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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
दूसरा भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 29. जल्दी लौटिए पीछे    

मद्रास से मैं कलकत्ते गया। कलकत्ते में मेरी कठिनाइयों का पार न रहा। वहाँ मैं 'ग्रेट ईस्टर्न' होटल में ठहरा। किसी से जान-पहचान नहीं थी। होटल में 'डेली टेलिग्राफ' के प्रतिनिधि मि. एलर थॉर्प से पहचान हुई। वे बंगाल क्लब में रहते थे। उन्होंने मुझे वहाँ आने के लिए न्योता। इस समय उन्हें पता नहीं था कि होटल के दीवानखाने में किसी हिंदुस्तानी को नहीं ले जाया जा सकता। बाद में उन्हें इस प्रतिबंध का पता चला। इससे वे मुझे अपने कमरे में ले गए। हिंदुस्तानियों के प्रति स्थानीय अंग्रेजों का तिरस्कार देखकर उन्हें खेद हुआ। मुझे दीवानखाने में न ले जाने के लिए उन्होंने क्षमा माँगी।

'बंगाल के देव' सुरेंद्रनाथ बैनर्जी से तो मुझे मिलना ही था। उनसे मिला। जब मैं मिला, उनके आसपास दूसरे मिलनेवाले भी बैठे थे। उन्होंने कहा, 'मुझे डर है कि लोग आपके काम में रस नहीं लेंगे। आप देखते है कि यहाँ देश में ही कुछ कम विडंबनाएँ नहीं है। फिर भी आपसे जो हो सके अवश्य कीजिए। इस काम में आपको महाराजाओं की मदद की जरूरत होगी। आप ब्रिटिश इंडिया एसोसियेशन के प्रतिनिधियों से मिलिए, राजा सर प्यारीमोहन मुकर्जी और महाराजा टागोक से भी मिलिएगा। दोनों उदार वृत्ति के हैं और सावर्जनिक काम में काफी हिस्सा लेते हैं।'

मैं इन सज्जनों से मिला। पर वहाँ मेरी दाल न गली। दोनों ने कहा, 'कलकत्ते में सार्वजनिक सभा करना आसान काम नहीं है। पर करनी ही हो तो उसका बहुत कुछ आधार सुरेंद्रनाथ बैनर्जी पर होगा।'

मेरी कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही थीं। मैं 'अमृतबाजार पत्रिका' के कार्यालय में गया। वहाँ भी जो सज्जन मिले उन्होंने मान लिया कि मैं कोई रमताराम हूँगा। 'बंगवासी' ने तो हद कर दी। मुझे एक घंटे तक बैठाए ही रखा। संपादक महोदय दूसरों के साथ बातचीत करते जाते थे। लोग आते-जाते रहते थे, पर संपादकजी ने मेरी तरफ देखते भी न थे। एक घंटे तक राह देखने के बाद जब मैंने अपनी बात छेड़ी, तो उन्होंने कहा, 'आप देखते नहीं है, हमारे पास कितना काम पड़ा है? आप जैसे तो कई हमारे पास आते रहते है। आप वापस जाएँ यही अच्छा है। हमें आपकी बात नहीं सुननी है।'

मुझे क्षण भर दुख तो हुआ, पर मैं संपादक का दृष्टिकोण समझ गया। 'बंगवासी' की ख्याति मैंने सुन रखी थी। संपादक के पास लोग आते-जाते रहते थे, यह भी मैं देख सका था। वे सब उनके परिचित थे। अखबार हमेशा भरापूरा रहता था। उस समय दक्षिण अफ्रीका का नाम भी कोई मुश्किल से जानता था। नित नए आदमी अपने दुखड़े लेकर आते ही रहते थे। उनके लिए तो अपना दुख बड़ी-से-बड़ी समस्या होती, पर संपादक के पास ऐसे दुखियों की भीड़ लगी रहती थी। वह बेचारा सबके लिए क्या कर सकता था? पर दुखिया की दृष्टि में संपादक की सत्ता बड़ी चीज होती है, हालाँकि संपादक स्वयं तो जानता है कि उसकी सत्ता उसके दफ्तर की दहलीज भी नहीं लाँघ पाती।

