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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 16. को जाने कल की? पीछे     आगे

'खबर नहीं इस जुग में पल की
समझ मन! को जाने कल की?'

मुकदमे के खतम होने पर मेरे लिए प्रिटोरिया में रहने का कोई कारण न रहा। मैं डरबन गया। वहाँ पहुँचकर मैंने हिंदुस्तान लौटने की तैयारी की। अब्दुल्ला सेठ मुझे बिना मान-सम्मान के जाने दे, यह संभव न था। उन्होंने मेरे निमित्त से सिडनहैम में एक सामूहिक भोज का आयोजन किया। पूरा दिन वहीं बिताना था।

मेरे पास कुछ अखबार पड़े थे। मैं उन्हें पढ़ रहा था। एक अखबार के एक कोने में मैंने एक छोटा-सा संवाद देखा। उसका शीर्षक था, 'इंडियन फ्रेंचाइज' यानी हिंदुस्तानी मताधिकार। इस संवाद का आशय यह था कि हिंदुस्तानियों को नेटाल की धारासभा के लिए सदस्य चुनने का जो अधिकार है वह छीन लिया जाए। धारासभा में इससे संबंध रखनेवाले कानून पर बहस चल रही थी। मैं इस कानून से अपरिचित था। भोज में सम्मिलित सदस्यों में से किसी को भी हिंदुस्तानियों का अधिकार छीननेवाले इस बिल की कोई खबर न थी।

मैंने अब्दुल्ला सेठ से पूछा। उन्होंने कहा, 'इस बात को हम क्या जानें? व्यापार पर कोई संकट आवे तो हमें उसका पता चलता है। देखिए न, ऑरेंज फ्री स्टेट में हमारे व्यापार की जड़ उखड़ गई। उसके लिए हमने मेहनत की, पर हम तो अपंग ठहरे। अखबार पढ़ते हैं तो उसमें भी सिर्फ भाव-ताव ही समझ पाते हैं। कानूनी बातों का हमें क्या पता चले? हमारे आँख-कान तो हमारे गोरे वकील है।'

मैंने पूछा, 'पर यहाँ पैदा हुए और अंग्रेजी जाननेवाले इतने सारे नौजवान हिंदुस्तानी यहाँ हैं, वे क्या करते हैं?'

अब्दुल्ला सेठ ने माथे पर हाथ रखकर कहा, 'अरे भाई, उनसे हमें क्या मिल सकता है? वे बेचारे इसमें क्या समझें? वे तो हमारे पास भी नहीं फटकते, और सच पूछो तो हम भी उन्हें नहीं पहचानते। वे ईसाई है, इसलिए पादरियों के पंजे में हैं। और पादरी सब गोरे हैं, जो सरकार के अधीन हैं।'

मेरी आँखें खुल गईं। इस समाज को अपनाना चाहिए। क्या ईसाई धर्म का यही अर्थ है? वे ईसाई है, इससे क्या हिंदुस्तानी नहीं रहे? और परदेशी बन गए?

किंतु मुझे तो वापस स्वदेश जाना था, इसलिए मैंने उपर्युक्त विचारों को प्रकट नहीं किया। मैंने अब्दुल्ला सेठ से कहा, 'लेकिन अगर यह कानून इसी तरह पास हो गया, तो आप सबको मुश्किल में डाल देगा। यह तो हिंदुस्तानियों की आबादी को मिटाने का पहला कदम है। इसमें हमारे स्वाभिमान की हानि है।'

'हो सकती है। परंतु मैं आपको फरेंचाइज (इस तरह अंग्रेजी भाषा के कई शब्द अपना रूप बदलकर देशवासियों में रूढ़ हो गए थे। मताधिकार कहो तो कोई समझता ही नहीं।) का इतिहास सुनाऊँ। हम तो इसमें कुछ भी नहीं समझते। पर आप तो जानते ही है कि हमारे बड़े वकील मि. एस्कंब हैं। वे जबरदस्त लड़वैया हैं। उनके और यहाँ के जेटी-इंजीनियर के बीच खासी लड़ाई चलती है। मि. एस्कंब के धारासभा में जाने में यह लड़ाई बाधक होती थी। उन्होंने हमें अपनी स्थिति का भान कराया। उनके कहने से हमने अपने नाम मतदाता-सूची में लिखवाए और अपने सब मत मि. एस्कंब को दिए। अब आप देखेंगे कि हमने अपने इन मतों का मूल्य आपकी तरह क्यों नहीं आँका। लेकिन अब हम आपकी बात समझ सकते हैं। अच्छा तो कहिए, आप क्या सलाह देते हैं?'

दूसरे मेहमान इस चर्चा को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। उनमें से एक ने कहा, 'मैं आपसे सच बात कहूँ? अगर आप इस स्टीमर से न जाएँ और एकाध महीना रुक जाएँ, तो आप जिस तरह कहेंगे, हम लड़ेंगे।'

दूसरे सब एक साथ बोल उठे, 'यह बात सच है। अब्दुल्ला सेठ, आप गांधी भाई को रोक लीजिए।'

अब्दुल्ला सेठ उस्ताद ठहरे। उन्होंने कहा, 'अब उन्हें रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं, अथवा जितना मुझे है, उतना ही आपको भी है। पर आप जो कहते है सो ठीक है। हम सब उन्हें रोक लें पर ये तो बारिस्टर है। इनकी फीस का क्या होगा?'

मैं दुखी हुआ और बात काटकर बोला, 'अब्दुल्ला सेठ, इसमें मेरी फीस की बात ही नहीं उठती। सार्वजनिक सेवा की फीस कैसी? मैं ठहरूँ तो एक सेवक के रूप में ठहर सकता हूँ। मैं इन सब भाइयों को ठीक से पहचानता नहीं। पर आपको भरोसा हो कि ये सब मेहनत करेंगे, तो मैं एक महीना रुक जाने को तैयार हूँ। यह सच है कि आपको कुछ नहीं देना होगा, फिर भी ऐसे काम बिलकुल बिना पैसे के तो हो नहीं सकते। हमें तार करने होंगे, कुछ साहित्य छपाना पड़ेगा, जहाँ-तहाँ जाना होगा उसका गाड़ी-किराया लगेगा। संभव है, हमें स्थानीय वकीलों की भी सलाह लेनी पड़े। मैं यहाँ के कानूनों से परिचित नहीं हूँ। मुझे कानून की पुस्तकें देखनी होंगी। इसके सिवा, ऐसे काम एक हाथ से नहीं होते, बहुतों को उनमें जुटना चाहिए।'

बहुत-सी आवाजें एकसाथ सुनाई पड़ीं, 'खुदा की मेहरबानी है। पैसे इकट्ठा हो जाएँगे, लोग भी बहुत हैं। आप रहना कबूल कर लें तो बस है।'

सभा सभा न रही। उसने कार्यकारिणी समिति का रूप ले लिया। मैंने सलाह दी कि भोजन से जल्दी निबटकर घर पहुँचना चाहिए। मैंने मन में लड़ाई की रूपरेखा तैयार कर ली। मताधिकार कितनों को प्राप्त है, सो जान लिया। और मैंने एक महीना रुक जाने का निश्चय किया।

इस प्रकार ईश्वर ने दक्षिण अफ्रीका में मेरे स्थायी निवास की नींव डाली और स्वाभिमान की लड़ाई का बीज रोपा गया।


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