hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 19. नेटाल इंडियन कांग्रेस पीछे     आगे

वकालत का धंधा मेरे लिए गौण वस्तु था और सदा गौण ही रहा। नेटाल में अपने निवास को सार्थक करने के लिए तो मुझे सार्वजनिक काम में तन्मय हो जाना था। भारतीय मताधिकार प्रतिबंधक कानून के विरुद्ध केवल प्रार्थना-पत्र भेजकर ही बैठा नहीं जा सकता था। उसके बारे में आंदोलन चलते रहने से ही उपनिवेश-मंत्री पर उसका असर पड़ सकता था। इसके लिए एक संस्था की स्थापना करना आवश्यक मालूम हुआ। इस संबंध में मैंने अब्दुल्ला सेठ से सलाह की, दूसरे साथियों से मिला, और हमने एक सार्वजनिक संस्था खड़ी करने का निश्चय किया।

उसके नामकरण में थोड़ा धर्म-संकट था। इस संस्था को किसी पक्ष के साथ पक्षपात नहीं करना था। मैं जानता था कि कांग्रेस का नाम कंजर्वेटिव (पुराणपंथी) पक्ष में अप्रिय था। पर कांग्रेस हिंदुस्तान का प्राण थी। उसकी शक्ति तो बढ़नी ही चाहिए। उस नाम को छिपाने में अथवा अपनाते हुए संकोच करने में नामर्दी की गंध आती थी। अतएव मैंने अपनी दलीलें पेश करके संस्था का नाम 'कांग्रेस' ही रखने का सुझाव दिया, और सन 1894 के मई महीने की 22 तारीख को नेटाल इंडियन कांग्रेस का जन्म हुआ।

दादा अब्दुल्ला का ऊपरवाला बड़ा कमरा भर गया था। लोगों ने इस संस्था का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। उसका विधान सादा रखा था। चंदा भारी था। हर महीने कम-से-कम पाँच शिलिंग देनेवाला ही उसका सदस्य बन सकता था। धनी व्यापारियों को रिझा कर उनसे अधिक-से-अधिक जितना लिया जा सके, लेने का निश्चय हुआ। अब्दुल्ला सेठ से महीने के दो पौंड लिखवाए। दूसरे भी सज्जनों से इतने ही लिखवाए। मैंने सोचा कि मुझे तो संकोच करना ही नहीं चाहिए, इसलिए मैंने महीने का एक पौंड लिखाया। मेरे लिए यह कुछ बड़ी रकम थी। पर मैंने सोचा कि अगर मेरा खर्च चलनेवाला हो, तो मेरे लिए हर महीने एक पौंड देना अधिक नहीं होगा। ईश्वर ने मेरी गाड़ी चला दी। एक पौंड देनेवालों की संख्या काफी रही। दस शिलिंगवाले उनसे भी अधिक। इसके अलावा, सदस्य बने बिना कोई अपनी इच्छा से भेंट के रूप में जो कुछ भी दे सो स्वीकार करना था।

अनुभव से पता चला कि बिना तकाजे के कोई चंदा नहीं देता। डरबन से बाहर रहनेवालों के यहाँ बार-बार जाना असंभव था। आरंभ-शूरता का दोष तुरंत प्रकट हुआ। डरबन में भी कई बार चक्कर लगाने पर पैसे मिलते थे।

मैं मंत्री था। पैसे उगाहने का बोझ मेरे सिर था। मेरे लिए अपने मुहर्रिर को लगभग सारा दिन उगाही के काम में ही लगाए रखना जरूरी हो गया। मुहर्रिर भी दिक आ गया। मैंने अनुभव किया कि चंदा मासिक नहीं, वार्षिक होना चाहिए और वह सबको पेशगी ही देना चाहिए। सभा की गई। सबने मेरी सूचना का स्वागत किया और कम-से-कम तीन पौंड वार्षिक चंदा लेने का निश्चय हुआ। इससे वसूली का काम आसान बना।

मैंने आरंभ में ही सीख लिया था कि सार्वजनिक काम कभी कर्ज लेकर नहीं करना चाहिए। दूसरे कामों के बारे में लोगों का विश्वास चाहे किया जाय, पर पैसे के वादे का विश्वास नहीं किया जा सकता। मैंने देख लिया था कि लिखाई हुई रकम चुकाने का धर्म लोग कहीं भी नियमित रूप से नहीं पालते। इसमें नेटाल के भारतीय अपवादरूप नहीं थे। अतएव नेटाल इंडियन कांग्रेस ने कभी कर्ज लेकर काम किया ही नहीं।

सदस्य बनाने में साथियों ने असीम उत्साह का परिचय दिया था। इसमें उन्हें आनंद आता था। अनमोल अनुभव प्राप्त होते थे। बहुतेरे लोग खुश होकर नाम लिखाते और तुरंत पैसे दे देते थे। दूर-दूर के गाँवों में थोड़ी कठिनाई होती थी। लोग सार्वजनिक काम का अर्थ नहीं समझते थे। बहुत-सी जगहों में तो लोग अपने यहाँ आने का न्योता भेजते और प्रमुख व्यापारी के यहाँ ठहराने की व्यवस्था करते। पर इन यात्राओं में एक जगह शुरू में ही हमें मुश्किल का सामना करना पड़ा। वहाँ एक व्यापारी से छह पौंड मिलने चाहिए थे, पर वह तीन से आगे बढ़ता ही न था। अगर इतनी रकम हम ले लेते, तो फिर दूसरों से अधिक न मिलती। पड़ाव उन्ही के घर था। हम सब भूखे थे। पर जब तक चंदा न मिले, भोजन कैसे करें? उन भाई को खूब समझाया-मनाया। पर वे टस से मस न होते थे। गाँव के दूसरे व्यापारियों ने भी उन्हें समझाया। सारी रात झक-झक में बीत गई। गुस्सा तो कई साथियों को आया, पर किसी ने विनय का त्याग न किया। ठेठ सबेरे वे भाई पिघले और उन्होंने छह पौंड दिए। हमें भोजन कराया। यह घटना टोंगाट में घटी थी। इसका प्रभाव उत्तरी किनारे पर ठेठ स्टेंगर तक और अंदक की ओर ठेठ चार्ल्सटाउन तक पड़ा। इससे चंदा वसूली का काम आसान हो गया।

