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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 20. मजदूरों के संपर्क में पीछे     आगे

चंपारन में अभी मैं समिति के काम को समेट ही रहा था कि इतने में खेड़ा से मोहनलाल पंड्या और शंकरलाला परीख का पत्र आया कि खेड़ा जिले में फसल नष्ट हो गई है और लगान माफ कराने की जरूरत है। उन्होंने आग्रह पूर्वक लिखा कि मैं वहाँ पहुँचू और लोगों की रहनुमाई करूँ। मौके पर जाँच किए बिना कोई सलाह देने की मेरी इच्छा नहीं थी, न मुझे में वैसी शक्ति या हिम्मत ही थी।

दूसरी ओर से श्री अनसुयाबाई का पत्र उनके मजदूर संघ के बारे में आया था। मजदूरों की तनख्वाहें कम थी। तनख्वाह बढ़ाने की उनकी माँग बहुत पुरानी थी। इस मामले में उनकी रहनुमाई करने का उत्साह मुझ में था। लेकिन मुझ में यह क्षमता न थी कि इस अपेक्षाकृत छोटे प्रतीत होनेवाले काम को भी मैं दूर बैठकर कर सकूँ। इसलिए मौका मिलते ही मैं पहले अहमदाबाद पहुँचा। मैंने यह सोचा कि दोनों मामलों की जाँच करके थोड़े समय में मैं वापस चंपारन पहुँचूँगा और वहाँ के रचनात्मक काम की देखरेख करूँगा।

पर अहमदाबाद पहुँचने के बाद वहाँ ऐसे काम निकल आए कि मैं कुछ समय तक चंपारन नहीं जा सका और जो पाठशालाए वहाँ चल रही थी वे एक एक करके बंद हो गई। साथियों ने और मैंने कितने ही हवाई किले रचे थे, पर बस कुछ समय के लिए तो वे सब ढह ही गए।

चंपारन में ग्राम पाठशालाओं और ग्राम सुधार के अलावा गोरक्षा की काम भी मैंने हाथ में लिखा था। गोरक्षा और हिंदी प्रचार के काम का इजारा मारवाड़ी भाइयों ने ले रखा है, इसे मैं अपने भ्रमण में देख चुका था। बेतिया में एक मारवाड़ी सज्जन ने अपनी धर्मशाला में मुझे आश्रय दिया था। बेतिया के मारवाड़ी सज्जनों ने मुझे अपनी गोरक्षा के काम में फाँद लिया था। गोरक्षा के विषय में मेरी जो कल्पना आज है, वही उस समय बन चुकी थी। गोरक्षा का अर्थ है, गोवंश की वृद्धि, गोजाति का सुधार, बैल से मर्यादित काम लेना, गोशाला को आदर्श दुग्धालय बनाना, आदि आदि। इस काम में मारवाड़ी भाइयों ने पूरी मदद देने का आश्वासन दिया था। पर मैं चंपारन में स्थिर होकर रह न सका, इसलिए वह काम अधूरा ही रह गया।

बेतिया में गोशाला तो आज भी चलती है पर वह आदर्श दुग्धालय नहीं बन सकी है। चंपारन के बैलों से आज भी उनकी शक्ति से अधिक काम लिया जाता है। नामधारी हिंदू आज भी बैलों को निर्दयता पूर्वक पीटते है और धर्म को बदनाम करते है। यह कसक मेरे मन में सदा के लिए रह गई। और, जब जब मैं चंपारन जाता हूँ तब तब इन अधूरे कामों का स्मरण करके लंबी साँस लेता हूँ और उन्हें अधूरा छोड़ देने के लिए मारवाड़ी भाइयों और बिहारियों का मीठा उलाहना सुनता हूँ।

पाठशालाओं का काम को एक या दूसरी रीति से अन्य स्थानों में चल रहा है, पर गोसेवा के कार्यक्रम ने जड़ ही नहीं पकड़ी थी, इसलिए उसे सही दिशा में गति न मिल सकी।

अहमदाबाद में खेड़ा जिले के काम के बारे में सलाह मशविरा हो ही रहा था कि इस बीच मैंने मजदूरों का काम हाथ में ले लिया।

मेरी स्थिति बहुत ही नाजुक थी। मजदूरों का मामला मुझे मजबूत मालूम हुआ। श्री अनसूयाबाई को अपने सगे भाई के साथ लड़ना था। मजदूरों और मालिकों के बीच के इस दारुण युद्ध में श्री अंबालाल साराभाई ने मुख्य रूप से हिस्सा लिया था। मिल मालिकों के साथ मेरा मीठा संबंध था।

उनके विरुद्ध लड़ने का काम विकट था। उनसे चर्चाएँ करके मैंने प्रार्थना की कि वे मजदूरों की माँग के संबंध में पंच नियुक्त करे। किंतु मालिकों ने अपने और मजदूरों के बीच पंच के हस्ताक्षेप की आवश्यकता को स्वीकार न किया।

मैंने मजदूरों को हड़ताल करने की सलाह दी। यह सलाह देने से पहले मैं मजदूरों और मजदूर नेताओं के संपर्क में अच्छी तरह आया। उन्हें हड़ताल की शर्तें समझाईं :

1. किसी भी दशा में शांति भंग न होने दी जाए।

2. जो मजदूर काम पर जाना चाहे उसके साथ जोर जबरदस्ती न की जाए।

3. मजदूर भिक्षा का अन्न न खाए।

4. हड़ताल कितनी ही लंबी क्यों न चले, वे दृढ़ रहे और अपने पास पैसा न रहे तो दूसरी मजदूरी करके खाने योग्य कमा लें।

मजदूर नेताओं ने ये शर्तं समझ ली और स्वीकार कर ली। मजदूरों की आम सभा हुई और उसमें उन्होंने निश्चय किया कि जब तक उनकी माँग मंजूर न की जाए अथवा उसकी योग्यता अयोग्यता की जाँच के लिए पंच की नियुक्ति न हो तब तक वे काम पर नहीं जाएँगे।

कहना होगा कि इस हड़ताल के दौरान में मैं श्री वल्लभभाई पटेल और श्री शंकरलाल बैकर को यथार्थ रूप मैं पहचानने लगा। श्री अनसूयाबाई का परिचय तो मुझे इसके पहले ही अच्छी तरह हो चुका था। हडतालियो की सभा रोज साबरमती नदी के किनारे एक पेड़ का छाया तले होने लगी। उसमें वे लोग सैकड़ो की तादाद में जमा होते थे। मैं उन्हें रोज प्रतिज्ञा का स्मरण कराता तथा शांति बनाए रखने और स्वाभिमान समझाता था। वे अपना 'एक टेक' का झंडा लेकर रोज शहर में घूमते थे और जुलूस के रूप में सभा में हाजिर होते थे।

यह हड़ताल इक्कीस दिन तक चली। इस बीच समय समय पर मैं मालिकों से बातचीत किया करता था और उन्हें इंसाफ करने के लिए मनाता था। मुझे यह जवाब मिलता, 'हमारी भी तो टेक है न? हममें और हमारे मजदूरों में बाप बेटे का संबंध है। उसके बीच में कोई दखल दे तो हम कैसे सहन करे? हमारे बीच पंच कैसे?'


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