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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 11. गिरमिट की प्रथा पीछे     आगे

अब नए बसे हुए और भीतरी तथा बाहरी तूफानों में से उबरे हुए आश्रम को छोड़कर यहाँ गिरमिट-प्रथा पर थोड़ा विचार कर लेने का समय आ गया है। 'गिरमिटया' यानी वे मजदूर जो पाँच बरस या इससे कम की मजदूरी के इकरारनामे पर सही करके हिंदुस्तान के बाहर मजदूरी करने गए हो। नेटाल के ऐसे गिरमिटयों पर लगा तीन पौंड का वार्षिक कर सन 1914 में उठा लिया गया था, पर गिरमिट का प्रथा अभी तक बंद नहीं हुई थी। सन 1916 में भारत-भूषण पंडित मालवीयजी ने यह प्रश्न धारासभा में उठाया था और लार्ड हार्डिंग ने उनका प्रस्ताव स्वीकार करके घोषणा किया था कि 'समय आने पर' इस प्रथा को नष्ट करने का वचन मुझे सम्राट की ओर से मिला है। लेकिन मुझे तो स्पष्ट लगा कि इस प्रथा का तत्काल ही बंद करने का निर्णय हो जाना चाहिए। हिंदुस्तान ने अपनी लापरवाही से बरसो तक इस प्रथा को चलने दिया था। मैंने माना कि अब इस प्रथा को बंद कराने जितनी जागृति लोगों में आ गई है। मैं कुछ नेताओं से मिला, कुछ समाचारपत्रों में इस विषय में लिखा और मैंने देखा कि लोकमत इस प्रथा को मिटा देने के पक्ष में है। क्या इसमें सत्याग्रह का उपयोग हो सकता है? मुझे इस विषय में कोई शंका नहीं थी। पर उसका उपयोग कैसे किया जाए, सो मैं नहीं जानता था।

इस बीच वाइसरॉय ने 'समय आने पर' शब्दों का अर्थ समझाने का अवसर खोज लिया। उन्होंने घोषित किया कि 'दूसरी व्यवस्था करने में जितना समय लगेगा उतने समय में' यह प्रथा उठा दी जाएगी। अतएव जब सन 1917 के फरवरी महीने में भारत-भूषण पंडित मालवीयजी ने गिरमिट प्रथा सदा के लिए समाप्त कर देने का कानून बड़ी धारासभा में पेश करने की इजाजत माँगी तो वाइसरॉय ने वैसा करने से इनकार कर दिया। अतएव इस प्रश्न के संबंध में मैंने हिंदुस्तान में घूमना शुरू किया।

भ्रमण आरंभ करने से पहले मुझे वाइसरॉय से मिल लेना उचित मालूम हुआ। उन्होंने तुरंत ही मुझे मिलने की तारीख भेजी। उस समय मि. मेंफी, अब सर जॉन मेंफी के साथ मेरा अच्छा संबंध स्थापित हो गया। लार्ड चेम्सफर्ड के साथ संतोषजनक बातचीत हुई। उन्होंने निश्चय पूर्वक तो कुछ न कहा, पर मुझे उनकी मदद की आशा बंधी।

