hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 18. ग्राम-प्रवेश पीछे     आगे

प्रायः प्रत्येक पाठशाला में एक पुरुष और एक स्त्री की व्यवस्था की गई थी। उन्हीं के द्वारा दवा और सफाई के काम करने थे। स्त्रियों की मारफत स्त्री-समाज में प्रवेश करना था। दवा का काम बहुत सरल बना दिया था। अंडी का तेल, कुनैन और एक मरहम - इतनी ही चीजें प्रत्येक पाठशाला में रखी जाती थी। जाँचने पर जीभ मैली दिखाई दे और कब्ज की शिकायत हो तो अंड़ी का तेल पिला देना। बुखार की शिकायत हो तो अंडी का तेल देने के बाद आनेवाले को कुनैन पिला देना। और अगर फोड़े हो तो उन्हें धोकर उनपर मरहम लगा देना। खाने की दवा अथवा मरहम के साथ ले जाने के लिए शायद ही दिया जाता था। कहीं कोई खतरनाक या समझ में न आनीवाली बीमारी होती, तो वह डॉ. देव को दिखाने के लिए छोड़ दी जाती। डॉ. देव अलग-अलग जगह में नियत समय पर हो आते थे। ऐसी सादी सुविधा का लाभ लोग ठीक मात्रा में उठाने लगे थे। आम तौर से होनेवाली बीमारियों थोड़ी ही है और उनके लिए बड़े-बड़े विशारदो की आवश्यकता नहीं होती। इसे ध्यान में रखा जाए, तो उपर्युक्त रीति से की गई व्यवस्था किसी को हास्यजनक प्रतीत नहीं होगी। लोगों को तो नहीं ही हुई।

सफाई का काम कठिन था। लोग गंदगी दूर करने के लिए तैयार नहीं थे। जो लोग रोज खेतों की मजदूरी करते थे वे भी अपने हाथ से मैला साफ करने के लिए तैयार न थे। डॉ. देव हार मान लेनेवाले आदमी न थे। उन्होंने और स्वयंसेवकों ने अपने हाथ से एक गाँव की सफाई की, लोगों के आँगनो से कचरा साफ किया, कुओं के आसपास के गड्ढ़े भरे, कीचड़ निकाला और गाँववालो को स्वयंसेवक देने की बात प्रेम-पूर्वक समझाते रहे। कुछ स्थानों में लोगों ने शरम में पड़कर काम करना शुरू किया और कहीं-कहीं तो लोगों ने मेरी मोटर आने-जाने के लिए अपनी मेहनत से सड़के भी तैयार कर दी। ऐसे मीठे अनुभवों के साथ ही लोगों की लापरवाही के कड़वे अनुभव भी होते रहते थे। मुझे याद है कि कुछ जगहों में लोगों ने अपनी नाराजी भी प्रकट की थी।

इस अनुभवों में से एक, जिसका वर्णन मैंने स्त्रियों की कई सभाओं में किया है, यहाँ देना अनुचित न होगा। भीतिहरवा एक छोटा से गाँव था। उसके पास उससे भी छोटा एक गाँव था। वहाँ कुछ बहनों के कपड़े बहुत मैंले दिखाई दिए। इन बहनों को कपड़े बदलने के बारे में समझाने के लिए मैंने कस्तूरबाई से कहा। उसने उन बहनों से बात की। उनमें से एक बहन कस्तूरबाई को अपनी झोंपड़ी में ले गई और बोली, 'आप देखिए, यहाँ कोई पेटी या आलमारी नहीं है कि जिसमें कपड़े बंद हो। मेरे पास यही एक साड़ी है, जो मैंने पहन रखी है। इसे मैं कैसे धो सकती हूँ? महात्माजी से कहिए कि वे कपड़े दिलवाए। उस दशा में मैं रोज नहाने और कपड़े बदलने को तैयार रहूँगी।' हिंदुस्तान में ऐसे झोपड़े में साज-सामान, संदूक-पेटी, कपड़े लत्ते, कुछ नहीं होते और असंख्य लोग केवल पहने हुए कपड़ो पर ही अपना निर्वाह करते है।

एक दूसरा अनुभव भी बताने-जैसा है। चंपारन में बाँस या घास की कमी नहीं रहती। लोगों ने भीतिहरवा में पाठशाला का जो छप्पर बनाया था, वह बाँस और घास का था। किसी ने उसे रात को जला दिया। संदेह तो आसपास के निलहों के आदमियों पर हुआ था। फिर से बाँस और घास का मकान बनाना मुनासिब मालूम नहीं हुआ। यह पाठशाला श्री सोमण और कस्तूरबाई के जिम्मे थी। श्री सोमण ने ईटों का पक्का मकान बनाने का निश्चय किया और उनके स्वपरिश्रम की छूत दूसरों को लगी, जिससे देखते-देखते ईटों का मकान तैयार हो गया और फिर से मकान के जलजाने का डर न रहा।

इस प्रकार पाठशाला, सफाई और औषधोपचार के कामों से लोगों में स्वयंसेवकों के प्रति विश्वास और आदर की वृद्धि हुई और उन पर अच्छा प्रभाव पड़ा।

पर मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस काम को स्थायी रूप देने का मेरा मनोरथ सफल न हो सका। जो स्वयंसेवक मिले थे, वे एक निश्चित अवधि के लिए ही मिले थे। दूसरे नए स्वयंसेवकों को मिलने में कठिनाई हुई और बिहार से इस काम के लिए योग्य सेवक न मिल सके। मुझे भी चंपारन का काम पूरा होते-होते एक दूसरा काम, जो तैयार हो रहा था, घसीट ले गया। इतने पर भी छह महीनों तक हुए इस काम ने इतनी जड़ पकड ली कि एक नहीं तो दूसरे स्वरूप में उसका प्रभाव आज तक बना हुआ है।


>>पीछे>> >>आगे>>