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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 14. अहिंसा देवी का साक्षात्कार? पीछे     आगे

मुझे तो किसानों की हालत की जाँच करनी थी। नील के मालिकों के विरुद्ध जो शिकायतें थी, उनमें कितनी सचाई है यह देखना था। इस काम के लिए हजारों किसानों से मिलने की जरूरत थी। किंतु उनके संपर्क में आने से पहले मुझे यह आवश्यक मालूम हुआ कि मैं नील के मालिकों की बात सुन लूँ और कमिश्नर से मिल लूँ। मैंने दोनों को चिट्ठी लिखी।

मालिकों के मंत्री के साथ मेरी जो मुलाकात हुई, उसमें उसने साफ कह दिया कि आपकी गिनती परदेशी में होती है। आपको हमारे और किसानों के बीच दखल नहीं देना चाहिए। फिर भी अगर आपको कुछ कहना हो, तो मुझे लिखकर सूचित कीजिए। मैंने मंत्री से नम्रतापूर्वक कहा कि मैं अपने को परदेशी नहीं मानता और किसान चाहे तो उनकी स्थिति की जाँच करने का मुझे पूरा अधिकार है। मैं कमिश्नर साहब से मिला। उन्होंने मुझे धमकाना शुरू कर दिया और मुझे सलाह दी कि मैं आगे बढ़े बिना तिरहुत छोड़ दूँ।

मैंने सारी बातें साथियों को सुनाकर कहा कि संभव है सरकार मुझे जाँच करने से रोके और जेल जाने का समय मेरी अपेक्षा से भी पहले आ जाए। अगर गिरफ्तारी होनी ही है, तो मुझे मोतीहारी में और संभव हो तो बेतिया में गिरफ्तार होना चाहिए और इसके लिए वहाँ जल्दी से जल्दी पहुँच जाना चाहिए।

चंपारन तिरहुत विभाग का एक जिला है और मोतीहारी इसका मुख्य शहर। बेतिया के आसपास राजकुमार शुक्ल का घर था और उसके आसपास की कोठियों के किसान ज्यादा-से-ज्यादा कंगाल थे। राजकुमार शुक्ल को उनकी दशा दिखाने का लोभ था और मुझे अब उसे देखने की इच्छा थी।

अतएव मैं उसी दिन साथियों को लेकर मोतीहारी के लिए रवाना हो गया। मोतीहारी में गोरखबाबू ने आश्रय दिया और उनका घर धर्मशाला बन गया। हम सब मुश्किल से उसमें समा सकते थे। जिस दिन हम पहुँचे उसी दिन सुना कि मोतीहारी से कोई पाँच मील दूर रहनेवाले एक किसान पर अत्याचार किया गया है। मैंने निश्चय किया कि धरणीधरप्रसाद वकील को साथ लेकर मैं दूसरे दिन सबेरे उसे देखने जाऊँगा। सवेरे हाथी पर सवार होकर हम चल पड़े। चंपारन में हाथी का उपयोग लगभग उसी तरह होता है, जिस तरह गुजरात में बैलगाड़ियों का। आधे रास्ते पहुँचे होंगे कि इतने में पुलिस सुपरिंटेंडेंट का आदमी आ पहुँचा और मुझे से बोला, 'सुपरिंटेंडेंट ने आपको सलाम भेजा है।' मैं समझ गया। धरणीधरबाबू से मैंने आगे जाने को कहा। मैं उस जासूस के साथ उसकी भाड़े की गाड़ी में सवार हुआ।

उसने मुझे चंपारन छोड़कर चले जाने की नोटिस दी। वह मुझे घर ले गया और मेरी सही माँगी। मैंने जवाब दिया कि मैं चंपारन छोड़ना नहीं चाहता, मुझे तो आगे बढ़ना है और जाँच करनी है। निर्वासन की आज्ञा का अनादर करने के लिए मुझे दूसरे ही दिन कोर्ट में हाजिर रहने का समन मिला।

मैंने सारी रात जागकर जो पत्र मुझे लिखने थे लिखें और ब्रजकिशोरबाबू को सब प्रकार की आवश्यकता सूचनाएँ दी।

