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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 13. बिहारी सरलता पीछे     आगे

मौलाना मजहरुल हक और मोहन दास करमचंद गांधी एक समय लंदन में पढ़ते थे। उसके बाद बंबई में सन 1915 की कांग्रेस में मिले थे। उस साल वे मुस्लिम लीग के अध्यक्ष थे। उन्होंने पुराना पहचान बताकर कहा था कि आप कभी पटना आए, तो मेरे घर अवश्य पधारिए। इस निमंत्रण के आधार पर मैंने उन्हें पत्र लिखा और अपना काम बतलाया। वे तुरंत अपनी मोटर लाए और मुझे अपने घर ले चलने का आग्रह किया। मैंने उनका आभार माना और उनसे कहा कि जिस जगह मुझे जाना है वहाँ के लिए पहली ट्रेन से रवाना कर दे। रेलवे गाइड से कुछ पता नहीं चल सकता था। उन्होंने राजकुमार शुक्ल से बातें की और सुझाया कि पहले मुझे मुजफ्फरपुर जाना चाहिए। उसी दिन मुजफ्फरपुर की ट्रेन जाती थी। उन्होंने मुझे उसमें रवाना कर दिया। उन दिनों आचार्य कृपलानी मुजफ्फरपुर में रहते थे। मैं उन्हें जानता था। जब मैं हैदराबाद गया था तब उनके महान त्याग की, उनके जीवन की और उनके पैसे से चलनेवाले आश्रम की बात डॉ. चोइथराम के मुँह से सुनी थी। वे मुजफ्फरपुर कॉलेज में प्रोफेसर थे। इस समय प्रोफेसरी छोड़ चुके थे। मैंने उन्हें तार किया। ट्रेन आधी रात को मुजफ्फरपुर पहुँचती थी। वे अपने शिष्य-मंडल के साथ स्टेशन पर आए थे। पर उनके घरबार नहीं था। वे अध्यापक मलकानी के यहाँ रहते थे। मुझे उनके घर ले गए। मलकानी वहाँ के कॉलेज में प्रोफेसर थे। उस समय के वातावरण में सरकारी कॉलेज के प्रोफेसर का मुझे अपने यहाँ टिकाना असाधारण बात मानी जाएगी।

कृपालानी जी ने बिहार की और उसमें भी तिरहुत विभाग की दीन दशा की बात की और मेरे काम की कठिनाई की कल्पना दी। कृपालानीजी ने बिहारवालों के साथ घनिष्ठ संबंध जोड़ लिया था। उन्होंने उन लोगों से मेरे काम का जिक्र कर रखा था। सबेरे वकीलों का एक छोटा सा दल मेरे पास आया। उनमें से रामनवमीप्रसाद मुझ याद रह गए है। उन्होंने अपने आग्रह से मेरा ध्यान आकर्षित किया था। उन्होंने कहा, 'आप जो काम करने आए है, आपको तो हम-जैसो के यहाँ ठहरना चाहिए। गयाबाबू यहाँ के प्रसिद्ध वकील है। उनकी ओर से मैं आग्रह करता हूँ कि आप उनके घर ठहरिए। हम सब सरकार से डरते जरूर है। लेकिन हमसे जितनी बनेगी उतनी मदद हम आपकी करेंगे। राजकुमार शुक्ल की बहुत सी बातें सच है। दु:ख इस बात का है कि आज हमारे नेता यहाँ नहीं है। बाबू ब्रजकिशोरप्रसाद और राजेंद्रप्रसाद को मैंने तार किए है। दोनों तुरंत यहाँ आ जाएँगे और आपको पूरी जानकारी व मदद दे सकेंगे। मेहरबानी करके आप गयाबाबू के यहाँ चलिए।'

इस भाषण से मैं ललचाया। इस डर से कि कहीं मुझे अपने घर में ठहराने से गयाबाबू कठिनाई में न पड़ जाए, मुझे संकोच हो रहा था। पर गयाबाबू ने मुझे निश्चिंत कर दिया।

मैं गयाबाबू के घर गया। उन्होंने और उनके परिवारवालो ने मुझे अपने प्रेम से सराबोर कर दिया।

ब्रजकिशोरबाबू दरभंगा से आए। राजेंद्रबाबू पुरी से आए। यहाँ जिन्हे देखा वे लखनऊवाले ब्रजकिशोरप्रसाद नहीं थे। उनमें बिहारवासी की नम्रता, सादगी, भलमनसी, असाधारण श्रद्धा देखकर मेरा हृदय हर्ष से छलक उठा। बिहार के वकील मंडल का आदर भाव देखकर मुझे सानंद आश्चर्य हुआ।