मैं हारा नहीं। दूसरे संपादको से मिलता रहा। अपने रिवाजों के अनुसार मैं अंग्रेजों से भी मिला। 'स्टेट्समैन' और 'इंग्लिशमैन' दोनों दक्षिण अफ्रीका के सवाल का महत्व समझते थे। उन्होंने लंबी मुलाकातें छापी। 'इंग्लिशमैन' के मि. सांडर्स ने मुझे अपनाया। मुझे अखबार का उपयोग करने की पूरी अनुकूलता प्राप्त हो गई। उन्होंने अपने अग्रलेख में काटछाँट करने की भी छूट मुझे दे दी। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि हमारे बीच स्नेह का संबंध हो गया। उन्होंने मुझे वचन दिया कि जो मदद उनसे हो सकेगी, वे करते रहेंगे। मेरे दक्षिण अफ्रीका लौट जाने पर भी उन्होंने मुझसे पत्र लिखते रहने को कहा और वचन दिया कि स्वयं उनसे जो कुछ हो सकेगा, वे करेंगे। मैंने देखा कि इस वचन का उन्होंने अक्षरशः पालन किया, और जब तक वे बहुत बीमार न हो गए, मुझसे पत्र व्यवहार करते रहे। मेरे जीवन में ऐसे अनसोचे मीठे संबंध अनेक जुड़े हैं। मि. सांडर्स को मेरी जो बात अच्छी लगी, वह थी अतिशयोक्ति का अभाव और सत्य-परायणता। उन्होंने मुझ से जिरह करने में कोई कसर नहीं रखी थी। उसमें उन्होंने अनुभव किया कि दक्षिण अफ्रीका के गोरों के पक्ष को निष्पक्ष भाव से रखने में और भारतीय पक्ष से उसकी तुलना करने में मैंने कोई कमी नहीं रखी थी।

मेरा अनुभव मुझे बतलाता है कि प्रतिपक्षी को न्याय देकर हम जल्दी न्याय पा जाते हैं। इस प्रकार मुझे अनसोची मदद मिल जाने से कलकत्ते में भी सार्वजनिक सभा होने की आशा बँधी। इतने में डरबन से तार मिला, 'पार्लियामेंट जनवरी में बैठेगी, जल्दी लौटिए।'

इससे अखबारों में एक पत्र लिखकर मैंने तुरंत लौट जाने की जरूरत जता दी और कलकत्ता छोड़ा। दादा अब्दुल्ला के बंबई एजेंट को तार दिया कि पहले स्टीमर से मेरे जाने की व्यवस्था करे। दादा अब्दुल्ला ने स्वयं 'कुरलैंड' नामक स्टीमर खरीद लिया था। उन्होंने उसमें मुझे और मेरे परिवार को मुफ्त ले जाने का आग्रह किया। मैंने उसे धन्यवाद सहित स्वीकार कर लिया, और दिसंबर के आरंभ में मैं 'कुरलैंड' स्टीमर से अपनी धर्मपत्नी, दो लड़कों और अपने स्व. बहनोई के एकमात्र लड़के को लेकर दूसरी बार दक्षिण अफ्रीका के लिए रवाना हुआ। इस स्टीमर के साथ ही दूसरा 'नादरी' स्टीमर भी डरबन के लिए रवाना हुआ। दादा अब्दुल्ला उसके एजेंट थे। दोनों स्टीमरों में कुल मिलाकर करीब 800 हिंदुस्तानी यात्री रहे होंगे। उनमें से आधे से अधिक लोग ट्रान्सवाल जानेवाले थे।


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