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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 21. आश्रम की झाँकी पीछे     आगे

मजदूरों की बात को आगे बढ़ाने से पहले यहाँ आश्रम की झाँकी कर लेना आवश्यक है। चंपारन में रहते हुए भी मैं आश्रम को भूल नहीं सकता था। कभी-कभी वहाँ हो भी आता था।

कोचरब अहमदाबाद के पास एक छोटा सा गाँव है। आश्रम का स्थान इस गाँव में था। कोचरब में प्लेग शुरू हुआ। आश्रम के बालकों को मैं उइस बस्ती के बीच सुरक्षित नहीं रख सकता था। स्वच्छता के नियमों का अधिक से अधिक सावधानी से पालन करने पर भी आसपास की अस्वच्छता से आश्रम को अछूता रखना असमभव था। कोचरब के लोगों से स्वच्छता के नियमों का पालन कराने की अथवा ऐसे समय उनकी सेवा करने की हममें शक्ति नहीं थी, हमारा आदर्श तो यह था कि आश्रम को शहर या गाँव से अलग रखे, फिर भी वह इतना दूर न हो कि वहाँ पहुँचने में बहुत कठिनाई हो। किसी न किसी दिन तो आश्रम को आश्रम के रूप में सुशोभित होने से पहले अरनी जमीन पर खुली जगह में स्थिर होना ही था।

प्लेग को मैंने कोचरब छोड़ने की नोटिस माना। श्री पूंजाभाई हीराचंद आश्रम के साथ बहुत निकट का संबंध रखते थे और आश्रम की छोटी बड़ी सेवा शुद्ध और निरभिमान भाव से करते थे। उन्हें अहमदाबाद के कारबारी जीवन का व्यापक अनुभव था। उन्होंने आश्रम के लिए जमीन खोज तुरंत ही कर लेने का बीड़ा उठाया। कोचरब के उत्तर दक्षिण के भाग में मैं उनके साथ घूमा। फिर उत्तर की ओर तीन चार मील दूर कोई टुक़डा मिल जाए तो उसका पता लगाने की बात मैंने उनसे कही। उन्होंने आज की आश्रमवाली जमीन का पता लगा लिया। वह जेल के पास है, यह मेरे लिए खास प्रलोभन था। सत्याग्रह आश्रम में रहनेवाले के भाग्य में जेल तो लिखा ही होता है। अपनी इस मान्यता के कारण जेल का पड़ोस मुझे पसंद आया। मैं यह तो जानता ही था कि जेल के लिए हमेशा वही जगह पसंद की जाती है जहाँ आसपास स्वच्छ स्थान हो।

कोई आठ दिन के अंदर ही जमीन का सौदा तय कर लिया। जमीन पर न तो कोई मकान था, न कोई पेड़। जमीन के हक में नदी का किनारा और एकांत ये दो बड़ी सिफारिशे थी। हमने तंबुओं में रहने का निश्चय किया और सोचा कि रसोईघर के लिए टीन का एक कामचलाऊ छप्पर बाँध लेंगे और धीरे धीरे स्थायी मकान बनाना शुरू कर देंगे।

इस समय आश्रम की बस्ती बढ़ गई थी। लगभग चालीस छोटे-बढ़े स्त्री-पुरुष थे। सुविधा यह थी कि सब एक ही रसोईघर में खाते थे। योजना का कल्पना मेरी थी। उसे अमली रूप देने का बोझ उठानेवाले तो नियमानुसार स्व. मगललाल गांधी ही थे।

स्थायी मकान बनने से पहले की कठिनाइयों का पार न था। बारिश का मौसम सामने था। सामान सब चार मील दूर शहर से लाना होता था। इस निर्जन भूमि में साँप आदि हिंसक जीव तो थे ही। ऐसी स्थिति में बालकों की सार सँभाल को खतरा मामूली नहीं था। रिवाज यह था कि सर्पादि को मारा न जाए लेकिन उनके भय से मुक्त तो हममें से कोई न था, आज भी नहीं है।

फीनिक्स, टॉल्सटॉय फार्म और साबरमती आश्रम तीनों जगहों में हिंसक जीवो को न मारने का यथाशक्ति पालन किया गया है। तीनों जगहों में निर्जन जमीनें बसानी पड़ी थी। कहना होगा कि तीनों स्थानों में सर्पादि का उपद्रव काफी था। तिस पर भी आज तक एक भी जान खोनी नहीं पड़ी। इसमें मेरे समान श्रद्धालु को तो ईश्वर के हाथ का, उसकी कृपा का ही दर्शन होता है। कोई यह निरर्थक शंका न उठावे कि ईश्वर कभी पक्षपात नहीं करता, मनुष्य के दैनिक कामों में दखल देने के लिए यह बेकार नहीं बैठा है। मैं इस चीज को, इस अनुभव को, दूसरी भाषा में रखना नहीं जानता। ईश्वर की कृति को लौकिक भाषा में प्रकट करते हुए भी मैं जानता हूँ कि उसका 'कार्य' अवर्णनीय है। किंतु यदि पामर मनुष्य वर्णन करने बैठे तो उसकी अपनी तोतली बोली ही हो सकती है। साधारणतः सर्पादि को न मारने पर भी आश्रम समाज के पच्चीस वर्ष तक बचे रहने का संयोग मानने के बदले ईश्वर की कृपा मानना यदि वहम हो, तो वह वहम भी बनाए रखने जैसा है।

जब मजदूरों की हड़ताल हुई, तब आश्रम की नींव पड़ रही थी। आश्रम का प्रधान प्रवृत्ति बुनाई काम की थी। कातने की तो अभी हम खोज ही नहीं कर पाए थे। अतएव पहले बुनाईघर बनाने का निश्चय किया था। इससे उसकी नींव चुनी जा रही थी।


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