इस मंडल के और मेरे बीच जीवनभर की गाँठ बंध गई।

ब्रजकिशोरबाबू ने मुझे सारी हकीकत की जानकारी दी। वे गरीब किसानों के लिए मुकदमे लड़ते थे। ऐसे दो मुकदमे चल रहे थे। इस तरह मुकदमों की पैरवी करके वे थोड़ा व्यक्तिगत आश्वासन प्राप्त कर लिया करते थे। कभी-कभी उसमें भी विफल हो जाते थे। इन भोले किसानों से फीस तो वे लेते ही थे। त्यागी होते हुए भी ब्रजकिशोरबाबू अथवा राजेंद्रबाबू मेहनताना लेने में कभी संकोच नहीं करते थे। उनकी दलील यह थी कि पेशे के काम में मेहनताना न ले, तो उनका घरखर्च न चले और वे लोगों की मदद भी न कर सकें। उनके मेहनताने के और बंगाल तथा बिहार के बारिस्टरों को दिए जानेवाले मेहनताने के कल्पना में न आ सकनेवाले आंकड़े सुनकर मेरा दम घुटने लगा।

' ... साहब को हमने ओपिनियन (सम्मति) के लिए दस हजार रुपए दिए।' हजारों के सिवा तो मैंने बात ही न सुनी।

इस मित्र मडली ने इस विषय में मेरा मीठा उलाहना प्रेमपूर्वक सुन लिया। उसका उन्होंने गलत अर्थ नहीं लगाया।

मैंने कहा, 'इन मुकदमों को पढ़ जाने के बाद मेरी राय तो यह बनी है कि अब हमें मुकदमे लड़ना ही बंद कर देना चाहिए। ऐसे मुकदमों से लाभ बहुत कम होता है। यहाँ रैयत इतनी कुचली गई है, जहाँ सब इतने भयभीत रहते है, वहाँ कचहरियों की मारफत थोड़ा ही इलाज हो सकता है। लोगों के लिए सच्ची दवा तो उनके डर को भगाना है। जब तक यह 'तीन कठिया' प्रथा रद्द न ही, तब तक हम चैन से बैठ ही नहीं सकते। मैं तो दो दिन में जितना देखा जा सके उतना देखने आया हूँ। लेकिन अब देख रहा हूँ कि यह काम तो दो वर्ष भी ले सकता है। इतना समय भी लगे तो मैं देने को तैयार हूँ। मुझे यह तो सूझ रहा है कि इस काम के लिए क्या करना चाहिए। लेकिन इसमें आपकी मदद जरूरी है।'

ब्रजकिशोरबाबू को मैंने बहुत ठंडे दिमाग का पाया। उन्होंने शांति से उत्तर दिया, 'हमसे जो मदद बनेगी, हम देंगे। लेकिन हमें समझाइए कि आप किस प्रकार की मदद चाहते है।'

इस बातचीत में हमने सारी रात बिता दी। मैंने कहा, 'मुझे आपकी वकालत की शक्ति का कम ही उपयोग होगा। आपके समान लोगों से तो मैं लेखक और दुभाषिए का काम लेना चाहूँगा। मैं देखता हूँ कि इसमें जेल भी जाना पड़ सकता है। मैं इसे पसंद करूँगा कि आप यह जोखिम उठाए। पर आप उसे उठाना न चाहे, तो भले न उठाए। वकालत छोड़कर लेखक बनने और अपने धंधे को अनिश्चित अविधि के लिए बंद करने की माँग करके मैं आप लोगों से कुछ कम नहीं माँग रहा हूँ। यहाँ कि हिंदी बोली समझने में मुझे कठिनाई होती है। कागज-पत्र सब कैथी में या उर्दू में लिखें होते है, जिन्हें मैं नहीं पढ़ सकता। इनके तरजुमें की मैं आपसे आशा रखता हूँ। यह काम पैसे देकर कराना हमारे बस का नहीं है। यह सब सेवाभाव से और बिना पैसे के होना चाहिए।'

ब्रजकिशोरबाबू समझ गए, किंतु उन्होंने मुझसे और अपने साथियों से जिरह शुरू की। मेरी बातों के फलितार्थ पूछे। मेरे अनुमान के अनुसार वकीलों को किस हद तक त्याग करना चाहिए, कितनों की आवश्यकता होगी, थोड़े-थोड़े लोग थोड़ी-थोड़ी मुद्दत के लिए आवे तो काम चलेगा या नहीं, इत्यादि प्रश्न मुझसे पूछे। वकीलों से उन्होंने पूछा कि वे कितना त्याग कर सकते है।

अंत में उन्होंने अपना यह निश्चय प्रकट किया, 'हम इतने लोग आप जो काम हमें सौपेंगे, वह कर देने के लिए तैयार रहेंगे। इनमें से जितनो को आप जिस समय चाहेंगे उतने आपके पास रहेंगे। जेल जाने की बात नई है। उसके लिए हम शक्ति-संचय करने की कोशिश करेंगे।'


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