समन की बात एकदम चारों ओर फैल गई। लोग कहते थे कि उस दिन मोतीहारी में जैसा दृश्य देखा गया वैसा पहले कभी न देखा गया था। गोरखबाबू के घर भीड़ उमड़ पड़ी। सौभाग्य से मैंने अपना सारा काम रात को निबटा लिया था। इसलिए मैं इन भीड़ को सँभाल सका। साथियों का मूल्य मुझे पूरा-पूरा मालूम था। वे लोगों को संयत रखने में जुट गए। कचहरी में जहाँ जाता वहाँ दल के दल लोग मेरे पीछे आते। कलेक्टर, मेंजिस्ट्रेट, सुपरिंटेंडेंट आदि के साथ भी मेरा एक प्रकार का संबंध स्थापित हो गया। सरकारी नोटिसों वगैरा के खिलाफ कानूनी विरोध करना चाहता, तो मैं कर सकता था। इसके बदले मैंने उनकी सब नोटिसों को स्वीकार कर लिया और अधिकारियों के साथ निजी व्यवहार में मिठास से काम लिया। इसमें वे समझ गए कि मुझे उनका विरोध नहीं करना है, बल्कि उनकी आज्ञा का विनयपूर्वक विरोध करना है। इससे उनमें एक प्रकार की निर्भयता आ गई। मुझे तंग करने के बदले उन्होंने लोगों को काबू में रखने में मेरी और मेरे साथियों की सहायता का प्रसन्न्ता पूर्वक उपयोग किया। किंतु साथ ही वे समझ गए कि उनकी सत्ता आज से लुप्त हुई। लोग क्षणभर को दंड का भय छोड़कर अपने नए मित्र के प्रेम की सत्ता के अधीन हो गए।

याद रहे कि चंपारन में मुझे कोई पहचानता न था। किसान वर्ग बिलकुल अनपढ़ था। चंपारन गंगा के उस पार ठेठ हिमालय की तराई में नेपाल का समीपवर्ती प्रदेश है, अर्थात नई दुनिया है। वहाँ न कहीं कांग्रेस का नाम सुनाई देता था, न कांग्रेस के कोई सदस्य दिखाई पड़ते थे। जिन्होंने नाम सुना था वे कांग्रेस का नाम लेने में अथवा उसमें सम्मिलित होने से डरते थे। आज कांग्रेस के नाम के बिना कांग्रेस के सवेकों ने इस प्रदेश में प्रवेश किया और कांग्रेस की दुहाई फिर गई।

साथियों से परामर्श करके मैंने निश्चय किया था कि कांग्रेस के नाम से कोई भी काम न किया जाए। हमें नाम से नहीं बल्कि काम से मतलब है। 'कथनी नहीं' 'करनी' की आवश्यकता है। कांग्रेस का नाम यहाँ अप्रिय है। इस प्रदेश में कांग्रेस का अर्थ है, वकीलों की आपसी खींचातानी, कानूनी गलियों से सटक जाने की कोशिश। कांग्रेस यानी कथनी एक, करनी दूसरी। यह धारणा सरकार की और सरकार की निलहे गोरों की थी। हमें यह सिद्ध करना था कि कांग्रेस ऐसी नहीं है, कांग्रेस तो दूसरी चीज है। इसलिए हमने कहीं भी कांग्रेस का नाम तक न लेने और लोगों को कांग्रेस की भौतिक देह का परिचय न कराने का निश्चय किया था। हमने यह सोच लिया था कि वे उसके अक्षर को न जानकर उसकी आत्मा को जाने और उसका अनुकरण करे तो बस है। यही असल चीज है। अतएव कांग्रेस की ओर से किन्ही गुप्त या प्रकट दूतों द्वारा कोई भूमिका तैयार नहीं कराई गई थी। राजकुमार शुक्ल में हजारों लोगों में प्रवेश करने की शक्ति नहीं थी। उनके बीच किसी में आज तक राजनीति का काम किया ही नहीं था। चंपारन के बाहर की दुनिया को वे आज भी नहीं जानते थे। फिर भी उनका और मेरा मिलाप पुराने मित्रों जैसा लगा। अतएव यह करने में अतिशयोक्ति नहीं बल्कि अक्षरशः सत्य है कि इस कारण मैंने वहाँ ईश्वर का, अहिंसा का और सत्य का साक्षात्कार किया। जब मैं इस साक्षात्कार के अपने अधिकार की जाँच करता हूँ, तो मुझे लोगों के प्रति अपने प्रेम के सिवा और कुछ भी नहीं मिलता। इस प्रेम का अर्थ है, प्रेम अर्थात अहिंसा के प्रति मेरी अविचल श्रद्धा।

चंपारन का यह दिन मेरे जीवन में कभी न भूलने जैसा था। मेरे लिए और किसानों के लिए यह एक उत्सव का दिन था। सरकारी कानून के अनुसार मुझ पर मुकदमा चलाया जानेवाला था। पर सच पूछा जाए तो मुकदमा सरकार के विरुद्ध था। कमिश्नर ने मेरे विरुद्ध जो जाल बिछाया था उसमें उसने सरकार को ही फँसा दिया।


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