भ्रमण का आरंभ मैंने बंबई से किया। बंबई में सभा करने का जिम्मा मि. जहाँगीर पिटीट ने अपने सिर लिया। इम्पीरियल सिटिजनशिप एसोसियेशन के नाम से सभा हुई। उसमें डॉ. रीड, सर लल्लूभाई शामलदास, मि. नटराजन आदि थे। मि. पिटीट तो थे ही। प्रस्ताव में गिरमिट प्रथा बंद करने की विनती करनी थी। प्रश्न यह था कि वह कब बंद की जाए? तीन सुझाव थे, 'जितनी जल्दी हो सके', 'इकतीसवीं जुलाई तक' और 'तुरंत'। इकतीसवीं जुलाई का मेरा सुझाव था। मुझे तो निश्चित तारीख की जरूरत थी, ताकि उस अवधि में कुछ न हो तो यह सोचा जा सके कि आगे क्या करना है या क्या हो सकता है। सर लल्लूभाई का सुझाव 'तुरंत' शब्द रखने का था। उन्होंने कहा, 'इकतीसवीं जुलाई की अपेक्षा तुरंत शब्द अधिक शीध्रता-सूचक है।' मैंने समझाने का प्रयत्न किया कि जनता 'तुरंत' शब्द को नहीं समझ सकती। जनता से कुछ काम लेना हो तो उसके सामने निश्चयतात्मक शब्द होना चाहिए। 'तुरंत' का अर्थ तो सब अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार करेंगे। सरकार उसका एक अर्थ करेंगी, जनता दूसरा। 'इकतीसवीं जुलाई' का अर्थ सब एक ही करेंगे और इस तारीख पर मुक्ति न मिली तो हमें क्या कदम उठाना चाहिए, सो हम सोच सकेंगे। यह दलील डॉ. रीड के गले तुरंत उतर गई। अंत में सर लल्लूभाई को भी 'इकतीसवीं जुलाई' पसंद आ गई और प्रस्ताव में यह तारीख रखी गई। सार्वजनिक सभा में यह प्रस्ताव पेश किया गया और सर्वत्र 'इकतीसवीं जुलाई' की सीमा अंकित हुई।

बंबई से श्री जाएजी पिटीट के अथक परिश्रम से स्त्रियों का एक डेप्युटेशन वाइसरॉय के पास पहुँचा। उसमें लेडी ताता, स्व. दिलशाह बेगम आदि महिलाएँ थी। सब बहनों के नाम तो मुझे याद नहीं है, पर इस डेप्युटेशन का बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा था और वाइसरॉय ने उन्हें आशाजनक उत्तर दिया था।

मैं करांची, कलकत्ता आदि स्थानों पर भी हो आया था। सब जगह अच्छी सभाएँ हुए थी और लोगों में सर्वत्र खूब उत्साह था। आंदोलन आरंभ करते समय मुझे यह आशा नहीं थी कि ऐसी सभाएँ होगी और उनमें लोग इतनी संख्या में उपस्थित होंगे।

इन दिनों मेरी यात्रा अकेले ही होती थी, इस कारण अनोखे अनुभव प्राप्त होते थे। खुफिया पुलिसवाले तो मेरे पीछे लगे ही रहते थे। उनके साथ मेरा झगड़ा होने का कोई कारण ही न था। मुझे तो कोई बात छिपानी नहीं थी। इससे वे मुझे परेशान नहीं करते थे और न मैं उन्हें परेशान करता था। सौभाग्य से उस समय मुझे 'महात्मा' की छाप नहीं मिली थी, यद्यपि जहाँ में पहचान लिया जाता था, वहाँ इस नाम का घोष जरूर होता था। एक बार रेल में जाते हुए कई स्टेशनों पर खुफिया पुलिसवाले मेरा टिकट देखने आते और नंबर वगैरा लेते रहते थे। उनके प्रश्नें का उत्तर मैं तुरंत ही दे देता था। साथी यात्रियों ने मान लिया था कि मैं कोई सीधा-सीदा साधु अथवा फकीर हूँ। जब दो-चार स्टेशनों तक खुफिया पुलिसवाले आए तो यात्री चिढ गए और उन्हें गालियाँ देकर धमकाया, 'इस बेचारे साधु को नाहक क्यों सताते हो?' फिर मेरी ओर मुड़कर बोले, 'इन बदमाशों को टिकट मत दिखाओ।'

मैंने इन यात्रियों से धीमी आवाज में कहा, 'उनके टिकट देखने से मुझे कोई परेशानी नहीं होती। वे अपना कर्तव्य करते है। उससे मुझे कोई कष्ट नहीं होता।'

यात्रियों के गले यह बात नहीं उतरी। वे मुझ पर अधिक तरस खाने लगे और आपस में बातें करने लगे कि निर्दोष आदमियों को इस तरह तंग क्यों किया जाता है?

