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आत्मकथा

सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
पाँचवाँ भाग

मोहनदास करमचंद गांधी

अनुवाद - काशीनाथ त्रिवेदी

अनुक्रम 23. खेड़ा-सत्याग्रह पीछे     आगे

मजदूरों की हड़ताल समाप्त होने के बाद दम लेने को भी समय न मिला और मुझे खेड़ा जिले के सत्याग्रह का काम हाथ में लेना पड़ा। खेड़ा जिले में अकाल की-सी स्थिति होने के कारण खेड़ा के पाटीदार लोग लगान माफ कराने की कोशिश कर रहे थे। इस विषय में श्री अमृतलाल ठक्कर ने जाँच करके रिपोर्ट तैयार की थी। इस बारे में कोई निश्चित सलाह देने से पहले मैं कमिश्नर से मिला। श्री मोहनलाल पंड्या और श्री शंकरलाल परीख अथक परिश्रम कर रहे थे। वे स्व. गोकलदास कहानदास पारेख और विट्टलभाई पटेल के द्वारा धारासभा में आंदोलन कर रहे थे। सरकार के पास डेप्युटेशन भी गए थे।

इस समय मैं गुजरात-सभा का सभापति था। सभा ने कमिश्नर और गवर्नर को प्रार्थना पत्र भेजे, तार भेजे, अपमान सहे। सभा उनकी धमकियों को पचा गई। अधिकारियों का उस समय का ढंग आज तो हास्यजनक प्रतीत होता है। उन दिनों का उनका अत्यंत हलका बरताव आज असंभव सा मालूम होता है।

लोगों की माँग इतनी साफ और इतनी साधारण थी कि उसके लिए लड़ाई लड़ने की जरूरत ही न होनी चाहिए थी। कानून यह था कि अगर फसल चार ही आना या उससे कम आवे, तो उस साल का लगान माफ किया जाना चाहिए। पर सरकारी अधिकारियों का अंदाज चार आने से अधिक था। लोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा रहा था कि उपज चार आने से कम कूती जानी चाहिए, पर सरकार क्यों मानने लगी? लोगों की ओर से पंच बैठाने की माँग की गई। सरकार को वह असह्य मालूम हुई। जितना अनुनय-विनय हो सकता था, सो सब कर चुकने के बाद और साथियों से परामर्श करने के पश्चात मैंने सत्याग्रह करने की सलाह दी।

साथियों में खेड़ा जिले के सेवकों के अतिरिक्त मुख्यतः श्री वल्लभभाई पटेल, श्री शंकरलाल बैकर, श्री अनसूयाबहन, श्री इंदुलाल कन्हैया याज्ञिक, श्री महादेव देसाई आदि थे। श्री वल्लभभाई अपनी बड़ी और बढ़ती हुई वकालत की बलि देकर आए थे। ऐसा कहा जा सकता है कि इसके बाद वे निश्चिंत होकर वकालत कर ही न सके।

हम नड़ियाद के अनाथाश्रम में ठहरे थे। अनाथाश्रम में ठहरने को कोई विशेषता न समझे। नड़ियाद में उसके जैसा स्वतंत्र मकान नहीं था, जिसमें इतने सारे लोग समा सकें। अंत में नीचे लिखी प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर लिए गए :

'हम जानते है कि हमारे गाँवों की फसल चार आने से कम हुई है। इस कारण हमने सरकार से प्रार्थना की कि वह लगान वसूली का काम अगले वर्ष तक मुल्तवी रखे। फिर भी वह मुल्तवी नहीं किया। अतएव हम नीचे सही करनेवाले लोग यह प्रतिज्ञा करते है कि हम सब इस साल का पूरा या बाकी रहा सरकारी लगान नहीं देंगे। पर उसे वसूल करने के लिए सरकार जो भी कानूनी कार्यवाई करना चाहेगी, हम करने देंगे और उससे होनेवाले दु:ख सहन करेंगे। यदि हमारी जमीन खालसा की गई, तो हम उसे खालसा भी होने देगे। पर अपने हाथों पैसे जमा करके हम झूठे नहीं ठहरेंगे और स्वाभिमान नहीं खोयेंगे। अगर सरकार बाकी बची हुई सब जगहों में दूसरी किस्त की वसूली मुल्तवी रखे तो हममें से जो लोग जमा करा सकते है वे पूरा अथवा बाकी रहा हुआ लगान जमा कराने को तैयार है। हममें से जो जमा करा सकते है, उनके लगान जमा न कराने का कारण यह है कि अगर समर्थ लोग जमा करा दे, तो असमर्थ लोग घबराहट में पड़कर अपनी कोई भी चीज बेचकर या कर्ज लेकर लगान जमा करा देगे और दु:ख उठाएँगे। हमारी मान्यता है कि ऐसी स्थिति में गरीबों की रक्षा करना समर्थ लोगों का कर्तव्य है।'

इस लड़ाई के लिए मैं अधिक प्रकरण नहीं दे सकता। अतएव अनेक मीठे स्मरण छोड़ देने पड़ेगे। जो इस महत्वपूर्ण लड़ाई का गहरा अध्ययन करना चाहे, उन्हें श्री शंकरलाल परीख द्वारा लिखित खेड़ा की लड़ाई का विस्तृत प्रामाणिक इतिहास पढ़ जाने की मैं शिफारिश करता हूँ।


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