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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 10. कसौटी पर चढ़े पीछे     आगे

आश्रम को कायम हुए अभी कुछ ही महीने बीते थे कि इतने में जैसी कसौटी की मुझे आशा नहीं थी वैसी कसौटी हमारी हुई। भाई अमृतलाल ठक्कर का पत्र मिला, 'एक गरीब और प्रामाणिक अंत्यज परिवार है। वह आपके आश्रम में रहना चाहता है। क्यों उसे भरती करेंगे?'

मैं चौका। ठक्करबापा जैसे पुरुष की सिफारीश लेकर कोई अंत्यज परिवार इतनी जल्दी आएगा, इसकी मुझे जरा भी आशा न थी। मैंने साथियों को वह पत्र पढ़ने के लिए दिया। उन्होंने उसका स्वागत किया। भाई अमृतलाल ठक्कर को लिखा गया कि यदि वह परिवार आश्रम के नियमों का पालन करने को तैयार हो तो हम उसे भरती करने के लिए तैयार है।

दूदाभाई, उनकी पत्नी दानीबहन और दूध-पीती तथा घुटनो चलती बच्ची लक्ष्मी तीनों आए। दूदाभाई बंबई में शिक्षक का काम करते थे। नियमों का पालन करने को वे तैयार थे उन्हें आश्रम में रख लिया।

सहायक मित्र-मंडल में खलबली मच गई। जिस कुएँ के बंगले के मालिक का हिस्सा था, उस कुएँ से पानी भरने में हमें अड़चन होने लगी। चरसवाले पर हमारे पानी के छींटे पड़ जाते, तो वह भ्रष्ट हो जाता। उसने गालियाँ देना और दूदाभाई को सताना शुरू किया। मैंने सबसे कह दिया कि गालियाँ सहते जाओ और दृढ़ता पूर्वक पानी भरते रहो। हमें चुपचाप गालियाँ सुनते देखकर चरसवाला शरमिंदा हुआ और उसने गालियाँ देना बंद कर दिया। पर पैसे की मदद बंद हो गई। जिन भाई ने आश्रम के नियमों का पालन करनेवाले अंत्यजों के प्रवेश के बारे में पहले से ही शंका की थी, उन्हें तो आश्रम में अंतज्य के भरती होने की आशा ही न थी। पैसे की मदद बंद होने के साथ बहिष्कार की अफवाहें मेरे कानों तक आने लगी। मैंने साथियों से चर्चा करके तय कर रखा था, 'यदि हमारा बहिष्कार किया जाए और हमें मदद न मिले, तो भी अब हम अहमदाबाद नहीं छोड़ेगे। अंतज्यों की बस्ती में जाकर उनके साथ रहेंगे और कुछ मिलेगा उससे अथवा मजदूरी करके अपना निर्वाह करेंगे।'

आखिर मगनलाल ने मुझे नोटिस दी, 'अगले महीने आश्रम का खर्च चलाने के लिए हमारे पास पैसे नहीं है। ' मैंने धीरज से जवाब दिया, 'तो हम अंत्यजों की बस्ती में रहने जाएँगे।'

मुझ पर ऐसा संकट पहली ही बार नहीं आया था। हर बार अंतिम घड़ी में प्रभु ने मदद भेजी है।

मगललाल के नोटिस देने के बाद तुरंत ही एक दिन सबेरे किसी लड़के न आकर खबर दी, 'बाहर मोटर खड़ी है और एक सेठ आपको बुला रहे है।' मैं मोटर के पास गया। सेठ ने मुझ से पूछा, 'मेरी इच्छा आश्रम को कुछ मदद देने की हैं, आप लेंगे?'

मैंने जवाब दिया, 'अगर आप कुछ देंगे, तो मैं जरूर लूँगा। मुझे कबूल करना चाहिए कि इस समय मैं आर्थिक संकट में भी हूँ।'

'मैं कल इसी समय आऊँगा। तब आप आश्रम में होगे?'