खुफिया पुलिसवालों की तो मुझे कोई तकलीफ नहीं मालूम हुई, पर रेल की भीड़ की तकलीफ का मुझे लाहौर से दिल्ली के बीच कड़वे-से-कड़वे अनुभव हुआ। कराची से कलकत्ते मुझे लाहौर के रास्ते जाना था। लाहौर में ट्रेन बदलनी थी। वहाँ की ट्रेन में मेरी कही दाल गलती नहीं थी। यात्री जबरदस्ती अपना रास्ता बना लेते थे। दरबाजा बंद होता तो खिड़की में से अंदर घुस जाते थे। मुझे कलकत्ते निश्चित तारीख पर पहुँचना था। ट्रेन खो देता तो मैं कलकत्ते पहुँच न पाता। मैं जगह मिलने की आशा छोड़ बैठा था। कोई मुझे अपने डिब्बे में आने न देता था। आखिर एक मजदूर ने मुझे जगह ढूंढते देखकर कहा, 'मुझे बारह आने दो, तो जगह दिला दूँ।' मैंने कहा, 'मुझे जगह दिला दो, तो जरूर दूँगा।' बेचारा मजदूर यात्रियों से गिडगिड़ाकर कह रहा था, पर कोई मुझे लेने को तैयार न होता था। ट्रेन छूटने ही वाली थी कि एक डिब्बे के कुछ यात्रियों ने कहा, 'यहाँ जगह नहीं है, लेकिन इसके भीतर घुसा सकते हो तो घुसा दो। खड़ा रहना होगा।' मजदूर मेरी ओर देखकर बोला, 'क्यों जी?'

मैंने 'हाँ' कहा और उसने मुझे उठाकर खिड़की में अंदर डाल दिया। मैं अंदर घुसा और उस मजदूर में बारह आने कमा लिए।

मेरी रात मुश्किल से बीती। दूसरे यात्री ज्यों-त्यो करके बैठ गए। मैं ऊपरवाली बैठक की जंजीर पकड़कर दो घंटे खड़ा ही रहा। इस बीच कुछ यात्री मुझे धमकाते ही रहते थे, 'अजी, अब तक क्यों नहीं बैठते हो?' मैंने बहुतेरा समझाया कि कहीं जगह नहीं है। पर उन्हें तो मेरा खड़ा रहना ही सहन नहीं हो रहा था, यद्यपि वे ऊपर की बैठकों पर आराम से लंबे होकर पड़े थे। बार-बार मुझे परेशान करते थे। जितना मुझे परेशान करते थे, उतनी ही शांति से मैं उन्हें जवाब देता था। इससे वे कुछ शांत हुए। मेरा नाम-धाम पूछा। जब मुझे नाम बतलाना पड़ा तब वे शरमाए। मुझसे माफा माँगी और मेरे लिए अपनी बगल में जगह कर दी। 'सब्र का फल मीठा होता है, 'कहावत की मुझे याद आई। मैं बहुत थक गया था। मेरा सिर घूम रहा था। बैठने के लिए जगह की जब सचमुच जरूरत थी तब ईश्वर ने दिला दी।

इस तरह मैं टकराता और धक्कामुक्की की बरदाश्त करता हुआ समय पर कलकत्ते पहुँच गया। कासिम बाजार के महाराज में मुझे अपने यहाँ उतरने का निमंत्रण दे रखा था। कलकत्ते की सभा के अध्यक्ष भी वही थे। कराची की ही तरह कलकत्ते में भी लोगों का उत्साह उमड़ा पडता था। कुछ अंग्रेज भी सभा में उपस्थित थे।

इकतीसवीं जुलाई के पहले गिरमिट की प्रथा बंद होने की सरकारी घोषणा हुई। सन 1894 में इस प्रथा का विरोध करनेवाला पहला प्रार्थना पत्र मैंने तैयार किया था और यह आशा रखी थी कि किसी दिन यह 'अर्ध-गुलामी' अवश्य ही रद्द होगी। 1894 से शुरू किए गए इस प्रयत्न में बहुतों ने सहायता की। पर यह कहे बिना नहीं रहा जाता कि इसके पीछे शुद्ध सत्याग्रह था।

इसका विशेष विवरण और इसमें भाग लेनेवाले पात्रों की जानकारी पाठकों को 'दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास' में अधिक मिलेगी।


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