पर हमारा हेतु केवल पैसे इकट्ठे करने का न था। आवश्यकता से अधिक पैसा न रखने का तत्व भी मैं समझ चुका था।

सभा हर हफ्ते या हर महीने आवश्यकता के अनुसार होती थी। उसमें पिछली सभा का विवरण पढ़ा जाता और अनेक प्रकार की चर्चाएँ होती। चर्चा करने की और थोड़े में मुद्दे की बात कहने की आदत तो लोगों की थी ही नहीं। लोग खड़े होकर बोलने में झिझकते थे। सभा के नियम समझाए गए।

और लोगों ने उनकी कदर की। इससे होनेवाले अपने लाभ को वे देख सके और जिन्हें पहले कभी सार्वजनिक रूप से बोलने की आदत नहीं थी, वे सार्वजनिक कामों के विषय में बोलने और विचारने लग गए।

मैं यह भी जानता था कि सार्वजनिक काम करने में छोटे-छोटे खर्च बहुत पैसा खा जाते है। शुरू में तो मैंने निश्चय कर लिया था कि रसीद बुक तक न छपाई जाय। मेरे दफ्तर में साइक्लोस्टाइल मशीन थी। उस पर रसीदें छपा लीं। रिपोर्ट भी मैं इसी तरह छपा लेता था। जब तिजोरी में काफी पैसा जमा हो गया। सदस्य बढ़े, काम बढ़ा, तभी रसीद आदि छपाना शुरू किया। ऐसी किफायत हर एक संस्था के लिए आवश्यक है। फिर भी मैं जानता हूँ कि हमेशा यह मर्यादा रह नहीं पाती। इसीलिए इस छोटी-सी उगती हुई संस्था के आरंभिक निर्माण काल का विवरण देना मैंने उचित समझा है। लोग रसीद की परवाह नहीं करते थे। फिर भी उन्हें आग्रहपूर्वक रसीद दी जाती थी। इसके कारण आरंभ से ही पाई-पाई का हिसाब साफ रहा, और मैं मानता हूँ कि आज भी नेटाल कांग्रेस के दफ्तर में सन 1894 के पूरे-पूरे ब्योरेवाले बही-खाते मिलने चाहिए। किसी भी संस्था का बारीकी से रखा गया हिसाब उसकी नाक है। इसके अभाव में वह संस्था आखिर गंदी और प्रतिष्ठा-रहित हो जाती है। शुद्ध हिसाब के बिना शुद्ध सत्य की रक्षा असंभव है।

कांग्रेस का दूसरा अंग उपनिवेश में जन्मे हुए पढ़े-लिखे हिंदुस्तानियों की सेवा करना था। इसके लिए 'कॉलोनियल बॉर्न इंडियन एज्युकेशनल ऐसोसिएशन' की स्थापना की गई। नवयुवक ही मुख्यतः उसके सदस्य थे। उन्हें बहुत थोड़ा चंदा देना होता था। इस संस्था के द्वारा उनकी आवश्यकताओं का पता चलता था और उनकी विचार-शक्ति बढ़ती थी। हिंदुस्तानी व्यापारियों के साथ उनका संबंध कायम होता था और स्वयं उन्हें भी समाज सेवा करने के अवसर प्राप्त होते थे। यह संस्था वाद-विवाद मंडल जैसी थी। इसकी नियमित सभाएँ होती थीं। उनमें वे लोग भिन्न-भिन्न विषयों पर अपने भाषण करते और निबंध पढ़ते थे। इसी निमित्त से एक छोटे से पुस्तकालय की भी स्थापना हुई थी।

कांग्रेस का तीसरा अंग था बाहरी कार्य। इसमें दक्षिण अफ्रीका के अंग्रेजों में और बाहर इंग्लैंड तथा हिंदुस्तान में नेटाल की सच्ची स्थिति पर प्रकाश डालने का काम होता था। इस उद्देश्य से मैंने दो पुस्तिकाएँ लिखीं। पहली पुस्तिका नाम था 'दक्षिण अफ्रीका में रहनेवाले प्रत्येक अंग्रेज से बिनती'। उसमें नेटाल-निवासी भारतीयों की स्थिति का साधारण दिग्दर्शन प्रमाणों सहित कराया गया था। दूसरी पुस्तक का नाम था 'भारतीय मताधिकार - एक बिनती' उसमें भारतीय मताधिकार का इतिहास आँकड़ों और प्रमाणों-सहित दिया गया था। ये दोनों पुस्तिकाएँ काफी अध्ययन के बाद लिखी गई थीं। इनका व्यापक प्रचार किया गया था। इस कार्य के निमित्त से दक्षिण अफ्रीका में हिंदुस्तानियों के मित्र पैदा हो गए। इंग्लैंड में तथा हिंदुस्तान में सब पक्षों की तरफ से मदद मिली, कार्य करने की दिशा प्राप्त हुई और उसने निश्चित रूप धारण किया।


>>पीछे>> >>आगे>>