभी भूल नहीं सका। वे मुझसे मित्र की तरह मिले। मेरी निराशा को तो उन्होंने हँसकर ही उड़ा दिया। 'क्या तुम मानते हो कि सबके लिए फीरोजशाह मेहता बनना जरूरी है? फीरोजशाह मेहता या बदरुद्दीन तैयबजी तो एक-दो ही होते है। तुम निश्चय समझो कि साधारण वकील बनने के लिए बहुत अधिक होशियारी की जरूरत नहीं होती। साधारण प्रामाणिकता और लगन से मनुष्य वकालत का पेशा आराम से चला सकता है। सब मुकदमे उलझनोंवाले नहीं होते। अच्छा, तो यह बताओ कि तुम्हारा साधारण वाचन क्या है?'

जब मैंने अपनी पढ़ी हुई पुस्तकों की बात की तो मैंने देखा कि वे थोड़े निराश हुए। पर यह निराशा क्षणिक थी। तुरंत ही उनके चेहरे पर हँसी छा गई और वे बोले, 'अब मैं तुम्हारी मुश्किल को समझ गया हूँ। साधारण विषयों की तुम्हारी पढ़ाई बहुत कम है। तुम्हें दुनिया का ज्ञान नहीं है। इसके बिना वकील का काम नहीं चल सकता। तुमने तो हिंदुस्तान का इतिहास भी नहीं पढ़ा है। वकील को मनुष्य के स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए। उसे चेहरा देखकर मनुष्य को परखना आना चाहिए। साथ ही हर एक हिंदुस्तानी को हिंदुस्तान के इतिहास का भी ज्ञान होना चाहिए। वकालत के साथ इसका कोई संबंध नहीं है, पर तुम्हें इसकी जानकारी होनी चाहिए। मैं देख रहा हूँ कि तुमने के. और मेलेसन की 1857 के गदर की किताब भी नहीं पढ़ी है। उसे तो तुम फौरन पढ़ डालो और जिन दो पुस्तकों के नाम देता हूँ, उन्हें मनुष्य की परख के खयाल से पढ़ जाना।' यों कहकर उन्होंने लेवेटर और शेमलपेनिक की मुख-सामुद्रिक विद्या (फीजियोग्नॉमी) विषयक पुस्तकों के नाम लिख दिए।

मैंने उन वयोवृद्ध मित्र का बहुत आभार माना। उनकी उपस्थिति में तो मेरा भय क्षण भर के लिए दूर हो गया। पर बाहर निलकने के बाद तुरंत ही मेरी घबराहट फिर शुरू हो गई। चेहरा देखकर आदमी को परखने की बात को रटता हुआ और उन दो पुस्तकों का विचार करता हुआ मैं घर पहुँचा। दुसरे दिन लेवेटर की पुस्तक खरीदी। शेमलपेनिक की पुस्तक उस दुकान पर नहीं मिली। लेवेटर की पुस्तक पढ़ी, पर वह तो स्नेल से भी अधिक कठिन जान पड़ी। रस भी नहीं के बराबर ही मिला। शेक्सपियर के चेहरे का अध्ययन किया। पर लंदन की सड़कों पर चलनेवाले शेक्सपियरों को पहचाने की कोई शक्ति तो मिली ही नहीं।

लेवेटर की पुस्तक से मुझे कोई ज्ञान नहीं मिला। मि. पिंकट की सलाह का सीधा लाभ कम ही मिला, पर उनके स्नेह का बड़ा लाभ मिला। उनके हँसमुख और उदार चेहरे की याद बनी रही। मैंने उनके इन वचनों पर श्रद्धा रखी कि वकालत करने के लिए फीरोजशाह मेहता की होशियारी और याददाश्त वगैरा की जरूरत नहीं है, प्रामाणिकता और लगन से काम चल सकेगा। इन दो गुणो की पूँजी तो मेरे पास काफी मात्रा में थी। इसलिए दिल में कुछ आशा जागी।

के. और मेलेसन की पुस्तक विलायत मे पढ़ नहीं पाया। पर मौका मिलते ही उसे पढ़ डालने का निश्चय किया। यह इच्छा दक्षिण अफ्रीका में पूरी हुई।

इस प्रकार निराशा मे तनिक सी आशा का पुट लेकर मैं काँपते पैरों 'आसाम' जहाज से बंबई के बंदरगाह पर उतरा। उस समय बंदरगाह में समुद्र क्षुब्ध था, इस कारण लांच (बड़ी नाव) में बैठकर किनारे पर आना पड़ा।


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