मैंने 'हाँ' कहा और सेठ चले गए। दूसरे दिन नियत समय पर मोटर का भोपूँ बोला। लड़कों ने खबर दी। सेठ अंदर नहीं आए। मैं उनसे मिलने गया। वे मेरे हाथ पर तेरह हजार के नोट रखकर बिदा हो गए।

मैंने इस मदद की कभी आशा नहीं रखी थी। मदद देने की यह रीति भी नई देखी। उन्होंने आश्रम में पहले कभी कदम नहीं रखा था। मुझे याद आता है कि मैं उनसे एक ही बार मिला था। न आश्रम में आना, न कुछ पूछना, बाहर ही बाहर पैसे देकर लौट जाना! ऐसा यह मेरा पहली ही अनुभव था। इस सहायता के कारण अंत्यजों की बस्ती में जाना रूक गया। मुझे लगभग एक साल का खर्च मिल गया। पर जिस तरह बाहर खलबली मची, उसी तरह आश्रम में भी मची। यद्यपि दक्षिण अफ्रीका में मेरे यहाँ अंत्यज आदि आते रहते थे और भोजन करते थे, तथापि यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अंत्यज कुटुंब का आना मेरी पत्नी को और आश्रम की दूसरी स्त्रियों को पसंद आया। दानीबहन के प्रति धृणा नहीं तो उनकी उदासीनता ऐसी थी, जिसे मेरी अत्यंत सूक्ष्म आँखें देख लेती थीं और तेज कान सुन लेते थे। आर्थिक सहायता के अभाव के डर ने मुझे जरा भी चिंतित नहीं किया था। पर यह आंतरिक क्षोभ कठिन सिद्ध हुआ। दानीबहन साधारण स्त्री थी। दूदाभाई की शिक्षा भी साधारण थी, पर उनकी बुद्धि अच्छी थी। उनकी धीरज मुझे पसंद आता था। उन्हें कभी-कभी गुस्सा आता था, पर कुल मिलाकर उनकी सहन-शक्ति की मुझ पर अच्छी छाप पड़ी थी। मैं दूदाभाई को समझाता था कि वे छोटे-मोटे अपमान पी लिया करें। वे समझ जाते थे और दानीबहन से भी सहन करवाते थे।

इस परिवार को आश्रम में रखकर आश्रम ने बहुतेरे पाठ सीखे हैं और प्रारंभिक काल में ही इस बात के बिलकुल स्पष्ट हो जाने से कि आश्रम में अस्पृश्यता का कोई स्थान नहीं है, आश्रम की मर्यादा निश्चित हो गई और इस दिशा में उसका काम बहुत सरल हो गया। इसके बावजूद, आश्रम का खर्च, बराबर बढ़ता रहने पर भी, मुख्यतः कट्टर माने जानेवाले हिंदुओं की तरफ से मिलता रहा है। कदाचित यह इस बात का सूचक है कि अस्पृश्यता की जड़े अच्छी तरह हिल गई हैं। इसके दूसरे प्रमाण तो अनेकों हैं। परंतु जहाँ अंत्यज के साथ रोटी तक का व्यवहार रखा जाता है, वहाँ भी अपने को सनातनी माननेवाले हिंदू मदद दे, यह कोई नगण्य प्रमाण नहीं माना जाएगा।

इसी प्रश्न को लेकर आश्रम में हुई एक और स्पष्टता, उसके सिलसिले में उत्पन्न हुए नाजुक प्रश्नों का समाधान, कुछ अनसोची अड़चनों का स्वागत-इत्यादि सत्य की खोज के सिलसिले में हुए प्रयोगों का वर्णन प्रस्तुत होते हुए भी मुझे छोड़ देना पड़ रहा है। इसका मुझे दु:ख है। किंतु अब आगे के प्रकरणों में यह दोष रहने ही वाला है। मुझे महत्व के तथ्य छोड़ देने पड़ेंगे, क्योंकि उनमें हिस्सा लेनेवाले पात्रों में से बहुतेरे अभी जीवित है और उनकी सम्मति के बिना उनके नामों का और उनसे संबंध रखनेवाले प्रसंगो का स्वतंत्रता-पूर्वक उपयोग करना अनुचित मालूम होता है। समय-समय पर सबकी सम्मति मंगवाना अथवा उनसे संबंध रखनेवाले तथ्यों को उनके पास भेज कर सुधरवाना संभव नहीं है और यह आत्मकथा की मर्यादा के बाहर की बात है। अतएव इसके आगे की कथा यद्यपि मेरी दृष्टि से सत्य के शोधक के लिए जानने योग्य है, तथापि मुझे डर है कि वह अधूरी ही दी जा सकेंगी। तिस पर भी मेरी इच्छा और आशा यह है कि भगवान पहुँचने दे, तो असहयोग के युग तक मैं पहुँच जाऊँ।


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